गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

49-O : सिंडिकेट को ठेंगा

मजहब और जाति के नाम पर एकजुट होकर भेंड़ियाधसान मानसिकता
से मतदान लोकतंत्र के लिये खतरनाक है। चित्राभार: टाइम्स ऑफ इंडिया
इस बार मतदान अवश्य करें। यदि आप सभी प्रत्याशियों में नालायकियत, फिरकापरस्ती, जातिवादी जहनियत, गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार, संकीर्णता आदि देख कर आज तक मतदान करने से बचते रहे तो इस बार घर से निकलिये।

चुनाव प्रक्रिया में नियम 49-O के तहत आप को मतदान न करने के अपने मंतव्य को आधिकारिक रूप से दर्ज करने का प्रावधान है:

49-O. Elector deciding not to vote.-If an elector, after his electoral roll number has been duly entered in the register of voters in Form-17A and has put his signature or thumb impression thereon as required under sub-rule (1) of rule 49L, decided not to record his vote, a remark to this effect shall be made against the said entry in Form 17A by the presiding officer and the signature or thumb impression of the elector shall be obtained against such remark. (स्रोत: विकिपीडिया)
फॉर्म 17 अ में नाम दर्ज होने और हस्ताक्षर के पश्चात आप को पीठासीन अधिकारी से बताना है कि आप अपना मत 'नहीं देना' चाहते हैं। अधिकारी महोदय यह टिप्पणी आप के नाम के आगे दर्ज करेंगे और आप से हस्ताक्षर लेंगे। ऐसा कर आप अपने संवैधानिक कर्तव्य की पूर्ति भी करेंगे और परोक्ष रूप से 'सत्ता के दलालों' के प्रति अपना विरोध भी दर्ज करा पायेंगे। सूचना के अधिकार के तहत बाद में आप ऐसे कुल मतदाताओं की संख्या भी जान सकेंगे।
आप अगर सभी प्रत्याशियों को नालायक पाते हैं तो प्रकट रूप से आप अल्पसंख्यक हैं लेकिन यदि वोट न देने वालों की संख्या एक समूह के रूप में देखी जाय तो? यदि सभी वोट न देने वाले इस तरह अपना मत व्यक्त करें तो? आप बहुसंख्यक होंगे जिनका मत मायने रखेगा। आज ऐसे मतों के आधार पर भले परिणाम प्रभावित न हों लेकिन कल को शासक वर्ग नियमों में यह संशोधन करने को बाध्य हो सकता है कि यदि किसी क्षेत्र में 'मतदान न करने' वालों की संख्या एक निश्चित प्रतिशत तक पहुँच जाती है तो वहाँ प्रक्रिया निरस्त कर दुबारा से पूरी कार्यवाही हो और प्रत्याशियों की स्क्रीनिंग हो। सम्भव है कि ऐसी स्थिति में 'बहुसंख्यकों' के मध्य से ही कोई लायक प्रत्याशी सामने आ जाय!   
हल्के तौर से सोचने पर यह बहुत पिद्दी सा प्रावधान लगता है लेकिन यह दलाल उठाइगीरों के लिये एक चुनौती भी है। सोचिये कि अगर यह स्थापित हो जाय कि अमुक क्षेत्र के मतदाता परोक्ष रूप से सभी प्रत्याशियों को नकार सकते हैं तो पार्टियों और जनता दोनों की सोच में परिवर्तन होगा कि नहीं? जाति, मजहब जैसे सारहीन मुद्दों के स्थान पर वास्तविक मुद्दे निर्वाचन को प्रभावित करेंगे कि नहीं? जनकल्याण सबसे पहले आयेगा कि नहीं?
सोचिये! यह समय अंगुली पर स्याही का निशान लगाने के साथ साथ भ्रष्ट सुविधाभोगी देश के गद्दारों को ठेंगा दिखाने का भी है।
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लोकतंत्र के इस मॉडल से आप अगर दुखी हैं तो आप अकेले नहीं हैं। इस मॉडल में जो दोष हैं उनकी ओर इशारा करते ये तीन आलेख कभी मैंने लिखे थे। आप इन्हें देख सकते हैं:
  
