पिछ्ले भाग से आगे ...
हम उन घंटों को हल्की छुअन की तरह जीते हैं जो हमारे अधसोये अस्तित्त्व पर भारी हैं और दु:स्वप्नों के अंतहीन तनावों से भारी कशमकश के साथ गुजरते हैं। टेंट में रखा मिट्टी का घड़ा खाली है। फेंक दी गई टॉयलेट वाली प्लास्टिक बोतल में पानी की चन्द बूँदें हैं। मैं उसे उठाता हूँ और उन चन्द बूँदों को अपने सूख चुके मुँह में खाली कर देता हूँ। मेरी जुबान सूख गई है। यह किसी भी वक्त गिर सकती है। सूरज को देखने पर मेरी दादी चीखती है। धूप में अचेत हो जाने के डर से वह टेंट से बाहर आने में घबराती है। वह रोज अपने कपड़ों में ही गू मूत कर देती है। मेरी माँ ने उसके लिए जो हाजती मँगाया है, वह उसका प्रयोग तक नहीं कर सकती। सुबह से शाम तक वह उस पुराने बक्से से चिपकी रहती है जिसे वह साथ लाई थी। वह उसके सीने से उसके वजूद जैसा चिपका रहता हैI मुझे यह सोचते हैरानी होती है कि क्या उसमें कोई गहने या कीमती सामान बचे हुए हैं?
खुद से और दूसरों से अनजान होने की, भुलाने की इच्छा मैंने पहले कभी नहीं महसूस की। गन्ध ....स्पर्श.... साँसें... आह... सब कुछ।
साथ के एक टेंट में पाँच जनों का एक परिवार उस बूढ़े को यातना देता है जो उनका पालक-दादा है, जिसने धुँधलाती दूरी में गुम होते अपने घर को देख अपना मानसिक संतुलन खो दिया था। बूढ़ा अपने बेटे बहू के लिए एक बोझ है। वे उसे बस भकोसने वाला एक मुँह समझते हैं। रातों में वह लगातार कराहता है और बीच बीच में किसी बुरे सपने के कारण ठिठुरन भरी काँप के साथ जाग उठता है। उसके बेटे बहू अपने मनबहलाव के लिए उस पर ताना कसते हैं। वे उसके कानों में फुसफुसाते हैं कि उसकी माँ मर चुकी है और उसे क्रूरता के साथ पीट पीट कर मार दिया गया था। बूढ़ा रंज करता है और उनसे अत्याचारों के बारे में बात न करने की भीख माँगता है। हर शाम यह यंत्रणा जारी रहती है। बूढ़े की पागल बना देने वाली हँसी चिथड़ा चिथड़ा कैनवास टेंट से टकरा कर वापस हो लेती है। बूढ़ा हर रात विलपता है। वह अपने बेटे बहू को मुँह फाड़े एकटक देखता रहता है और उनके ऊपर अपने आशीर्वाद न्यौछावर करता है। अन्धेरा! अन्धेरा!
सिर धुनते मैं आश्चर्य में पड़ जाता हूँ – 'नैतिक क्या, अनैतिक क्या।‘
पम्पोश के अनुभव और दशा के बारे में सुन कर श्रीधर की साँसें कुछ देर के लिए थम गईं। उसने पम्पोश का सस्ते सिगरेटों वाला पैक उठा लिया। पहली बार उसने सिगरेट सुलगाई थी। उसने एक कश लिया। धुयें का गुबार हवा में मँडराया और सीलिंग फैन के आवर्त में खो गया।
उस दिन श्रीधर ने अपने जरनल में अपने विचार लिखे। उसने पम्पोश के बारे में लिखा और उसकी चेतना की भयानक खान के बारे में भी लिखा।
उसे खयाल आया कि पम्पोश जैसा होना कैसा होगा? पिछले दिन कहे गये पम्पोश के अंतिम शब्द उसे याद आये। पम्पोश श्रीधर के कान में फुसफुसाया था,‘मुझे एक बच्चे सी हँसी की तमन्ना है।
पम्पोश ने कश्मीर में गुजारे अपने दिनों के बारे में कभी नहीं बताया। श्रीधर ने पम्पोश को कश्मीरी गाँव में गुजारे उसके बचपन के दिनों के बारे में जानने के लिए ऐसी बातें करने को उकसाने की कोशिश की। पम्पोश का परिवार कश्मीर के एक गाँव से आया था। कैम्प के कुछ विद्यार्थियों ने श्रीधर को बताया कि पम्पोश का परिवार फलों के एक बागीचे का स्वामी था जिसमें वे लोग अनार, चेरी और अखरोट उपजाते थे। श्रीधर ने सोचा, पम्पोश का बचपन खेल कूद मस्ती से भरा रहा होगा। किसी ने बताया कि पम्पोश का परिवार उनके गाँव में अकेला पंडित परिवार था और उन्हें चरम भयावह परिस्थितियों में वहाँ से भागना पड़ा था। जो घटित हुआ उसे बताने की स्थिति में कोई नहीं था। पम्पोश ने एक घर खोया था और उसे दूसरे की तलाश नहीं थी।
शरणार्थी चट्टानी टीले पर दिन भर बैठे रहते और अपने समाज के मामलों पर बात बहस करते। दिन बैठे हुए और दिमागी फितरतों, उनकी दुर्दशा और बदहाली के बारे में बातें करते गुजारे जाते। वे लोग प्रतीक्षा में व्यस्त रहते। बहुतों के लिए यह प्रतीक्षा एक तरह की चीर फाड़ थी। उन्हें तब भी इसका भान नहीं हुआ था कि यह प्रतीक्षा अंतहीन थी। उन्हें नहीं पता था कि वे किसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। यह प्रतीक्षा घर लौटने के लिए नहीं, घाटी में शांति के लिए नहीं बल्कि एक नये दिन के प्रारम्भ और एक नई शाम की ढलान के लिए थी। वे बिना लू वाले दिन और बिना सर्पदंश वाली रात के लिए प्रार्थना करते थे।
पम्पोश स्कूल के बाद चींटियों की एक बाँबी के पास श्रीधर से रोज मिलता। वह किसी बेलचे से बाँबी को ढहा देने और साँपों को बेघर कर देने की सोचता ताकि कैम्प में सर्पदंश की कोई घटना न हो।
कैम्प से रोज ही निकलते जनाजों में पूछने के लिए बस एक ही प्रश्न होता – ‘सर्पदंश या लू?’
आने वाले दिनों में श्रीधर और पम्पोश ने ढेरों कैम्पवासियों को एक एक कर श्मशान में लाइन लगते देखा। उन दोनों के बीच अर्थहीन शब्द साँस लेते थे! शब्द! मौन! ......(समाप्त)
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दुनिया हसीन रहे, इसके लिए घृणा भी उतनी ही आवश्यक है, जितना प्रेम।
गुनहगारों!
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मैंने तुम्हारे लिए सहेज रखा है।
भूलना मेरी फितरत नहीं।

