कबीर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कबीर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 3 मार्च 2012

लोक : भोजपुरी - 7: बोले पिजड़ा में सुगनवा बड़ऽ लहरी (अंतिम भाग)

  
भोजपुरी शृंखला की अन्य कड़ियाँ:
(1) साहेब राउर भेदवा
(2) कवने ठगवा
(3) लोकसुर में सूर - सिव भोला हउवें दानी बड़ लहरी
(4) अम्मा के स्वर में - गउरा सिव बियाह की एक झलकी
(5) घुमंतू जोगी - जइसे धधकेले हो गोपीचन्द, लोहरा घरे लोहसाई
(6) रोइहें भरि भरि ऊ ... बाबा हमरो

यह पिछले भाग से जारी है:

 पीछे छूट गया जोगीछपरा। क्यों लग रहा है कि मैंने टाइम मशीन से कोई यात्रा की? पिछ्ड़े देहात में भी नहर के उस पार समय पीछे है और इस पार आगे! ...
नहीं, वह स्वर एक नर्तक(ई) का नहीं हो सकता। स्वर अभिनय इतनी ऊँचाई नहीं छू सकता और इस पेशे में तो कोई असंग रह ही नहीं सकता लेकिन प्रमाणों का क्या करूँ? किसी ने भी किसी दूसरे का नाम नहीं लिया! मौन धसता चला गया है। मैं यह पूछ कर कि बीगन पंडित अपने गाँव आयेंगे क्या? चुप हो गया हूँ । भैया कहते हैं – आयेंगे, अब उनकी पत्नी उन्हें आये बिना रहने नहीं देगी। भैया को मेरे तिलस्म पर भरोसा है ...
... मैं घर पहुँचने के बाद अनमने उत्तर दे बाकी काम में लग जाता हूँ। दिन में दो एक बार भैया के पास फोन कर पूछ लेता हूँ – नहीं, कोई काल नहीं... मोबइलवा ऑफ बा। वह आश्वस्त करते हैं - अरे ऊ खुदे करिहें...
पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। मन में उदासी है और एक कलाकार से साक्षात होने की उमंग भी – विचित्र मन:स्थिति में हूँ। अनमन लहरी। मोबाइल में अनुज के भेजे ऑडियो के बहुत छोटे अंश को सुनता हूँ:
बोले पिजड़ा में सुगनवाऽ बड़ऽ लहरी
बोले पिजड़ा में मयनवाऽ बड़ऽ लहरी।
क्या है गीत का पिजड़ा? पिजड़ा तो देह है रे! पिंजर प्रेम परकासिया। चौंध सी हुई है – देह! अनुज से पता करो कि गायक दिखने में कैसा है? अरे बावरे! वहाँ क्यों नहीं सूझा? ... पता नहीं।


...छोटा भाई मोबाइल पर बता रहा है – साँवला चेहरा। मझोली गठी हुई काठी। घने केश ...समझ लीजिये – वह परिचय का एक नाम लेता है - दाढ़ी के साथ।
“दाढ़ी! तुमने दाढ़ी कहा?”
“हाँ, अधिक बढ़ी नहीं - युवा जोगियों की तरह।“
बिंगो!
मेरा अनुमान सही था। नौटंकी का समाजी जो नर्तकी बनता है, दाढ़ी क्यों रखेगा?


अपने शक की पुष्टि की प्रसन्नता क्षण भर में हवा हो जाती है। अगर वह नहीं तो कौन? दिन व्यर्थ गया! दुबारा से खोज!! कहाँ ढूँढूँ?
मन में वर्षों पुराना किशोर सिर उठाता है – किसे किसे ढूँढ़ोगे गिरिजेश? तुम्हारी खोज कभी सफल भी हुई? मन में कुछ कुछ भूले बिसरे से अंश हैं:
... बन बन ढुँढलीं, खोजलीं आँखि मिलंते।
छ्न्द छ्न्द लय ताल में ढुँढलीं, खोजलीं स्वर से मन से।
अरे हिया हिया में पइस के ढुँढलीं, खोजलीं उर के धन से।
कवने खोतवा में लुकइलूऽ, अहि रे बालम चिरईऽ ....
सगरी उमिरिया धकनक जियराऽ, कवले तोहके पाईं।
कवने सुगना पर मोहइलू, अहि रे बालम चिरईऽ!
खलील कहीं नहीं है लेकिन मन में उनके गहमर प्रश्नों की बुलन्दी है और फिर हताशा...मोबाइल पर क्रेज़ी हार्ट का कंट्री सांग लगा कर सुनने लगा हूँ... 
They say no place for weary kind... अम्मा का कहा अब समझ में आ रहा है – मैं weary kind हूँ। क्या सोचते होंगे लोग? no place to lose your mind… Pick up crazy heart! Give one more try ...धूप में बैठा चुप हूँ ... pick up! उलाहने में Crazy lazy हो गया है – pick up lazy heart, one more try! ... भीतर कुछ नहीं होता।


