23 अप्रैल 1993, समय: अपराह्न 03:00
'घिर गई काली उदासी'नींद से स्वप्न तोड़े, घिर गई काली उदासी
ठूँठा वन, सूना मन, बह गई पछुवा हवा सी।
तुम किसी लायक न थी, हाय मेरी चाहना
छोटी छड़ी हाथों लगी, था समुद्र थाहना चन्द्रिका की वासना, चन्द्र को आँखें पियासी
घिर गई काली उदासी।
रंग रूप रस गन्ध माधुरी, क्यों न भोगे ?
संग अंग छवि बन्ध नागरी, क्यों न भोगे ?
पतझड़ फिरता नहीं, क्यों नहीं समझा विनाशी?
घिर गई काली उदासी।