हाल में  चैतन्य आलोक  (संवेदना के स्वर) ने फेसबुक पर यह आलेख शेयर किया जो स्याह पक्ष को उजागर करता है। आप के लाभ के लिये उसे यहाँ दे रहा हूँ। [ उनके ब्लॉग आलेख का लिंक यह है - भारत में (अ) व्यवस्था किस तरह काम करती है? ]:
 रईसों और ताकतवर लोगों का यह “सिंडीकेट !!
by Chaitanya Alok on Saturday, February 4, 2012 at 6:15pm ·
“भारत के सभी संसाधनों" पर चन्द रईसों और ताकतवर लोगों का कब्जा है। रईसों और ताकतवर लोगों के बीच बनें इस “सशक्त गठबन्धन” को सिंडीकेट या माफिया” कह सकते हैं। देश में फैली (अ) व्यवस्था इस “सिंडीकेट” द्वारा किस तरह से निर्देशित होती है ? रईसों और ताकतवर लोगों का यह सिंडीकेट” कुछ नियम-कायदे” बनाता है ताकि जो लोग रईस और ताकतवर नहीं हैं वह इस (अ) व्यवस्था से हमेशा बाहर रहें। यह “सिंडीकेट”, सभी महत्त्वपूर्ण जानकारियों और ज्ञान को अपने नियन्त्रण में रखता है। जानकारियों से यहाँ मतलब "धन बनाने", व्यापार और रोजगार की उन सम्भावनाओं से है जिनका पूर्व ज्ञान मात्र कुछ लोगों को ही रहता है। मतलब कौन सी जगह हाई-वे बनाना है, किस प्रकार की टेक्नोलोजी या उत्पाद को बढावा देना है। सरकारी और निजी व्यापार और रोजगार की बयार किस तरफ बहेगी और उससे होने वाले लाभ की गंगा किस तरह और किस किस को तरेगी, वही सब। फिर इन जानकारियों को सीमित पहुंच तक रखने के लिये रईसों और ताकतवरों का यह “सिंडीकेट” बहुत से नियम-कायदों का मकड़जाल बुनता है। नियम-कायदों के इस मकड़जाल का पहला मकसद यही होता है कि “आम आदमी”, रईसों और ताकतवरों के इस वैभवशाली साम्राज्य से दूर रहे और उसे किसी भी तरह से चैलेंज करने की स्थिति में न पहुचें। नियम-कायदों के इस मकड़जाल में बहुत सी सीढ़ियां होती हैं और हर सीढ़ी पर एक गेट कीपर तैनात होता है।
यह (अ) व्यवस्था हर गेटकीपर को कुछ ताकत देती है जिनके द्वारा वह अपनी सीमा में नियत नियम-कायदों को नियंत्रित करता है।......
यह बात महत्वपूर्ण है कि गेटकीपर का अहम काम अपने उपर वाली सीढ़ी तक पहुंच को मुश्किल बनाना है, इसके परिणाम स्वरुप प्रत्येक उपर वाले गेटकीपर की ताकत कई गुना बढ़ती जाती है। और अंत में सिंडीकेट महा-शक्तिशाली हो जाता है। रईसों और ताकतवरों का यह सशक्त गठबन्धन या सिंडीकेट”, अन्य सहयोगी लोगों के शातिर नेटवर्क” के द्वारा नियम-कायदों के इस मकड़जाल को नियंत्रित करता है, और यह सुनिश्चित करता है (अ) व्यवस्था की सभी संस्थायें इस शातिर नेटवर्क” के द्वारा नियंत्रित की जायें। इन संस्थायों के मुखिया के पद पर जब शातिर नेटवर्क के व्यक्ति को बैठाया जाता है तो उसकी ताकत बेहद उंचे दर्जे की हो जाती है क्योकिं उसके कार्य अब विधि और संविधान सम्मत हो जाते हैं और उन्हें चैलेंज करना मुश्किल ही नहीं लगभग नामुमकिन को जाता है। “सशक्त गठबन्धन या सिंडीकेट” इस बात के पूरे इंतजाम करता है कि शातिर नेटवर्क” के एक- एक व्यक्ति को ताउम्र पूर्ण सरंक्षण दिया जाये।
पर देश का वाच डाग” मीडिया और इस शातिर नेटवर्क” से बाहर हुये लोग क्या इतनी आसानी से इसे काम करने दे सकते हैं?
“मीडिया” जो जनमानस को निरंतर प्रभावित करता है उसे भी इसी “शातिर नेटवर्क” द्वारा येन केन प्रकारेण नियंत्रण में रख कर वाच डाग” से लैप डाग” बना दिया जाता है। शातिर नेटवर्क” में उन लोगों को सहर्ष स्वीकार कर लिया जाता जो या तो येन केन प्रकारेण, “सशक्त गठबन्धन या सिंडीकेट” को फायदा पहुंचाते हैं या फिर उनका बहुत विरोध करने की स्थिति में पहुंच जाते हैं। बहुत से गेटकीपर जो अपने रसूख और धनबल को बढ़ाने में कामयाब हो जाते हैं उन्हें भी शातिर नेटवर्क में शामिल कर लिया जाता है।
पर फिर भी इसे त्वरित रूप से चलाये कैसे रखा जाता है?
(अ) व्यवस्था के पूरे तन्त्र को लालच रुपी इंजन से चलाया जाता है और इसके सभी कल पुर्जों में काले धन रुपी लुब्रीकैंट को डाला जाता है।
 