...रात घिर आई है। भैया खुशखबरी लेकर आये हैं – बीगन पंडित ने फोन किया था, कल दस बजे तक आयेंगे।
सोलर लाइट सिस्टम का प्रकाश है। भैया की प्रसन्नता दिख रही है, मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। वह आगे बताते हैं – पता है उन्हों ने बताया है कि वह गीत उन्हों ने नहीं गाया था बल्कि उनके पार्टनर ने गाया था? मैं उछ्ल पड़ता हूँ। भैया आगे कहते हैं – हँ, कहत रहलें कि ऊ गुरुभाई हउवें, उन्हूँके लिया अइहें। उनके पार्टनर भी कल साथ आयेंगे।...

क्षणों का क्या महत्त्व है? प्रसन्नता क्या होती है? ... मुझे नहीं पता। एक अनजान गायक। सवा-एक मोबाइल रिकॉर्डिंग। उसका नाम तक मुझे नहीं पता और उसे भी नहीं पता कि उसने एक अनजान का क्या हाल कर रखा है! पूछता हूँ – नाव बतवले हँ कि नाहीं? बीगन पंडित ने गुरुभाई का नाम नहीं बताया। गहरी साँस लेता हूँ – अभी भी अनाम है!...

...सुबह के सवा दस बजे हैं। भैया ने मोबाइल काल किया है – ऊ लोग आ गइल बाऽ। चाय पानी होता तवलेक आ जा। मुझे स्वयं पर आश्चर्य होता है कि अब कोई हल्तल्फी नहीं है। सुगना आ पहुँचा है। अब क्या? ...

2012-02-19-036गौर वर्ण, तीखे से नैन नक्श वाले ऊँचे से बीगन पंडित। गैरिक वस्त्र। सिर पर साफा। चेहरे पर रतजगे की थकान अभी भी है।


मझोले कद के साँवले गुरुभाई। मोटे नयन नक्श। बढ़ी दाढ़ी। सँवारे घने केश। ललाट पर श्वेत चन्दन। मूर्तिमान गँवई जोगी।


अभिवादन करता हूँ,“आप का नाम क्या है?”
“शम्भू... शम्भू पांडे।“ अनाम ‘स्वयम्भू नामी शम्भू’ हो गया!


बताते हैं कि जहाँ हम लोग गये थे उससे ढेलाफेंक दूरी पर ही उनका टोला है – मन्दिर वाला टोला। अगर किसी से पूछे होते तो उसी दिन मुलाकात हो जाती!
... बहुत पूछा था शम्भू पंडित! किसी ने बताया होता तब न? सब बीगन पंडित और उनकी मंडली की ही बात करते रहे। इतने अज्ञात बन कर क्यों रहते हो?...


शिवरात्रि के पर्व पर जोगी शम्भू आज मेरे लिये निरगुन गायेंगे!! हाथ फिर से जुड़ गये हैं - क्या कहूँ?
भैया पूछते रहते हैं। वे दोनों उत्तर देते हैं और मैं शांत हूँ .. बड़ऽ लहरीऽ।


लहर ही उठी है – किसी नौटंकी में बीगन पंडित गउरा बनें और शम्भू पंडित महादेव तो कैसा हो? सछाते गँवई गउरा महादेव।
गउरा अपने महादेव से ऊँची और महादेव औघड़ी रूप में! रतजग्गे से मदमाते नयन लिये गउरा और सँवराये महादेव ...बड़ऽ लहरीऽ...


