गुरुवार, 30 जून 2011

अपलाप (?)

"मृत्यु के बारे में सोचना पलायन है। अतार्किक भय की तार्किक परिणति।" 
"यह कहना सीमित दृष्टि का परिचायक है। तुमने यह मान लिया कि मृत्यु के बारे में सोचने वाला जीवन संघर्षों से घबराता है और यह भी कि वह भयभीत होता है।" 
"जब समय सीमित हो तो सार्थक काम करो। व्यर्थ की सोचें भटकाती हैं और सच की विकृत प्रस्तुति करती हैं। कोई आवश्यक नहीं कि दुबारा पहिये की खोज करो। जितना चिंतन उपलब्ध है, वह पर्याप्त है।"
"तो तुम यह बताना चाह रहे हो कि किसी एक निष्कर्षी चिन्तन मार्ग को पकड़ कर काम किया जाय और स्वयं को गँवा दिया जाय? तुम्हारी बात सम्मोहक है लेकिन तलहीन कुयें में कूदने के समान है।"
"उसके बिना कुछ नहीं हो सकता। कहीं जाना हो तो एक मार्ग तो पकड़ना ही पड़ेगा। तुम राह दर राह फुदकते हुये कहीं नहीं पहुँच सकते।" 
"तुमने मान लिया कि जहाँ जाना है वह एक है। बस वहीं गड़बड़ है। तुम्हारे मॉडल में गड़बड़ है। ऐसा क्यों नहीं सोचते कि राह दर राह फुदकते हुये ढेरों लोग यादृच्छ ही अस्थायी संतुलन बनाते बिगाड़ते रहते हैं और एक एक कर मरते जाते हैं। उनके स्थान पर दूसरे आते रहते हैं।" 
"फिर तो कोई बात ही नहीं रही। सब अनजान पर अनजाने छोड़ दो। खाओ, पिओ, जियो और मर जाओ! यह तो यथास्थिति समर्थक विकृति है।" 
"नहीं, यथास्थिति जैसा कुछ होता ही नहीं। मैं बस यह कहना चाह रहा हूँ कि एक तुम्हारे और तुमसे मिलते जुलते सोच प्रयासों को ही सारा सच नहीं कहा जा सकता।" 
"तुम हो किस ओर?" 
"मैं अपनी ओर हूँ।" 
"तुम्हें सिवाय कुचलने और नष्ट करने के और कोई उपाय नहीं!" 
"मृत्यु पर इसीलिये सोच रहा था। अंतिम सत्य जैसा कुछ नहीं होता और इसलिये तुम्हारा यह उपाय भी निरुपाय परिणति ही ले आयेगा। दु:ख यही है कि जीवन इतना आलोकित कभी नहीं रहा और न होगा कि अन्धेरे का स्थान ही न बचे। इस बहस को समाप्त करो और बस यह समझ लो कि अन्धेरा-प्रकाश या मृत्यु-जीवन एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। एक की उपस्थिति दूसरे की अनुपस्थिति भी नहीं कही जा सकती।"
"कुछ नहीं और ...तुम्हारा कहना वृथा है और तुम सच में मृत्यु की पात्रता रखते हो।"       

बुधवार, 29 जून 2011

प्रलाप

बाहर बादलों की दबिश से झँवराया प्रकाश है और कमरे में 6500 केल्विन ताप का आभास देता फेयर ऐंड लवली प्रकाश। खिड़की के सलेटी काँच और जाली के भूरेपन में फँसा प्रकाश इन दोनों से दो दो हाथ करता उन्हें अलग अलग किये हुये है जब कि खुली छत पर तनी पारदर्शी छतरी से छन कर आता प्रकाश भीगा ठिठुरा सा है। 
...इतने सारे प्रकाश हैं और सामने अन्धेरी दीवार है - आँखों के आगे नहीं, मन के आगे। चल नहीं पाता। मन का चलना कभी बन्द हुआ है भला? 
ऐसा चलना भी क्या जब पाँवों में पुनरावृत्ति की चप्पलें पड़ी हों। घुटनों का जीवन द्रव सूख रहा है - मन, मस्तिष्क और पाँव गतियों में कोई तालमेल नहीं। 
...अभी कुछ पन्ने लिखे हैं, जिनसे अक्षर पिघल पिघल गिर रहे हैं। मुझे यह प्रकाशों का षड़यंत्र सा लगता है। हथेली पसीजती रहती है। बारिश की ऋतु में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।  गर्मियों की उन साँझों में ऐसा होता है जब सारे प्रकाश एक जैसे जोगिया हो जाते हैं। किसी ने इसे रसायनों की गड़बड़ी बताया। मैं उससे यह पूछ्ना भूल गया कि वह वातावरण की बात कर रहा था या मेरी? वह दुबारा नहीं आने वाला।  
प्रकाश की केमिस्ट्री क्या होती है? नहीं, मुझे यह पूछना चाहिये कि मिस्ट्री क्या होती है? वह बुढ़िया माई काले बादलों के पीछे छिपे अधजगे सूरज को अनुमान से ही जब अर्घ्य दे रही होती है तो वह निरी यांत्रिकता होती है या कृष्ण वितान के ऊपर अँखुआते प्रकाश से नीचे आने का आह्वान? उसने कभी प्रकाश को ऐसे देखा होगा क्या? 
कितने ही लोग हैं जिन्हें इसका आभास ही नहीं होता। होना या न होना मायने नहीं रखता। उनके लिये यह सहज स्वाभाविक सा होता है - साँस की तरह लेकिन जिनकी साँसें ही जटिल हों, वे क्या करें?
...कमरे में क्लोज सर्किट टी वी कैमरे लगा कर वीडियो बनाया जाय तो क्या प्रकाशों पर कुछ और प्रकाश पड़ेगा?  अगर फ्रेमों को तेजी से भगाया जाय तो कुछ नया पता चलेगा क्या? मुझे नहीं लगता। वह बस आँखों का मनोरंजन होगा जिसे देखते साँसें टँगी रहेंगी जब कि संसार ऐसे ही चलता रहेगा। 
...मैं कुछ अधिक ही संवेदनशील हूँ। यह कहना मनोविकारी के लिये एक सम्मानजनक सम्बोधन भर है - अन्धे के लिये सूरदास जैसा? सम्वेदनशील कौन नहीं होता? बस इसलिये कि मैं उसे बड़ा सा अनुभव कर पाता हूँ जो सभी करते हैं लेकिन सिर झटकने इतना - दाल में नमक की डली टप्प!फिर स्वाद का फैलाव; मुझे विशिष्ट नहीं बनाता। बात बस इतनी है कि मैं औरों से अधिक आलसी और गैतल हूँ। जो औरों के लिये बस यूँ ही होता है मेरे लिये विशिष्ट हो जाता है। ऐसे लोग टाइमपास टाइप होते हैं। खाली समय में उनके आलस में भागीदार बनो और काम आने पर चलते बनो! 
...प्रकाश में भी भेद देखने वाले अ-व्यवहारिक होते हैं - हानिहीन प्रकार के। उन्हें बस यूँ ही उपेक्षित कर देना होता है जैसे सड़क चलते चुप पागल को। 
...कहाँ से और किस तरह से शुरू किया था और अब कहाँ हूँ! भीतर गहरे, बहुत गहरे अन्धकार का एक ट्यूमर है। ऊपर उठती उदात्ततायें वहाँ गोता क्यों लगायें? ऋषियों और नीतिकारों की बातें तो साँकल में ही झूलती रह जाती हैं। जब भी उस तक पहुँचता हूँ तो उसका शल्य करने को अस्त्र ढूँढ़ता हूँ और अजाने ही प्रकाश को टुकड़ों में बाँटने लगता हूँ कि कोई टुकड़ा तो सही कोण और घुमाव का हो जिससे ट्यूमर को काट-निकाल-फेंक सकूँ। 
अपने आप पर हँसता हूँ - प्रकाश सीधी रेखा में चलता है, घूमता भी है तो बहुत कम और मेरे मन में फाइबर ऑप्टिक्स वाले केबल नहीं हैं। 
...अब तक तो समझ ही गये होगे कि मुझमें 'बुरा मानने' या 'अच्छा लगने', 'महान होने' या 'नीचता की पराकाष्ठता तक पहुँचने' आदि आदि लायक कुछ भी नहीं? कुछ भी नहीं। 
बिजली चली गई है। कमरे में 6500 केल्विन का प्रकाश नहीं है और साँवरे, सलेटी, भूरे सब गायब हो गये हैं। इतना क्षणजीवी होना स्वस्थ होना है कि रोटी, बच्चों और समाज की परवाह बची रहती है लेकिन उस ट्यूमर का क्या करूँ मित्र?                