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समस्या यह है कि लोकतंत्र का कोई बेहतर विकल्प नहीं सूझता। ऐसे में जो उपलब्ध है उसी में सुधार की लड़ाई लड़ी जाय।
क्या पता 49-O ही वह चिनगारी हो जो रावणों की लंका भस्म करने का सामान बन जाय?
राष्ट्रों के भाग्य बदलने में सदियाँ लगती हैं। जो पीढ़ी लड़ती है वह फल नहीं चखती। क्या पता हमारे लिये यही तय हो?
भोली है यह आशा लेकिन बिना इसके जिया भी तो नहीं जाता!

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

बसंत की ऐसी तैसी ...


बसंत माने जिसमें संत भी बौरा जायँ। बसंतपंचमी आई और गई। अधेड़ और बूढ़ों ने गुजरे जमाने याद कर आह भरे। पीले कपड़ों में उन गालों की ललाई याद की जिन पर अब वक्त की झुर्रियाँ हैं और शाम को ब्लड प्रेशर की दवा खा खाँसते सो गये। जवानों को पता ही नहीं चला हालाँकि फेसबुक पर आहें भरते अंकल टाइप के जवान बसंत बसंत चिल्लाये भी। उधार खाते का वैलेंटाइन डे आने वाला है, जवानों को और मार्केटिंग कम्पनियों को उसका इंतज़ार है। धुँआधार तैयारियाँ चालू हैं। वैलेंटाइन बाबा भी संत थे। बौराने का भरपूर मसाला दे गये। दूरदर्शी थे। उन्हें पता था कि सुदूर इंडिया में जब जवान लाइफ के टेंशन में बसंत काल की फसंत विद्या भूलने लगेंगे तो उनका डे ही काम आयेगा। जमाना गवाह है, बड़े बौरान टाइप के संत थे।

जवानों को बसंत या किसी संत से कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें तो बस फँसने फँसाने का बहाना चाहिये। सारी फसंत विद्या लिये मोबाइल जो साथ में है! भाँति भाँति के एस एम एस और टाक स्कीम – अगर आप फँसानू जोड़े हैं तो आपसी बातचीत मुफ्त और छ्त्तीस घंटे बतिया लिये तो उसे तिरसठ करने के लिये पास के कॉफी हाउस में कॉफी मुफ्त।