..कौतुक से दोनों को एकतारा बाँधते हुये देखता हूँ। शम्भू पंडित बहुत संकोची हैं, कम बोलते हैं जब कि बीगन पंडित बताते हुये सकुचाते नहीं हैं। नाच में काम करने का असर है साइत! बीगन ही बताते हैं कि शम्भू के एकतारे का तार किसी बाइक के गियर वाले तार से लिया है। वह जोर से मारते हैं न! पीतल का तार नहीं टिकता।

मन में कहता हूँ – वाह रे लोकगायक! तुम्हारे स्वर की बुलन्दी अंगुलियों में भी है, उसे पावरफुल बाइक का तार चाहिये और प्रकट में पहली फरमाइश करता हूँ - बड़ऽ लहरीऽ। वह मुस्कुराते हैं। पूछता हूँ – हेडफोन से कोई कष्ट या असुविधा तो नहीं? वह बताते हैं – नहीं, आकाशवाणी में गा चुका हूँ। सन् 1994। वह भुगतान के पहले भरे जाने वाले फॉर्म की कॉपी भी दिखाते हैं– मेरे 5000/- आज भी बाकी हैं।
...कैसी आस लिये आये जोगी? मुझमें शक्ति होती तो...
... वह बताते हैं - एक पैसा नहीं दिया। दौड़ाने लगे तो छोड़ दिया मैंने ही। ...मेरे मुँह में पित्त सा भर आया है – दगाबाज आकाशवाणी गोरखपुर। ... शम्भू! काश मैं तुम्हें पूरा दे पाता।...

2012-02-19-043लैपटॉप पूरा चार्ज है। बचा कर रखा था क्यों कि बिजली कल रात से ही गुल है। ऑडेसिटी सॉफ्टवेयर रेडी है। श्रोता बस तीन जन – मैं, भैया और पिताजी... गायक रेडी? एक, दो, तीन ... शुरू! ... धप्प! बिजली आ गई। ग़जब संयोग!
सर्वं शुभं शम्भू! ... बड़ऽ लहरीऽ


दोनों गायकों के स्वर में दसियो गीत रिकॉर्ड कर लिये हैं मैंने!


... एकतारे को ट्यून करते शम्भू लीन हैं और मैं सोच रहा हूँ - कौन होता है लहरी? क्या होता है लहरी? हिन्दी वालों को अपनी भोजपुरिया समझ बतानी पड़ेगी। उन्हें तो बस लहर की समझ है न!


लहरी कहते हैं दिलखुश व्यक्ति को। गाँव जवार में ऐसे जन हर टोले पाये जाते हैं। उनके स्वरों में बारहमासा गाता है। वे रंग रसिया होते हैं। सबके रंजक, सहायक, मौके पर काम आने वाले। बियाह सियाह में डट कर काम करने वाले और मौसम आने पर सबसे पहले ढोल निकालने वाले। भौजाइयों के प्रीतम प्यारे और भाइयों के लगुआ भगुआ! वे रोयें तो दो चार को रुला दें और हँसें तो गर्दा उड़ा दें। लोक का जीवन उनमें बसता है। लोक तो शंकर महादेव को भी लहरी नाम से जानता है! बम भोले औढरदानी। महाभोगी, महाजोगी।

कबीरदास आत्मा की तुलना लोक लहरी से करते हैं जो जिन्दगी के मजे लेने में मस्त है और अपनी वास्तविक प्रकृति भूल गया है – साढ़े तीन हाथ लम्बे शरीर रूपी पिंजरे में क़ैद। अपनी बात समझाने के लिये कबीर का निज शैली में प्रबल प्रहार! चेतो! साथ में उतनी ही करुणा जो लहरी की व्यंजना दे दे लहकाती है। आँखों में लहरें उठने लगती हैं – अंत समय पछताते रोओगे लहरी! अभी तो पिजरे में बहुत किल्लोल कर रहे हो! .. पिताजी मगन हैं।