शनिवार, 18 जून 2011

तिब्बत - चीखते अक्षर (7)

imageपूर्ववर्ती:
तिब्बत - चीखते अक्षर : अपनी बात
तिब्बत - चीखते अक्षर : प्राक्कथन
तिब्बत – क्षेपक
तिब्बत - चीखते अक्षर (1), (2), (3), (4), (5), (6)
अब आगे ...
सांस्कृतिक क्रांति


जैसा कि बताया जा चुका है सांस्कृतिक क्रांति के पहले ही तिब्बती संस्कृति का अधिकांश ध्वस्त किया जा चुका था। यह दौर तिब्बतियों द्वारा झेले गये मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न की चरम गहराई को चिह्नांकित करता है। धर्म का पालन एकदम असम्भव बना दिया गया, व्यक्तिगत सम्बन्ध, केश-सजा, वेश भूषा, व्यक्तिगत आदतें और यहाँ तक कि सोने के तरीके भी कम्युनिस्टों की सावधान निगरानी में रहे (आज भी हैं।) आज भी ऐसे स्त्री पुरुष जो परस्पर विवाहित नहीं है, साथ सोते हुये 'पकड़' लिये जायँ तो अक्सर उन्हें सार्वजनिक रूप से जलील किया जाता है और दंडित किया जाता है। अनधिकृत निवासियों पर नियंत्रण रखने और जाँच करने के बहाने घरों में घुस कर नियमित तलाशियाँ ली जाती है। 1959 में ल्हासा के अधिकांश पुरुषों को ल्हासा से दूर श्रमिक शिविरों में भेज दिया गया और प्रतीत होता है कि उनमें से बहुत कम लौट पाये। ल्हासा ‘भयभीत भूखी स्त्रियों’ का शहर हो गया। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान दो जनों के बीच का संक्षिप्त वार्तालाप भी शक के घेरे में आ जाता था अगर उसमें पार्टी नारों का मुलम्मा न हो।

थामज़िंग (संघर्ष सत्र) का एक चित्र
एक थामज़िंग सत्र : चित्राभार - विकिपीडिया
थामज़िंग (संघर्ष) सत्रों के दौरान अनगिनत लोग मर मरा गये। इसमें आश्चर्य नहीं कि भयानक ‘विचार पुलिस’ और ऑर्वेल के उपन्यास ‘1984’ सम प्रतीत होती परिस्थितियों के कारण बहुत से तिब्बती पागल हो गये। एक तिब्बती महिला ने लिखा है कि उसकी बहन को चटक रंगीन थियेटरनुमा कपड़ों जैसा कुछ पहने और स्वयं से बातें करते ल्हासा के चारो ओर आवारा घूमते देखा गया। वह अपनी बहन के बारे में चिंतित थी क्यों कि उसके पाँच बच्चे थे और उसका पति जेल में था। लेकिन वह आने जाने पर कड़े नियंत्रण के कारण उससे मिलने नहीं जा सकती थी।

एक दूसरे ने लिखा है कि उसने तिब्बती बच्चों से भरी हुई कई लॉरियों को ल्हासा से गुजरते देखा जिन्हें उनकी हत्या करने के लिये ले जाया जा रहा था। कद में वे इतने भी नहीं थे कि उन सवारियों के साइड से देख सकें लेकिन वे गोली मारे जाने लायक कद रखते थे। नौ और दस वर्षों की आयु वाले बच्चे समूह में चिड़ियों का शिकार करने और मक्खियों को मारने के लिये भेजे जाते थे और शाम को उन्हें चीनियों के सामने अपने ‘शिकार’ को जमा करना होता था। शिकार में सबसे कम सफल बच्चों को क्रूर दंड दिया जाता और उनके माँ बाप भी ‘प्रतिक्रियावादी संतान’ पैदा करने के लिये दंडित किये जाते थे। चीनियों का यह कहना था कि चिड़ियों को इसलिये मारना था कि वे फसलों को चट कर जाती थीं। हालाँकि, तिब्बती यह बताते हैं कि इस व्यवहार को लागू करने के पीछे इस मंशा की सम्भावना अधिक थी कि पुरानी संस्कृति के मनोबल को तोड़ दिया जाय जो बौद्ध धर्म के गहन प्रभाव के कारण जीवन के हर रूप को बहुत आदर देती थी।

कुंसांग पल्जोर, जिसके माता पिता की चीनियों ने हत्या कर दी थी और जिसे हजारों और युवाओं के साथ कम्युनिस्ट सिद्धांत सीखने के लिये चीन भेज दिया गया था; ने हत्या, बलात्कार, यातना, भूख, पूर्ण दमन और सामाजिक अव्यवस्था के बारे में लिखा है। बहुत से विश्वासी तिब्बती कैडरों की तरह उसने भी जो देखा उससे विरुचित हो गया और भारत भाग गया।
(अगले भाग में जनसंख्या विस्थापन और असंतुलन)
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संघर्ष सत्र (थामज़िंग, Thamzing):
कम्युनिस्टों द्वारा जनता को बरगलाने के लिये गढ़े गये तमाम शब्दों में से यह एक शब्द माओ की देन है। कम्युनिस्ट समाज को ‘सर्वहारा’ और ‘बुर्जुआ’ दो प्रमुख वर्गों में बाँट कर रखते हैं। क्रांति के लिये वर्ग संघर्ष अनिवार्य है और सर्वहारा विरोधियों को वर्गशत्रु कहा जाता है।

प्रकट रूप में थामज़िंग ‘लक्ष्य(वर्गशत्रु)’ के हित के लिये आयोजित किया जाता है ताकि उसके मस्तिष्क में प्रतिक्रियावादी और प्रति-क्रांतिकारी (कुछ और शब्द जो हर उस सोच के लिये प्रयुक्त होते हैं जो कम्युनिस्ट सोच और विधि विधान का समर्थन नहीं करती) चिंतन का लेशमात्र भी न रहे।

इसके तहत ‘लक्ष्य’ को हजारो आँखों के सामने भीड़ द्वारा उत्पीड़ित और पीटा जाता है। भाँति भाँति की शारीरिक और मानसिक यातनायें दी जाती हैं जिसके दौरान ‘लक्ष्य’ को भीड़ से मुखातिब रहना होता है।

व्यवहारत: यह जनता के भीतर विभेद उत्पन्न करने की एक विधि है। बच्चों को अपने माँ बाप का त्याग सार्वजनिक रूप से करने को कहा जाता है, सेवकों को स्वामियों का, भिक्षुओं को अपने लामाओं का आदि। बीस, पचास और कभी कभी सैकड़ों की संख्या में लोग ‘लक्ष्य’ को पीड़ित और प्रताड़ित करते हैं जिनमें न मानने पर भावी अत्याचार की आशंका से त्रस्त उनके अपने परिवार वाले भी सम्मिलित रहते हैं।

