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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

निजी हिन्दी चिट्ठाकारी - एक सिंहावलोकन




मैंने दस वर्ष पूर्व विक्रम संवत 2065 में चिट्ठा (blog) हिंदी में लिखना आरम्भ किया तथा उसे पूरब की माटी के अनुकरण में 'चिठ्ठा' कहा, 'ठ' का डेढ़त्व 😄। उस वर्ष मात्र एक प्रविष्टि रही । 
तब से अब तक दो मुख्य एवं अन्य चिट्ठों को मिला कर प्राय: सवा ग्यारह सौ प्रविष्टियाँ लिख चुका हूँ।
गद्य लेखन हेतु मुख्यत: 'आलसी का चिठ्ठा' है तो पद्य हेतु 'कवितायें और कवि भी'। पद्य एवं गद्य प्रविष्टियों में अनुपात ‍~ 1:2 का रहा है। 2067 सबसे उर्वर वर्ष रहा जिसमें लगभग पौने तीन सौ प्रविष्टियाँ आईं तथा पद्य एवं गद्य की लगभग समान संख्या रही। आगे के दो वर्ष संख्या घटी किन्‍तु नव्य विषयों पर नई विधाओं में रचना कर्म हुआ। 2069 के पश्चात 2070 में सहसा ही प्रविष्टि संख्या पहले की 55% रह गई, आगे के वर्षों में भी संख्या घटती चली गयी। वर्ष 2072 में मात्र 27 प्रविष्टियाँ आईं, तब से अब अति मंद गति से उठान है इस वर्ष अब तक 36 प्रविष्टियाँ हो चुकी हैं।
इन वर्षों में भाषा अनिवार्यत: संस्कृतनिष्ठ होती गयी यद्यपि पद्य में नागरी उर्दू में कुछ ऐसी रचनायें, नज़्में एवं ग़जलें भी आईं जिन्हें उस अप्रकट चुनौती का उत्तर कहा जा सकता है जिसके अनुसार उर्दू काव्य कोई शतघ्नी है। यह कहना उचित होगा कि उनका छन्द या लय विधान अनेक स्थानों पर देसी है, हिन्दी है।
महा/खण्ड काव्य के अतिरिक्त काव्य की प्राय: हर विधा में रचा। लम्बी कविता 'नरक के रस्ते' में उसका सार है जो मुझे कम्युनिस्ट मार्ग से मिला जिससे अब बहुत दूर आ चुका हूँ। इतना सब होते हुये भी मैंने सदैव अपने काव्य को ‌_विता कहा क्यों कि कवि कर्म को मैं आज कल के अर्थ में नहीं लेता।
गद्य में नाटक के अतिरिक्त प्रत्येक विधा में लिखा, बहुत लिखा। कविता एवं गद्य, दोनों में विपुल प्रयोग भी किये, जिनमें कुछ को भयानक, जुगुप्सित या बालपन भी कहा जा सकता है :) अपनी रची कहानियों को कहानी कहते हुये भी सङ्कोच होता है किन्‍तु उनके भी ग्राहक हैं ।
गद्य में कोणार्क शृंखला को पाठकों ने बहुत सराहा । मेरी समस्त सर्जनात्मकता का निचोड़ 'एक अधूरा प्रेमपत्र' एवं 'बाउ कथा', इन दो धारावाहिकों में है। विशाल किन्‍तु अधूरा 'अधूरा प्रेमपत्र' अब पाठकों को उपलब्ध नहीं है तथा बाउ कथा उपलब्ध होने पर भी ठहरी हुई है क्यों कि प्रवाह टूटने के पश्चात वह विशेष क्षण नहीं आ रहा जिसके आगे सब तट पर तज बहना पड़ता है। जहाँ तक मेरी प्रतीति है, इन दो को पढ़ने वाले भी अल्प ही मिलेंगे किन्‍तु इन दो को पुस्तक रूप में प्रकाशित किये बिना धरा से प्रयाण नहीं करना है । :)
भारतविद्या यथा रामायण, नाक्षत्रिकी, शब्द, पुराण, वेदादि पर भी बहुत लिखा एवं लिखे जा रहा हूँ।
2070 से फेसबुक एवं ट्विटर पर सक्रिय उपस्थिति है, जुड़ तो 2065 में ही गया था। इन पर कितना लिखा, आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। किसी दिन इन्हें भी खँगालना है। लगभग दो वर्ष पूर्व मघा पत्रिका में लिखना आरम्भ किया जो अनवरत चल रहा है।
अपने चिट्ठों को देखता हूँ तो वर्तनी शुद्धता 95% से नीचे नहीं लगती जिसे
 मैं अपनी एकमात्र उपलब्धि मानता हूँ। शेष तो पाठक जानें। 
चिठ्ठाकारी के आरम्भ में मैं एक द्विपदी कहता था :
' पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं,
तफसील पूछोगे तो कह दूँगा - मुझे कुछ नहीं पता। '

प्रेमकथा हो या बाउ कथा, उनके लिये लिखा करता था -
' ...एक भटकता औघड़ है जिसके आधे चेहरे चाँदनी बरसती है और आधा काजल पुता है। संसार जो भी कहे, उसे सब स्वीकार है। वह तो रहता ही अँधेरी गुफा में है जिसकी भीतों पर भी कालिख पुती है ... वह जाने क्या क्या बकता रहता है। '
तथा
' मेरे पात्र बैताल की भाँति,
चढ़ जाते हैं सिर और कंधे पर, पूछते हैं हजार प्रश्न ।
मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूँ उत्तर
...प्रतिदिन मेरा सिर हजार टुकड़े होता है।'

बड़ा ही देसी प्रकार का आत्मविश्वास था, जो आज भी बना हुआ है। मेरा मात्र यही है, मैं कोई आचार्य वाचार्य नहीं हूँ। किञ्चित समर्पण हो तो आप भी वह कर सकते हैं जो मैं इन वर्षों में करता रहा हूँ, उसकी लब्धि क्या रही, सिद्धि क्या रही, मुझे नहीं पता।
‌‌‌____________
हिन्‍दी चिट्ठों के पते ये हैं :


https://girijeshrao.blogspot.com
 https://kavita-vihangam.blogspot.com/
शब्द आधारित अंतर्जाल स्थल यह है :

 http://nirukta.in/
इनके अतिरिक्त भी हैं किन्‍तु सक्रियता अत्यल्प है। परिवार के साथ साथ उन सब का भी ऋणी हूँ जिन्हों ने सराहा, प्यार दिया, प्रोत्साहित किया तथा उपयोगी सुझाव भी दिये। 
_____________________
॥ त्वदीयं वस्तु गोविन्‍दं तुभ्यमेव समर्पये ॥

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

हिन्दी ब्लॉगरी की दशकोत्सव यात्रा - 4

अधिकांश हिन्दी ब्लॉगर अब फेसबुक पर हैं/भी हैं - 'हैं' उनके लिये जो ब्लॉग का लगभग त्याग ही कर चुके हैं; 'भी हैं' उनके लिये जो दोनों स्थानों पर अपने को स्थापित किये हुये हैं। कुछ तो ट्विटर पर भी सक्रिय हैं। आज के समय की आवश्यकता है इंटरनेट जिसे कतिपय जन अब नागरिक 'मौलिक अधिकारों' में सम्मिलित करने की माँग भी करने लगे हैं। जीवन की आपा धापी में पारम्परिक दृष्टि से देखें तो एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से दूर हुआ है किंतु एक दृष्टि से देखें तो इतना पास हुआ है जितना कभी नहीं था। भूगोल, लिंग, पंथ आदि की सीमायें ध्वस्त हो चली हैं और सोशल साइटों के द्वारा लोग बेतहाशा एक दूसरे से सम्वादित हो चले हैं। इस के नकारात्मक पहलू भी हैं लेकिन विधेयात्मक पक्ष यह है कि इसने उन्हें भी अभिव्यक्ति दे दी है जिन्हें व्यवस्था ने चुप कर रखा था। स्त्रियाँ इतनी मुखर पहले कभी नहीं हुईं! और वे आधी जनसंख्या हैं। यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन है जिसके प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र में दिखने लगे हैं।
फेसबुक या ट्विटर के 'हिट' होने के पहले सम्वाद की त्वरा की आवश्यकता की पूर्ति ब्लॉग प्लेटफार्म करता था। परिणामत: अधिक जीवन्त लगता था। इनके आने से त्वरित और लघु सम्वाद एवं उनके अन्य प्रकार ब्लॉग से हट गये। ऊबे और त्वरा की प्रचुरता के आदी जन ने ब्लॉग को बीते युग की बात घोषित कर दी एवं फेसबुक पर ‘फुल्ल' या 'प्रफुल्ल टाइमर' हो गये। हिन्दी ब्लॉगरी में ऐसा अधिक दिखा लेकिन अन्य भाषाओं से तुलना करें या आज भी स्वयं हिन्दी ब्लॉग जगत की सक्रियता और गुणवत्ता देखें तो 'बीते युग की बात' बकवाद ही लगती है। सोशल साइट और ब्लॉग एक साथ चल रहे हैं और चलते रहेंगे।
फेसबुक त्वरित है। अधिकतर विचार या अभिव्यक्ति आते हैं और बिना परिपाक हुये छप जाते हैं। विविधता और नयापन तो प्रचुर हैं लेकिन विकसित करने में समय न दिये जाने के कारण गुणवत्ता और गहराई की कमी ही दिखती है। सुतली बम कस के बाँधा न जाय तो धमाके और प्रभाव में कमी हो जाती है! यदि उन्हीं फेसबुकिया विचारों या अभिव्यक्तियों को ब्लॉग पर परिवर्धित और थोड़ा समय दे परिमार्जित कर डाला जाय तो क्या बात हो! फेसबुकिया ब्लॉगर या ब्लॉगर फेसबुकिये ध्यान दें! 
2013 में हिन्दी ब्लॉगरी के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर मैंने सोचा कि क्यों न फेसबुक के उन जनों को हिन्दी ब्लॉगरी की झलकियाँ दिखाई जायँ जो इससे अनभिज्ञ हैं? फेसबुकिया शैली में ही बिना वर्तनी या व्याकरण पर अधिक ध्यान दिये मैंने ब्लॉग जगत का परिचय देना प्रारम्भ किया तो लोग रुचि लेने लगे। मित्र निवेदन और चैट सन्देश भी मिलने लगे। मैं सनातन कालयात्री आगे बढ़ता चला गया। शिवम मिश्र ने ब्लॉग बुलेटिन पर छापना चाहा तो मैंने कहा कि डाल दीजिये [जब सामने वाला पश्चात प्रभाव झेलने को तैयार है तो अपने को क्या?] उन्हों ने ये तीन लिंक छापे: 1, 2, 3 । वह चाहें तो इसे भी अपने यहाँ कॉपी पेस्ट कर सकते हैं, वहाँ रहने पर पहुँच बढ़ेगी ही।
फेसबुक पर ही इस घोषणा के बावजूद कि
हिन्दी ब्लॉगरी के दस वर्ष पूरे होने वाले हैं। अपनी पसन्द के लेख शेयर करता रहूँगा- दशकोत्सव की अपनी विधि! इसमें कोई 'राजनैतिक या गुटीय' मंतव्य न ढूँढ़े जायँ, प्लीज! ;)'परशुराम जी' ठाकुर विश्वामित्र और बाभन वशिष्ठ प्रकरण ले आये जिससे मामला तनि एक रोचक हुआ। कुछ जन बिदके भी लेकिन टिप्पणी का सार समझते हुये पब्लिक चुप ही रही! इस स्टेट्स पर नम्बरी बिलागर समीर लाल ने लिखा: jindaabaad!! किसका जिन्दाबाद? ये तो वही जानें।
आप सब अपने अपने ब्लॉगों पर कुछ नया करें। अपने बारे में कॉलर टाइट करते रहे, पल्लू लहराते रहे; अब दूजों की सोचें। छिपो को प्रगटो करें, प्रशंसा करें, उनके योगदान को चिह्नित करें।  फागुन का महीना आ ही रहा है, नमकीन या रंगीन भी हो सकते हैं।
कविता के मारे हैं तो गद्य का लठ्ठ भाँजें, चुपो रहे हैं तो अनुराग शर्मा, अर्चना चाव जी, पद्म सिंह, सलिल वर्मा, हिन्द युग्म, रेडियो प्लेबैक इंडिया आदि के सहजोग से मुखो हो पॉडकास्ट ट्राई करें। आवाज के मामले में निश्चिंत रहें, जब मेरी आवाज को भी पसन्द किया जा सकता है तो सबके पसन्दकर्ता उपलब्ध होंगे। अस्तु, आगे बढ़ते हैं।