2012-02-19-044


बड़ऽ लहरीऽ ए बड़ऽ लहरीऽ,
बोले पिजड़ा में सुगनवा बड़ऽ लहरीऽ।
पिजड़ा है सढ़े तीनि हाथ के, तामे सुगना बोलिय हाय हाय, तामें सुगना बोले।
कभी कभी मस्ती मेंह आके, दिल का जेहवर खोले
बोले पिजड़ा में सुगनवा बड़ऽ लहरीऽ,
बोले पिजड़ा में मयनवा बड़ऽ लहरीऽ।
पाँच तत्त के महल बनल बा, तामे सुगना बोलिय हाय हाय, तामें सुगना बोले।
बोले साम और सुबेरवा, बड़ऽ लहरीऽ
बोले पिजड़ा में मयनवा बड़ऽ लहरीऽ।
बीच महल में आसन मारि के, राजा बनि के बइठे हाय हाय, राजा बनि के बइठे।
झूले प्रेम के झुलनवा, बड़ऽ लहरीऽ
बोले पिजड़ा में सुगनवा बड़ऽ लहरीऽ,
बोले पिजड़ा में मयनवा बड़ऽ लहरीऽ।
अपने सुख के कारन सुगना राखे नौ नौ नारी, राखेय नौ नौ नारी
सब नारिन से बाति करेला, अपने भऽरेला हुँकारी
बोले पिजड़ा में सुगनवा बड़ऽ लहरीऽ।
बोले पिजड़ा में मयनवा बड़ऽ लहरीऽ।
कहें कबीर सुनो भइ साधो, एक दिन होइहें जाना, एक दिन होइहें जाना
रोइहें भरि भरि ऊ नयनवा बड़ऽ लहरीऽ,
रोइहें भरि भरि ऊ नयनवा बड़ऽ लहरीऽ।

शरीर के नौ द्वार – दो आँख, दो कान, दो नासाछिद्र, मुँह और दो गुह्यांग - भोगी के लिये नौ नौ नारियों के समान हैं। उसने उन्हें रखा हुआ है। इन्द्रियलिप्त उन सबसे मन मनसायन की बात करता है और सहमति में हुँकार भरता हुआ जीता है! स्वयं को धोखा देता है। वाह रे कबीर!

पिताजी पूछते हैं – कहाँ मिलेगी ऐसी सहज और अर्थगहन कविताई? मैं उत्तर देता हूँ – लोक में।

गायकों से अनुरोध करता हूँ कि अम्मा को भी सुनना है और आप दोनों को मेरे घर भी चलना पड़ेगा। घर के ओसारे में वही गीत अब युगल स्वरों में गाया जाने लगा है और मुझे समझ में आता है कि बीगन पंडित सहगायन के किस सौन्दर्य की बात कर रहे थे!



(गीत एच डी वीडियो में रिकॉर्ड किया था – 400+MB! नेट अपलोड के लिये क़्वालिटी को बहुत कम कर दिया है ताकि फाइल का आकार छोटा हो सके। समस्त गायन को यू ट्यूब पर अपलोड करने की योजना भी बना रखी है मैंने। आकाशवाणी न सही, हम खुले मंच पर पर ही इन कलाकारों को प्रचारित कर सकते हैं।)


हम लोग मोबाइल नम्बरों का आदान प्रदान करते हैं। मैं पूछ्ता हूँ – आप लोगों के गुरुजी कौन हैं? शम्भू जी तो मुस्कुरा कर रह जाते हैं लेकिन बीगन पंडित बताते हैं कि पडरौना क्षेत्र के हैं उनके गुरुजी, बहुत अच्छा सोरठी बिरजाभार गाते हैं।
 सोरठी बिरजाभार! अपनी पहली ब्लॉग पोस्ट याद आती है। गिरिजेश! यह खोज भी पूरी हुई...

...कभी सुनेंगे रात भर जाग कर सोरठी बिरजाभार। पुरातन गर्मी की उन छतनार रातों को पुन: जिलायेंगे जब न मच्छर होते थे और न थकान। नभ को ओढ़ हम लेटे रहते जब कि गायक तारों के लिये धरती से सोरठी भेजता रहता - हम बस पुकार सुनते रह जाते थे! ... एकिया हो रामाऽ कवने करनवा रतिया बाँझि?
 

