मंगलवार, 25 अगस्त 2009

मदार :वनस्पति,पौधा,लता,वृक्ष -3


पौधा है : मदार , वैज्ञानिक (Botanical) नाम: Calotropis gigantea,
अन्य नाम - अर्क(संस्कृत), आक, अकौआ
मदार आदमी की ऊँचाई से भी अधिक बढ़ने वाला झाड़ी प्रकार का पौधा है। इसकी पत्तियाँ स्निग्ध, मांसल सी और कोमल होती हैं। तोड़ने पर दूध सा स्राव निकलता है जिसे लोग विषैला बताते हैं।

मुख्यत: यह दो प्रकार का होता है। एक प्रकार में पुष्प एकदम श्वेत होते हैं। पत्तियाँ कुछ छोटी तो पौधा बृक्ष सा आकार लेता हुआ। दूसरे प्रकार में पत्तियाँ अपेक्षाकृत बड़ी, पौधा छोटा और पुष्प बैगनी रंगत लिए होते हैं।

इसके संस्कृत नाम 'अर्क' का एक अर्थ सूर्य भी होता है। प्रात: बेला में सूर्य की किरणों से नहाए इसके श्वेत पुष्पों को देखने से इस संज्ञा की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। अद्भुत कांति !

यह पौधा तमाम औषधीय गुण रखता है और नानियों, दादियों का प्रिय रहा है। इसके फल जब पक कर बीज प्रसारण के लिए चिटकते हैं तो उनसे रूई निकलती है। इस रूई से बने तकिये को लगा कर सोने से 'अधकपारी' शिरोपीड़ा में लाभ होता है। इस प्रयोग को सफल होते मैंने स्वयं देखा है।

बचपन में हम लोग इसके दूध को प्रतिदिन्द्वी की आँखों मे डाल उन्हें फोड़ देने की धमकियाँ दिया करते थे। नाना नानी ने हमेशा इस पौधे के निकट जाने से मना किया - सम्भवत: इसके दूध से आतंकित रहने के कारण। वाकई इतना त्वरित प्रभाव होता है, इसकी परीक्षा नहीं कर सके। आँखों से चांस कौन ले?

महादेव की पूजा में इसके पुष्पों का प्रयोग होता है। किसी और देवी देवता की पूजा में इसे प्रयुक्त होता मैंने नहीं देखा। भाँग और धतूरा की तरह ही औघड़दानी शिव ने इस सर्वहारा पौधे पर भी अपनी कृपा रखी है। शिव से सम्बद्ध और पौधों की तरह ही टोटका वग़ैरह में भी इसका प्रयोग होता है।

सम्भवत: आप ने ध्यान न दिया हो - गाँवों में कोला कोलवाई, बँसवारी और सरेह में पाया जाने वाला यह पौधा अब कम दिखने लगा है। यहाँ गोमती नगर में एल डी ए इस पर कुछ अधिक ही मेहरबान है जिसके कारण इसके पौधे बाकायदे रोपित किए गए हैं। मैंने बड़े अनूठे चित्र मोबाइल से खींचे थे लेकिन दुर्भाग्य से कुछ चित्र गायब हो गए। इसी कारण उपर के दो चित्रों के लिए वीकीपीडिया की शरण लेनी पड़ी। वीकीपीडिया को आभार

नए घर में आया तो आसपास इसके दूसरे प्रकार की बहुतायत दिखी। अपनी पूरी देहाती गरिमा के साथ यह पौधा यहाँ बहुतायत में उपलब्ध है। यहाँ पादप और जंतु जगत की अन्योन्याश्रयिता का एक उदाहरण मैंने पाया है। एक बहुत ही रंग बिरंगी टिड्डे की जाति आहार के लिए पूरी तरह से इसकी कोमल पत्तियों पर निर्भर है। ये टिड्डे इन पत्तियों पर ही रहते हैं, उन्हें खाते हैं, वहीं सम्भोग करते हैं . .। किसी और पौधे पर मैंने उन्हें नहीं पाया। नीचे कुछ चित्र दे रहा हूँ।
क्या आप इस टिड्डे की जाति बता सकते हैं?

18 टिप्‍पणियां:

  1. जानकारी के लिए आभार!
    आपको टड्ढे का नाम भी लिखना जाहिए था।

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  2. बहुत बढिया जानकारी दी जी आपने. हमारे घर और कालोनी मे सफ़ेद फ़ूल वाला आक खूब है. हमारे घर के बाहर भी है जिनके फ़ूलों से शिवजी बाबा की चापलूसी हम करते ही रहते हैं. और उनकी चापलूसी मे बढोतरी के लिये हमने एक काले धतूरे का पौधा भी लगा दिया..आजकल उसमे मस्त फ़ूल आ रहे हैं और बाबा भी मस्त हैं. आपकी एमेल भेजिये. इसके असली फ़ोटो आपको उपलब्ध करवाये जायेंगें.:)

    रामराम.