इन सत्रों में 'लक्ष्य' को अपराध स्वीकृति के लिये बाध्य भी किया जाता है ताकि बाद में उसे मृत्युदंड दिया जा सके। अपराध स्वीकृति माओवादी तंत्र में बहुत महत्त्वपूर्ण है क्यों कि उन्हें एक और स्वयंस्वीकृत प्रतिक्रियावादी या प्रतिक्रांतिकारी कम करने का ठोस और दिखाऊ तर्क मिल जाता है।
 
इन सत्रों के मनोदशा पर कुप्रभाव इस तथ्य से समझे जा सकते हैं कि पंचेन लामा लम्बे उत्पीड़नहीन सार्वजनिक संघर्ष सत्रों और बन्दी रहने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के पुन: सदस्य बन गये। इसके पहले उन्हें दलाई लामा को बलैकमेल करने और दलाई लामा के विरुद्ध सरकार समर्थित समांतर तिब्बती परम्परा की स्थापना के लिये चीनी मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया था। कालांतर में उन्हों ने अपना वह प्रसिद्ध चीन विरोधी भाषण दिया जिसके एक सप्ताह के भीतर ही उनकी रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। 

एक अंश The Voice That Remembers: A Tibetan Woman’s Inspiring Story of Survival से:

ama_adhe... एक दिन एक थामज़िंग में सम्मिलित होने के लिये टाउन से अभी लोगों को बुलाया गया। कई ग्रामीण और एक लामा गिरफ्तार किये गये थे। हम आतंकित थे कि हमारे टाउन में सबसे पहले प्रताड़ित होने वाले लामा हमारे परिवार के विशेष लामा खार्नांग कुशो थे। महिला सैनिकों में से एक वहाँ आई जहाँ बन्दी खड़े थे। भिखारियों से यह देखने को कहा गया कि उसने लामा से कैसा व्यवहार किया, उन्हें भी लामा के साथ वैसा ही करना था। खार्नांग कुशो को घुटनों के बल झुकने को बाध्य कर दिया गया और सैनिक उनके पैरों पर उनके पीछे खड़ी हो गई। तब उसने एक रस्सी लेकर उनके मुँह में ऐसे लगा दिया जैसे कि घोड़े के साथ किया जाता है और उनके सिर को झटके के साथ पीछे की ओर खींच लिया। उसने उनके चेहरे पर पेशाब उसे पीने को बाध्य करते हुये डाला। जब उन्हों ने इनकार किया, तो उसने पेशाब को उनके चेहरे पर यूँ ही उड़ेल दिया।

संघर्ष सत्र के जारी रहने के दौरान, झुके हुये बन्दियों को बाध्य किया गया कि वे भींड़ से मुखातिब रहें। खार्नांग कुशो के साथ इतना बुरा व्यवहार होते देख टाउन के कुछ लोग खड़े हो गये और चिल्लाये,”हमारे लामा ने ऐसा क्या किया है कि तुम लोग उन्हें इस तरह दंडित कर रहे हो?” तुंरंत ही सैनिकों ने उन लोगों को अलग कर दिया जो चिल्लाये थे और जेल में ले जाने के लिये ट्रकों में चढ़ा दिया। चीनियों ने उन्हें दिये जा रहे धर्माचार सम्बन्धित दंड की व्याख्या खार्नांग कुशो को यह बता कर की,”ईश्वर के नाम पर तुम बुरे रहे हो और अपने मत के प्रयोग से स्वयं के लाभ हेतु जनता को मूर्ख बनाते रहे हो।“
उस दिन अपने लामाओं और मित्रों की प्रताड़ना को देखने के बाद सभी लोग यह कहते हुये रो रहे थे,”अब चीनी कम्युनिस्टों के हाथों हमारे कष्ट भोगने के दिन आ गये।“...

एक अंश Wikipedia से:

... यू झियावोली एक स्टूल पर बहुत मुश्किल से संतुलन साधते खड़ी थी। उसका शरीर कमर से लम्बवत झुका हुआ था। उसके तने हाथ सीधे उसके पीछे यूँ थे कि एक से दूसरे की कलाई पकड़ी हुई थी। इस मुद्रा को ‘हवाईजहाज बनाना’ कहा जाता था। उसकी गर्दन के चारो ओर भारी जंजीर थी और जंजीर से एक ब्लैकबोर्ड, वास्तविक ब्लैकबोर्ड, लगा हुआ था जिसे उस विश्वविद्यालय की एक कक्षा से निकाला गया था जहाँ यू झियावोली ने पूर्णकालिक प्रोफेसर के तौर पर दस वर्षों तक पढ़ाया था। ब्लैकबोर्ड के दोनों ओर उसके नाम के साथ वे सारे लफ्फाजी ज़ुर्म लिखे हुये थे जिनका कि उसके ऊपर आरोप था...

यह सब एक विश्वविद्यालय, वह भी एक क्रीड़ांगन, में घटित हो रहा था जो उच्च शिक्षा के सर्वोत्तम चीनी संस्थानों में से एक था। दर्शकों में झियावोली के विद्यार्थी, सहकर्मी और पुराने मित्र थे। तमाशा देखने के लिये स्थानीय कारखानों से कामगारों और पास के कम्यूनों से किसानों को बसों में भर कर लाया गया था। भीड़ से बार बार लयबद्ध आवाजें आ रही थीं...”यू झियावोली मुर्दाबाद! यू झियावोली मुर्दाबाद!!”...

यू झियावोली याद करती हैं,”संघर्ष सत्र के दौरान मेरे मन में अनेक भावनायें उठीं। मैंने सोचा कि तमाशाइयों में कुछ बुरे लोग थे। लेकिन मैंने यह भी सोचा कि उनमें से बहुत से ऐसे थे जो अनजान थे, ऐसे लोग जो यह नहीं समझते थे कि क्या घट रहा थ, इसलिये मुझे उन लोगों पर दया आई। वे उन सत्रों में मज़दूरों और किसानों को ले आये थे जिन्हें समझ नहीं थी। लेकिन मैं क्रोधित भी थी।“...

मंगलवार, 14 जून 2011

संत निगमानन्द को श्रद्धांजलि

 गंगा शुद्धि के लिए दी प्राण की आहुति

गंगासम्मान योद्धा को श्रद्धांजलि 
तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें। 

हरिद्वार कुम्भ क्षेत्र में अवैध खनन को रोकवाने और गंगा सम्बन्धित कई माँगों को लेकर 115 दिनों से अनशन कर रहे संत निगमानन्द से अंतत: जीवन हार गया। औषधियों के साथ विष देने की भी अफवाहें हैं। 

जब गंगा हारेगी तब क्या होगा? 
हारने जीतने को जीवन रहेगा?  

शनिवार, 11 जून 2011

तिब्बत - चीखते अक्षर (6)



अब आगे ... 