फिल्मों पर लिखते हैं स्वघोषित आवारा मिहिर पंड्या अपने ब्लॉग http://mihirpandya.com पर। वह अपने इस ब्लॉग पर अनवरत रचना संसार सृजित कर रहे हैं। सेल्यूलाइड पर अमर कर दिए गए दृश्य, ध्वनियाँ, गीत, संगीत, भावनाएँ, प्रकाश, अन्धकार .... सबको बहुत बारीकी से विश्लेषित करते हैं और तह दर तह खोलते जाते हैं।
लाइट, कैमरा, ऐक्शन !!
ये तीन शब्द जो रचते हैं, उस पर बहुत कुछ रचा जा सकता है। ज़रा देखिए तो सही । बस समीक्षा नहीं, साहित्य भी मिलेगा। 
 
अंग्रेजी की मास्टरनी शेफाली पांडेय अपने को कुमाउँनी चेली कहती हैं। http://shefalipande.blogspot.in में ग़जब के व्यंग्य रचती हैं। स्वभाव से ही विरोधी हैं, पुरस्कारों की भी। ये बात और है कि 'जब मुझे पुरस्कार मिल जाता था तो मैं उन लोगों की बातों का पुरज़ोर विरोध करती थी जो पुरस्कारों की पारदर्शिता पर संदेह करते थे'  
राजस्थान की धरती से किशोर चौधरी के मित्र संजय व्यास ब्लॉग लिखते हैं http://sanjayvyasjod.blogspot.in/ अपने बारे में कहते हैं कि मुझे तैरना बिल्कुल नहीं आता लेकिन मरुस्थल की रेत पर लहरों सा आनन्द लेना हो तो इन्हें पढ़िये। राजस्थान का रंग है, गँवई प्रेक्षण हैं, खिलखिलाती लड़कियाँ भी हैं, कुछ कवितायें भी और कुछ अद्भुत गद्य भी। व्यक्तिगत कहूँ तो दोनों में मुझे ये अधिक पसन्द हैं।  
लखनवी विनय प्रजापति कम्प्यूटर तकनीकी के टिप्स देते हैं अपने ब्लॉग http://www.techprevue.com/ पर। अब अंग्रेजियाने लगे हैं। नज़र तखल्लुस (यही कहते हैं न?) से ग़जलियाते भी हैं और ब्लॉग की अलेक्सा वलेक्सा रैंकिंग कैसे दुरुस्त रहे इसका भी खयाल रखते हैं। कविताकोश पर भी पाये गये हैं। 
शिक्षा, विज्ञान, सामयिकी, कविता, ललित गद्य, स्त्री मुद्दे आदि में निष्णात हैं अल्पना वर्मा। व्योम के पार मध्य पूर्व से लिखा जाने वाला इनका ब्लॉग है http://alpana-verma.blogspot.in
वतन से दूर हैं लेकिन इसकी मिट्टी से खिंचते रहने की बात कहती हैं। इन्हों ने जावा स्क्रिप्ट एनेबल कर ब्लॉग से कॉपी पेस्ट बन्द कर रखा है :) गायन भी करती हैं।
उम्मतें http://ummaten.blogspot.in/ नाम से ब्लॉग रचते हैं अली सईद। सुन्दर ललित विचारपूर्ण गद्य लिखते हैं। लेफ्ट सेंटर चलते हुये कहते हैं जो जी चाहे ले लीजिये ! कोई कापी राईट नहीं !.
नहीं जी, इनका ट्रैफिक विभाग से सम्बन्ध नहीं, छत्तीसगढ़ शिक्षा में उच्च पद पर हैं।  
अलग तरह का साहित्य है ब्लॉगर नवीन रांगियाल के ब्लॉग औघट घाट http://aughatghat.blogspot.in पर। राजेश खन्ना के अवसान के बाद चुप हैं लेकिन ब्लॉग के पुराने लेख भी पठनीय हैं। उनके मित्र उनके बारे में लिखते हैं:क्‍या कहूं तुम्‍हें                                                                  
कि तुम जितने पुराने हो रहे हो
उतना ही ताजा बन पडे हो..
रंगों मे रहकर रंगहीन क्‍यों हो तुम
काफ्काई गद्य पढ़ना हो तो आई टी क्षेत्र से जुड़े युवा ब्लॉगर नीरज बसलियाल के ब्लॉग काँव काँव प्रकाशन लि. http://kaanv-kaanv.blogspot.in/ पर जाइये। कम सामग्री है लेकिन जो है वह कभी कभी गुरुदत्त के सिनेमाई बिम्बों सा भी लगता है।
दीपक बाबा अब कम बकबक http://deepakmystical.blogspot.in करते हैं लेकिन जो करते हैं अलगे अन्दाज में करते हैं। चचा जैसे जन इनके टाइप की ब्लॉगरी को ही ब्लॉगरी मानते हैं। बाकी तो साहित्त फाहित्त सभी रच लेते हैं! है कि नहीं?
रोटी की रोजी का टैम हो गया, फिर मिलते हैं।