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  3. बहुत शानदार जानकारी। मदार का वास्तुशास्त्र में भी महत्व बताया जाता है। घर के बाहरी दरवाजे की दाहिनी ओर समी का वृक्ष और बायीं(?) ओर सफेद मदार का पौधा शुभ फलदायक बताया जाता है।

    मैं सुनी सुनायी बात ही बता रहा हूँ। विशेषज्ञ लोग इसमें संशोधन प्रस्ताव प्रेषित कर सकते हैं।:)

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  4. हाय इस आलसी के ऐसे आलस पर कुर्बान...गज़ब जानकरी...

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  5. मदार का एक प्रयोग मुझ पर हुआ है। मेरे पांव के अंगूठे के नाखून भंगुर हो रहे थे। उनपर रोज मदार के दूघ का लेप किया गया। भंगुरता में निश्चय कमी हुई।
    बाकी मदार का नाम ही शिव का स्मरण करा देता है!

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  6. बहुत अच्छी जानकारी दी । बचपन से ही आक के फूल बेहद लुभाते रहे है। लेकिन फूल छूने से हर कोई मना करता रहा इसलिये छूने की तम्न्ना अभी भी है। मुझे नही पता कि कितना नुकसानदायक है फिर भी मैं अपने बच्चों को यह फूल छूने से मना करती हूं।
    सच कहा अब यह पौधें बहुत कम देखने को मिलते है।

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  7. जयपुर हमारे घर में ये बहुतायत से उगा करता है...माँ तब भी इसके पास जाने से मना करती थीं और अब भी...सफ़ेद फूल यकीनन बहुत दिलकश लगते हैं लेकिन फिर भी इसे घर से बाहर ही रखना ठीक माना जाता है...रोचक लेकिन सार्थक जानकारी दी है...टिड्डे इसके इतने प्रेमी क्यूँ हैं ये समझ नहीं आया...
    नीरज

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  8. वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्षों-पुष्पों की चर्चा में अगला नम्बर तो मदार का ही था । आप ने लिख डाला - अब तो हमारी धुन कौन सुनेगा ?

    वैसे सु्विधा भी हो गयी - सामग्री के लिये कम भटकना पड़ेगा । आज्ञा हो तो नम्बर लगाऊं मदार का वृक्ष-दोहद चर्चा में !

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  9. http://girijeshrao.wordpress.com से आयातित:Comment@Tue, Aug 25, 2009 at 6:02 PM
    बहुत बढिया जानकारी प्रदान की आपने!!!
    मदार के दूध में रूई की बात्ती भिगोकर यदि उस बात्ती को जलाकर अन्जन बनाया जाए तो वो अन्जन नेत्रज्योतिवर्धक और विभिन्न प्रकार के नेत्रविकारों में रामबाण औषधी का काम करता है। ये हमारा स्वयं का आजमाया हुआ नुस्खा है।

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  10. Bahut achcha likha hai aapne ...

    aapke Jaal Ghar ka naam bhee

    ab mere aalekh mei darj ho gaya hai

    Dekhiyega Girijesh bhai

    Sa sneh,

    Lavanya

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  11. आक पश्चिमी राजस्थान के कई स्थानों पर आज भी भरमार में मिलता है. एक कहावत भी है-
    "ऊँट छोडे आकडो, बकरी छोडे काकरो"
    ऊँट आक नहीं खाता और बकरी तो कंकड़ छोड़ कर सबकुछ खा लेती है.

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  12. वनस्पति जगत में आप कुछ अधिक स्वाभाविक लगते हैं धन्यवाद इस सदुपयोगी जानकारी के लिये...........

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  13. बस क्रिया पर ध्यान दे बच्चे -ज़ाति न पूंछो टिड्डे की ! और हिमांशु की भी तो सुनो ! उसकी नायिका अब अगली पद घात कहाँ करेगी बेचारी ?

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  14. रोचक प्रस्तुति। इस टिड्डे को विषयुक्त माना जाता है पर जानकार दवा के रुप मे भी इसका प्रयोग करते है। इसका वैज्ञानिक नाम Poekilocerus pictus है।

    आक पर लिखे कुछ लेखो को आप इस कडी से जान सकते है।


    http://www.google.com/webhp?tab=mw#hl=en&safe=off&q=+site:www.botanical.com+calotropis+oudhia&ei=iO2aSqjcHIPVkAWD7MWrAg&sa=X&oi=manybox&resnum=3&ct=all-results&fp=9733483af0cc9d26

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  15. इसके दुध से यदि सिर मं फंगस हो गया हो तो लगाने से ठीक हो जाता है । यदी शरीर मे कही आऔर है तो शहद मिलाकर लगये। यदी कोइ घाव हो गया है जो गल रहा हो तो आक के पत्ते सुखा कर बारीक पाउडर बना ले इसे डाले घाव ठीक हो जायेगा।

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