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रविवार, 5 जून 2011

यायावर की चिन्ता - एक पुनर्प्रस्तुति

कुछ दिनों पहले सृजनशील गिरिजेश पर लोककथा और कहानी की मिश्रित प्रतीकात्मक शैली में इसे लिखा था। आज के दिन पुनर्प्रस्तुत कर रहा हूँ।
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यायावर को उसकी माँ ने गीत सहेजने का काम सौंपा। उसकी माँ चाहती थी कि वह सहेजे गये गीतों को सुनता, सुनाता भी रहे ताकि दिन ब दिन बोझिल होती हवाओं में हल्की मीठी सरगोशियाँ बनी रहें। जब से उसने होश सँभाला यही करता आ रहा है। खेतों के गीत, बालगृहों के गीत, जेल कोठरियों के गीत, निर्माण स्थलों के गीत, ऑफिस के गीत, कॉफी मशीन के गीत, टॉयलेट के गीत, मीटिंग के गीत, रसोई के गीत... वह हर प्रकार के गीत सहेजता है। 
 पेट पालंने को वह कुछ भी कर लेता है। उसकी भोली सूरत देख कोई भी उसे काम दे देता है। कई बार मन से बेगारी भी कर लेता है। फाइल में उलझी कोई क्लर्क या बच्चों के फीस का हिसाब देखता कोई शिक्षक हो, जब उचट कर सिगरेट पीने या यूँ ही राउंड लेने चले जाते हैं तो वह बैठ कर लगन से फाइल में, हिसाब में कुछ कुछ कर देता है। वे लौट कर आते हैं तो सब कुछ ठीक पाते हैं। उसे उस समय उनकी गुनगुनाहटों को सहेजने में बहुत आनन्द आता है।
उसके साथ उससे लगन लगाये छाया भी चलती रहती है। उसकी मीठी, तीखी, बेस्वाद हर तरह की बकबक उसे आह्लादित करती है तो कभी खिझाती भी है। 
कुछ वर्षों पहले क्या हुआ कि एक दिन उसे लगा कि जब उसे एकांत की आवश्यकता होती तो वह मिलता ही नहीं था। घरों, ऑफिसों, विद्यालयों आदि में हर जगह दिन में भी बिजली के प्रकाश में काम करने की प्रथा बढ़ने के साथ साथ उसे एकान्त और कम मिलने लगा। छाया किसी और को दिखती नहीं लेकिन उसके साथ बनी रहती। एक दिन तपती दुपहर में जब वह किसी किसान के खेतों में पानी दे रहा था तो छाया हवाओं को बुला बुला उनसे बतिया रही थी। उसे उस समय एकांत की आवश्यकता थी लेकिन छाया मानने को तैयार ही नहीं थी। वह उसे भगा भी नहीं सकता था। सूरज दादा की कड़ी पहरेदारी थी। 
उसने सिर इधर उधर घुमाया तो पाया कि माँ की गोद में जाने कितने ही वृक्ष एक जगह बने रह कर भी ढेरों काम करते रहते थे। उनकी परछाइयाँ कभी सिमट कर पत्तों से अटखेलियाँ करने लगतीं तो कभी बहुत दूर जा कर घास झाड़ियों में बैठे फतिंगों से बतियाने लगतीं। उसे समझ में आया कि सूरज दादा ने उन्हें अपने सिर चढ़ा रखा था। उहँ, मुझे क्या? उसने सोचा और फिर उसे ध्यान आया कि अगर वह किसी वृक्ष की परछाईं से मित्रता जोड़ ले तो छाया मारे ईर्ष्या के पास न फटके। लेकिन मित्रता होगी तो बात भी होगी और फिर वही एकांत की कमी! कुछ समझ में न आया तो उसने सूरज दादा को गोहराया। 
सूरज दादा ने उसकी समस्या सुनी और धीमे धीमे हँसने लगे। बोले - स्थावरों की परछाइयाँ किसी मनुष्य़ से मित्रता नहीं करतीं, बात चीत भी बहुत दूर की बात है।  हाँ, स्थावरों के साथ बैठने में एकांत का सुख मिल सकता है। लेकिन उनके साथ के लिये तुम्हें धरोहर रखनी पड़ेगी।  
उसने पूछा - लेकिन मेरी छाया तो अलग ही है। वह तो मेरा दिमाग खाती रहती है। 
सूरज दादा बोले - मनुष्यों के लिये अलग नियम बनाये गये हैं। 
उसने उलझन में कहा - ऐसा क्या! क्यों? 
सूरज दादा ने उत्तर दिया - अपनी माँ से पूछना। 
सूरज दादा की बात मान कर यायावर ने स्थावर परछाइयों के साथ के लिये धरोहर जमा कर दिया। सूरज दादा ने इसके लिये ढेर सारे श्रम सीकर लिये। जब वह पसीना बहा रहा था तो उसकी छाया ने मना किया। न मानने पर रूठ कर उसने उस समय हवाओं को बुलाना और उनसे बातें करना भी छोड़ दिया। यायावर को और आसानी हो गई।
तबसे यायावर को जब भी एकांत की आवश्यकता होती है, वह वृक्षों की ओर भागता है। जब वह उनकी परछाइयों के साथ बैठता है तो छाया कुड़बुड़ाती हुई परछाइयों के किनारे बैठ उसे अगोरती रहती है। जब वह लौटता है तो उसे खूब कोसती है लेकिन वह तो तरो ताज़ा हो चुका होता है। उसे कोई अंतर नहीं पड़ता। वह आनन्द भरा कोई गीत गुनगुनाने लगता है और छाया मुग्ध हो जाती है। 
इधर कुछ दिनों से वृक्ष कम दिखने लगे हैं। यायावर ने उनके बारे में चिंतित बातें सुनी हैं - खेतों में, बालगृहों में, जेल कोठरियों में, निर्माण स्थलों में, ऑफिस में, कॉफी मशीन पर, टॉयलेट में, मीटिंग में, रसोई में - हर स्थान पर वृक्षों के कम होते जाने की चिंता है। काँच बन्द ठंडे सम्मेलन कक्षों में ढेर सारे उपाय हैं। कुछ कहते हैं कि जब से हरे रंग से पुताई होने लगी है, हालत सुधरने लगी है। कुछ इसे बकवास बताते हैं और उन्हें माफिया तक कह डालते हैं। 
यायावर को अपने एकांत और परछाइयों की चिंता है। उसने पाया है कि अब उसकी छाया कुछ अधिक ही गहरी होने लगी है। 
यायावर को चिंता है क्यों कि गीत कम होने लगे हैं। 
उसकी चिंता गहरी है क्यों कि सूरज दादा और माँ दोनों ने उसके प्रश्नों का उत्तर देना छोड़ दिया है। उसे रह रह सूरज दादा की यह बात याद आती रहती है - मनुष्यों के लिये अलग नियम बनाये गये हैं। उसे इस बात का अर्थ अब अबूझ हो चला है। 
गीतों का सहेजना भी कम हो गया है और वह सबसे उनकी चिंताओं, वृक्षों और परछाइयों के बारे में पूछता रहता है लेकिन जब दादा और माँ को भी चुप रहना पड़े तो दूसरे क्या कह सकते हैं? 
यायावर को चिंता है। उसे अपनी धरोहर की चिंता है।  


मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

लापता कौवे

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मोरी अटरिया पर बोले कागा - सुना होगा आप ने!
लोकगीतों में वनवासी राम को अगोरती कौशल्या सूचना देने वाले जिस पक्षी की चोंच को सोने से मढ़वाने की बात करती हैं, वह कागा मेरे इलाके में नहीं दिखता जब कि यहाँ पर्याप्त हरियाली है। प्रात: चिड़ियों की चहचह है लेकिन वह कर्ण मधुर काँव काँव नहीं है। एक दो महीने से ही नोटिस कर रहा हूँ। शायद पहले भी...
बहुत पहले गाँव से पहली बार जब प्रयाग गया था तो ध्यान में आया था कि कौवों का एक दूसरा प्रकार भी होता है जिनमें गले के आसपास काला नहीं धूसर रंग होता है जब कि अपने गाँव मैंने पूर्ण काले कौवे देखे हैं। बहुत तलाशा लेकिन नेट पर भी पूर्ण काले कौवे का चित्र नहीं मिला। स्मार्ट भैया को धन्यवाद - Raven बताने के लिए। देखिए ये रहा शुद्ध कृष्ण काग: 
 श्रीमती जी कहती हैं कि नर मादा का अंतर है लेकिन वीकी का यह नीचे का चित्र और ही कहानी कह रहा है:

 
अब तो कोई भी प्रकार नहीं दिख रहा!
गए कहाँ कौवे? आप को पता हो तो बताइए।
इनकी अंतरराष्ट्रीय संरक्षण श्रेणी Least Concern (IUCN 3.1) बताई गई है मतलब कि इनको खतरा हो सकता है, इस बारे में सोचना भी नहीं है! माजरा क्या है?
जरा घर से बाहर निकलिए और बताइए तो आप के आस पास कौवे दिख रहे हैं क्या?

शनिवार, 5 जून 2010

वह वनस्पति ढूँढ़ कर लाओ वत्स ...

"... मुझे गुरुदक्षिणा का आदेश दें। करबद्ध प्रार्थना है कि दीक्षांत समारोह में स्नातक दीक्षा के लिए मेरा नाम प्रस्तावित करें।"
नालन्दा विश्वविद्यालय की एक कोठरी में गुरु के चरणों में झुका शिष्य निवेदन कर रहा था। गुरु के प्रशांत मुखमंडल पर स्मित आभा पसर गई। कृपापूर्ण स्वर में उन्हों ने आदेश  दिया,  
" नालन्दा के वन प्रांतर से वह वनस्पति ढूँढ़ कर लाओ वत्स, जिसमें औषधीय गुण न हों।"
शिष्य को आश्चर्य हुआ - यह कैसी दक्षिणा !
"जाओ वत्स। प्रात:बेला शुभ है। कार्यारम्भ में शीघ्रता करो।"
"जो आज्ञा गुरुदेव !"
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शिष्य ढूँढ़ता रहा। ऋतुएँ बीतती गईं। सूर्यदेव जाने कितनी बार नभ के चक्कर लगा गए। वह वनस्पति नहीं मिली ।  अश्रु भरे नेत्र लिए थका हारा वापस गुरु के चरणों पर आ गिरा।
"मैं असफल हुआ देव ! क्षमा करें । मुझे ऐसी कोई वनस्पति नहीं मिली जिसमें औषधीय गुण न हों। कोई और  गुरुदक्षिणा बताइए।"
आचार्य ने शिष्य को उठा कर गले लगा लिया।
"नालन्दा के वन प्रांतर ही नहीं, पूरे ज्ञात संसार में कोई ऐसी वनस्पति नहीं है जिसमें औषधीय गुण न हों। तुम कसौटी पर खरे उतरे हो। तुम्हारी स्नातक दीक्षा के लिए मैं कुलपति से विशेष सत्र आयोजन का अनुरोध करूँगा। "
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आज पर्यावरण दिवस  पर  इस कथा का स्मरण हो आया। हममें से जाने कितने वनस्पति जगत के विविध रूपों को देखने के लिए पर्यटन करते हैं या डिस्कवरी चैनल पर अमेज़न के जंगलों पर प्रोग्राम देखते हैं। क्या आप ने अपने आस पास के वनस्पति संसार पर कभी परखन दृष्टि दौड़ाई है ? आप सोचते होंगे ऐसा क्या विशेष है ?
विशेष है। अपने घर के सामने के पार्क से कुछ अज्ञात पौधों के चित्र पोस्ट कर रहा हूँ। विविधता को सराहिए।
ये बस 'घास पात' नहीं हैं। इनके नाम बताइए। गुण बताइए। मुझे मालूम नही हैं।
मेरा मानना है कि रत्नगर्भा धरती अपने भीतर बहुत कुछ छिपाए रखती है। उचित अवसर और पर्यावरण मिलते ही रत्नप्रसूता बन जाती है। ये वनस्पतियाँ प्रमाण हैं। 
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ये वनस्पतियाँ यूँ ही उग आई हैं। सारे फोटो मैंने मोबाइल से लिए हैं।
 

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

प्रात: से चुराए क्षणों में कुछ असहज बातें..

(1) 
वित्तीय वर्ष के अंत ने बहुत व्यस्त कर दिया है। कुछ लिखना नहीं हो पा रहा। कल एक पृष्ठ की फोटोकॉपी करने में तीन बार समझाने के बाद भी एक महिला प्रशिक्षु ने 10 पृष्ठ खराब किए। उन्हें फाड़ कर फेंकना पड़ा क्यों कि गोपनीय दस्तावेज था। मैं इस मामले में कुछ अधिक ही संवेदनशील हूँ, इतना कि मेरी टेबल पर 'प्रयुक्त लेकिन एक तरफ सादे कागज' पड़े रहते हैं जिनका उपयोग मैं ड्रॉफ्ट प्रिंट लेने के लिया करता हूँ । ... मैं बड़बड़ाया - एक और पेंड़ कटा !
मेरे एक वरिष्ठ ने सुन कर कहा," अरे इतना ही पेंड़ों को बचाना चाहते हो तो अखबार लेना बन्द कर दो..."
यह अप्रत्याशित था। ग्लॉसी और निहायत ही फालतू होने के कारण मैंने टाइम्स बन्द कराया था तो आशा के अनुरूप कायदे की सामग्री न होने के कारण जागरण (पत्रकार मित्रों से क्षमा)। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस और अमर उजाला लेता हूँ। प्रात:काल 15 मिनट इंडियन एक्सप्रेस पढ़ता हूँ। उसकी रिपोर्टिंग और अन्य सामग्री अच्छी लगती है। अमर उजाला श्रीमती जी के लिए है और इसलिए मैं भी पढ़ता हूँ कि अपने स्तर और अज्ञान के प्रति ईमानदार लगता है (पुन: पत्रकार मित्रों से क्षमा)। ... वरिष्ठ महोदय का यह प्रस्ताव क्रांतिकारी लगा लेकिन मैंने प्रतिवाद किया । उन्हों ने प्रत्युत्तर दिया, " नेट है, टी वी है, रेडियो है - देखो, सुनो। यह आलस ही है कि नेट पर पता नहीं क्या क्या ढूढ़ लेते हो लेकिन ऑनलाइन अखबारों को नहीं पढ़ते। टीवी को गरियाने का शौक चल पड़ा है। देखने का सऊर तो है नहीं । जरा सोचो अखबार छपने बन्द हो जाँय तो कागज की कितनी बचत हो। अखबार तो ऑनलाइन छप ही रहे हैं। " उस जनता की सोच जिसे नेट नहीं उपलब्ध, अखबारों की छपाई बन्द करने का विचार मैंने 13 नम्बर फाइल में डाल दिया लेकिन हम जैसे तो अखबार बन्द करा ही सकते हैं। 
यह विचार मन को मथे जा रहा है।
(2) 
 महिला प्रशिक्षु ने यह ग़लती क्यों की? न तो हमारे ऑफिस का वातावरण महिला विरोधी है और न ही बाहर इतनी अराजकता है कि एकाध घंटे अतिरिक्त रुक कर काम तसल्ली से निपटा दिए जाँय लेकिन इन्हें जाने क्या जल्दी रहती है कि आधे घंटे पहले से ही पैक अप की तैयारियाँ चलने लगती है। जाने के समय से आप घड़ी मिला सकते हैं। वित्तीय वर्षांत की क्लोजिंग ई आर पी सिस्टम होने के कारण अतिरिक्त काम ले कर आती है। लेकिन इन महिलाओं ने एक भी दिन अतिरिक्त समय नहीं दिया। एक से दो बजे तक लंच है तो है। ऐसा नहीं कि ये बहुत सुगढ़ या प्रवीण हैं। होता यह है कि अनजाने ही पुरुष कर्मी बढ़े कार्यभार को भी सहेज लेते हैं। 
हाँ, यह बता दूँ कि उनके बाल बच्चे नही हैं।  बढ़े हुए कार्य दबाव में भागीदार होने की पहल ये कभी नहीं करतीं। स्वत: प्रेरणा नहीं होती, हाँ कहने पर अनिच्छा पूर्वक अवश्य लग जाती हैं।  जिनके रात को देर तक माल में घूमने से घर वालों को आपत्ति नहीं उन्हें ऑफिस में विलम्ब होने से तो नहीं ही होगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि महिलाएँ कार्य स्थल पर लैंगिक कारणों से अनुचित लाभ ले रही हैं ?  जब मैं यह लिख रहा हूँ तो आशा करता हूँ कि आप मेरी बात को नारीवादी चश्मे से नहीं देखेंगे और निष्पक्ष विचार करेंगे। अपवादों की बात नहीं, मैं एक सामान्य प्रवृत्ति की बात कर रहा हूँ। 
(3) 
सानिया मिर्ज़ा का पाकिस्तान में विवाह तय हुआ है। उसने घोषणा की है विवाहोपरांत 2012 में वह ओलम्पिक में भारत का प्रतिनिधित्व करेगी। कई प्रश्न उठ रहे हैं:
(क) किसी विदेशी से विवाह करने के बाद नारी की भारतीय नागरिकता स्वत: समाप्त हो जाती है । क्या एक पाकिस्तानी  ओलम्पिक जैसे वैश्विक स्तर के खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व कर सकता/ती है? हो सकता है मेरा ज्ञान पुराना, गलत या अधूरा हो। जानकार लोग सही बात बताएँ और साथ ही उत्तरांश का उत्तर दें।  
(ख)   सानिया को ऐसी क्या आवश्यकता पड़ी है कि अभी से इस तरह की घोषणा कर रही है? ओलम्पिक को अभी दो वर्ष हैं। 
(ग) ऐसी परिस्थिति में भारत का क्या रुख होना चाहिए? मंगल कामना है कि उसका विवाह सफल हो लेकिन यदि खुदा न खास्ता उसकी शादी ओलम्पिक के पहले टूट जाती है तो क्या उसे ओलम्पिक में भारत की तरफ से खेलने के लिए दुबारा भारत की नागरिकता लेनी होगी? 


सोमवार, 29 जून 2009

हमहूँ नामी हो गइलीं

वफादारी सीखनी हो तो कोई पेंड़ पौधों से सीखे। सर्वहारा 'कनैल' पर लेख क्या लिखा, नामी हो गया।

महीनों से मेहनत करते रहे लेकिन किसी अखबार ने नहीं पूछा । 'बरियार' और 'कनैल' पर लिखते ही दोनों ने जाने क्या गुल खिलाया कि 'अमर उजाला' ने अभी इस बच्चे से ब्लॉग के लेख को जगह दे डाली। स्कैन नीचे लगा हुआ है, यह 25/06/09 के अंक में छपा था।


जरा सोचिए, थोड़ी सी संवेदना दिखाने पर ऐसा हो सकता है तो इन पेंड़, पौधों और वनस्पतियों की अगर आप सही देखभाल और पोषण करेंगे तो परिणाम कितने सुखद होंगे!

तो चलिए एक पौधा रोपते हैं और उसे जिलाते हैं।