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शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

पुरानी डायरी से - 3 : घिर गई काली उदासी




23 अप्रैल 1993, समय: अपराह्न 03:00                                                     
'घिर गई काली उदासी'


नींद से स्वप्न तोड़े, घिर गई काली उदासी
ठूँठा वन, सूना मन, बह गई पछुवा हवा सी। 


तुम किसी लायक न थी, हाय मेरी चाहना 
छोटी छड़ी हाथों लगी, था समुद्र थाहना
चन्द्रिका की वासना, चन्द्र को आँखें पियासी
घिर गई काली उदासी।


रंग रूप रस गन्ध माधुरी, क्यों न भोगे ? 
संग अंग छवि बन्ध नागरी, क्यों न भोगे ?
पतझड़ फिरता नहीं, क्यों नहीं समझा विनाशी?
घिर गई काली उदासी।