दाँत चियारने, आँख मारने, ताली बजाने, लजाने, रूठने, मनाने, चुम्मा लेने आदि आदि सबके तो इमोटिकॉन चैट बॉक्स में बने ही हुये हैं। कितनी सहूलियत रहती है! गॉड नोज पुराने जमाने में इनकी ऐक्टिंग करने के लिये कितनी मेहनत करनी पड़ती होगी! ओल्ड फैशन्ड यू नो! फूल तक चैट बॉक्स में बन जाते हैं, असली फूलों के फूलने का मौसम जानने, निहारने, चुनने में बड़ी ट्रबल है। शियर नॉनसेंस! आइ ऐम एलर्जिक टू पॉलेन, यू नो! वैसे भी फूल एक्जीविशन में ही अच्छे लगते हैं। देखो दूर से, छुओ मत। छूने के लिये तो ... ही ही ही।

माइ डैड इज सुपर्ब! ये देखो मस्त बाइक गिफ्ट किया, अभी तो ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं पास में।
यू आर ग्रेट डैड!
चिपक कर पीछे बिठा के घूमने घुमाने का मज़ा आप लोग क्या जानो? पता है इससे गल्स को गिफ्ट करने का ग्रेट तरीका भी आ जाता है। वो ढली चाँदनी आंटियाँ हैं न! चेन पहन कर शाम को सब्जी लेने जाती हैं। बस एक झटका और गिफ्ट मनी हाथ में। हाउ कूल!

हम तो हरदम बसंत के स्प्रिंग मोड में रहते हैं। उसके आने जाने को जानने से क्या होगा? घंटा!
ये देखो ये आर्टिकल भी किसी अंकल टाइप ने ही लिखा है। बोर! महाबोर!! थम्स डाउन किधर है? 

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

समय के साये में ...सौन्दर्य सोच

काल, परिवेश, सभ्यता, संस्कृति के अंतर से सौन्दर्य के प्रतिमान और मानक परिवर्तित होते हैं। एक ही काल की दो भिन्न संस्कृतियों में इनमें अंतर होता है। हमलावर बाबर को क्या लोग, क्या प्रकृति; हिन्दुस्तान में सब बदसूरत ही लगे थे!
दो भिन्न संस्कृतियाँ जब एक दूसरे के सम्पर्क में आती हैं तो उनकी टकराहट और सम्मिश्रण से नयी अवधारणाये भी विकसित होती हैं लेकिन एक बात तय है – मनोरंजन के दृश्य, श्रव्य माध्यमों, गीतों, कथाओं आदि सब में नायक नायिका प्राय: सुन्दर ही होते हैं। नायक वीर धीरोदात्त होता है तो नायिका ऐसी कि जिससे प्रकृति के मनोरम उपमान गढ़े गये प्रतीत होते हैं। वास्तविक जीवन में साधारण रूप वाली लैला जब पर्दे पर उतारी जाती है तो अप्रतिम सुन्दरी होती है! इस सोच की एंटी थिसिस के रूप में मैं बनमानुष सरीखे महाकुरूप और लंठ बाऊ की कथा लिख रहा हूँ लेकिन उसे भी चारित्रिक रूप से पतित नहीं कर रहा। इसके क्या कारण हो सकते हैं?  