युद्ध के दौरान चीनियों के अत्याचार इतने वीभत्स थे कि कई वर्षों तक तिब्बती कम्युनिस्ट नेता और तिब्बती राजनीतिक सलाहकार समिति के महत्त्वपूर्ण उपाध्यक्ष पद पर रहे फुंत्सोक वांग्याल को भी उन अत्याचारों का विरोध करने और तिब्बती स्वतंत्रता आन्दोलन से सहानुभूति प्रदर्शित करने के लिये बन्दी बना लिया गया। ल्हासा में पी एल ए के आर्टीलरी कमांडर रहे कर्नल चेंग हो-चिंग यह जताते हुये तिब्बती पक्ष से आ मिले कि उन्हें तिब्बतियों की की जा रही हत्याओं और उन सरल सीधे लोगों के साथ किये जा रहे छ्ल प्रपंच से घृणा हो गई थी।
10 मार्च 1959 को जब ल्हासा में विद्रोह उठ खड़ा हुआ तो युद्ध को जारी रहते लगभग छ: वर्ष बीत चुके थे और तिब्बत में वृहद संघर्ष आगे के चार वर्षों तक जारी रहा जो कि मुख्यत: दक्षिणी प्रांत ल्होका में केन्द्रित था और 1962 के चीन-भारत युद्ध काल में भी जारी रहा। (पीस्सेल के अनुसार इस बात के कुछ प्रमाण हैं कि खाम्ब योद्धाओं ने युद्ध के दौरान चीनियों के संचार तंत्र को ध्वस्त कर दिया था जिससे आभासी विजय की स्थिति में उनकी जल्दीबाजी भरी वापसी को समझा जा सकता है।) सत्तर के दशक के दौरान भी यत्र तत्र विद्रोहों की अच्छी खासी संख्या है।
आक्रमणकारियों की गृद्ध दृष्टि की निगरानी में परम्परा का निर्वहन।
शांत और व्यवस्थित आतंक का एक उदाहरण 
यह कोई नहीं जानता कि ल्हासा विद्रोह के दौरान कितने तिब्बतियों की चीनियों ने हत्या कर दी। उनका दमन उस बर्बरता और असभ्यता के साथ किया गया जैसा कि नाज़ियों ने वारसा में किया था। मृत जनों की संख्या के 10000 तक होने के अनुमान हैं। सामान्यत: लोगों को यह पता नहीं है कि दमन के दो दिनों के पश्चात हजारो तिब्बती महिलाओं ने ल्हासा की वीथियों में जुलूस निकाले और चीनियों से तिब्बत से बाहर जाने की माँग की। उसके पश्चात सामूहिक गिरफ्तारियाँ हुईं और अपनी नेताओं के साथ बहुत सी तिब्बती महिलाओं को बन्दी गृह में डाल कर वर्षों तक यातनायें दी गईं। बाद में उन्हें सार्वजनिक रूप से मृत्युदंड दिया गया लेकिन मारी गई अधिकांश महिलायें पहचानी ही नहीं जा सकती थीं क्यों कि उन्हें बुरी तरह से पीट पीट कर विरूपित कर दिया गया था।
ल्हासा विद्रोह के बाद समूचे मध्य तिब्बत में घनघोर संघर्ष फैल गया। निरंतर बढ़ती हुई संख्या के साथ खाम्ब योद्धा दलाई लामा को बन्दी बनाने को उद्यत  चीनी सेनाओं के साथ आमने सामने की लड़ाई में सन्नद्ध हो गये। उस समय इस सूचना के बाद कि चीनी उनका अपहरण कर उन्हें मार देना चाह रहे थे, दलाई लामा अपने मंत्रियों की सलाह मान भारत की सुरक्षित भूमि की ओर बढ़ रहे थे। युद्ध के इस मध्य काल में तिब्बती प्रतिरोध गोम्पो ताशी अन्द्रुग्त्सांग के नेतृत्त्व में अधिक सुव्यवस्थित और नियमित हो गया।
'आस्था के रक्षक तिब्बती स्वयंसेवी' का बैज
चार नदियाँ छ: पहाड़ प्रतिरोध सेना 
चित्राभार : विकिपीडिया 
 उन्हों ने ‘चार नदियाँ छ: पहाड़’ नाम के प्रतिरोध समूह की स्थापना की थी और बाद में युद्ध में घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुये। चीनियों की क्रूरता इतनी भयावह थी कि मध्य तिब्बत के निवासियों ने भी, जो कि स्वभाव से खाम्ब निवासियों की तुलना में बहुत ही कोमल थे, बड़ी संख्या में अपने को तिब्बती प्रतिरोधी दलों में सम्मिलित कर लिया।
युद्ध का अंतिम दौर 1965-74 में घटित हुआ जब जन्मभूमि से 1600 किलोमीटर दूर उत्तरी नेपाल के मुस्तांग क्षेत्र में स्थित अपने अवस्थानों से मुख्यत: खाम्ब योद्धाओं ने चीनियों पर आक्रमण कर दिया। यदि तिब्बतियों को भारत या कहीं और से शस्त्र सहायता मिली होती तो विद्रोह निस्सन्देह और भी अधिक वर्षों तक जारी रहता और चीनियों के लिये और भी कष्टकारी होता। चीनी तिब्बत के ऊपर सम्पूर्ण सैन्य नियंत्रण छ्ठे दशक के मध्य में ही पा सके। उदाहरण के लिये 1958 के अवसान काल में खाम्ब योद्धाओं ने त्सांग पो (ऊपरी ब्रह्मपुत्र) घाटी में स्थित चीनी सैन्य ठिकाने त्सेथांग पर आक्रमण कर बहुशस्त्रास्त्र सज्जित चीनी गैरिसन को मटियामेट कर दिया जिसमें तीन से पाँच हजार तक की संख्या में चीनी सैनिक थे। उस समय पूर्वी तिब्बत का एक बड़ा भूभाग और वे क्षेत्र जिनसे होकर दलाई लामा 1959 में अपने भारत निर्वासन की यात्रा किये; खाम्ब योद्धाओं के नियंत्रण में थे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू के मथ्थे तिब्बत के विनाश का बड़ा दोष है। चीनियों को नाराज़ न करने की उनकी आकुलता के चलते समाचारों पर एक सुनियोजित सेंसर लगाया गया जिसके कारण चीनी अत्याचारों की सूचनायें बाहरी संसार तक पहुँच नहीं पाईं। वे पाकिस्तान की ओर से इतने अधिक आशंकित थे कि उन्हों ने लगातार चीनी खतरे को कमतर आँका और एक सभ्यता के सम्पूर्ण विनाश में मौन सहमति जैसा साथ दिया। विनाश को रोकने के लिये बहुत कुछ किया जा सकता था और गोला, बारूद, शस्त्रास्त्र की अत्यल्प आपूर्ति भी तिब्बती स्वतंत्रता सेनानियों के लिये अनमोल सहायता होती।
व्यवहारत: खाम्ब योद्धाओं को एकमात्र सहायता युद्ध के अंतिम वर्षों में सी आइ ए से नेपाल में मिली जब कि उनका उपयोग सी आइ ए ने चीनियों को सताने के लिये मुहरों की तरह किया। राजनैतिक रूप से कपटहीन खाम्ब योद्धा अपनी मातृभूमि को बरबाद होते और अपने परिवारों का सफाया होते देख व्याकुल हो चाहे जहाँ से सहायता मिले, लेने के लिये मज़बूर थे। वह सहायता भी कुछ खास नहीं थी और सातवें दशक में चीन के साथ सम्बन्ध सुधरते ही अमेरिका ने उसे भी शीघ्रतापूर्वक समाप्त कर दिया।
विद्रोही युद्ध अंतत: 1974 में समाप्त हो गया जब नेपाली सेना ने चीनी बलों के साथ मिल कर खाम्ब योद्धाओं पर हमला बोल दिया। बहुत से खाम्ब योद्धा या तो मारे गये या नेपाली जेलों में लुप्त हो गये जब कि बीस वर्षों से भी अधिक चली लड़ाई में बचे खुचे योद्धा दक्षिण की तरफ भारत में आ गये। तिब्बती संग्राम का अंत ऐसे हुआ।
(अगले भाग में सांस्कृतिक क्रांति)
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‘चार नदियाँ छ: पहाड़’ नाम तिब्बत के खाम या खाम्ब प्रांत की चार नदियों मेकांग, यांग्त्सी, यालोंग जियांग और सालवीन और छ: पर्वतमालाओं को व्यक्त करता है। इस प्रतिरोधी सैन्य के संस्थापक रहे गोम्पो ताशी अन्द्रुग्त्सांग एक तिब्बती व्यापारी थे। उनके पौत्र ने ‘Four Rivers Six Ranges’ नाम से उनकी आत्मकथात्मक जीवनी को प्रकाशित किया है जो कि सुलभ है। 
युद्ध में घायल होने के बाद सितम्बर 1964 में भारतभू पर अपनी मृत्यु के पहले इस महान योद्धा ने अपने जीवन के ये अंतिम शब्द कहे जो कि आने वाली पीढ़ियों के लिये संघर्ष को जारी रखने के लिये सर्वदा प्रेरक रहेंगे:
“तिब्बत की दु:खभरी गाथा समूची मानवजाति के लिये एक चेतावनी और एक पाठ हो और हर जगह लोगों को अत्याचारों और मानवाधिकारों के दमन के विरुद्ध संघर्षरत रहने को उद्यत रखे।“
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सी आइ ए के तिब्बत अभियान के बारे में यहाँ पढ़ा जा सकता है: 