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

कुछ अनुभव सीखें

अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में हाल में सम्पन्न हिन्दी ब्लॉगर संगोष्ठी पर बहुत कुछ कहा सुना जा चुका है। कतिपय व्यक्तिगत कारणों से मैं वहाँ जा नहीं पाया जिसका मुझे हमेशा दु:ख रहेगा। प्रयाग के बाद वर्धा, उसके बाद? मुझे आशा है कि 'अ-सरकारी' प्रयास भी होंगे जिनमें कथित 'भूल, ग़लतियों, असफलताओं' से सबक लिया जाएगा और उत्तरोत्तर कड़ियाँ एक इतिहास का सृजन करेंगी। विश्वविद्यालय, आयोजकों और सभी जुड़े लोगों को सफल आयोजन हेतु मैं धन्यवाद देता हूँ और आशा करता हूँ कि आगे और अच्छे आयोजन होंगे। एक बात सबको याद दिलाऊँगा: जिस तरह धुएँ से अग्नि युक्त है उसी प्रकार सभी कर्म किसी न किसी दोष से युक्त हैं। इस कारण सहज कर्म को त्यागना नहीं चाहिए। आयोजक इस आयोजन के लिए साधुवाद के पात्र हैं। इसलिए और भी कि उन्हों ने एक 'लीक ' दिखाई है , अब 'राजपथ' के शिल्पियों को कर्मप्रवृत्त होना चाहिए। 
        यह आलेख वहाँ न जा पाने की स्थिति में भेजा गया था। सोचा कि आप लोगों से साझा कर लूँ। एक नए ब्लॉगर के लिए और उसकी दृष्टि से ही इसे लिखा। अपरिपक्वता दिख सकती है लेकिन आशा है कि बातें विचारने को प्रेरित तो करेंगी ही। अस्तु ... 
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क्या लिखें?
मैं यह मानकर कह रहा हूँ कि आप क्यों की दुविधा से मुक्त होकर लिखने को तत्पर हैं। आप के भीतर की जो रचनात्मकता अब तक बन्द थी, वह सम्पादकों, प्रकाशकों, आलोचकों, खेमों आदि ढक्कनों से मुक्त हो एक अत्याधुनिक, सक्षम और उत्कृष्ट प्लेटफॉर्म ब्लॉग पर खुलने को है। स्वभावत: आप सोचेंगे कि क्या लिखें? मैं कहूँगा कि यह चयन का मामला है, कमी का नहीं। विषय बिखरे हुए हैं, आप को रुचि अनुसार चुनना है और चुनते या लिखते समय किसी भी तरह की घबराहट, पूर्वग्रह या दुविधा से मुक्त रहना है।
प्रात:काल नर्सों को हॉस्टल से लेकर अस्पताल जाती बस, कुत्ते को टहलाते और उससे अपनी धोती बचाते दादा जी, टूटे दाँत लिए स्कूल से चहकती लौटती कामवाली की गुड़िया, शाम को ठीक 5 बजे आप के दरवाजे पर रोज आकर खड़ी होती गाय, पार्क की बेंच पर अकेले मोबाइल पर देर तक रोज बात करती युवती, बीच गली में घंटे भर से गपियाते अति व्यस्त मित्र, चहारदीवारी पर कोने में चिपके युगल, माल में ग्राहकों का ऑनलाइन हिसाब करती परेशान मुस्कुराती युवती, सड़क के गड्ढे में किनारे अटका चिप्स का रैपर, बजरंग बली के मन्दिर के ठीक बाहर फेंका हुआ कंडोम .... अनंत सूची है। यदि आप प्रेम में हैं तो कहना ही क्या? अगर आप का बॉस खड़ूस है या मातहत बदतमीज है फिर तो यकीन मानिए आप की झोली कभी खाली नहीं रहेगी।
कहने का मतलब यह कि कुछ भी लिखिए और प्रयोग करने से न चूकिए। आत्मीयता महत्त्वपूर्ण है। बहुत बार आप को स्वयं नहीं पता होता कि आप की बोर्ड पर या कलम के साथ किस विषय पर कितने धारदार हो जाएँगे? इसलिए प्रयोग करने से न चूकिए। यहाँ आप स्वयं लेखक, सम्पादक, प्रकाशक हैं। प्रारम्भ में विवादास्पद विषयों पर लिखने से बचें लेकिन उन्हें टीपे रहें और नैतिकता, विधि, अन्यों के विचार आदि जुड़े पहलुओं पर जानकारी इकठ्ठी करते रहें और फिर लिखें।
नकारात्मक लेखन न करें। तात्कालिक प्रसिद्धि(?) तो मिलेगी लेकिन बहुत दिनों तक आप चल नहीं पाएँगे। ब्लॉग जगत में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब धूमकेतु की तरह नकारात्मक बातें करने वाले छा गए और उसी की तरह लुप्त हो गए। नकार की ऊर्जा क्षणजीवी होती है क्यों कि स्वभावत: वह प्रतिक्रिया से उपजती है। क्रिया के बिना प्रतिक्रिया हो ही नहीं सकती।  
वह सब तो ठीक है लेकिन कैसे लिखें?
विषय को कैसे अभिव्यक्त किया जाय? यहाँ कैसे से अर्थ गद्य, पद्य, चित्र, ऑडियो, वीडियो, फोटोग्रॉफ आदि या इनके कम्बिनेशन से है। हिन्दी ब्लॉगरी में साहित्य बनाम ब्लॉग विवाद का एक दौर था जहाँ साहित्य से अर्थ बनी बनाई, वाददूषित, खेमाई पृष्ठभूमि से आती गद्य, पद्य, उपन्यास, कहानी आदि से लगाया जाता था और ऐसे बहुत से ब्लॉगर थे/हैं जो ‘साहित्य’ को उतनी ही हेय दृष्टि से देखते थे जितनी हेय दृष्टि से ब्लॉगर दूसरे पक्ष द्वारा देखे जाते थे – ब्लॉग और इंटरनेट माने पोर्नोग्राफी और दोयम गुणवत्ता। 
अभी मतभेद तो हैं लेकिन सक्रिय विवाद नहीं दिखता। साहित्य को अभिव्यक्ति मानें तो ब्लॉगरी एक विधा के रूप में बस इस मायने में अलग है कि यह मुक्त है। छपने पर बन्धन हैं लेकिन वैसे नहीं जैसे कागज पर छपने पर हैं। आप जैसे चाहें लिख सकते हैं। विकासमान प्रक्रिया है यह। ठीक वैसे ही जैसे वार्णिक छ्न्द-मात्रिक छन्द-मुक्त छ्न्द। गद्य-कथा-कहानी-नाटक-उपन्यास-रिपोर्ताज वगैरह वगैरह। सूक्ष्म अंतर यह है कि जहाँ विकास होने में पहले वर्षों लगते थे वहीं आप के भीतर, आप के ब्लॉग पर विकास होने में शायद कुछ महीने या सप्ताह ही लगें। शर्त यह है कि आप स्वयं उतने ही मुक्त रहें जितना मुक्त प्लेटफॉर्म है और प्रयोग करने से न हिचकिचाएँ। एक उदाहरण लें – मान लीजिए कुछ लिखते हुए आप ध्वस्त ट्विन टॉवर्स का जिक्र करते हैं और आप चाहते हैं कि पाठक वहीं उनके बारे में जान तो ले लेकिन आप विपर्यय से बचे रहें। ऐसे विजेट उपलब्ध हैं जो उस शब्द पर कर्सर ले जाते ही टॉवर्स का मयचित्र संक्षिप्त परिचय वहीं एक खिड़की में दिखा देंगे। जैसे ही कर्सर हटेगा आप वापस अपने विषय पर होंगे।      
तो आप जैसे चाहें लिख सकते हैं। गद्य, पद्य, गीत, नाटक, नौटंकी, शेर, हल्की फुलकी तुकबन्दी, ऑडिय़ो, वीडिय़ो आदि। धीरे धीरे आप अपनी एक सुविधाजनक शैली विकसित कर लेंगे जिसके लिए जाने जाएँगे और स्पष्ट है आप के चाहने वाले भी बन जाएँगे। 
भाषा कैसी हो?
वैसी ही हो जैसे आप हैं। मतलब यह कि आप भाषा के जिस किस्म के साथ/में सुविधा के साथ लिख सकते हैं उसी में लिखें। ग्राम परिवेश पर मैला आँचल भी लिखा जा सकता है, राग दरबारी भी, गोदान भी और आधा गाँव भी। विषयवस्तु, काल और परिवेश से भी भाषा तय होगी। इसे ऐसे समझिए कि आप शहर में चल रहे नाट्य समारोह पर लिख रहे हैं या झुग्गियों की किसी आपसी लड़ाई पर या कोर्ट द्वारा सुनाए किसी फैसले पर – भाषा तदनुसार बदलेगी।
एक बात और है। आप बिन्दास लिखना चाहते हैं कि दूसरों की भाषा शैलियों से सीखना चाहते हैं? प्रयोग करना चाहते हैं या भाषा की परवाह किए बिना बस इस पर केन्द्रित रहना चाहते हैं कि बात ठीक से पहुँच जाय? यदि आप दूसरी श्रेणी के हैं तो सहज अनायास रचते रहिए, आप खाँटी ब्लॉगर हैं। आप के ब्लॉग पोस्ट ही आप की एक शैली/शैलियाँ विकसित कर देंगे।  
लेकिन यदि आप सीखना चाहते हैं तो अध्ययन अपेक्षित है। ब्लॉग प्लेटफॉर्म पर भी बहुत से दिग्गज हैं और साहित्य क्षेत्र में भी। उन्हें पढ़िए और लिखते रहिए। इस मुद्दे पर अधिक टेंशन लेने की आवश्यकता नहीं है। भाषा सहज सम्वाद करती होनी चाहिए, बस।
यह भी समझ लें कि चाहे तत्सम प्रधान लिखें, उर्दू सिक्त लिखें, अंग्रेजी शब्दों को लेते हुए लिखें, चाहे जैसे लिखें; आप की बात समझने वाले, शैली सराहने वाले मिलेंगे। दुनिया बहुत बड़ी है और हिन्दी वाले करोड़ो हैं। आप भारत की प्रथम जनभाषा में लिख रहे हैं और इस कारण नियति आप के पक्ष में है।    
टिप्पणियाँ, नामी बेनामी और मॉडरेशन 
हिन्दी ब्लॉगरी के ये बहुत रोचक पहलू हैं। संख्या कम है और इस कारण ब्लॉगरों का एक दूसरे को और दूसरे के मित्रों को भी जानना हिन्दी ब्लॉगरी को एक खास फ्लेवर देता है। एक एक कर देखते हैं।
(क)  टिप्पणियाँ:
आप के ब्लॉग की पहुँच अधिक लोगों तक होने के लिए टिप्पणी का विकल्प खुला रखना आवश्यक नहीं है। लेकिन उससे मदद मिलेगी। निजी जिन्दगी में परेशाँ लोग ऐसा कुछ चाहते हैं जहाँ बतिया सकें या यूँ ही अपने मन लायक कुछ कह सकें। पढ़ने पर अच्छा लगे तो वाह वाह कर सकें, कुछ जोड़ सकें; कुछ ठीक न लगे तो अपना पक्ष रख सकें। बहुतायत ऐसे जन की ही है। कुछ विघ्नतोषी या बवाली भी पाए जाते हैं लेकिन वे तो हर जगह हैं, ब्लॉग प्लेटफार्म अछूता क्यों रहे? ऐसे लोगों की बेहूदी टिप्पणियों को आप आसानी से मिटा सकते हैं।
कई बार टिप्पणियाँ ऐसी भी आती हैं कि ब्लॉग लेख भी उनसे समृद्ध हो जाता है। कई बार ऐसी बहसें भी हो जाती हैं जिनसे कई आयामों पर प्रकाश पड़ता है।
अपने ब्लॉगर सेटिंग में यह विकल्प अवश्य चालू रखें जिससे कि कोई भी टिप्पणी ब्लॉग के अलावा आप द्वारा निर्धारित एक ई मेल बॉक्स में भी आ जाय। इसका लाभ यह है कि भले टिप्पणी करने वाला ब्लॉग से मिटा दे या आप मिटा दें; सन्दर्भ के लिए वह टिप्पणी आप के पास हमेशा उपलब्ध रहेगी।
एक पक्ष यह भी है जहाँ ब्लॉग के संकलक प्लेटफॉर्मों द्वारा रेटिंग निर्धारण के लिए टिप्पणियों की संख्या का भी ध्यान रखा जाता है। अधिक टिप्पणियों वाले ब्लॉग पोस्ट अलग से दिखाए जाते हैं और एक चेन रिएक्शन की तरह अधिकाधिक लोग वहाँ पहुँचते हैं और टिप्पणी कर जाते हैं। अगर आप ऐसी राह पकड़ना चाहते हैं तो आप को भी दूसरों के यहाँ जाकर प्रतिदान करने पड़ेंगे। अगर समय है और उत्साह है तो कीजिए लेकिन याद रखिए ‘प्रसिद्धि की चाह भक्ति की राह में सबसे बड़ी बाधा होती है’। महत्त्वपूर्ण टिप्पणियों की संख्या या तात्कालिक रेटिंग नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण है और आप के ब्लॉग का अधिकाधिक लोगों तक पहुँचना है। अगर आप अच्छा लिखेंगे, काम लायक लिखेंगे तो भले धीमे हो, आप को लोग पहचानेंगे और आप की बात दूसरों तक भी पहुँचाएँगे।
स्वयं टिप्पणी करते हुए वस्तुनिष्ठता का ध्यान रखें। परिचित या घनिष्ठ ब्लॉगरों के यहाँ आप हास परिहास या चुटकी भी ले सकते हैं लेकिन वहाँ भी विषयकेन्द्रित रहें। प्रशंसा करना आसान है – आह, वाह, अद्भुत लिखे और चलते बने लेकिन आलोचना कठिन कर्म है। वीतरागी संत ब्लॉगिंग नहीं कर रहे। आलोचना पर पहली प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से क्रोध होती है। इसलिए विरुद्धवीणा बजाने के पहले सुर ताल पर पक्के हो लें और सभ्य भाषा में ईमानदारी के साथ अपनी बात कहें। प्रतिकार में दिए गए तर्कों के प्रति खुले रहें। ऐसा करने पर कई बार आलोच्य और आलोचक दोनों लाभांवित होते हैं। अधिक लम्बी और फलदायी बहस के लिए चुनिन्दा लोगों के साथ ई मेल पर बहस का विकल्प भी आजमाया जा सकता है। त्वरित प्लेटफार्म होने के कारण सामान्यत: एक पोस्ट बस एक या दो दिन ही बहस के लिए हॉट रहती है। हजारों लोग लिख रहे हैं और अच्छा लिख रहे हैं। पाठक केवल आप की एक पोस्ट पर बँधे रह कर सारा समय वहीं तो नहीं दे सकता।
(ख)  नामी बेनामी
कायदे से वास्तविक मतलब यह कि जैसा असल जीवन में ब्लॉगर है, वैसा ही ब्लॉग प्लेटफार्म पर भी है। वही नाम, वही फोटो, वही परिचय आदि आदि। उसे ब्लॉग जगत के लोग जानते पहचानते हैं या प्रोफाइल में उसके द्वारा दिए गए सम्पर्क सूत्रों से तसदीक कर सकते हैं, मिल सकते हैं। इस हिसाब से ब्लॉग जगत में बहुत से नामी ऐसे हैं जो बेनामी ही कहे जा सकते हैं। वे स्वस्थ ब्लॉगरी की राह चलते हैं, प्रतिष्ठित हैं लेकिन आप उनसे साक्षात नहीं मिल सकते। व्यक्तिगत कारणों से वे गुमनाम बने रहना चाहते हैं। नाम तक कैसे कैसे! Ghost buster, उन्मुक्त, ab inconve.., Abyss_Garden आदि आदि।
ब्लॉग जगत में जब ‘बेनामी’ की बात होती है तो उसके निशाने पर यह लोग नहीं होते, सामान्यत: वे विघ्नतोषी और दुष्ट प्रकृति के लोग होते हैं जो अपनी कुंठा, धर्मान्धता आदि बेनाम टिप्पणियों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। फिर किसी भी पोस्ट पर हो रही बहस का लीक से उतरना तय हो जाता है। लिखने वाले और गम्भीर पाठकों को जो कष्ट होता है वह तो है ही। चूँकि बेनामी विकल्प से कोई भी टिप्पणी कर सकता है, कई बार नाम वाले ब्लॉगर भी अपनी खुन्नुस निकालने के लिए यह काम करते हैं। यह बुराई समाज की अन्य बुराइयों की तरह ही है।
प्रश्न यह है कि बेनामी टिप्पणी का विकल्प खुला रखा जाय या नहीं? खुला रखना ही ठीक है। कोई भी दुष्ट फर्जी नाम से ब्लॉगर प्रोफाइल बना कर अपने काम को अंजाम दे सकता है फिर उन आम पाठकों को जो कि ब्लॉगर नहीं हैं या प्रोफाइल नहीं बनाना चाहते, टिप्पणी करने से क्यों रोका जाय? अगर आप टिप्पणी का विकल्प खुला रखे हैं तो समय समय पर आप को अपने ब्लॉग पर आई टिप्पणियों को देखना भी होगा और सफाई भी वैसे ही करनी पड़ेगी जैसे कि आप घर में करते रहते हैं। आप अवांछित टिप्पणियों को मिटा सकते हैं लेकिन उस हानि का क्या जो उस तरह की टिप्पणी ने उतनी देर  आप की पोस्ट पर रह कर कर दी? बहुत बार दो तीन टिप्पणीकार आप के ब्लॉग को निजी लड़ाई का आखाड़ा बना देते हैं। अगर आप उस दौरान अपने काम में कहीं और व्यस्त रहे तो हो गया कल्याण!
इससे बचने के कई तरीके हैं:
(1)  आप गुमनाम ब्लॉगर प्रोफाइल बनाएँ और बेफिक्र रहें, रह सकें तो।
(2)  आप भी नंगे हो जायँ। कोई कुछ भी धमाल मचाता रहे आप को कोई फर्क ही न पड़े। लेकिन इसमें कभी कभार क़ानूनी मामलों में फँसने का खतरा है। ब्लॉग लेख ही नहीं, उस पर आई टिप्पणियों की जवाबदेही भी ब्लॉगर की  बनती है। किसी ने यदि राष्ट्रविरोधी टिप्पणी कर दी तो आप भी गुनहगार होंगे।
(3)   कविताओं, कहानियों, ग़जल, गणित के पाठ आदि पर ऐसे विवाद नहीं होते। विवाद सामान्यत: समकालीन ज्वलंत विषयों पर लिखे गए लेखों पर ही होते हैं। आप विवादास्पद या ज्वलंत विषयों पर लिखें ही नहीं। कोई आवश्यक है क्या कि सभी लोग हवन करें?
(4)  मॉडरेशन। टिप्पणियाँ बिना आप की अनुमति/सहमति के न छपें। यह एक रोचक  विकल्प है। इसे ऊपर बताए उस विकल्प के प्रकाश में भी देखना होगा जिसमें टिप्पणियों के ई मेल पर भी आ जाने वाले अतिरिक्त विकल्प को सक्रिय रखने को कहा गया है। 
मॉडरेशन कब ?
(क)  अगर आप प्रसिद्ध हस्ती हैं और आम जन के विचार जानना तो चाहते हैं लेकिन असुविधाजनक बातों से बचना चाहते हैं। प्रसिद्धि ईर्ष्या, निन्दा, कुप्रचार, द्वेष, अवांछित हस्तक्षेप आदि  वस्त्र पहन कर आती है। जितनी सुन्दर प्रसिद्धि, उतने ही विविध वस्त्र।
(ख) अगर आप अपने को ‘बड़ी हस्ती’ समझते हैं और भाव क़ायम रखना चाहते हैं।
(ग)  आप वास्तव में शत्रुग्रस्त हैं।
(घ)  आप नहीं चाहते कि आप के ब्लॉग पर कोई बहस ऐसी हो जो अवांछित हो, पटरी से उतर जाय और आप के अलावा औरों को भी संकट में डाल दे।
(ङ)  आप केवल विषय सम्बन्धित टिप्पणियाँ ही चाहते हैं और प्रचार, स्पैम वगैरह से बचना चाहते हैं।   