हिन्दी ब्लॉग जगत में एक जन ‘समय’ नाम से मनोविज्ञान आधारित विश्लेषण मंच की आपूर्ति करते हैं। वाद विवाद से परे रह कर इनके ब्लॉग 'समयके साये में' को एक जिज्ञासु और विद्यार्थी की तरह मैं पढ़ता रहता हूँ। यदा कदा ई मेल सम्वाद भी होते रहे हैं। इनकी एक पोस्ट 'चारित्रिक गुणों के सम्बन्ध' पढ़ कर निज मन में उमड़ते सौन्दर्य विषयक प्रश्न का मनोवैज्ञानिक पक्ष जानने की उत्सुकता हुई और मैंने उन्हें यह मेल लिखा:

आप के ब्लॉग आलेख पढ़ता रहता हूँ और पसन्द करता हूँ, भले उपस्थिति का पता न चले। चरित्र पर ताजे आलेख से एक विचार आया। सिने, काव्य और अन्य अभिव्यक्ति माध्यमों में नायक/नायिका अक्सर चरित्र और काया दोनों पक्षों से सुन्दर दिखाये जाते हैं। दिखाने और देखने की इस इंसानी चाहत के पीछे जाने कितने आयाम छिपे हैं। उनके मनोवैज्ञानिक पक्ष पर प्रकाश डालते कुछ लिखेंगे क्या?  

उनका यह उत्तर आया:

.... 
आपने एक सुझाव पेश किया है, अच्छा लगा। इस पक्ष की गंभीरता से विस्तृत विवेचना तो फिर कभी हो जाएगी, अभी इस पर आपके चिंतन के लिए हम भी प्रत्युत्तर में सिर्फ़ कुछ सुझाव पेश किए दे रहे हैं। जरूरी लगे तो संवाद आगे भी बढ़ाया जा सकता है।