अगले अंक में:
फगुआ के माहौल में महाप्राण निराला और एक लोककलाकार का मुकाबला :) यानि कि -
'कस कसक मसक गई' के मुकाबले 'सुतलऽ न सूते दिहलऽ' .... ;)
फागुन में बाबा देवर लगें,
ए लिये खराब मनले के कवनो जरूरत नइखे!
______________________________________________
जिस दिन निरगुन रिकॉर्ड किये उसी दिन रात में मय हारमोनियम, ढोलक, झाल ,करताल, साउंड सिस्टम आठ गवैयों का कार्यक्रम रखा था। फगुआ, रंगफाग, चौताल, बैसवारी, झूमर, चैता, सोहर, कीर्तन, कजरी वगैरह सब हुये - 5 घंटे तक चला लेकिन सिंगल ट्रैक की रिकॉर्डिंग और ऐसे माहौल  की रिकॉर्डिंग में बहुत अंतर होता है। बिजली रानी गुल हो गईं। जनरेटर चलाया गया। दूरी के बावजूद उसका शोर भी था...बहुत प्रयास किया परंतु रिकॉर्डिंग की क़्वालिटी सुधार नहीं पाया। मेरी योजना थी कि होली तक एक एक कर प्रस्तुत करता रहूँगा। रिकॉर्डिंग में सुधार के लिये हाथ पैर मार रहा हूँ, ब्लॉग जगत से भी सहायता की माँग कर रहा हूँ। कुछ सही हो पाया तो अवश्य प्रस्तुत करूँगा। 

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

लोक : भोजपुरी - 2 : कवने ठगवा - वसुन्धरा और कुमार गन्धर्व : एक गली स्मृति की

(1) लोक : भोजपुरी - 1: साहेब राउर भेदवा से आगे ... 

भोजपुरी शृंखला में आज एक प्रसिद्ध निरगुन। रचयिता एक बार पुन: कबीर और गायकद्वय कुमार गन्धर्व और वसुन्धरा। मेरा प्रयास अनजान जन द्वारा गाये और आम जन जीवन में घुले गीतों को प्रस्तुत करने का रहेगा। यू ट्यूब आदि पर जो कुछ पहले से उपलब्ध है उसे भरसक नहीं दुहराऊँगा लेकिन यह गीत मेरे लिये बहुत ही खास है।

आकाशवाणी गोरखपुर की प्रात: वन्दना में इसे पहली बार सुना था। घर में रेडियो था और हमलोग उसके वन्देमातरम से जगते थे। जाड़े के दिन थे। पिताजी की गोद में रजाई में दुबका था और तभी यह गीत बजना शुरू हुआ। दुलराते (इंटरमीडिएट में पढ़ते पुत्र को भी दुलराया जा सकता है! और वह पिता के पास सोने की ज़िद भी कर सकता है!!) पिताजी एकदम शांत हो गये और मैं भी। “कवने ठगवा नगरिया लूटल हो!” – लगा जैसे भीतर वैराग और पवित्रता की धारायें बहने लगी हों। गीत समाप्त होने पर पिताजी ने कहा – कुछ होता जिससे इसे रोज सुन पाते (हमारे घर में ग्रामोफोन या टेपरिकॉर्डर नहीं थे)। उन्हों ने उसी दिन भिनसहरी गायन की परम्परा बताई। कुछ था उस निरगुन में, उन स्वरों में, गायन में जो मनप्रस्तर पर अमिट अंकित हो गया। पता किया तो बस यही जाना कि शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में कुमार गन्धर्व बहुत बड़ा नाम है।