मॉडरेशन के अवांछित प्रभाव
(क)   किसी ज्वलंत विषय पर सही बहस तब तक नहीं हो सकती जब तक आप लगातार बैठ कर टिप्पणियों को मॉडरेट न करते रहें। मॉडरेशन की दशा में बहस अड्डेबाजी न होकर ऐसा ग्रुप डिस्कशन रह जाती है जो बॉस द्वारा अनुशासित है और बीच बीच में आप के कान आँख बन्द कर दिए जाते हैं। तुर्रा यह कि आप की बात खत्म होती है और वे बातें आप के सामने लिख कर रख दी जाती हैं जो अपनी बात कहने के पहले आप ने देखी सुनी ही नहीं। तब तक बात इतनी आगे जा चुकी होती है कि पीछे लौटा ही नहीं जाता।
(ख) आप पाठकों को भाई छाप गुंडा लगने लगते हैं भले ही कितने ही भले क्यों न हों।
(ग)   पाठक असहज और अपने को आप की दृष्टि में अविश्वसनीय सा अनुभव करने लगता है।
(घ)   बहस के बीच में कहीं आप का नेट कनेक्शन बिगड़ गया तो या तो किसी और के यहाँ/ढाबे पर जाइए या सैकड़ो योजन दूर से भी पाठकों की गालियाँ पाइए।

तो एक विकल्प यह भी है कि टिप्पणियों का विकल्प बन्द रखिए और अपनी ई मेल आइ डी पब्लिक कर दीजिए। जिसे बहुत इच्छा होगी वह अपनी बात आप तक पहुँचा देगा। अब विश्राम लेता हूँ। 

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

लंठ महाचर्चा: अलविदा शब्द, साहित्य और ब्लॉगरी तुम से भी...

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...  लेंठड़ा सनातन पात्र से बाहर आ चलते चलते थक गया था। सुस्ताने के लिए वह जहाँ छाये में रुका, वह जगह पुस्तकालय भवन कहलाती थी। भवन का द्वार बन्द था लेकिन उसके बाहर बहुतेरे अद्भुत प्राणी टहल रहे थे। अपना परिचय देने के लिए और उनकी प्रतीक्षा को फलदाई बनाने के लिए लेंठड़े ने यह प्रवचन दिया था। स्पष्ट है कि मैं भी उन अद्भुत प्राणियों की भीड़ में सम्मिलित था। बहुत सी बातें समझ में नहीं आईं। जो आईं उन्हें किसी तरह यहाँ दे रहा हूँ। एक बात तो एकदम समझ में नहीं आई - लेंठड़ा अपने को 'हम' में शामिल कर बात कर रहा था। कहाँ केंकड़ा, कहाँ मनुष्य !
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(10) काल:सार्वकालिक                                           परम्परा: भ्रमित परंतु जागृत मन की