1959 में ल्हासा के दमन के दौरान चीनियों के हाथ जितनी भी धर्म पुस्तकें और कलाकृतियाँ लगीं, उन्हें जला दिया गया। पांडुलिपियों की संख्या इतनी अधिक थी कि महीनों तक आग जलती रही। भागते हुये शरणार्थी जिन पांडुलिपियों को निकाल लाये थे उन्हें प्रकाशित करने का प्रकल्प चल रहा है। अधिक जानकारी और सहयोग के लिये आप यहाँ पहुँचें: http://www.adoptabook.us/home
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शुक्रवार, 10 जून 2011

प्लीज शट अप!

एक अपरिपक्व, ठग, तमाशेबाज, कायर ..... आदि आदि का समर्थन मैं क्यों कर रहा हूँ? मेरा समर्थन व्यक्ति को नहीं इस मुद्दे को है कि काला धन वापस लाया जाय और दोषियों को दंडित किया जाय। यदि कोई परिपक्व, सज्जन, निष्कामी, वीर इस मुद्दे को लेकर इतने व्यापक तरीके से सामने आयेगा और लोगों की आँखों में अंगुली डालेगा तो मेरा समर्थन उस पर शिफ्ट हो जायेगा। लेकिन कोई सामने आये तो सही!
 इतना बड़ा मुद्दा किसी ठग उठाईगीर के लिये क्यों छोड़ रखा है? मैं उन सब के विरोध में हूँ जो बाबा पर प्रहार कर इस मुद्दे को तनु कर लबड़धोंधे खाते के कबाड़ में डाल देने को उद्यत धनदोहनी भांडों और लिजलिजे हरामखोरों का जाने अनजाने प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन कर रहे हैं।

काले धन का मुद्दा इन इन से जुड़ता है(बहुत कुछ छूट भी गया है):

- बेड के अभाव में हॉस्पिटल के फर्श पर कुत्तों के बीच सोये मरीजों से

- सरकारी हस्पतालों में दवा बिना टाँग रगड़ रगड़ यातना झेलती आत्माओं से 

- प्रसव के लिये सुविधाओं के अभाव में फुटपाथ पर बच्चा जनती माताओं से 

- बजबजाते सीवर और गढ्ढों वाली सड़कों से

- बाबुओं के टेबल टेबल फाइल शिफ्ट करवाते बरबाद होते ज़िन्दगी के अनमोल लम्हों से

- उस आतंक से जो शाम को बहू बेटियों को घर से बाहर नहीं निकलने देता 

- उन किसानों से जो आत्महत्या को आत्मीय मानने लगे हैं 

- सब्जबागों के भ्रम में जवानी के अनूठे वर्ष बरबाद करते जवानों से 

- शहरों की झुग्गियों में जिन्दगी के नरक को जीते मर्द, औरत और बच्चों से 

- रात में फुटपाथ पर सोने के जुर्म में चूतड़ पर पुलिस के प्यार प्रसाद पाते रिक्शावालों से

- हर इंसान के भीतर चौबीसो घंटे छाये रहने वाले अनजाने आक्रोश से

- उन औरतों से जिनकी जवानी अज्ञान और प्रदर रोग में ही खत्म हो जाती है 

- उन मर्दों से जिनके लिये ज़िन्दगी गुटका खा कर थूक देने के बराबर है 

- उन बच्चों से जिनके करिअर विकल्प ये हैं - भीख माँगो, पॉकेट काटो, बिस्तर गर्म करो या विकलांग बनो

- रेलवे का कोई क्लास हो - काकरोचों से , काटते हुये अनजान कीड़ों से

- आम जन की क़्वालिटी ऑफ लाइफ से ...

...काले धन का मुद्दा कोई गिरहकट भी इतने व्यापक स्तर पर उठायेगा कि सरकार दहल जाय तो मैं उसे समर्थन दूँगा। आप शुचिता की बात करते हैं तो ले आइये देवदूतों को या स्वयं बन जाइये लेकिन अपने भगवान के लिये इस मुद्दे को यूँ उठाइये तो सही!

आप के बकवासी तर्क आप की सुविधाभोगी ज़िन्दगी के ऊपर मँडरा रहे खतरों से उपजे हैं। आप को कहीं भीतरखाने डर है कि लिहाफ उठा तो आप स्वयं भी किसी के साथ नंगे सोये मिलेंगे। अपना आचरण सुधारिये और इस मुद्दे का समर्थन नहीं कर सकते तो प्लीज शट अप!

गुरुवार, 9 जून 2011

तिब्बत - चीखते अक्षर (5)




बीस वर्षीय युद्ध 

चीनी सामान्यत: यह दावा करते हैं कि तिब्बतियों द्वारा उन के विरुद्ध लड़ा गया युद्ध मुख्यत: तिब्बती शासक वर्ग का था जिसे आसानी से 1959 में कुचल दिया गया। अब यह बात असत्य साबित हो गई है। इसके विपरीत वह ल्हासा की तिब्बती सरकार ही थी जो शांतिपूर्ण समझौते की आस कर रही थी  और पूर्वी तिब्बत के उग्र लोगों को संयमित रखने के हर उपाय कर रही थी। एकदम प्रारम्भ से ही तिब्बती लोगों ने चीनी हमले का विरोध किया और समूचे सीमाक्षेत्र के साथ स्वत:स्फूर्त प्रतिरोध के क्षेत्र विद्यमान थे। जब चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी की टुकड़ियों ने अक्तूबर 1950 में द्राइ-चू(यांग्त्सी नदी) को पार करने का प्रयास किये तो उन्हें तिब्बती सरकार की सेनाओं और तिब्बती स्वयंसेवी जनसेनाओं दोनों का सामना करना पड़ा। 1950 के प्रारम्भ से मध्य तक आते आते समूचे पूर्वी तिब्बत में लड़ाई चारो ओर फैल चुकी थी। युद्ध बीस वर्षों तक चला और प्रतिरोध की लोकप्रियता इतनी गहन थी कि तिब्बती शासक समाज पर दमनकारी होने का चीनी आरोप बहुत ही संदिग्ध लगता है। लड़ाई के उरूजकाल में लाखों चीनी और तिब्बती जूझ रहे थे और उसका प्रसार पूर्वी, मध्य और दक्षिणी तिब्बत सभी ओर था। लड़ाई में तिब्बती जनसमाज का हर तबका सम्मिलित था। 1949 में चीनियों ने पूर्वी तिब्बत में घुसपैठ की। उन्हों ने स्थानीय आपसी झगड़ों को प्रोत्साहित किया और उनकी हरकतों को केन्द्रीय तिब्बती सत्ता की अनिर्णयात्मक प्रवृत्ति के कारण बल मिला। इस लम्बे युद्ध के निम्न कारण थे:
(अ)  चीनी सेना की भारी संख्या के कारण उत्पन्न खाद्य पदार्थों का अभाव
(आ)  ‘कोरिया सहयोग’ निधि में योगदान के लिये चीनियों द्वारा फसल, ऊन और पशुसम्पदा पर लगाये गये कर
(इ)   तिब्बती खाम्ब जाति को नि:शस्त्र करने के प्रयास
(ई)  ‘कम्यून तंत्र’ को लागू करने के प्रयास जो कि तिब्बतियों के लिये घृणित था क्यों कि वह सुस्थापित जीवन पद्धति के लिये विनाशकारी था।
(उ)  चीनी घुसपैठियों द्वारा भारी संख्या में बसावट जो कि चाम्दो क्षेत्र में चरम पर थी।
(ऊ) सर्वमहत्त्वपूर्ण थे - तिब्बतियों के धर्म को हानि पहुँचाने के प्रत्यक्ष और परोक्ष चीनी प्रयास

