शनिवार, 16 जुलाई 2011

तिब्बत - चीखते अक्षर (11)

पूर्ववर्ती:
तिब्बत - चीखते अक्षर : अपनी बात 
तिब्बत - चीखते अक्षर : प्राक्कथन 
तिब्बत – क्षेपक 
तिब्बत - चीखते अक्षर (1)(2)(3)(4)(5)(6)(7),(8),(9),(10) 
अब आगे ...
(7) संयुक्त राष्ट्र के निवेदन

हालाँकि 1950 में संयुक्त राष्ट्र से किये गये प्रारम्भिक तिब्बती निवेदनों को सीमित प्रतिसाद मिला लेकिन चीनी अत्याचार इतने बुरे हो गये कि संयुक्त राष्ट्र ने 1959, ’61 और ’65 में तीन प्रस्ताव पारित किये जिनमें से अंतिम में यह माँग की गई थी कि ऐसी समस्त कार्यप्रणालियों को समाप्त किया जाय जो तिब्बतियों को मानवाधिकारों और उन मौलिक स्वतंत्रताओं  से वंचित करती हैं जो उन्हें हमेशा उपलब्ध रहे। तिब्बत की वर्तमान परिस्थिति ऊपर चर्चित घटनाओं (1-6) से जुड़ कर यह सुझाती है कि आइ सी जे (अंतरराष्ट्रीय न्यायालय)  की दो रिपोर्टों में चीनियों पर जातिसंहार में संलिप्त होने के आरोप और यह कथन कि ‘तिब्बतियों का एक धार्मिक समूह के रूप में विनाश करने हेतु       तिब्बत में जातिसंहार के कृत्य किये गये हैं’ अपने तर्कों की मुख्य निष्पत्तियों के रूप में सही हैं। उनमें मानवाधिकारों के उल्लंघन के दूसरे आरोप भी उल्लिखित हुये जिनमें हत्या, बलात्कार, यातना, पारिवारिक जीवन का विनाश और निर्वासन सम्मिलित थे।   इन दोनों रिपोर्टों के मुख्य निष्कर्षों के अधिकांश की अब दूसरे बहुत से स्रोतों से पर्याप्त रूप से पुष्टि हो चुकी है जिनमें से कुछ यहाँ सम्मिलित किये गये हैं। सबूत जोर देकर यह जतलाते हैं कि तिब्बतियों की संख्या तेजी से घट रही है, उनकी संस्कृति तेजी से विलुप्त हो रही है और वे चीनी घुसपैठियों की बाढ़ में डूब रहे हैं। स्पष्टतया चीनियों द्वारा संयुक्त राष्ट्र जातिसंहार सन्धि (11 दिसम्बर 1946 को हस्ताक्षरित) की धारा 2 का उल्लंघन हो रहा है जिसमें जातिसंहार को ‘एक राष्ट्रीय, जातीय, नृवंशीय या धार्मिक समूह का पूर्ण या आंशिक रूप से विनाश करने के उद्देश्य से किये गये अपराध’ कह कर परिभाषित किया गया है। भारी मात्रा में मिले प्रमाण बहुत सरल तरीके से यह सुझा देते हैं कि तिब्बती चीनियों के हाथों जातीय संहार का सामना कर रहे हैं। एकाधिक पीढ़ियों के पश्चात एक जातीय/धार्मिक समूह के रूप में जिसकी अपनी भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान हो, उनका अस्तित्त्व समाप्त हो जायेगा।

आज का तिब्बत #
आगे के अंश वर्तमान में तिब्बत की परिस्थितियों पर कुछ प्रकाश डालेंगे। ये तथ्य मुख्यत: चीनी सरकार के अनुरोध पर वहाँ गये तीन सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडलों द्वारा उद्घाटित किये गये जिन्हों ने 1979-83 के दौरान तिब्बत की यात्रायें की। ये तिब्बती लोगों की दुर्दशा को स्पष्टतया इंगित करते हैं। पीछे के समस्त भागों के अधिकांश तथ्य और आगे आने वाले तथ्य भी बिन्दुवार रूप में वैज्ञानिक बौद्ध संगठन द्वारा चीन के अग्रणी तिब्बती विशेषज्ञ प्रोफेसर वांग याओ को एक खुले पत्र के रूप में सम्बोधित किये गये। जहाँ तक ज्ञात है, उन्हों ने अभी तक हमारे किसी भी बिन्दु का उत्तर नहीं दिया है।

शिक्षा और भाषा

तिब्बत में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य तिब्बती जनसंख्या का चीनीकरण और उन पर  हठधर्मी राजनैतिक विचारधारा का आरोपण प्रतीत होता है। लिखित भाषा लगभग लुप्त हो चुकी है और बहुत से भागों में मौखिक तिब्बती भाषा नहीं समझी जा सकती। बहुत से स्थानों के नाम चीनी हैं और माँ बाप को अपने बच्चों के तिब्बती नाम रखने की अनुमति नहीं है। उदाहरण के लिये, सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडल ने पाया कि बहुत से बच्चों के नाम उनके भार या जन्म के समय उनके पिता की आयु पर रखे गये थे जैसे ‘7½’ या ‘42’। यह जानना रोचक है कि ‘तिब्बत’, ‘तिब्बती’, ‘चीनी’, ‘राजा’ और ‘इतिहास’ के लिये प्रयुक्त तिब्बती शब्द दबा दिये गये हैं और उन शब्दों से प्रतिस्थापित कर दिये गये हैं जो तिब्बत के पृथक अस्तित्त्वभाव को महत्त्वहीन बनाते हैं। अपरिहार्य रूप से ऑरवेल के ‘न्यूजस्पीक’ की स्मृति हो आती है जिसमें पार्टी को अस्वीकार्य अवधारणाओं का क्रमिक निर्मूलन किया जाता है।