crab2 शब्द क्यों आवश्यक हैं? हमने शब्द क्यों गढ़े? समूह में रहने और सम्बन्धों के ढीले स्वरूप में प्रारम्भ होने से संवाद की आवश्यकता आन पड़ी और उत्तरोत्तर अनिवार्यता बनती गई।  मुँह की बिचकाहट, चेहरे की लाली, भौहों और नाक की सिकुड़न, हाथों की हरकतें, आँखों के आँसू, देह की तमाम हरकतें... अपनी बात कहने और दूसरे तक पहुँचाने में जब अपर्याप्त लगने लगीं तो वाणी का 'विकसित होना' प्रारम्भ हुआ। बात और वाणी एक नहीं हैं। अगर हम किसी को आँख मारें और वह हँस दे तो यह भी एक बात हुई। सरल युग में सम्भवत: ऐसे ही कुछ से संवाद होता होगा और बहुत कुछ समझ भी लिया जाता होगा - सरलता के कारण, साथ। बात को जब वाणी का यान मिला तो वह भाग चली। उसे लगा कि अब वह श्रृंगार कर सकती है, चल सकती है, दौड़ सकती है, बढ़ सकती है, घट सकती है, छिपी रह सकती है, चुपके से अन्धेरे में फुसफुसा सकती है... उसने अपने हर 'लगाव' को बढ़ाना, बझाना और लगाना शुरू किया। इस लगावट के वाहक बने शब्द।
ध्वनि के मूल टुकड़ों को अक्षरों से अभिव्यक्त किया गया। अक्षरों से बने शब्द। ध्वनियों को शब्दों से पहचाना जाने लगा और फिर मानव मस्तिष्क की अभिव्यक्ति सरिताएँ बह चलीं। मन के हर भाव, परिवेश के हर जुड़ाव और अस्तित्त्व से जुड़ा सब कुछ शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त हो चला। सहूलियत बढ़ी, मानव इतना आदी हो गया कि भूल ही गया, शब्दों के पहले भी कुछ था, कुछ होता था और वह कुछ महत्त्वपूर्ण था। शब्दों की महत्ता के साथ ही उन्हें सहेजने की चिंताएँ भी आ जुड़ीं और शुरुआत हुई वाचिक परम्परा की। एक बार फिर आस पास फैली नित्य ध्वनियों की पड़ताल हुई और सामने आए लय, मात्राएँ, उच्चारण में विराम, यति, गति, ताल ... संगीत ने आकार लिया और शब्द सुरक्षित हो चले ग्राम गीतों में, ऋचाओं में, गाथाओं में, कथाओं में।
सम्भवत: विवादों ने शब्दों को यथावत सार्वकालिक सुरक्षित रखने की आवश्यकता को जन्म दिया। इस परम्परा के साथ ही आए चारण, पुरोहित, अभिचार.. जाने क्या क्या। हम अभी उस पर बात नही करेंगे। ...
वाचिक परम्पराएँ अपने उद्देश्य में तो सफल रहीं लेकिन कहीं आम जन जीवन से कटती चली गईं। ऐसे में निठ्ठल्ले, आलसी लेकिन जीवन को सरल बनाने को आतुर किसी पुरोहित ने लिपि का आविष्कार कर डाला और फिर तो जैसे क्रांति ही हो गई। लिपि से अक्षर, अक्षर से शब्द, शब्द से ध्वनि-उच्चारण, ध्वनि से पुन: शब्द, शब्द से अक्षर, अक्षर से लिपि और लिपि से प्रतिलिपि.. आलसी का आविष्कार बड़े काम का निकला !
बेकाबू सभ्यता अपनी जनसंख्या बढ़ाऊ कामुकता के साथ बढ़ती चली गई। बीच बीच में विराम और विनाश भी आए लेकिन शब्दों ने पुनर्निर्माण सुनिश्चित कर दिया था। शब्द महत्त्वपूर्ण होते चले गए, लिपि में लिपट आदमी की संतान को ज्ञान, विज्ञान के ककहरे सिखाते पढ़ाते रहे। तमाम अभिव्यक्तियों में जो श्रेष्ठ था उसे साहित्य कहा गया। शब्द शिक्षक भी थे जो साहित्य की कक्षा में मास्साब की भूमिका निभा रहे थे। साहित्य को यह गौरव इसलिए हासिल हुआ कि वह अभिव्यक्ति का शीर्ष था। शीर्ष पर होना बहुत रिस्की होता है। लिहाजा साहित्य की खूब जाँच पड़ताल और ठुकाई हुई। एक जमाने का साहित्य दूसरे जमाने का गँवारू गलबाजा कहलाया और इसके उलट भी बहुत कुछ हुआ लेकिन साहित्य नामधारी शीर्षस्थ बना रहा ...
और ऐसे ही सीखते पढ़ते हम पहुँच गए आज के जमाने में।
आज । संक्रमण का दौर। शब्द पर संकट सा आन पड़ा है। संवाद के लिए अब शीर्षस्थ श्रेणी के मनुष्यों को लगता है कि शब्द गौण हो चले हैं। उनकी आवश्यकता तो है लेकिन बस ऐसे ही .. । उन्हें शब्द बोझ लगने लगे हैं। क्यों? क्यों कि विकल्प सामने दिख रहे हैं। ऐसे विकल्प जो अभी आकार नहीं ले पाए हैं लेकिन कोहरे में घूमती छाया सी झाँक पड़ताल कर रहे हैं। आदमी की फितरत है नवीनता की तलाश। और शब्द तो बहुत पुराने हैं। हटाओ इन्हें ! शब्दों के प्रति इस दुराव ने बेचारे साहित्य को एक बार फिर ठुकाई पिटाई के हथौड़े तले ला दिया है। हथौड़े उनके बाएँ हाथों में हैं जिनके दाहिने हाथ कम्प्यूटर के की बोर्ड पर जम कर टाइप करने में लगे हैं। उन्हें शब्द षड़यंत्रकारी लग रहे हैं क्यों कि शब्द साहित्य के समानार्थी रूप में रूढ़ हो चुके हैं। साहित्य के मानदण्डों ने इन क्रांतिकारियों को अभिव्यक्ति से रोके रखा । मानदण्डों की खैर नहीं, साहित्य की खैर नहीं, शब्दों की खैर नहीं - अब की बोर्ड हाथ में है। बेचारे साहित्य रसिक इस स्थिति पर हाहाकार कर रहे हैं।
लेकिन दोनों वर्ग अनजान हैं कि यह तो बस रूटीन जाँच पड़ताल और ठुकाई है। अब विराट समय का रूटीन तुच्छ मनुष्यों के रूटीन से तो कदम मिला चल नहीं सकता लिहाजा भारी कंफ्यूजन है। दोनों को यह मान लेना ही श्रेयस्कर है कि चाहे रूप जैसा भी हो जाय, शीर्ष पर साहित्य ही रहेगा। या यूँ कह लें कि जो भी शीर्षस्थ होता है वह साहित्य कहलाता है। साहित्य और शब्दों के विरोधी असल में परिपाटी विरोधी भर हैं और इसलिए साहित्य समर्थकों को उनको गम्भीरता से लेना होगा। लेकिन साथ ही साहित्य और प्रतिक्रिया में शब्द विरोधी का भी बाना धारण किए क्रांतिकारियों को यह हमेशा याद रखना होगा कि साहित्य तो सत्त्व है। जो सत्त्व के पक्ष में हैं वे कुछ भी हों अभिव्यक्ति के विरोधी नहीं हो सकते। दोनों पक्षों में से कोई भी नहीं कह सकता - अलविदा साहित्य या अलविदा शब्द। यह बहुत फुसफुसी बात होगी। ...( जारी)  

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

इलाहाबाद से 'इ' गायब - अंतिम भाग

... ब्लॉगर संगोष्ठी में जाने के तमाम कारणों में एक था अपने प्रिय ब्लॉगरों से मिलना।
भारी भरकम बड़के भैया आइ मीन अरविन्द मिश्र - गम्भीरता और हँसोड़पन का यिंग यांग टाइप संतुलन। ऑंखों में नाचती बच्चों सी शरारत। बच्चों को शायद मच्छर अधिक सताते हैं। जिस मनोयोग से प्रस्तुतियों को नोट करते रहे उससे मैं हैरान था।
अरुण प्रकाश - ग़जब का हास्य बोध! मैं तो दंग रह गया। पोस्ट लिखने में सुस्त हैं लेकिन इनके ब्लॉग पर जो मिलता है वह शायद ही कहीं मिले।
हिमांशु - रसिक कवि ऐसा ही होना चाहिए। हेमंत को मिलाने के बाद हम पाँच जितनी हा हा ही ही किए - शायद ही किसी ग्रुप (गुट नहीं) ने किया हो! भैया को मच्छर और जाली वगैरह तो याद रहे लेकिन सुबह कपड़ों पर लगे रक्त धब्बों के बहाने जो हंसी ठठ्ठा हुआ, भूल गए। अरे काहे इतना. . ?
अजित वडनेरकर से मिलना एक सपना पूरा होने जैसा था। एक अनूठा शब्द साधक जो मेरे मन द्वारा बनाई आभासी इमेज से एकदम अलग निकला - अपने बीच का - बिना सींग पूँछ का आदमी, सुना है मिर्ची और नीबू का शौकीन पाया गया। अपन से अधिक घुलान नहीं किए लेकिन हमारी तो एक साध पूरी ही हो गई।
ज्ञान चचा ;) ने जब गले लगाया तो आत्मीयता ही साक्षात थी। 
कृष्ण मोहन मिश्र - व्यंग्य का मास्टर ब्लॉगर- एकदम उलट ! इतना सौम्य और गम्भीर! मेरी इतनी तारीफ कर दी कि मैं मारे डर के दूसरे दिन उनसे भागता फिरा।
साथ गए थे ज़ाकिर अली 'रजनीश', ओम और मीनू खरे। ज़ाकिर भाई ऊर्जा से लवरेज ग़जब के जवान  - जाने कितने सपने सँजोए हुए। भैंसासुर मर्दन के आह्लाद से अभी तक उबर नहीं पाए हैं। मीनू जी ने जब _तियापा बार बार कहने पर हड़काया तो संभल गए - जरूरी था। ऐसे ऊर्जावान आदमी को बगल की खुदकी का पता ही नहीं चलता। ओम यात्रा भर बीच बीच में आइ टी ज्ञान देते रहे, ये बात अलग है कि मोबाइल पर नागरी दिखे - ऐसा जावा स्क्रिप्ट देने का वादा कर भूल गए (मैं ही कौन फॉलोअप किया?)
प्राइमरी के मास्टर प्रवीण त्रिवेदी से मिलना वैसा ही रहा जैसा वडनेरकर के साथ। एक कामना पूरी हुई। वह गम्भीर बने रहे और वाचाल लंठ को कोई खास भाव नहीं दिए। हमको अपने आचार्य जी याद आ गए। सो बाद में हम सहमे ही बैठे रहे, जाने कब मास्साब कान उमेठना शुरू कर दें (वैसे ऐसा कुछ नहीं हुआ।)
अनूप शुक्ल और रवि रतलामी
फ्रंट पर डटे हुए सिपाही।
धड़ाधड़ रपट। बड़े रपटी हैं !
वह लोग भी मिले जिनसे मिलने की तमन्ना नहीं थी लेकिन जब मिल गए तो बस हम फैन हो गए - अभिषेक त्रिपाठी, प्रियंकर, .  .
वे जिनसे बात तक नहीं हुई लेकिन उनकी बातों ने मन को बेंत सा पीट दिया - देख इसे कहते हैं मेधा! अब तो अकड़ना छोड़ दे -  मसिजीवी, विनीत, भूपेन, हर्षवर्धन, अफलातून।   
अभय तिवारी . . . - अबे, वह तो आए ही नहीं थे! पता है।... हमरे ऊ पी के वासी सरपत काटने की मेहनत में बेराम हो गए थे सो खुद न आकर फिलिम ही भेज दिए। सौन्दर्य और अनुपात के भक्त हैं - उनके फिल्मी कैमरे से यह एक नई बात पता चली। बाकी ब्लॉगरी की भाषा पर एक नई राह की सम्भावना दिखी। क्या कहा?. . .  देखो, हम जुमला उछाल दिए हैं, बाकी उनसे पूछ लो। फिलम बढ़िया लगी सो कह दिया। वैसे देहातन शुरू में सहज नहीं दिखी..
... करीब आधे उपस्थित ब्लॉगरों को समेट दिया है। भूल चूक लेनी देनी। जो छूट गए वे या तो ऐसे ही छूट गए होंगे या उन्हें हम घूरते ही रह गए या खौफ खाते रहे। एक सज्जन तो घोषित कर ही चुके हैं कि वे बेनामी गए थे। बता दिए रहते तो तिरछे अक्षरों में लिखी जाती टिप्पणियों के रहस्यों से भी परदा उठ जाता. .