पहले तो चीनियों ने कुछ ऐसे सुधारों को लागू किया जो बहुत लाभकारी थे और यदि वे वैसे ही जारी रहते तो सम्भवत: मुद्दे बहुत ही अलग होते लेकिन तिब्बती समाज में दूरगामी और सामान्यत: अवांछनीय परिवर्तनों पर उनके निर्दयी जोर ने खाम और आम्डो क्षेत्रों में नित वर्धमान विद्रोह को उकसाया जिनका प्रतिरोध चीनियों ने विभिन्न अत्याचारों से किया। उदाहरण के लिये दोइ नाम के एक छोटे से नगर में 500 में से 300 कथित भूदास स्वामियों को आतंकित भीड़ के सामने सार्वजनिक रूप से सिरों में पीछे से गोलियाँ दाग कर मार दिया गया। लोगों को बताया गया कि यदि उन्हों ने समाजवाद का विरोध किया तो उनका भी यही हाल होगा।
चीनियों ने विद्रोह के अस्तित्त्व को कई अवसरों पर स्वीकार किया यद्यपि नई चीनी समाचार एजेंसी के बुलेटिन अंतर्विरोधों से भरे पड़े हैं। डा. पीस्सेल संकेत करते हैं कि राज्य परिषद को दिये अपने भाषण में कथित ‘चीनी तिब्बती क्षेत्र’ के कमांडर-इन-चीफ ने घोषणा की कि कठिनाइयों से पाला पड़ा है और तिब्बत में गम्भीर ग़लतफहमियाँ फैली हैं। बाद में दिसम्बर 1957 में कम्युनिस्ट पार्टी कार्यकारी समिति के सचिव फान मिंग ने यह तक घोषित कर दिया कि खाम्बों के अकथ से प्रतीत होने वाले विद्रोह के प्रेरक जनक तिब्बत में विद्यमान हान(चीनी) जाति के ‘महान हान श्रेष्ठताबोध’ और तिब्बत के पिछड़ेपन के प्रति प्रदर्शित उनकी जुगुप्सा थे।             
1955 में जैसे जैसे विद्रोह बढ़ा, लिथांग, बाथांग, दर्गे, चाम्डो और कांज़े के आसपास घनघोर लड़ाइयाँ प्रारम्भ हो गईं। यह जानना कठिन है कि उन लड़ाइयों में सम्मिलित लोगों की वास्तविक संख्या क्या थी लेकिन प्रारम्भ में ही लड़ाई की गहनता और उसके क्षेत्रीय प्रसार से परिचित बहुश्रुत लोग चीनियों से लड़ने वाले खाम्बा घुड़सवारों की संख्या दस हजार तक बताते हैं। लड़ाइयों का प्रसार बड़े भूभाग में हो गया क्यों कि अपने पारम्परिक चीनी शत्रुओं के विरुद्ध शस्त्र उठाने वाले तिब्बतियों की संख्या बढ़ती गई और कभी कभी तो युद्ध शून्य से भी 40 डिग्री सेल्सियस नीचे तापमान में  4500 मीटर से भी अधिक ऊँचाइयों पर लड़े गये। अधिकांशत:, धुन्ध वाले निचले क्षेत्रों से आये चीनी आक्रमणकारी खाम्बा योद्धाओं के आगे कहीं नहीं ठहरते थे जो कि ऐसे वातावरण में लड़ने की शक्ति रखते थे और समूचे क्षेत्र को बहुत अच्छी तरह से जानते थे। चीनियों को 1956 में जहाँ के तहाँ रोक दिया गया और उपद्रवों के कारणों की जाँच के लिये के  चीनियों द्वारा डिप्टी प्रीमियर चेन-यि को भेजा गया। उसके उपरांत चीनियों ने तिब्बतियों के साथ शान्ति समझौता कर लिया जिसे चीनियों ने बाद में तोड़ दिया।
पचास के दशक के उत्तरार्ध में चीनियों ने पूर्वी तिब्बत में अपनी सेनाओं की भारी घुसपैठ कराई थी। लिथांग में प्रारम्भ हुये एक प्रमुख आक्रमण के प्रतिकार में चीनियों द्वारा 1 जून 1956 को लिथांग के विशाल बौद्ध मठ को बमबारी द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। उस समय मठ तीर्थ यात्रियों से खचाखच भरा हुआ था। चीनियों के अनुरोध पर 1980 में जब दलाई लामा द्वारा भेजे गये द्वितीय  सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडल ने तिब्बत का दौरा किया तो उसे लिथांग के स्थान पर ध्वस्त खंडहर मिला। मठ को ढहाने के बाद लिथांग के स्थानीय तिब्बती राज्यपाल को चीनियों ने सार्वजनिक रूप से यातनायें दे कर मार दिया और सैंकड़ो भिक्षुओं का पशुओं की तरह से वध कर दिया। शरणार्थियों और चरवाहों के कैम्पों को मशीनगनों की गोलीबारी और हवाई बमबारियों द्वारा विनष्ट कर दिया गया। जाने कितने हजार चीनियों के लेबर कैम्पों में लापता हो गये। विद्रोही युद्ध जब पश्चिमी तिब्बत की ओर बढ़ा तो सभी व्यवसायों के तिब्बतियों – किसान, जनजातिगण, चरवाहे, व्यापारी और भिक्षु – ने एका दिखाते हुये अपनी बौद्ध संस्कृति और प्राचीन जीवनपद्धति की रक्षा में विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश की आक्रमणकारी सेनाओं के विरुद्ध कमर कस ली। (युद्ध जारी) 
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बहुत कुछ नष्ट भ्रष्ट और विनष्ट करने बाद अब चीन 'लुप्तप्राय तिब्बती संगीत' को बचाने के नाम पर पश्चिमी स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिल कर 'मुखौटा' कवायद में लगा है। वास्तव में उसके लिये इन सबका कोई महत्त्व नहीं लेकिन एक राष्ट्र को निगल लेने के बाद संसार को दिखाने के लिये कुछ तो करना ही पड़ेगा न!  

तिब्बती वेणु संगीत का एक नमूना - आखेटक की प्रेमाभिव्यक्ति


   