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पहले दिखाने और देखने की इस चाहत पर। इसके पीछे के आयामों पर कुछ विवरणात्मक भावप्रधान साहित्यिक सा लिखने की हमारी सीमाएं हैं, हम तो सिर्फ़ कुछ नीरस विचारात्मक सुझाव ही पेश कर सकते हैं।
मनुष्य का अस्तित्व उसके सामाजिक सार से ही है। यानि कि उसके अस्तित्व की सारी सक्रियता समाज के साथ अंतर्गुथित है। वह दूसरों के साथ अपनी अंतर्क्रियाओं में अपने को सामाजिकतः उपयोगी साबित करने और इसमें बेहतर सिद्ध करने की कवायदों में रहता है। वह औरों के सामने अपने को व्यक्तिगत तौर पर भी, सौन्दर्य और सामूहिक मूल्यों के मामलों में भी बेहतर साबित करना चाहता है। उसकी महत्त्वांकाक्षाएं, अपने सामाजिक महत्त्व को विस्तार देने में फलीभूत होती हैं। यही दिखाने के पीछे का महत्त्वपूर्ण आयाम है, वह बेहतर बनने, होने की कोशिश करता है। नहीं हो पा रहा है तो बेहतर दिखने की कोशिश करता है, इसके लिए वह आदर्शों को सिर्फ़ ओढ़ता-बिछाता है और उनका प्रदर्शन करने लगता है।
मनोविज्ञान में देखने और दिखाने की इस प्रवृति को अहम्के बोध से भी जोड़कर देखा जाता है। सामाजिक संबंधों की पद्धति का अंग बनकर और अन्य लोगों से अन्योन्यक्रिया व संप्रेषण करते हुए मनुष्य अपने को परिवेश से अलग करता है, अपनी शारीरिक तथा मानसिक अवस्थाओं, क्रियाओं तथा प्रक्रियाओं के कर्ता के रूप में अपनी एक छवि बनाता है और दूसरों के अहम् के मुकाबले में खड़े, किंतु साथ ही उनसे अभिन्नतः जुड़े हुए अपने अहम् (आत्म’, ‘स्व’) के रूप में सामने आता है।
मनुष्य द्वारा अपने अहम् का बोध या अपने आत्म की चेतना व्यक्तित्व-निर्माण की एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है, जो शैशवावस्था में आरंभ होती है। आत्मचेतना के विकास की प्रक्रिया अहम्के एक आधारभूत और निश्चित बिंब के निर्माण के साथ पूरी होती है, जिसमें मनुष्य अपने बारे में विचारों और अन्य व्यक्तियों के प्रति अपने रवैयों के बारे में एक अपेक्षाकृत स्थिर और सचेतन मानसिक निर्मिति बना लेता है। इसके संज्ञानमूलक घटकों में मनुष्य का अपने प्रति, यानि अपनी योग्यताओं, शक्ल-सूरत, सामाजिक महत्त्व, आदि से संबंधित मूल्यांकन शामिल होते हैं। जैसे कि यदि किसी मनुष्य का लालन-पालन जीवन के भौतिक पक्ष को ही सब-कुछ माननेवाले परिवार में हो रहा है तो यह बहुत संभव है कि वह अपने छैल-छबीले रूप को ही जो उसके अनुसार उसके महंगे, फ़ेशनेबुल कपड़ो का परिणाम है, को ही अपनी आत्म-धारणा में सर्वोच्च महत्त्व देगा। अहम्के व्यवहारमूलक घटक में अपने को समझने, अन्य व्यक्तियों से सहानुभूति तथा आदर पाने, अपना दर्जा बढ़ाने की इच्छा अथवा, इसके विपरीत, आड में रहने, मूल्यांकन तथा आलोचना से बचने, अपनी कमियां छिपाने, आदि की इच्छा शामिल रहती हैं।
अहम् के बिंब के दो पक्ष हुआ करते हैं, एक वास्तविक अहम्जिसमें मनुष्य अपनी आत्मधारणा को यथार्थ वस्तुगत आलोचना के साथ परिपक्व करता है और अपने बारे में एक वास्तविक छवि बनाता है और उसकी बेहतरी के प्रयास रचता है। दूसरा कल्पित अहम्भी होता है, यानि वह अपने को किस रूप में देखना चाहता है, उसके आधार पर वह अपनी सक्रियता को क्रियाबद्ध करना चाहता है। यदि यह नहीं हो पाता है, जो कि अक्सर ही हुआ करता है, तो फिर वह इस कल्पित अहम्की धारणा के अनुसार अपनी दिखावटी छवि रचने और प्रस्तुत करने को प्रवृत्त रहता है। 