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... अस्सी साल के कलमघुसेडू द्वारा हिन्दी चिट्ठाकारी की अस्मिता के साथ बलात्कार, मंच खरीदे जाने, ब्लॉगरों के बिक जाने, हिन्दुत्त्व वाले ब्लॉगरों की उपेक्षा करने (किराना घराना शिकायतहीन है), एक वृद्ध का पिछवाड़ा धो उसके जल से आचमन करने .. और जाने कैसी कैसी बातें कही जा रही हैं। इस संगोष्ठी की यह एक उपलब्धि ही रही जो इसने ब्लॉगरों की अद्भुत कल्पनाशीलता, दूरदृष्टि, सूक्ष्म दृष्टि, अन्धदृष्टि, मूकदृष्टि, हूकदृष्टि, चूकदृष्टि, कदृष्टि, खदृष्टि....ज्ञदृष्टि...अल्ल, बल्ल... हाँ हाँ हाँ ... से परिचय करा दिया। अब तो ब्लॉगरों की जुटान करने की सोच को भी पहले दस बार (कम कहा क्या?) सोचना होगा। अच्छा ही है पता चल गया कि रस्ते में और रस्ते के किनारे पट्टी (वहीं जहाँ लोग निपटते हैं !) पर माइनें कहाँ कहाँ बिछी हो सकती है !यह भी पता चल गया कि ये माइनें फुस्स पटाखा हैं, डरने की कौनो जरूरत नाहीं।     
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सुना जा रहा है कि बस चुनिन्दा ब्लॉगरों को बुलाया गया था। तो का सबको नेवत देते? अबे तुम लोग हजार तो हो ही! तीस चालिस आए तो यह हाल है अधिक आ जाते तो गंगा यमुना भी प्रयाग छोड़ भाग लेतीं। ग़िरेबान में झाँको भइए और बहिनी माई सब। इतना टंटा इसलिए कर पा रहे हो कि सैकड़ा हजार में हो। लाख में होते तो क्या ...? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम लोगों की ही वजह से हजार लाख नहीं हो पा रहा?
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...गोबर पट्टी के अलावा इनको भी नेवता गया था – शास्त्री जी (कोच्चि), दिनेश राय द्विवेदी (कोटा), शिव कुमार मिश्र (कलकता), रंजू भाटिया-व्यक्तिगत नेवता (झारखण्ड, दिल्ली), प्रमोद सिंह, अभय तिवारी (मुम्बई), मनीषा, अजित वडनेरकर (भोपाल), संजय बेंगाणी (अहमदाबाद) आदि आदि  – कुछ आए और बहुतेरे नहीं आए। क्यों नहीं आए? व्यक्तिगत कारण, कम समय, मानदेय नहीं, यात्रा के क्लास का खुलासा नहीं.... लम्बी लिस्ट है। कुछ सच्ची कुछ झूठी। कौन क्या है क्या पता? लेकिन आयोजकों का इसमें क्या दोष? ... जाने भी दो यारों ! पाखंड की भी एक हद होती है। सही सही कहो न !
... महिला ब्लॉगर तीन ही आ पाई थीं । व्यक्तिगत अनुरोध भी किए गए लेकिन वही गृहिणी की व्यावहारिक सीमाएँ ! पुरुष प्रधान समाज ने न्यौतने का पाखण्ड तो दिखाया लेकिन घरनी को घर से मुक्त नहीं कर पाया। बड़ी नाइंसाफी है। नारी मुक्ति के झण्डा बरदारों !एक महिला ब्लॉगर सम्मेलन कर दिखाओ। मार तमाचे पुरुषवादी नारी शोषकों पर !...    
... नमूना बद-इंतजामी। चार जगहों पर प्रवास की व्यवस्था। सरकारी गेस्ट हाउस, एल आइ सी गेस्ट हाउस, विश्राम होटल और प्रयाग विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस। अनाहूत ब्लॉगर भी (हाँ गए थे) ठहरा दिए गए। कमरे खाली भी रह गए। खाना आदमी के खाने लायक था - ब्लॉगर के नहीं (एक अलग जीव होता है शायद)।
सबने मौज ली मुझे तो कोई दु:खी नहीं दिखा। ...धन्यवाद हिन्दी एकेडमी, धन्यवाद अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, धन्यवाद नामवर, धन्यवाद ब्लॉगर जानवर, धन्यवाद ज्ञान, धन्यवाद विज्ञान, धन्यवाद फलाने, धन्यवाद ढेमाके... हम तो धनाधन धन्न हैं। .....
... गरिया रहे हो सरकारी टैक्स पेयर के पैसे फिजूल में उड़ाए गए। इस देश में और कहाँ कहाँ ऐसे कुकर्म होते हैं? जरा बताइए तो! नहीं होते न !बस ब्लॉगरी ही भ्रष्ट है।... क्या कहा? ऐसी बात नहीं लेकिन ब्लॉगरी को इन दोषों से बचना/बचाना चाहिए। अच्छा, पवित्र गैया की बड़ी चिंता है आप को ! बड़ा आत्मविश्वास है अपने उपर! जमाने को अपनी मुठ्ठी में बन्द रखेंगे! दुर्भाग्य(या सौभाग्य) से बहुत लोग ऐसे नहीं हैं। भ्रष्ट हैं न ! सुविधाजीवी प्रलापी। ...
... आप क्यों नहीं आए इसे गम्भीर दिशा देने? नेवता अगोर रहे थे - हजाम से भिजवाना था शायद। अव्वल तो कुछ करोगे नहीं और कोई करेगा तो दूर से नंगे होकर ढेला फेंकोगे। कर के दिखाओ न ! पता चलेगा कि मास्टर, वैज्ञानिक, अधिकारी, विद्यार्थी, मीडियाकर्मी, पत्रकार, प्रोफेसर, बेकार, प्रबन्धक और जाने क्या क्या टाइप के लोगों की जमात कैसे इकठ्ठी करनी होती है! इकठ्ठी हो भी जाय तो संभाला कैसे जाता है।...  
.. हम तो कहेंगे फले फूले अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय और हिन्दी एकेडमी जो ऐसी हिम्मत की। बस हिम्मत ही की नजर नहीं दी। छोटी छोटी बातें ऐसी विविध जुटान में महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं – क्यों नहीं समझ पाए? बारात स्वागत में भारतीय सजगता ही याद रखते! थोड़ा और प्रोफेसनलिज्म दिखाते जैसा कि यात्रा व्यय का रिफंड करने की त्वरित कार्यवाही में दिखाए! सोने में सुहागा हो जाता. . .परफेक्सनिस्ट टाइप बड़के भैया तो खुश हो जाते (रास्ते में मीनू जी ने बताया था कि कैसे साइंस ब्लॉगर्स की बनारस मीट में उन्हों ने छोटी छोटी बातों तक का ख्याल रखा था और कितनी सफाई से समय का प्रबन्धन हुआ था।) भैया, आप का गुस्सा जायज ही सही अब थूक दीजिए।...   
....  सिद्धर्थवा तो बड़ा अवसरवादी है किताब भी छपवाया और नामवर से विमोचन भी कराया। आप को कहाँ कष्ट है? कोषाध्यक्ष हो कर पद का दुरुपयोग किया। आप नहीं करते क्या? क्यों नहीं करते? आदर्श महिला/पुरुष हैं आप। पढ़ा है आप ने उसके ब्लॉग को? छपने लायक नहीं लगा क्या? अपना संकलन कभी कहीं भेजे क्या छपने को? नहीं। क्यों? आप को छपास नहीं है। दूसरों को भी नहीं होनी चाहिए क्यों कि आप को नहीं है - यह ब्लॉगरी की  लोकतांत्रिक सोच है।...
आप से भी तो लेख माँगे गए थे – दूसरे संकलन के लिए। क्यों नहीं भेजे? भेजे भी तो इतनी हुज्जत के बाद – क्यों? अच्छा वह अपनी कुकरनी पर परदा डालने के लिए ऐसा कर रहा है और आप पर्दा प्रथा के खिलाफ हैं ! ... कब तक अपने अन्ध मानदण्डों से सबको नाप कर जात बाहर करते रहेंगे? ... देखिए एक दिन आप अकेले बचेंगे और खुद जाति बाहर हो जाएंगे। नहीं, आप बचेंगे ही नहीं क्यों कि आप को चाहे जो भ्रम हो यह समय बड़ा छिनार है, हरजाई है – किसी का नहीं हुआ और बहुत कम हुए जो इसके प्रवाह को मोड़ या तोड़ पाए। लेकिन वह लोग हरगिज आप जैसे न थे. . .
... मैं यह सब क्यों कह रहा हूँ? बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना! एकेडमी, विश्वविद्यालय और सिद्धर्थवा का चमचा हूँ। बड़ा फायदा मिलता है मुझे इनसे। सुना है कि ब्लॉग रत्न के लिए हमरा नाम प्रस्तावित किया है। प्राइवेट बात है – किसी को बताइएगा मत ! ....
... टुटपुँजिया हूँ जो लखनऊ से प्रयाग अपने खर्च पर नहीं जा सकता था और ठहर नहीं सकता था। चार पैसों के लिए जमीर  बेंच दिया मैंने! हिन्दी के लिक्खाड़ों का तमाशा देखने के लिए अपने को बेंच दिया मैंने! हिन्दी के शलाकापुरुषों के हृदयपरिवर्तन या मजबूर स्वीकार को देखने को अपने को बेंच दिया मैंने! साहित्य की गन्दगी का ब्लॉगरी गंगा यमुना से संगम देखने को अपने को बेंच दिया मैंने! ब्लॉगरी को ही दलाल हिन्दी साहित्यकारों के हाथ बेंच दिया मैने! इतने गुनाह एक साथ !. . कुंठासुर नहीं मैं शक्तिशाली गुनाहासुर हूँ। हा ! हा!! हा!!! ...
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किसी ब्लॉगर ने संगोष्ठी में कहा था कि वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी हिन्दी वालों से आजाद होगी। उसकी बागडोर गैर हिन्दियों और सारे संसार के हाथ होगी। मुझे प्रतीक्षा है उस दिन की।
आओ बालसुब्रमण्यमों! आओ शास्त्री फिलिपों !! गोबर पट्टी से एक अदना आह्वान कर रहा है।

अंग्रेजी के e का कमाल तो देख लिया – धड़ाधड़ लाइव सी रिपोर्टिंग में लेकिन हिन्दी की छोटी ‘इ’ का कमाल देखना बाकी है। उस मात्रा का कमाल देखना बाकी है जिसने e कोड वालों को बहुत दु:ख दिए, इतनी विनम्र कि पहले लगती है, फिर उच्चरित होती है- मतलब कि काम पहले बात बाद में। ...
.... हाँ इलाहाबाद से ‘इ’ गायब थी।   