उसी दिन से मैं शास्त्रीय, उपशास्त्रीय और शाम को आकाशवाणी से ही प्रसारित जुगानी भाई द्वारा प्रस्तुत गाँव देहात भोजपुरी प्रोग्राम में सुनाये जाने वाले लोकगीतों में सुरों को ढूँढ़ने लगा। एक ऐसी यात्रा का प्रारम्भ हुआ जिसने मुझे लोक, शास्त्रीय, पश्चिमी, रॉक, डिस्को, ओपेरा, सूफी, कंट्री, जोगी और जाने किन किन संगीत धाराओं में अब तक नहाने का सुख दिया है जब कि संगीत का स भी मुझे नहीं आता। बाद में अम्मा से जाना कि जब मैं गर्भ में था तब गाँव की हर शाम लोकगीतों की होती थी – कीर्तन, फगुआ, चैती, निरगुन, कजरी, सोरठी, आल्हा आदि आदि और अम्मा ओसारे में बैठी सुनती रहती थीं। कुमार गन्धर्व ने सुप्त संस्कारों को जगा दिया!
.....
आकाशवाणी केन्द्रों में जाने कितने ही लोकगायकों के लोकगीत तालों में बन्द हैं। कितने ही एल पी रिकॉर्ड नष्ट हो गये/हो रहे हैं। आवश्यकता है कि उन्हें लोकहित में आम कर दिया जाय। कोई सरकारी बाबू सुन रहा है?
....
गोरखपुर इंजीनियरिंग करने गया तो खोज शुरू हुई। गोलघर में गीतांजलि म्यूजिक स्टोर को एक सिख परिवार चलाता है। स्टोर काफी समृद्ध है। मैं वहाँ पहुँचा और सहमते हुये फरमाइश कर दी। सरदार जी ने मुझे अजीब नज़रों से देखा और फिर से पूछा जैसे विश्वास न हुआ हो। मुझे आश्चर्य हुआ जब उन्हों ने एच एम वी के चार कैसेटों का डीलक्स संस्करण अलबम सामने लाकर रख दिया। तीन कैसेट तो शुद्ध शास्त्रीय थे लेकिन चौथे में त्रिवेणी नाम से ‘सूर, मीरा और कबीर’ की रचनायें संग्रहीत थीं – एक से बढ़ कर एक जैसे ‘सखी मोरि नींद नसानी हो’, ‘नीरभय नीरगुन’। दाम देखकर पाँव तले धरती खिसक गई (सम्भवत: तीन सौ रुपये, तब छ: सौ में महीने भर का खर्च चल जाता था!) । एक कैसेट लायक मुद्रा पास में थी और उसे खर्चा भी जा सकता था। मुझे पूरा विश्वास था कि एक वह कैसेट दिखाने पर पिताजी टेपरिकॉर्डर खरीद देंगे। डरते डरते सरदार जी से पूछा कि क्या वह केवल एक कैसेट देंगे? उन्हों ने उपेक्षा से मुँह बिचका कर उत्तर दिया – यही तो समस्या है। बाकी तीन कौन लेगा? वह अलबम वापस ले दूसरे ग्राहकों की ओर मुड़ गये। 
निराश मैं इन्दिरा गार्डेन, सिनेमा रोड और जाने कहाँ कहाँ घूम आया। जो चाहिये वह सामने था और मैं...!  साहस कर पुन: पहुँचा और इस बार अपने समवयस्क लड़के से जो सरदार जी का पोता था, पूछ बैठा। उसने भी अलबम सामने लाकर रख दिया। मैंने केवल एक कैसेट लेने की इच्छा जताई तो उसने भी वही उत्तर दिया। मैंने प्रस्ताव रखा – आप अभी केवल एक कैसेट दे दें। वादा करता हूँ कि एक एक कर बाकी तीनों भी ले जाऊँगा। जाने समआयु का असर था या मेरी कातरता का, लड़के ने यह कहते हुये कि किनारे रख रहा हूँ, जल्दी ले जाना और दुकान पर सिर्फ मुझसे माँगना; वह कैसेट मुझे दे दिया। अगले रविवार कैसेट पिताजी के सामने था और उसके अगले रविवार हमारे घर में पहला कैसेट रिकॉर्डर आया जिस पर बाद में मैंने घुमंतू जोगी का गाया एक गीत बैटरी लगा कर रिकॉर्ड किया। 

अगले दो महीनों में मैंने बाकी तीन कैसेट भी खरीद लिये और आज तक उस निर्णय पर नाज करता हूँ। उस लड़के से चलती फिरती मित्रता हो गई, इतनी कि बैजू बावरा के एक गीत में मामूली सी गड़बड़ी की मेरी शिकायत पर उसने पूरा लॉट ही वापस कर दिया। कॉलेज से निकल जाने के कई वर्षों बाद एक दिन गोरखपुर गया तो सहज उत्सुकता से लड़के से मिलने (हमदोनों एक दूसरे का नाम तक नहीं जानते थे) गया। डबडबायी आँखों से सरदार जी ने सड़क दुर्घटना में उसकी मृत्यु की बात बताई ... लौट कर बहुत देर तक मैं चुप इन्दिरा गार्डेन में बैठा रहा। उसके बाद दुबारा वहाँ जाने का साहस आज तक नहीं कर पाया ....
....
कबीर की बानी का क्षेत्र पश्चिम में दूर पंजाब तक है। गुरुग्रंथसाहब में भी उनकी बानी दर्ज है। दक्षिणवासी कुमार—वसुन्धरा के स्वरों में अंत में ‘-ल हो’, ‘लयो’ और 'लओ' तीनों ध्वनित हैं लेकिन वह भोजपुरी ‘-ल हो’ ही है। वैसे भी कबीर को क्या बाँधना? एक पंक्ति में कहते हैं ‘आये जमराज पलंग चढ़ि बैठा’(व्याकरण की दृष्टि से देखें तो बिगड़ी पश्चिमी भाषा) और तुरंत दूसरी पंक्ति में कहते हैं ‘नयनन अँसुआ टूटल हो’ – ‘नयनन अँसुआ’ पर पुराने हिन्दुस्तानी का प्रभाव है तो ‘–ल’ से अंत होने वाली क्रिया विशुद्ध भोजपुरी। ‘चार जने मिलि’ भोजपुरी है तो ‘खाट उठाइन’ अवधी(?)। ‘चहुँदिसि’ ब्रजावधी है तो ‘धुमधुम’ ध्वनि भोजपुरी की। भाखा बहता नीर और सधुक्कड़ी के पर्याय कबीर किसी व्याकरण में नहीं बँधते लेकिन लोक में ‘कहत कबीर सुनो भइ साधो’ की टेक वाली रचनायें भोजपुरी की हैं जिनमें सधुक्कड़ी की चलती भाखा घुलमिल गई है। फक्कड़ी घुमंतू जोगियों के स्वरों ने उन्हें संस्कारित किया है।
  
