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शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

पुरानी डायरी से - 3 : घिर गई काली उदासी




23 अप्रैल 1993, समय: अपराह्न 03:00                                                     
'घिर गई काली उदासी'


नींद से स्वप्न तोड़े, घिर गई काली उदासी
ठूँठा वन, सूना मन, बह गई पछुवा हवा सी। 


तुम किसी लायक न थी, हाय मेरी चाहना 
छोटी छड़ी हाथों लगी, था समुद्र थाहना
चन्द्रिका की वासना, चन्द्र को आँखें पियासी
घिर गई काली उदासी।


रंग रूप रस गन्ध माधुरी, क्यों न भोगे ? 
संग अंग छवि बन्ध नागरी, क्यों न भोगे ?
पतझड़ फिरता नहीं, क्यों नहीं समझा विनाशी?
घिर गई काली उदासी। 

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

पुरानी डायरी से - 1


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नया जवान होता व्यक्ति अभिव्यक्ति के सागर जेब में लिए चलता है। जेब भी कैसी ! पानी तक न टपके। जब जरूरत हो तो निचोड़ कर ऐसी टपकाए कि बस ....
थोड़ा रूमानी और ताक झाँक वाला स्वभाव हो तो क्या कहने ! 
आज अपनी पुरानी डायरी आप के सामने खोलना प्रारम्भ कर रहा हूँ - पन्ने दर पन्ने , बेतरतीब । डायरी रोजनामचा टाइप नहीं बल्कि सँभाल कर छिपा कर किए प्रेम की तरह - जब मन आया लिख दिए, जब मन आया चूमने चल दिए, बहाने चाहे जो बनाने पड़ें। 
नई जवानी में बचपना अभी शेष है लेकिन आश सी है कि इन पन्नों को भी उतना ही प्यार दुलार मिलेगा।
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9 मई 1992                          'झुलसा सारा गाँव'



आज चाँदनी के आगन में, गरमी धरती पाँव
झुलस गए सब फूल पतंगे, झुलसा सारा गाँव।


सूख गए सब ताल तलइया
कोयल छोड़ चली अमरइया
गिद्धों के उन्मुक्त भोज में
कउवे बोलें काँव
झुलसा सारा गाँव।


भाग चले सब छोड़ घोंसले
मन में जलता काठ कोप ले
भाग दौड़ छीना झपटी में
सधते सबके पाँव
झुलसा सारा गाँव।


दीप दिवाली होली गाली
खा गइ सभी अमीरी (?) साली
नए ठाँव के नए ठाठ में
चलती कागज की नाँव
झुलसा सारा गाँव।  
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