कम्युनिस्ट  प्राइमरी - तिब्बती बच्चे के हाथ में चीनी वर्णमाला की पुस्तक  
अपनी शैक्षिक उपलब्धियों के बखान हेतु चीनी प्राय: आँकड़ों को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं जैसे जन द्वारा प्रारम्भ किये गये 2000 विद्यालय जिनमें 200000 विद्यार्थी पढ़ते हैं आदि। जब कि तिब्बत गये सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडल  में सम्मिलित शैक्षिक विशेषज्ञों ने 85 विद्यालयों के दौरों में जो देखा उससे निराश और संत्रस्त हुये। बहुत से स्थानों पर उन्हें सूचित किया गया कि विद्यालय ग्रीष्म ऋतु के कारण बन्द थे। एक स्कूल प्रात: 10 बजे ‘दुपहर के भोजन के लिये बन्द’ था और उसकी सभी कक्षाओं में इमारती लकड़ी के बोटों के चट्टे लगे हुये थे। स्वयं ल्हासा रेडियो ने तिब्बत में शिक्षा के घटिया स्तर की घोषणा की थी। दौरा किये गये विद्यालयों के आधिकारिक आँकड़े भी यह दर्शाते थे कि बच्चों में केवल 44% तिब्बती तथा बाकी चीनी थे। शिक्षकों में 70% चीनी थे। तिब्बत में अधिकांश समाचारपत्र, पुस्तक और पत्र पत्रिकायें चीनी भाषा में छपते हैं। तिब्बत के कई भागों में तिब्बती एकदम नहीं पढ़ाई जाती और मध्य तिब्बत में इसे केवल 3 वर्षों तक पढ़ाया जाता है और उसके बाद केवल कम्युनिस्ट किचारधारा के प्रचारवाहन के तौर पर पढ़ाया जाता है। दावा त्सेरिंग मार्क्सवाद/ल्रेनिनवाद की विदेश में शिक्षा प्राप्त एक तिब्बती था जो स्वेच्छा से तिब्बत लौटा और लन्दॉउ अल्पसंख्यक संस्थान में अध्ययन किया। उसने पाया कि वहाँ तिब्बतियों का बहुसंख्य मात्र चीनी पढ़ रहा कैडर था और विज्ञान संकाय पूर्ण रूप से चीनियों के लिये आरक्षित था। उसे इतनी घृणा हुई कि उसने तिब्बत छोड़ दिया। अंत में यह बता दें कि सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडल को एक भी तिब्बती ऐसा नहीं मिला जिसने विश्वविद्यालयीय शिक्षा पाई हो।  (जारी)                  
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 # वर्ष 1983-84  

नोट: 

सातवीं सदी के मध्य में तिब्बती राजा सोंग्त्सेन गाम्पो (569-649) के आदेश पर उसके मंत्री थोन्मी साम्भोता ने भारत का दौरा 'लेखन कला' को जानने के लिये किया।
लौट कर उसने तत्कालीन भारतीय लिपि ब्राह्मी पर आधारित तिब्बती लिपि का विकास किया। आज की भारतीय और प्राचीन ब्राह्मी लिपियों से तिब्बती लिपि की साम्यता देखें।
आभार : विकिपीडिया 
  चीनी लिपि अति प्राचीन और हजारो संकेतों वाली जटिल लिपि है जिसकी प्रकृति तिब्बतियों की ब्राह्मी आधारित सरल लिपि के एकदम उलट है। चीनी कम्युनिस्टों द्वारा तिब्बती बच्चों के शिक्षा माध्यम के रूप में चीनी के उपयोग के साथ साथ चीनी लिपि को भी उनके ऊपर थोपा जा चुका है। 
जहाँ सत्ता में नहीं हैं वहाँ भाषिक और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों के पक्ष में भोंपू बजाने वाले कम्युनिस्टों की साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का दोगलापन तिब्बत में नग्न हो जाता है।  

6 टिप्‍पणियां:

  1. संस्कृति, भाषा और सभ्यता का गला घोंट देने के विरोध में बड़े देश मौन साध जाते हैं।

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  2. यह ब्लॉग जगत का तिब्बत की दुर्दशा पर श्वेत पत्र है ....

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  3. विश्व समुदाय में तिब्बत के लिये अब तक जितना कुछ हुआ वह काफ़ी नहीं है। तिब्बत स्वातंत्र्य के लिये न केवल अधिक कार्य की आवश्यकता है बल्कि शायद दिशा-परिवर्तन भी आवश्यक है।

    @ जहाँ सत्ता में नहीं हैं वहाँ भाषिक और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों के पक्ष में भोंपू बजाने वाले कम्युनिस्टों की साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का दोगलापन तिब्बत में नग्न हो जाता है।

    सत्य वचन! मानवाधिकार-विरोधी तानाशाही प्रवृत्तियाँ मानव-जाति की शत्रु हैं।

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  4. सभी कड़ियाँ अभी तक नहीं पढ़ पाया इसका अफसोस है।

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  5. पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं, तफसील पूछोगे तो कह दूँगा - मुझे कुछ नहीं पता।.... सबसे पहले आपके ब्लॉग की यही पंक्ति पढ़ी.... पोस्ट पढते-पढते आपकी बकबक में नायाब चीजे भी दिखने लगी......पहली बार आई और आके बहुत सार्थक-सा लगा.....नोट में लगे लिपियों का ब्योरा भी मन को कौतुहल के हद तक ले गया.....

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