बाद में ब्लॉग पर व्यक्तित्व के ऊपर विस्तार से एक श्रृंखला शुरू करने का भी विचार है, तब इस पर विस्तार से और भी सामग्री प्रस्तुत करने की संभावना बनेगी। बातें कई और भी हैं. अभी इस पर इतना ही, इनसे काफ़ी इशारे मिल सकते हैं।
अब कुछ बातें अन्य कला माध्यमों में नायक/नायिका के चरित्रों को आदर्श रचने की प्रवृत्ति पर। इन्हें वही मनुष्य रच रहा है जिसकी कुछ प्रवृत्तियों की बात हम ऊपर कर चुके हैं। उसी को आगे बढ़ाते हैं।  सिने, साहित्य या कला माध्यम अंततोगत्वा अपने आपको अभिव्यक्त करने के, अपने आपको दूसरों में विस्तार देने केअपनी सामाजिक उपयोगिता साबित करने और इसी ज़रिए एक सामाजिक मूल्य पैदा करने की प्रक्रियाएं मात्र हैं जिससे कि अंततः एक व्यक्तिगत संतुष्टि, एक सामाजिक संतुष्टि, या अभी के दौर में जो अधिक देखा जा रहा हैश्रेष्ठता बोध की तुष्टि और भौतिक पूंजी प्राप्त की जा सकती है।
आगे बढ़ते हैं, अब प्रश्न यह उठता है कि व्यक्ति ऐसा करना ही क्यों चाहता है, यानि कि अपने आपको अभिव्यक्त ही क्यूं करना चाहता है?
मनुष्य जब भी अपने परिवेश के साथ अंतर्क्रियाओं में कुछ नया (यह हो सकता है कि व्यक्तिगत तौर पर उसके लिए नया हो) अनुभव करता है (आत्मपरक सामान्य था विशिष्ट अनुभव), यह नया पन इसमें भी हो सकता है कि इन्हीं अंतर्क्रियाओं में वह यह महसूस करता है कि वर्तमान में कुछ ठीक नहीं हैइसे और बेहतर तरीक़े से किया जा सकता है (यथार्थ का चित्रण तथा बेहतरी के विकल्पों की तलाश कीआवश्यकता और इस हेतु सुझाव), या जब वह तय कर लेता है कि वर्तमान में कुछ निश्चित खराबियां हैं और उन्हें कुछ निश्चित तरीक़ो से ही ठीक किया जा सकता है (यथार्थ की विकृतियों का निरूपण एवं विश्लेषण और निश्चित विकल्पों का प्रस्तुतिकरण)तो मनुष्य के लिए यह आवश्यकता पैदा होती है कि वह इसे, अपने द्वारा अनुभूत किए हुए को औरों के साथ बांटे, दूसरों को बताए, यानि इसे अभिव्यक्तकरे।
यथार्थ से असंतुष्टि, नवीन रचने को प्रेरित करती है। नवीन रचने के लिए मनुष्य एक महत्त्वपूर्ण मानसिक उपागम ‘कल्पनाका सहारा लेता हैजिसके ज़रिए वह यथार्थ के उपलब्ध संज्ञान की सीमाओं में हीकुछ निश्चित परिणाम प्राप्त करने के लिए यथार्थ में विभिन्नबदलावों की कल्पना करता है, योजना बनाता है। यदि इस प्रक्रिया का विषय मानसिक सामग्री है, तो जाहिरा तौर पर इसके परिणाम मानसिक यानि वैचारिक ही होते हैंजिन्हें वह भाषा के जरिए, बोल कर या लिखकर या अन्य कला माध्यमों के ज़रिए अभिव्यक्त करता है।
यानि कि कला माध्यमों में व्याक्ति यथार्थ की विकृतियों का निरूपण करता हैउन्हें सही किए जाने की आवश्यकता महसूस करता, करवाता है और फिर वैकल्पिक कल्पनाएं प्रस्तुत करता है। ग़लत को सही करवाने के लिए, कमियों को दूर करवाने के लिए, चरित्रों कोबुनता है और उनकी अंतर्क्रियाओं के ज़रिए एक कथा का वितान रचता है जिनमें वह उसकी कल्पना के आदर्श चरित्रों के ज़रिए यथार्थ मेंकुछ आदर्श बदलावों का आख्यान प्रस्तुत करता है।
यहां आदर्शों का चुनाव किए जाने की बात परिदृश्य पर उभरती है। निश्चित तौर पर हर व्यक्ति अपने अनुभव, अपने ज्ञान और समझ, अपने दृष्टिकोणों, अपनी मान्यताओं और आस्थाओं के दायरे में ही, उनके हिसाब से ही अपनी कल्पना में आदर्श के चुनाव और उसकी प्रस्तुति की प्रक्रिया को संपन्न कर सकता है।