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

इलाहाबाद से 'इ' गायब, भाग -1


प्रयाग ब्लॉगर संगोष्ठी (जी हाँ ब्लॉगरी में इलाहाबाद को प्रयाग कहने वालों के लिए भी जगह है।) के बारे में सोचा था कि नहीं लिखूँगा लेकिन बहुत बार अपना सोचा नहीं होता।
(पहला दिन)  
हिन्दुस्तानी एकेडमी के सभागार में प्रेमचन्द, निराला, राजर्षि टंडन और हिन्दी के कितने ही आदि पुरुषों के साए तले हिन्दी आलोचना के एक पुरनिया स्तम्भद्वारा उद्घाटन - देख सोच कर ही रोंगटे खड़े हो गए। (वक्त ने खम्भे पर बहुत दाग निशान लगाए हैं - बहुत बार खम्भा भी इसके लिए जिम्मेदार रहा है)। लेकिन अभी तो बहुत कुछ बाकी था।...
ब्लॉगरी अभिव्यक्ति, संप्रेषण, सम्वाद और जाने क्या क्या (इसलिए लिख रहा हूँ कि आगम का नहीं पता) की एक नई और अपारम्परिक विधा है। लिहाजा इससे जुड़े सम्मेलन का प्रारम्भ और उद्घाटन ही पारम्परिकों को चिकोट गया। उद्घाटन के पहले वरिष्ठ ब्लॉगर ज्ञानदत्त पाण्डेय द्वारा विषय प्रवर्तन और फिर रवि रतलामी द्वारा पॉवर प्वाइण्ट प्रस्तुति! पुरनिया नामवर जी भन्ना गए। वे इतना भी नहीं सोच पाए कि इस निहायत ही नई विधा से सबका चीन्हा परिचय कराने के लिए यह आवश्यक था। चिढ़ को उन्हों ने पहले से ही उद्घाटित विषय का उद्घाटन करने की बात कह कर व्यक्त किया। बाद में नामवर जी ने तमाम अच्छी बातें भी  कहीं। ब्लॉगिंग की सम्भावना को स्वीकारा। चौथे पाँचवें स्तम्भ वगैरह जैसी बातें भी शायद हुईं। फिर खतरों की बात उठाई गई। राज्य सत्ता के भय, दमन वगैरह बातों के साथ सावधान किया गया - पुरनिए कर ही क्या सकते हैं? ब्लॉगिंग क्या है- इसका कख उन्हें कहाँ पता है? जो चीज न पता हो उससे खतरा तो लाजमी है। 
ये वही पुरनिए हैं जो मुक्तिबोध की अभिव्यक्ति के खतरे उठाने और गढ़ मठ तोड़ने वाली कविता की दिन में चार बार जरूर सराहना करते हैं। ऐसा करने से उनकी मेधा शायद तीखी बनी रहती है।  
सम्प्रेषण,संवाद,खतरा,भय। ब्लॉग पर लिखने के लिए यह चतुष्ट्य मुझे बड़ा सम्भावनाशील लगता है। 
आप पैदा होने के बाद जब पहली बार रोते हैं तो खतरा मोलना शुरू करते हैं और जारी रहते हैं मृत्यु के पहले की अंतिम हिचकी तक। खतरा कहाँ नहीं है? जीना छोड़ दें इसके कारण? 
ब्लॉगिंग में ऐसा अभी तक नहीं आया है जिस पर मुक्तिबोध की आत्मा खुश हो रही हो। वैसे भी ब्लॉगरी को मुक्तिबोधी मानकों की नहीं, अपनी परम्परा से विकसित मानकों की आवश्यकता है। लेकिन जब तक परम्परा न विकसे तब तक तो पुरनियों की अच्छी बातों का ही सहारा रहेगा। है कि नहीं?
अब आइए सिखावन पक्ष पर। हमारे बहुत से ब्लॉगर यह समझते हैं कि कुछ भी लिखो, कोई कुछ कर नहीं सकता। इस गलतफहमी को दूर करने के लिए पुरनियों की सिखावन पर ध्यान देना चाहिए। राज्य सत्ता वाकई शक्तिशाली है और आप का गला पकड़ कर पुलिस वैन में बैठाने में उसे देर नहीं लगती। इस लिहाज से ब्लॉगरों को स्व-अनुशासित रहना चाहिए। बस उतना अनुशासन कि अपराध न हो। अपराध क्या हो सकते हैं इसके लिए थोड़ी समझ का प्रयोग और थोड़ा अध्ययन आवश्यक है। कानूनी बैकग्राउण्ड वाले ब्लॉगर इस पर प्रकाश डाल सकते हैं।     
.....
.....
सभा का स्थल उद्घाटन के बाद बदल कर महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का प्रयाग केन्द्र कर दिया गया। निहायत ही अनुपयुक्त स्थान - किसी भी तरह से इस स्तर के जमावड़े के लायक नहीं। ब्लॉगरों के इकठ्ठे होने लायक तो हरगिज नहीं। सभागार जो कि एक पुराने घरनुमा भवन में बनाया (?) गया है कहीं से भी सभागार नहीं लगा। बन्दिशें न मानने के आदी ब्लॉगरों के अराजक व्यवहार का मार्ग इसने सुगम कर दिया। पहला दिन जुमलों का दिन रहा। इस तरह के जुमले उछाले गए:
- ब्लॉगर खाए,पिए और अघाए लोग हैं।
- ब्लॉग बहस का प्लेटफार्म नहीं है।
- अनामी दस कदम आकर जाकर लड़खड़ा जाएगा।
- पिछड़े हिन्दी समाज के हाथ आकर ब्लॉग माध्यम भी वैसा ही कुछ कर रहा है।
- एक भी मर्द नहीं है जो स्वीकार करे कि हम अपनी पत्नी को पीटते हैं।
- इंटरनेट पर जाकर हमारी पोस्ट प्रोडक्ट बन जाती है।
- एक अंश में हम आत्म-मुग्धता के शिकार हैं। 
- औरत बिना दुपट्टे के चलना चाहती है जैसे जुमले। . . .(बन्द करो कोई पीछे से कुंठासुर जैसा कुछ कह रहा है।)  


जुमले बड़े लुभावने होते हैं। ये आप को विशिष्ट बनाते हैं। आप जब इन्हें उछालते हैं तो असल में आप अपने आम जन होने के इम्प्रेशन को फेंक रहे होते हैं। कई बार आमजन की वकालत के बहाने अपने को विशिष्ट बना रहे होते हैं। . . . 
ब्लॉगर खाया, पिया और अघाया टाइप का आदमी है। बिल्कुल है। प्राइमरी का मास्टर जब 250 रुपए प्रति माह के बी एस एन एल कनेक्शन की धीमी स्पीड और आती जाती लाइट को कोसता पोस्ट लिख रहा होता है तो वह अघाया ही रहता है। चन्दौली जिले के हेमंत जब मोबाइल की रोशनी में अगले दिन की पोस्ट लिख रहे होते हैं तो अपनी आर्थिक स्थिति पर एकदम निश्चिंत होते हैं। 10/-रुपए प्रति आधे घंटे की दर से जब कोई आर्जव अपने ब्लॉग पर लेख लिख रहा होता है तो अपने बाप की कमाई को एकदम कोस नहीं रहा होता है। वैसे अखबार पढ़ने वालों, टी वी देखने वालों, रेडियो सुनने वालों के बारे में क्या खयाल है? खाए पिए अघाए लोग हैं?...  एलीट क्लास के जुमलाबाजों! दरवाजा खोल कर हमने अपने गोड़ अड़ा दिए हैं। (मैं भी जुमला तो नहीं उछाल रहा? नहीं भाई एक अभिनेता का डायलॉग अपनी भाषा बोली में दुहरा रहा हूँ।) अब हमसे सहानुभूति जताती बकवासें बन्द कमरे में जब होंगी तो हम सुनेंगे और उन्हें नकारेंगे। हम जोर से अपनी बात खुद कहेंगे। तुम्हारा एसी कमरों में बैठ कर बदहाली का रोमानीकरण करना हमें हरगिज बर्दास्त नहीं है। उपर चहारदीवारी को तोड़ता पेंड़ का फोटो देख रहे हो? (सभास्थल के पास ही था - तुम्हें नहीं दिखा होगा, सामने गोबर पट्टी का जानवर जो है। अरे!उस पर तो इंग्लिश स्पीकिंग कोचिंग का प्रचार टँगा है।) जब वह कर सकता है तो हम तो आदमी हैं।  काट सकते हो क्या? 


ब्लॉग बहस का प्लेटफॉर्म नहीं है। तो क्या है भाई? अगर नहीं भी है तो उससे क्या होता है? किस लिए यह कह रहे हो? मैं जब किसी बालसुब्रमण्यम या 'मैं समय हूँ'जैसे छ्द्मनामी के साथ बतकही करता हूँ तो क्या वह बहस नहीं होती? सही है तुम हर ब्लॉग तो देख नहीं सकते लेकिन ऐसे शक्तिशाली से दिखते खोखले जुमले क्यों उछालते हो भाई? 


अनामी दस कदम आकर जाकर लड़खड़ा जाएगा। ये अनामी दूसरे ग्रह से आता है क्या जो इसे आदमियों जैसे चलने की तमीज नहीं है? भैया, सारे अनामी/बेनामी/छ्द्मनामी ब्लॉग जगत से ही आते हैं। उन्हें चलना बखूबी पता है। आप इसकी फिकर करें कि कैसे गैर ब्लॉगर आप के ब्लॉग पर आए, पढ़े और आप की बात पर टिप्पणी करने को या आप से संवाद करने के लिए बाध्य हो ! वह बेनामी भी कर जाय तो उसे सीसे में मढ़ा कर रखिए। अगर आप उसे नहीं ला सकते तो अपने ब्लॉग को आलमारी में रखी डायरी की तरह बन्द कर दीजिए। खुद लिखिए और खुद पढ़िए। (यह बात सबके उपर लागू होती है।)


पिछड़े हिन्दी समाज के हाथ आकर ब्लॉग माध्यम भी वैसा ही कुछ कर रहा है। वह कुछ क्या है, थोड़ा समझाएंगे? आप का पिछड़ेपन का पैमाना क्या है? अगड़े समाज (अंग्रेजी ब्लॉगिंग) की बात बताइए। वहाँ लैंगिक पूर्वग्रह नहीं हैं? वहाँ जूतम पैजार नहीं होती? रेप नहीं होता? छेड़खानी नहीं होती? यौन शोषण नहीं होता? वहाँ साइबर अपराध नहीं होते? जरा बताइए तो हम पिछ्ड़ों में (आप तो अगड़ी जमात से हैं, मजबूरी में हिन्दी में ब्लॉगिंग कर हम पिछड़ों को तार रहे हैं।)ऐसी क्या बात है जो हमें उनकी तुलना में (जी हाँ मानक तो होना ही चाहिए)पिछड़ा बनाती है। एके लउरी सबको हाँकना बन्द कीजिए। हाँकना आप को शोभा नहीं देता क्यों कि वह कला आप को नहीं हम देहातियों को आती है।


एक भी मर्द नहीं है जो स्वीकार करे कि हम अपनी पत्नी को पीटते हैं। कोई मर्द यह भी नहीं स्वीकारता कि रोज रोज मानसिक घुटन और सौम्य (नहीं फेयर?)अत्याचार झेलते उसका जीना मुहाल हो गया है। उसको इस बात की आदत सी हो गई है - वैसे ही जैसे उस सौम्य अत्याचार और षड़यंत्रकारी की जननी को पीटने की हो गई है। परिवार नाम की किसी संस्था का पता है आप को? अगर हाँ तो वह कैसे चलाई जाती है? आप के साधारणीकरण द्वारा? ..क्या कहा? मैं मर्दवादी हूँ जो सन्दर्भ से बात को अलग कर के कह रहा है। जी नहीं महाशय मुझे आप के बात कहने के इस 'व्याकरण (गलत प्रयोग! मेरी मर्जी)' पर आपत्ति है। आप इसे किसी और तरीके से कह सकते थे। लेकिन क्या करिएगा आप भी मजबूर हैं - कहने में पंच नहीं आता। कुछ पूर्वग्रह और पुख्ता हो जाँय तो आप को क्या फर्क पड़ता है?    
                                  