रविवार, 5 जून 2011

अण्णा, रामदेव और एक भूतपूर्व किशोर की बोर्ड परीक्षायें

जब मैंने हाईस्कूल और इंटर की बोर्ड परीक्षायें दीं, तब घनघोर नकल के भ्रष्टाचार का प्रचलन था (शायद आज भी है ;))। परीक्षा केन्द्र दूर किसी पराये विद्यालय में होते थे लेकिन अभिभावक, शिक्षक और विद्यार्थी सभी नकल कराने और करने में लिप्त रहते। कई केन्द्रों पर तो बाकायदा कांट्रैक्ट सिस्टम तक होता था। ऐसे में मेरे आदर्शवादी पिता की शपथ थी - मुझे नकल नहीं करनी थी। परीक्षाओं के दौरान मैं ऐसे एकमात्र छात्र के रूप में प्रसिद्ध हो गया जो नकल नहीं कर रहा था। शिक्षक, पर्यवेक्षक, निरीक्षक आदि दूसरे कक्षों से मुझे और मेरी उत्तर पुस्तिका देखने आते थे क्यों कि उस जमाने में ऐसी 'हरकत' एक 'आश्चर्यजनक' बात थी जो कौतुहल, सम्मान और निगरानी तक के भाव जगाती थी। कुछ घटनायें यूँ हुईं:
(1) हाईस्कूल की परीक्षा के दौरान जब पहली बार 'उड़ाका दल' (flying squad) आया तो पकड़े जाने पर रस्टिकेशन के भय से विद्यार्थी अन्धाधुन्ध अपने चिट, गाइड बुक और नकल सामग्रियों को फेंकने लगे। निरीक्षक महोदय मेरी सीट पर आये और यह कह कर कि तुम निश्चिंत लिखते रहो, मेरी सीट के आस पास के सभी चिट वगैरह स्वयं एकत्रित कर बाहर फेंकते रहे। ऐसा उन्हों ने बस मेरे साथ किया। ऐसा करते हुये उनके चेहरे पर छाया भाव मुझे आज तक याद है।     
(2) दूसरी बार उड़ाका दल शायद अंतिम दिन आया था। प्रश्नपत्र बहुत कठिन था और एक दुरूह प्रश्न (सम्भवत: 8 या 10 अंक का) के हल की एक कार्बन कॉपी से सभी परीक्षार्थी कॉपी कर रहे थे। इस बार के निरीक्षक महोदय ने वह कॉपी मेरी डेस्क के दराज में अनुरोधपूर्वक छिपा दी। उनका यह कहना था कि अगर दल उस कमरे में आया तो मेरी तलाशी नहीं होगी और बचे हुये बच्चों का भला(?) हो जायेगा। उनकी इस हरकत पर मैं कुनमुना कर रह गया।
वह प्रश्न मुझे नहीं आता था, छोड़ना ही पड़ा। उड़ाका दल के जाने के बाद जब निरीक्षक महोदय मेरी डेस्क से वह चिट निकाल रहे थे तो बगल के कक्ष  के निरीक्षक ने देख कर कहा - तो यह बच्चा भी लिप्त हो गया! मेरे कक्ष निरीक्षक ने उत्तर दिया - सिन्हा जी, कभी कभी आँखों देखा सच नहीं होता।
(3) इंटरमीडियेट में हमलोगों ने सी राजगोपालाचारी की लम्बी कविता 'भरत' पढ़ी थी। परीक्षा  के दौरान कक्ष निरीक्षक मौलवी साहब मेरे पीछे ही पड़ गये। तीन चार पंक्तियों का कोई क़ोटेशन था जिसके लिये वह ज़िद पर अड़े थे कि मुझे उसे अपने उत्तर में डालना ही चाहिये। उनका कहना था कि वह बस मेरे लिये लेकर आये थे और मेरे लिखते ही फाड़ कर फेंक देंगे ताकि दूसरे प्रयोग न कर सकें। मैंने इनकार कर दिया। जाने वह शुभेच्छा थी या परीक्षा या कुछ और?
(4) भौतिकी के एक प्रश्न  में चुम्बकीय क्षेत्र के भीतर एक कोण पर रखे धारावाही चालक पर लगने वाले बल के लिये सूत्र का डेरिवेशन करना था और एक आंकिक भी हल करना था। अपने ट्यूटर यादव जी के निर्देशों के मुताबिक मैंने बायें पृष्ठों पर पहले रफ डेरिवेशन और हल के ड्राफ्ट बनाये और फिर उन्हें पलट पलट कर दायें पृष्ठों पर फेयर करने लगा। निरीक्षक ने देखा तो झपट कर आये और मेरी कॉपी छीन उसे हवा में यूँ लहराने लगे जैसे किसी छिपे चिट को निकालना चाह रहे हों। उन्हें लगा था कि मैं कॉपी में चिट छिपा कर नकल कर रहा था। कुछ न मिलने पर झेंपी सूरत लिये उन्हों ने कहा - मैंने कुछ और समझ लिया था।
बाबा रामदेव के आन्दोलन के साथ घटित देख आज मुझे यह सब क्यों याद आ गये?
मैं बाबा के बारे में बहुत कम जानता हूँ। जी इतना अविश्वासी हो गया है कि हर उद्योग के पीछे षड़यंत्र छिपे लगते हैं। बाबा के ऊपर सम्पत्ति जमा करने, लोगों को बरगलाने और उनके एक प्रमुख सहयोगी के ऊपर हत्या करने तक के शक हैं लेकिन -
भ्रष्टाचार आज हमारे तंत्र की रग रग में पैठ चुका है क्या इस पर भी शक है?
क्या लाखो करोड़ काले धन की वास्तविकताओं और उन्हें कमाने वालों के अस्तित्त्व पर भी शक है?
इन मुद्दों को स्वतंत्र भारत में इस तरह से अब तक क्यों नहीं उठाया गया?
एयरपोर्ट पर मंत्रियों द्वारा स्वागत से लेकर अन्धेरी रात में बर्बर कार्रवाई के बाद एयरोप्लेन में बैठा कर तड़ीपार करने तक के पूरे सरकारी उपक्रम और उससे जुड़े लोग आप को किसी षड़यंत्र के अंग नहीं दिखते?
योगेश्वर कृष्ण ने कहा है - कर्म स्वभावत: दोषयुक्त होता है लेकिन इसलिये कर्म का त्याग नहीं करना चाहिये। समाज एक विचित्र समूह है। समूह स्वभावत: विचित्र होता है - भाँति भाँति के लोग! ऐसे में क्या किसी जन आन्दोलन के लिये यह सम्भव है कि उससे जुड़े सभी दूध के धुले हों?  नहीं है।
आन्दोलन के कथ्य, नीयत और नेतृत्त्व पर ध्यान होना चाहिये। अगर कोई अण्णा, कोई रामदेव इतने व्यापक कोढ़ के निवारण के लिये आगे आते हैं तो उनका दमन नहीं, उनसे सहयोग होना चाहिये लेकिन सरकारें तो वही करेंगी जो बनी बनाई व्यवस्था के हित में होगा। जनहित की निगहबानी तो जन को स्वयं करनी होगी।
कौतुहल, सम्मान, निगरानी और परीक्षायें (दमन भी)  ऊँचे आदर्शों को लेकर चलने वाले आन्दोलनों के लिये स्वाभाविक हैं, इस बात को बाबा रामदेव और अण्णा जैसे नेताओं को समझते हुये लक्ष्य पर दृष्टि रखनी चाहिये। यह संघर्ष बहुत लम्बा चलने वाला है और कोई संघर्ष सुखद नहीं होता। जनता अपनी सुविधाओं को छोड़ बहुत कठिनाई से सामने आती है। भारत में तो जाने कितने सेफ्टी वाल्व और लेमनचूस अंग्रेजों की विरासत से ही आ रहे हैं। यहाँ के बँटे समाज में तो यह और कठिन है। 
आवश्यक है कि जन भी यह समझे कि नरेगा की बोटियों और एयरकंडीशंड ऑफिसों के कॉफी मशीनों की टोटियों के रहते हुये और निरंतर बढ़ते हुये भी अगर कोई विद्रोही नेतृत्त्व सामने आया है तो वह मूल्यवान है। उससे सहयोग न करें तो कम से कम उसके दमन का समर्थन तो न करें। रही बात तर्कों की और शक़ की तो कथित ईश्वर भी इनसे नहीं बच पाया। अब यह न कहिये कि यह तो धनदोहन सिंग की 'सीजर की बीवी' वाली बात जैसी बात हो गई! नहीं सर, नहीं मैडम, उससे अंतर है। समझिये, कोशिश कीजिये। शब्द हर वक़्त मुफीद नहीं होते। यह किसी किशोर की बोर्ड परीक्षा नहीं कि एक आश्चर्य(!) पर संतुष्टि, प्रलोभन, मौकापरस्ती, सरपरस्ती, शक़ आदि की क्षुद्रता द्वारा निपटा दिया जाय। पूरी लोकशाही(अण्णा के मुख से लोकतंत्र के लिये लोकशाही सुनना अच्छा लगता है) की साख दाँव पर है।
मेरी इस पोस्ट का प्रिंट कोई बाबा रामदेव तक पहुँचायेगा क्या? मैं चाहता हूँ कि बाबा उसे टी वी पर ऐसे ही लहरायें जैसे वह कपाली बलबल एक पन्ने को कल लहरा रहा था। मुझे प्रसिद्धि की चाह नहीं, मेरा नाम न लें। मैं तो बस देखना चाहता हूँ।                        