यथास्थिति में बड़े परिवर्तनों की आकांक्षाओं से विरत व्यक्ति, यथास्थिति में ही उपलब्ध और उसके दृष्टिकोणों से मेल खाते आदर्श चरित्र के मानदंड़ों को हीअपनी रचना में प्रस्तुत किए जाने वाले आदर्श चरित्रों पर आरोपित करता है। उसके सही लगने के, सौन्दर्यबोधके, आदर्शों के मानंदड़प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उसके परिवेश पर ही, यानि कि उसके सामाजिक यथार्थ पर ही निर्भर हुआ करते हैं।
मनुष्य का सौन्दर्य बोध (सौन्दर्य को इस तरह से भी देखा जा सकता है, कि यह चीज़ों का सही तरीक़े से, सलीके सेव्यवस्थित होना ही है, जो उसे प्रिय लगते हैं, किसी तरह की अप्रिय प्रतिक्रिया नहीं जगाते) सब कुछ सही देखना चाहता है, सही करना चाहता है, सही के साथ होना चाहता है। यह इसलिए कि अपने विकास क्रम में इसकी चेतना और इसे श्रम-प्रक्रियाओं के ज़रिए भौतिक रूप से किए जाने की संभावनाएं और क्षमताएं मनुष्य में ही विकसित हुई हैं। वह कर सकता है, इसीलिए चीज़ों को अपने उपयोग की बनानासही करना चाहता है और करता है।
एक और बात, मनुष्य अक्सर अपने अभावों, अप्राप्योंअसुरक्षाओंआदि कमियों के बीच (जिनके कि विकल्प भी यथार्थ में मौजूद होते हैं, जो किसी और के पास हैं, पर वह जिनसे वंचित है) उनकी पूर्ति की आकांक्षाओं में कल्पनाओं में रहता है।  (इसे इस तरह भी देखा जासकता है कि किसी अन्य के पास उपस्थिति ही किसी में उसकी वंचनाअभाव पैदा करती है) वह इन्हें पाने के स्वप्नों में रहता है। अब यह भी होता है कि ये सभी जहां हैवे व्यक्ति, उनका चरित्र अवचेतन-चेतन रूप से उसके मस्तिष्क में आदर्शों के मानदंड़ के रूप में स्थापित होता रहता है (इसी से यह भी समझा जा सकता है कि क्यों प्रभुत्वशाली शासकसाधनसंपन्न वर्गों के दृष्टिकोण और मानदंड आम चेतना का हिस्साबनते जाते हैं)।
तो इसलिए जब व्यक्ति रचता हैतो वह इन्हीं मानदंड़ो से निदेशित हो रहा होता है। कथा या सिनेमा की उसकी नायिका सुंदर देहयष्टि की मालिक होने के साथ-साथ उन चारित्रिक गुणों से भी संपन्न होती है जिन्हें वह उचित और बेहतर समझता है। सुंदर देहयष्टि के मानक भी समय के साथ इसीलिए बदलते रहते हैं, क्योंकि परिवेश में उपलब्ध मानक भी बदलते रहते हैं। कभी का मांसलता प्रधान स्वाभाविक देहसौंदर्य अभी छरहरी सुगठित काया के अंदर ढूंढा जाता है। पहले की नायिकाओं के स्वभावों तथा चरित्रों का मूल स्वभाव भी अब वैसा नहीं रह गया है। इसी तरह नायक के आदर्श चरित्र का गठन भी किया जाता है और इसके मानदंड़ भी परिवर्तित होते रहे हैं। वह सर्वगुणसंपन्नता और उत्तम चरित्र से लैस होकर, यथार्थ की बुराइयों के ख़िलाफ़ संघर्ष करता है, विजयी होता है। कुलमिलाकर वह अपने रचे में आदर्श और सौंदर्य का एक काल्पनिक संसार रचना चाहता है जो उसे वास्तविकता में उपलब्ध नहीं है और जिसे पाना उसकी मुक्तिकामी आकांक्षाओं और स्वप्नों से नाभिनालबद्ध है।
श्रेष्ठ आदर्शों का, श्रेष्ठ मूल्यों का, श्रेष्ठ चरित्रों का चित्रण हर सृजनधर्मा व्यक्ति की अभिव्यक्तियों के मूल में होता है और जाहिरा-तौर पर इनके मानदंड उसके दृष्टिकोणों, उसकी मान्यताओं, उसकी आकांक्षाओं तथा स्वप्नों पर निर्भर किया करते हैं।
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काफ़ी हुआ। अभी इतना ही। पता नहीं आपके यथेष्ट दायरे में यह है या नहीं, अथवा इसका अतिक्रमण कर गया है।
बाकी यदि आप आगे संवाद बढ़ाए तो।
आप स्वस्थ और सानंद होंगे,
सस्नेह
समय

सम्वाद और बहस को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उनसे अनुमति लेने के बाद उनका उत्तर सार्वजनिक कर रहा हूँ। इस विषय में आप सब के विचार क्या हैं?