इंटरनेट पर जाकर हमारी पोस्ट प्रोडक्ट बन जाती है। बाजार....वाद..... यह इस सभ्यता का सबसे बड़ा जुमला है लेकिन घिस चुका है। कहीं भी चल जाता है, पोस्ट की जगह भले सचाई ही क्यों न कह दो! क्या बुराई है भाई प्रोडक्ट होने में? अगर हम फोकट में उड़ा रहे हैं और बाजार उसे इकट्ठा कर रहा है तो शिकायत क्यों भाई? और अगर हम उड़ा नहीं रहे, पगहा पकड़ कर तमाशा दिखा रहे हैं तो पगहा की मजबूती को हम, चोर और दारोगा जी समझ लेंगे। आप क्यों चेता रहे हैं? मलाई आप चाभें और हमें बताएँ कि बड़ी खुन्नुस लगती है - बड़ी गन्दी बात है। आप के प्रयाग तक आने, ठहरने, खाने पीने, प्रलाप करने और फिर वापस जाने में बाजार के जितने प्रोडक्ट काम आए उनकी लिस्ट लगा दीजिए। क्या कहा? नहीं लगा सकते? अच्छा सिर में दरद है। ठीक है हम ठीक होने तक इंतजार कर लेंगे। 


एक अंश में हम आत्म-मुग्धता के शिकार हैं।  हम जब यहाँ आए तो अपने सबसे अच्छे कपड़े पहन कर दाढ़ी वगैरह बना कर आए थे। आइने में जब जब अपने को देखे मुग्ध हो गए। यह भी आत्ममुग्धता है क्या? हम कुछ ऐसा करते हैं जो हमें संतुष्टि देता है और दूसरों को नुकसान भी नहीं पहुँचाता। हम प्रसन्न हो जाते हैं। आप दु:खी क्यों हो जाते हैं? बुद्ध के खानदान से हैं क्या? हम बड़े बेहूदे नासमझ हैं - अज्ञानी। लेकिन क्या करें? मन मानता ही नहीं। बहुत दिनों तक अगोरने के बाद तो कुछ हाथ लगा है। उत्सव मना लेने दीजिए न। उसके बाद तो आप जैसा कहेंगे वैसा होगा। हम मुँह गाड़े कोने में बैठे कभी खुद को कभी दूसरों को गरियाते रहेंगे। आप के उपदेश सुनेंगे और पालन भी करेंगे। अब देखिए न कोई पीछे से आप का परिचय पूछ रहा है। बता दूँ?


औरत बिना दुपट्टे के चलना चाहती है जैसे जुमले। दुपट्टा औरत का सबसे बड़ा दुश्मन है। (आज कल कपड़ा ही दुश्मन हो गया है। सुना है कि पूरे संसार में कपास का उत्पादन कम हो गया है। इस प्रोडक्ट की कमी से बाजार खुश है। अजीब स्थिति है।... ससुरी ये तो कविता हो गई। कोई इसका बहर शहर बताइए।) हाँ, दुपट्टा न रहने से हमरे बापू की आँखों को बहुत तकलीफ होती है। अम्माँ तो गरियाने लगती हैं । पता नहीं दोनों को दुपट्टे से इतना प्रेम क्यों है? बड़े पिछड़े हैं बेचारे। हमको भी कुछ कुछ ...। कल सल्लू मियाँ कह रहे थे कि हम तो बिना बुशट पहने सड़क पर चलना चाहते हैं। हमने उनको कह दिया - बिन्दाश चलो।आजाद जमाना है। वैसे दुपट्टा और नारी की स्वतंत्रता पर एक मल्टीनेशनल कम्पनी ने लेख प्रतियोगिता आयोजित की है। आप जरूर भाग लीजिएगा। . . .पुरुषवादी,बैकवर्ड, मेल सुविनिस्ट ... खुसफुसाते चिल्लाते रहिए, हम सुन रहे हैं। अब कुछ दिनों में आँख पर पट्टी बाँध चलेंगे तो उसके लिए कानों को तेज होना ही चाहिए। एक्सरसाइज हो रही है उनकी... 


... जुमले बहुत खतरनाक होते हैं। ओरेटरों की जुबान पर चढ़े हथियार होते हैं। आप घायल नहीं होते बल्कि अपना दिमाग टुकड़ा टुकड़ा काट रहे होते हैं। सुना है दिमाग काटने पर दर्द भी नहीं होता।


(दूसरा दिन )             


हिमांशु जी को बोलने के लिए 'हिन्दी ब्लॉगिंग और कविता'विषय दिया गया था। एक कवि हृदय ब्लॉगर जिसका कविता/काव्य ब्लॉग सर्वप्रिय हो, उसे इस विषय पर कहने के लिए चुनना स्वाभाविक ही था।(मुझे पता है कि कीड़ा कुलबुलाया होगा,अरे ब्लॉगिंग करते ही कितने हैं जो सर्व की बात कर रहे हो - भाई अल्पसंख्यकों को ही गिन लो। वैसे भी कविता पर ब्लॉगिंग सम्भवत: सबसे अधिक होती है।) हिमांशु जी इस विषय पर दूसरे वक्ता थे। उनके पहले हेमंत जी ब्लॉगरी की कविताओं के नमूने सुना चुके थे। उसके बाद समय था विवेचन और बहस का और हिमांशु जी से बेहतर विकल्प उपस्थित ब्लॉगरों में नहीं था। अपनी भावभूमि में मग्न हिमांशु जब कहना प्रारम्भ किया तो ब्लॉगर श्रोताओं  (जी हाँ, गैर ब्लॉगर श्रोता बहुत कम थे) के मीडियाबाज और इसी टाइप के वर्ग के सिर के उपर से बात जाती दिखी। एक दिन पहले जिन लोगों ने इस प्लेटफॉर्म का उपयोग निर्लज्ज होकर अपनी कुंठाओं और ब्लॉगरी से इतर झगड़ों को परोक्ष भाव से जबरिया अभिव्यक्त करने के लिए किया था और सबने उन्हें सहा सुना था, उनमें इतनी भी तमीज नहीं थी कि चुपचाप सुनें। बेचारे हिमांशु जी तो पूरी भूमिका देने के मूड में थे, सो दिए। समस्या गहन होती गई। 
गलती उनसे यह हुई कि इस युग की जटिल परिस्थितियों से जूझते आम आदमी की जटिल सी झुंझलाहट  को व्यक्त करती इस नाचीज की कविता को ही उन्हों ने पहले उठाया। मैं चौंका - इतना भोलापन कि बवालियों के चेहरों पर नाचते असहजता के भावों को पढ़ ही नहीं पाए! इतना भी नहीं समझ पाए कि यह वर्ग अपनी बात सुनाने को व्यग्र तो रहता है और अवसर न मिलें तो छीन भी लेता है लेकिन दूसरों की बात सुनने की परवाह ही नहीं करता, गम्भीर विमर्श तो दूर की बात है। ...
मेरे मन में अब दूसरे भाव उमड़ने लगे। वक्ताओं के लिए निर्धारित मंच (पता नहीं सही शब्द है कि नहीं?) पर मैं हिमांशु की बगल में बैठा था और पहली बार मिले होने के कारण बीच बीच में अंतरंग सी दिखती खुसुर पुसुर में व्यस्त हो जाता था। गोबर पट्टी के इस देहाती के दिमाग में आशंका उठी - तमाम कविताओं में से मेरी ही कविता क्यों? वह भी इतनी अपारम्परिक? लोग क्या सोचेंगे? ... मेरी छठी इन्द्रिय सही चल रही थी।
एक तरफ से ऑबजेक्शन उठा। उन्हें बी.ए. प्रथम वर्ष में पढ़ाते रामचन्द्र शुक्ल याद आ गए थे। बड़ा ऑबजेक्सन था उन्हें? (ब्लॉगरी में क्या सचमुच रामचन्द्र शुक्ल का स्थान नहीं? अरुन्धती रॉय के बारे में क्या ख्याल है?) ये वही थीं जो पहले भी और बाद में भी तमाम असम्बद्ध सी अनर्गल बातें धड़ल्ले से कहती रहीं और पब्लिक सुनती रही थी। हिमांशु जी ने विषय की प्रकृति को बताते हुए उन्हें समझाया लेकिन उन्हें समझ में शायद ही आया हो। भोला चन्दौलीवासी अभी भी समझ नहीं पाया। उसके उपरांत फिर मेरी ही एक अत्यंत ही दूसरे मिजाज की कविता की बात उठाई ही थी कि बगल से आवाज आई ,"आप कहना क्या चाहते हैं?" जो कथ्य को विषय से जोड़ सुनने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे उन्हें कथ्य के बारे में तफसील चाहिए थी। [अरे हिमांशु भैया! मुझे बाद में लगा कि एक ही कवि (गुस्ताखी कर रहा हूँ, ब्लॉगर कहना अधिक उपयुक्त होता। नहीं?) की दो आम जीवन से जुड़ी और एकदम विपरीत भावभूमियों की कविताओं द्वारा आप यह दर्शाना चाहते थे कि ब्लॉगरी की कविता की भावभूमि कितनी विविध है और ब्लॉगर कवि कितने विविध तरीकों से अपनी बात कहते हैं. . .लेकिन देखनहार देखना चाहें तब न !]
मंचासीन ब्लॉगर की ही कविताएँ सुनाई जा रही हैं! स्वप्रचार?
शायद हिमांशु जी को सामने वालों की मन: स्थिति और उथली सोच का अहसास अब हो चला था। 
तुरंत उन्हों ने संभालने की कोशिश की और दूसरी कविता पर बहस शिफ्ट करने की बात की कि संचालक महोदय को 13 मिनट नजर आने लगे। टोक बैठे। यह 13 का अंक ससुरा बहुत अपशकुनी होता है। मुझे पूरा विश्वास हो आया है। 
भावुक कवि अब समझ गया। दिल वाले जब दिमाग पर आ जाते हैं तो फिर उन्हें सँभालना कठिन होता है। हिमांशु जी ने मंच छोड़ दिया। जिन संचालक महोदय को 13 मिनट भारी लगे वे इंटर्लूड के बहाने हर वक्ता के बदलाव पर जाने कितने मिनटों तक अपनी बातें कहते रहे। तब उन्हें घड़ी के मिनट नहीं दिखे - नजर सामने हो तो कहाँ और कैसे जा रहे हैं,नहीं दिखते क्या? बाद में उन्हों ने (उन्हीं का शब्द है) अपने इस  कमीनेपन को स्वीकारा भी। मैं उनकी निर्लज्जता की निर्लज्ज स्व-स्वीकृति पर निहाल हो गया। लेकिन हिमांशु जैसों की बात तो रह ही गई न । .... बात अभी बाकी है।