इस निरगुन को कुमार गन्धर्व ने अपनी धर्मपत्नी वसुन्धरा के साथ गाया है। कुमार गन्धर्व उन गायकों में थे जिन्हों ने शास्त्रीय संगीत का उत्स लोक से ही माना और शास्त्रीयता को लोक के ऊपर कभी चढ़ने नहीं दिया। लोक प्रभाव और मस्त उन्मुक्तता के कारण उनके गायन की बहुत आलोचनायें भी हुईं लेकिन कुमार तो कुमार! हम इसक मस्ताना, हमको दुनियादारी क्या! एक मस्ताने कबीर और दूजे ‘नीऽरभय नीऽरगुन’ कुमार। सुनिये ये दोनों जब मिलते हैं तो कैसा दिव्य सर्जित होता है: 
कवने ठगवा नगरिया लूटल हो
चन्दन काठ के बनल खटोला, तापर दुलहिन सूतल हो।
उठ्ठो सखी री माँग सँवारो, दुलहा मोसे रूठल हो
आये जमराज पलंग चढ़ि बैठा, नयनन अँसुआ टूटल हो।
चार जने मिलि खाट उठाइन, चहुँ दिसि धुमधुम ऊठल हो
कहत कबीरा सुनो भइ साधो, जग से नाता छूटल हो।
_________________________

अगले अंक में : घुमंतू जोगी -जइसे धधकेले हो गोपीचन्द! लोहरा घरे लोहसाई

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

लोक: भोजपुरी-1: साहेब राउर भेदवा

भोजपुरी लोक की बात आते ही आजकल कतिपय जन मुँह बिचका देते हैं। उनके लिये भोजपुरी माने अश्लीलता होती है। भोजपुरी की वर्तमान गीत गवनई पर बहुत बहसगालियाँ हो चुकी हैं। नेट पर कोस भर भर उपलब्ध हैं। मैं भोजपुरी क्षेत्र का हूँ जो मेरे रग रग में बसा है। अपनी संस्कृति और परम्परा को बहुत पास से देखा, सुना है। भोजपुरी माटी में जन्म हुआ, उसी में मिल जाऊँगा। जब चन्द सिक्कों के लालची कथित कलाकारों के कुकर्मों की धुन्ध फैली हो तो भ्रम स्वाभाविक है लेकिन मुझे कष्ट होता है। बहुत दिनों से सोचे जा रहा था कि उस समृद्ध पुरातन को सामने लाने का छोटा ही सही, प्रयास करूँ लेकिन टलता रहा।
यह धरती कबीर और रैदास की धरती है। भिखारी ठाकुर की धरती है। काव्य हो, संगीत हो, रस हों, वैविध्य हो – क्या नहीं है यहाँ? बस सामने लाने की आवश्यकता है। मैंने घुमंतू जोगियों को गाते देखा सुना है – किशोरावस्था में ही जोगी बन गोपीचन्द माँ से भीख माँगने आये हैं। माँ गुदड़ी देते रो पड़ती है और उसके दुख में जैसे समूची सृष्टि ही जार जार हो उठती है:
धइली हो गुदरिया ए माईऽ, बाबू के समझाई...
गाँव के अगिया सुन हो बेटा, गाँव के लोग बुझाई,
कोखिया के अगिनिया हो बेटाऽ दुनिया में कोइ ना मेटाईऽ। 
 