यायावर की चिन्ता - एक पुनर्प्रस्तुति

कुछ दिनों पहले सृजनशील गिरिजेश पर लोककथा और कहानी की मिश्रित प्रतीकात्मक शैली में इसे लिखा था। आज के दिन पुनर्प्रस्तुत कर रहा हूँ।
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यायावर को उसकी माँ ने गीत सहेजने का काम सौंपा। उसकी माँ चाहती थी कि वह सहेजे गये गीतों को सुनता, सुनाता भी रहे ताकि दिन ब दिन बोझिल होती हवाओं में हल्की मीठी सरगोशियाँ बनी रहें। जब से उसने होश सँभाला यही करता आ रहा है। खेतों के गीत, बालगृहों के गीत, जेल कोठरियों के गीत, निर्माण स्थलों के गीत, ऑफिस के गीत, कॉफी मशीन के गीत, टॉयलेट के गीत, मीटिंग के गीत, रसोई के गीत... वह हर प्रकार के गीत सहेजता है। 
 पेट पालंने को वह कुछ भी कर लेता है। उसकी भोली सूरत देख कोई भी उसे काम दे देता है। कई बार मन से बेगारी भी कर लेता है। फाइल में उलझी कोई क्लर्क या बच्चों के फीस का हिसाब देखता कोई शिक्षक हो, जब उचट कर सिगरेट पीने या यूँ ही राउंड लेने चले जाते हैं तो वह बैठ कर लगन से फाइल में, हिसाब में कुछ कुछ कर देता है। वे लौट कर आते हैं तो सब कुछ ठीक पाते हैं। उसे उस समय उनकी गुनगुनाहटों को सहेजने में बहुत आनन्द आता है।
उसके साथ उससे लगन लगाये छाया भी चलती रहती है। उसकी मीठी, तीखी, बेस्वाद हर तरह की बकबक उसे आह्लादित करती है तो कभी खिझाती भी है। 
कुछ वर्षों पहले क्या हुआ कि एक दिन उसे लगा कि जब उसे एकांत की आवश्यकता होती तो वह मिलता ही नहीं था। घरों, ऑफिसों, विद्यालयों आदि में हर जगह दिन में भी बिजली के प्रकाश में काम करने की प्रथा बढ़ने के साथ साथ उसे एकान्त और कम मिलने लगा। छाया किसी और को दिखती नहीं लेकिन उसके साथ बनी रहती। एक दिन तपती दुपहर में जब वह किसी किसान के खेतों में पानी दे रहा था तो छाया हवाओं को बुला बुला उनसे बतिया रही थी। उसे उस समय एकांत की आवश्यकता थी लेकिन छाया मानने को तैयार ही नहीं थी। वह उसे भगा भी नहीं सकता था। सूरज दादा की कड़ी पहरेदारी थी। 
उसने सिर इधर उधर घुमाया तो पाया कि माँ की गोद में जाने कितने ही वृक्ष एक जगह बने रह कर भी ढेरों काम करते रहते थे। उनकी परछाइयाँ कभी सिमट कर पत्तों से अटखेलियाँ करने लगतीं तो कभी बहुत दूर जा कर घास झाड़ियों में बैठे फतिंगों से बतियाने लगतीं। उसे समझ में आया कि सूरज दादा ने उन्हें अपने सिर चढ़ा रखा था। उहँ, मुझे क्या? उसने सोचा और फिर उसे ध्यान आया कि अगर वह किसी वृक्ष की परछाईं से मित्रता जोड़ ले तो छाया मारे ईर्ष्या के पास न फटके। लेकिन मित्रता होगी तो बात भी होगी और फिर वही एकांत की कमी! कुछ समझ में न आया तो उसने सूरज दादा को गोहराया। 
सूरज दादा ने उसकी समस्या सुनी और धीमे धीमे हँसने लगे। बोले - स्थावरों की परछाइयाँ किसी मनुष्य़ से मित्रता नहीं करतीं, बात चीत भी बहुत दूर की बात है।  हाँ, स्थावरों के साथ बैठने में एकांत का सुख मिल सकता है। लेकिन उनके साथ के लिये तुम्हें धरोहर रखनी पड़ेगी।  
उसने पूछा - लेकिन मेरी छाया तो अलग ही है। वह तो मेरा दिमाग खाती रहती है। 
सूरज दादा बोले - मनुष्यों के लिये अलग नियम बनाये गये हैं। 
उसने उलझन में कहा - ऐसा क्या! क्यों? 
सूरज दादा ने उत्तर दिया - अपनी माँ से पूछना। 
सूरज दादा की बात मान कर यायावर ने स्थावर परछाइयों के साथ के लिये धरोहर जमा कर दिया। सूरज दादा ने इसके लिये ढेर सारे श्रम सीकर लिये। जब वह पसीना बहा रहा था तो उसकी छाया ने मना किया। न मानने पर रूठ कर उसने उस समय हवाओं को बुलाना और उनसे बातें करना भी छोड़ दिया। यायावर को और आसानी हो गई।
तबसे यायावर को जब भी एकांत की आवश्यकता होती है, वह वृक्षों की ओर भागता है। जब वह उनकी परछाइयों के साथ बैठता है तो छाया कुड़बुड़ाती हुई परछाइयों के किनारे बैठ उसे अगोरती रहती है। जब वह लौटता है तो उसे खूब कोसती है लेकिन वह तो तरो ताज़ा हो चुका होता है। उसे कोई अंतर नहीं पड़ता। वह आनन्द भरा कोई गीत गुनगुनाने लगता है और छाया मुग्ध हो जाती है। 
इधर कुछ दिनों से वृक्ष कम दिखने लगे हैं। यायावर ने उनके बारे में चिंतित बातें सुनी हैं - खेतों में, बालगृहों में, जेल कोठरियों में, निर्माण स्थलों में, ऑफिस में, कॉफी मशीन पर, टॉयलेट में, मीटिंग में, रसोई में - हर स्थान पर वृक्षों के कम होते जाने की चिंता है। काँच बन्द ठंडे सम्मेलन कक्षों में ढेर सारे उपाय हैं। कुछ कहते हैं कि जब से हरे रंग से पुताई होने लगी है, हालत सुधरने लगी है। कुछ इसे बकवास बताते हैं और उन्हें माफिया तक कह डालते हैं। 
यायावर को अपने एकांत और परछाइयों की चिंता है। उसने पाया है कि अब उसकी छाया कुछ अधिक ही गहरी होने लगी है। 
यायावर को चिंता है क्यों कि गीत कम होने लगे हैं। 
उसकी चिंता गहरी है क्यों कि सूरज दादा और माँ दोनों ने उसके प्रश्नों का उत्तर देना छोड़ दिया है। उसे रह रह सूरज दादा की यह बात याद आती रहती है - मनुष्यों के लिये अलग नियम बनाये गये हैं। उसे इस बात का अर्थ अब अबूझ हो चला है। 
गीतों का सहेजना भी कम हो गया है और वह सबसे उनकी चिंताओं, वृक्षों और परछाइयों के बारे में पूछता रहता है लेकिन जब दादा और माँ को भी चुप रहना पड़े तो दूसरे क्या कह सकते हैं? 
यायावर को चिंता है। उसे अपनी धरोहर की चिंता है।