जोगी तपस्या की ऊँचाई को छूते प्रेम की नासमझी को भी समझाता है:
आगि के महलिया तोहरी, कइसे आईं हो जोगीऽ
लागि जइहें आगि देहियाँ, जरि जाई सारी सगरीऽ। 
 
दूर बिहार से कोई घुमंतू ठाकुर आता है और सबको रुला जाता है:
गवना कराइ सइयाँ घरे बइठवलें हो, अपने बसेलें परदेस रे बिदेसियाऽ
 
नभ से भी ऊपर उठान लेते मुहम्मद खलील वय:सन्धि की रेख को झँझोर जाते हैं:
बन बन ढूँढली, दर दर ढूँढली, ढूँढली नदी के तीरे
साँझ के ढूँढली राति के ढूँढली, ढूँढली होत फजीरे।
... सगरी उमिरिया धकनक जियरा कबले तोहके पाईं ...
कह नहीं सकता कि उस आवाज़ ने मुझे क्या से क्या कर दिया!... 
 
... आज उस सनातन पुरातन परम्परा के स्वर सुनाना चाहता हूँ।
कवितायें और कवि भी... पर शृंखला प्रस्तुत करना चाहता था लेकिन उसकी पहुँच आलसी जितनी नहीं है, इसलिये यहाँ। जनवरी में अनुज गाँव गया तो इलाके से मेरे लिये कुछ लेकर आया। एक देहाती कलाकार के स्वर में निरगुन। नहीं पता कि इसे कबीर ने रचा था या साधो से कहने सुनने की परम्परा को आदर देते गायक ने अपने गीत को उनके नाम कर दिया लेकिन है अद्भुत!
गायक का परिचय है:
नाम – अनाम
आयु – 45 के आसपास
ग्राम – सिंगहा
जिला – कुशीनगर, उत्तरप्रदेश
व्यवसाय – यायावरी
एक बेटा है जो छठी में पढ़ता है। एक बार आकाशवाणी गोरखपुर में भी गाया लेकिन वादे के बावज़ूद मेहनताने का एक पैसा तक नहीं मिला। गायक दुबारा ‘सीकरी’ नहीं गया। काठमांडू पशुपतिनाथ के दरबार में भी यह स्वर गूँज चुका है लेकिन आज उपेक्षित अनाम अज्ञात है।
वादा है कि इस बार गाँव गया तो इनसे अवश्य मिलूँगा और बहुत कुछ ले कर आऊँगा। मुझे सुनना है कि भर भर नयनों में लहरें कैसे उठती हैं:
बोले पिजड़ा में मयनवा, बड़ऽ लहरी
 रोइहें भरि भरि ऊ नयनवा, बड़ऽ लहरी। 
गीत कुछ इस तरह है:
जाने ना कोई कोई ए, साहेब राउर भेदवा हो जाने न कोई कोई।
ये देहिया ले बैल बाध बा निरमल खेतिय होई
राम हि नाम के हरवा जुअठवा, रनल बा मोतिया न बोई।
पानिय ले ल साबुन ले ल, मलि मलि काया धोई
अन्दर अघि के दाग न छूटे, निरमल कहवाँ से होई।
तोया क ल ए माया से, तोर मोर भेंट न होई
जाके प्राण परल बा मटिया, ना जाने मटिया के कवन गति होई।
साधुअ मुनिउँ अ सन्यासी, शेष नाग प धोई
जिन जिन जनम लिये धरती पर, अमर भइल नहिं कोई।
कहे कबीर सुनो भइ साधो, चेत करो मन रोई
अइसन अवसर फिर ना अइहें, मानुस तनवा ए दुरलभ होई।
 
जाने कौन साहेब है यह? और यह भेदिया कौन है? अब सुनिये मोबाइल की रिकॉर्डिंग। बढ़िया प्रभाव के लिये हेडफोन लगा कर सुनिये और समझिये कि लहरी भोजपुरी क्या होती है!यह स्वर प्रशिक्षित स्वर नहीं, सहजिया स्वर है जिसमें खेतिहर लोक का बैरागी रस है: