बुधवार, 12 मई 2010

बच्चों को बचाइए

मुझे नहीं पता कि नारीवादी क्या कहेंगे? वैचारिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के झण्डाबरदारों को कैसा लगेगा? बस हक़ीकत बयाँ कर रहा हूँ:
घटना 1:
समय : रात 11 बजे 
स्थान : पार्क 
सिर पर जेबकतरों की स्टाइल में रुमाल बाँधे पुरुष, टिपिकल टपोरी । जींस टी शर्ट पहने उससे आधी उमर की लड़की। बेंच पर प्रेम लीला करते पाए गए। दूसरी लड़की और एक और लड़का भागने में सफल। 
"इस समय यहाँ क्या कर रहे हो?"
"इसे मोबाइल देने आया था" 
"नाम?"
"...(मुस्लिम नाम)"
"कहाँ से आए हो?" 
".... (करीब 5 किमी. दूर)
लड़की से "तुम्हारा नाम क्या है? 
"...(हिन्दू नाम)
"कहाँ से आई हो?" 
"... (पास की ही एक कॉलोनी)"
भीड़ बढ़ चुकी है। 
"साले! इतनी दूर से इसे मोबाइल देने के लिए यही समय और यही ज़गह मिली थी? जो कर रहे थे वह तो सबने देखा। 
शरम नहीं आती ? "
"भाईजान! ऐसी कोई बात नहीं।"
"साले ! पूरे आधे घंटे झेलने के बाद परेशान सामने के घर वाले ने फोन किया तो लोग इकट्ठे हुए हैं और तुम कह रहे हो, ऐसी कोई बात नहीं? कान पकड़ कर उठो बैठो। फिर मत आना यहाँ!"
अकड़ दिखाता है। भीड़ में से एक शख्स निकल कर चार पाँच तमाचे जड़ देता है। तत्काल उठक बैठक शुरू। पुलिस बुलाने की बात होती है, कोई कहता है कि लड़की की ज़िन्दगी नरक हो जाएगी। साथ में जोड़ता है - इसके घर वालों को कोई ऑबजेक्सन नहीं , आप लोग आसमान सिर पर उठाए हैं।  
कोई लड़की को 'रंडी' कहता है।
"ज़बान सँभाल कर बात करो!" 
"अरे खुद को तो सँभाल नहीं पा रही, हमें सँभलने को कह रही है!" 
घटना 2:
समय: शाम के पाँच 
स्थान: पार्क के बाहर का कोना
स्कूटी पर लड़की आगे, लड़का पीछे। उम्र इतनी कि दसवीं या ग्यारहवीं में होंगे।  लड़का बेतहाशा वह किए जा रहा है जिसे मॉलेस्टेशन के आगे का स्टेज कहा जा सकता है। लड़की खिलखिलाए जा रही है। दोनो मस्त हैं। 
मैं अकेला। पास जा कर स्कूटी का नम्बर देखता हूँ। 
"यह तुम्हारी पढ़ने लिखने की उम्र है, शर्म नहीं आती? भाग यहाँ से!"
स्कूटी स्टार्ट । फुर्र.... 
घटना 3: 
समय: रात के आठ 
स्थान: पार्क और खाली प्लॉटों के बीच का सड़क का अन्धेरा हिस्सा । खिलखिलाहट , सिसकारी। .. 
ठक! ठक!! 
कार पर पुलिस विभाग का चिह्न लगा है। कार का शीशा थोड़ा और नीचे होता है। लड़की स्कूल ड्रेस में - शायद ग्यारहवीं बारहवीं में होगी । जल्दी जल्दी कपड़े ठीक कर रही है। एक बार फिर लड़का  उससे बहुत अधिक उमर का ।
लड़का "जी ?" 
"क्या कर रहे हो?"
"हमलोग अलबम देख रहे हैं।"
"रोशनी में देखो, अन्धेरे में कौन सा अलबम देख रहे हो? भैया! यहाँ मत आया करो। खामख्वाह फँस जाओगे।" 
"जी अंकल !" 
तीन चार  दिन बाद, बाज़ार से लौटते - फिर वही गाड़ी, समय शाम के छ:। लड़का वही, लड़की बदल गई है।  पास जा कर घूरते ही गाड़ी स्टार्ट, फुर्र। 
घटना 4: 
भरी दुपहरी। स्कूल कम्पाउंड से लगे दो बच्चे 'दोस्ताना' में संलग्न है। डाँटने पर जल्दी जल्दी निकर ठीक करते स्कूल भवन की तरफ भागते हैं।
घटना 5:
समय : सुबह छ: के आसपास  
टहलते हुए श्रीमती जी तीन दिनों से देख रही हैं। लड़की साइकिल से स्कूल ड्रेस में - शायद दसवीं में भी नहीं होगी। अधेड़ मर्द उसका इंतजार करता है, दोनों कभी इस कोने कभी उस कोने एकांत देख 'फोरप्ले' करते हैं। लोग देखते हुए भी नहीं देखते। कुछ देर के बाद लड़की साइकिल पर अकेले रवाना हो जाती है।
...आज उन्हों ने बताया है। कल कॉलोनी की 'ऐक्टिव ब्रिगेड' हिसाब किताब करेगी।    
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हॉर्मोन जनित सेक्स रिलेटेड इस तरह की घटनाएँ हमेशा होती रही होंगी लेकिन इतने खुले में और इतनी? मैं अब ही देख रहा हूँ। तकरीबन हर बार लड़की कम उमर है जब कि  लड़के/पुरुष आयु में बहुत बड़े।
...नहीं! मैं किसी घेट्टो में नहीं रहता। अच्छी कॉलोनी है, थोड़ी कम बसी है, बस। यह सब बस मेरे अलावा दो तीन और लोगों को दिखता है, बाकियों को नहीं।     
तब तक जब तक कि यौन शिक्षा लागू होती है, जब तक समाज उलट कर 'पुरुषवादी' से 'व्यक्तिवादी' नहीं होता; अपने बच्चों को संस्कारों की सीख दीजिए। बच्चों के उपर नज़र रखिए। उन्हें अपनी और दूसरों की निजता का सम्मान करना सिखाइए। 
एक्सपोजर बहुत बढ़ गया है। हमारी ज़िम्मेदारियाँ भी बढ़ गई हैं। जो देखने के अभ्यस्त हैं, जो देखना चाहते हैं ; उससे इतर भी देखने की कोशिश कीजिए। कहीं उल्टा पुल्टा होता दिखता है तो टोकिए, समझाइए। हाँ, अकेले नहीं - अपने जैसे दो तीन को जुटा कर। यह 'मॉरल पुलिसिंग' नहीं, हमारे आप के बच्चों के भविष्य का मामला है। लड़कियों के मामले में और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। माना कि यह एक हारी हुई लड़ाई है लेकिन कभी कभी ऐसे भी लड़ना ठीक होता है, अनजाने ही आप शायद भविष्य की किसी कल्पना चावला, किरण बेदी, इन्दिरा नुई .. को बचा लें। .. अभी मेरा साहस वहाँ तक नहीं पहुँचा कि मसीहा बनूँ, बच्चों के माँ बाप या पुलिस तक पहुँचने की ज़हमत उठाऊँ लेकिन मुझे लगता है कि कहीं न कहीं इस प्रयास में सार्थकता तो है... वक़्त भी कैसा हो चला है, जो बातें सीना तान कर की जाती थीं, उन्हें अब स्पष्टीकरण के साथ कहना पड़ रहा है। दकियानूसी पुरनियों की तुलना में शायद हम बहुत डरे हुए लोग हैं। 

रविवार, 9 मई 2010

इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत - 1

- हम जिन अपराधों की पोल खोलेंगे उनका फैसला कम्युनिस्ट सत्ताओं के मानकों से नहीं बल्कि मानवता के अलिखित प्राकृतिक नियमों से होना चाहिए। स्टीफेन कोर्टवोइस 
[द ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म, क्राइम्स, टेरर, रिप्रेशन , निकोलस, जीन-जुइस पन्ने, अन्द्र्ज़ेज चकोवस्की आदि, अनुवादित जोनाथन मरफी और मार्क क्रेमर, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1999, पृ.3 ] 
- एक अपराधी को छोड़ना ठीक नहीं भले सौ निर्दोषों की हत्या करनी पड़े। डोलोरेस इबर्रुरी ("ला पैसनरिआ"), स्पेनी कम्युनिस्ट [वही, पृ.343]  
- हमने पर्याप्त लोगों को नहीं मारा ... क्रांतियाँ तभी सफल होती हैं जब नदियाँ खून से लाल हो जाती हैं और जब आप का उद्देश्य मानव जाति की सम्पूर्ण उत्तमता का हो तो खून बहाना अनिवार्य हो जाता है। अरेस वेलूचिओटेस, ग्रीक कम्युनिस्ट, [वही, पृ.329]
- कम्युनिज्म आर्थिक उत्पाद की उत्कृष्ट्ता सुनिश्चित करने में उन्नीसवीं सदी की असफलता के विरुद्ध प्रतिक्रिया नहीं है। यह इसकी तुलनात्मक सफलता के विरुद्ध प्रतिक्रिया है। यह आर्थिक कल्याण के खोखलेपन के विरुद्ध प्रतिवाद है, हम सबके भीतर के तपस्वी के लिए एक अपील है ... आदर्शवादी युवा कम्युनिस्ट अवधारणा को आजमाते हैं क्यों कि यह एकमात्र आध्यात्मिक आकर्षण है जो उन्हें समकालीन लगता है। जॉन मेनार्ड कीनेस, 1934
- किसी भी बुद्धिजीवी के लिए यह कोई बचाव का रास्ता नहीं है कि उसे [कम्युनिज्म के द्वारा] ठग दिया गया। एक बुद्धिजीवी के रूप में उसे ऐसा कत्तई घटित नहीं होने देना चाहिए था।  ग्रेनविल हिक्स  
- यह अजीब है कि राजनैतिक रूप से सही (अवसरवादी) समतावाद बहुतेरे विद्वज्जनों के बौद्धिक दम्भ और उच्छिष्टवर्गवाद को आकर्षित करता है; साहित्यिक मार्क्सवाद के प्रति उनका झुकाव इसके आर्थिक सिद्धांत पर आधारित न हो कर इसके व्यापार (पण) और मध्य वर्ग के विरोध के कारण है। इसीलिए इस बुर्जुवाविरोधी भावना के चरित्र की संगति समतावाद के बजाय निचले तबके के प्रति इनके कुलीन तिरस्कार से अधिक बैठती है। जॉन एम. एल्लिस, लिटेरेचर लॉस्ट [येल यूनिवर्सिटी प्रेस, 1997], पृ.214
- कॉस्मिक अंतर्दृष्टि(विजन) वालों का मध्यवर्ग - बुर्जुवा - के प्रति करीब सर्वव्यापी तिरस्कार भाव इससे समझा जा सकता है कि ये विजन व्यक्तिगत संतुष्टि और व्यक्तिगत वैधता प्रदान करते हैं। निचले और धनाढ्य़ कुलीन दोनों वर्गों की तुलना में  परम्परा से ही मध्य वर्ग नियमों और परम्पराओं को मानने वाले और आत्मानुशासित लोगों का रहा है। जहाँ निचला तबका मध्य वर्ग जैसा आत्मानुशासित न होने की कीमत ग़रीबी और कैदखाने के रूप में अदा करता है वहीं धनाढ्य और शक्तिशाली लोग बहुधा नियम और क़ानून को बिना कुफल भुगते धता बता सकते हैं। सामाजिक अनुशासन और बन्धनों को स्वाभाविक के बजाय मनमाना मानने वाले कॉस्मिक अंतर्दृष्टिप्राप्त लोग उनसे मुक्ति चाहते हैं। वे निचले तबके की उच्छृंखलता और कुलीनों की खुद को नियमों से उपर मानने की प्रवृत्ति का रोमानीकरण करते हैं। थॉमस सोवेल्ल, द क्वेस्ट फॉर कॉस्मिक जस्टिस [द फ्री प्रेस, 1999], पृ. 139-140.
- बहुतेरे जिनकी निष्ठा सोवियत संघ के साथ थी अपने देश और लोकतांत्रिक संस्कृति के प्रति गद्दार की तरह देखे जाते हैं। लेकिन उनका सबसे बड़ा दोष और भी बुनियादी था। खुद को स्वतंत्र मस्तिष्कधारी की तरह देखते, एक समझदार की तरह अपने विकल्प चुनते उन्हों ने अपने मानदंडों की ही अवहेलना की। कम्युनिस्ट शासन की वास्तविकताओं पर तीसरे दशक में पहले से ही उपलब्ध बहुआयामी सबूतों की उन्हों ने जाँच पड़ताल नहीं की। यह कहा जा सकता है कि वे मानव मस्तिष्क के और स्वयं चिंतन के भी गद्दार थे। रॉबर्ट कॉंक़्वेस्ट, रिफ्लेक्संस ऑन अ रैवेज्ड सेंचुरी [डब्ल्यू ड्ब्ल्यू नॉर्टन एण्ड कम्पनी, 2000], पृ.118 
- एक बौद्धिक रचना के रूप में द कैपिटल (मार्क्स) उत्कृष्ट कृति थी। लेकिन कुछ और बौद्धिक उत्कृष्ट कृतियों की तरह ही यह एक विस्तृत और परिष्कृत शिल्प था जिसकी नींव एक आदिम मिथ्या अवधारणा थी। 
... विचारों के क्षेत्र में मार्क्स की अंतर्दृष्टि, उनके इतिहास के सिद्धांत के साथ, न केवल विभिन्न कालों में बहुआयामी क्षेत्रों में अपनी धाक जमाए रखी है, बल्कि पूँजीवाद की फलती फूलती समृद्धि और समाजवाद के आर्थिक पतन दोनों के दरम्याँ बची रही है। प्रमाण और तर्क के क्षयकारी प्रभावों से अभेद्य यह बुद्धिजीवियों की जमात के बीच स्वयंसिद्ध सी हो गई है। 
लेकिन अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मार्क्स का क्या योगदान था? योगदान केवल प्रस्ताव पर नहीं बल्कि स्वीकार पर भी आधारित होता है, और आज के अर्थशास्त्र में कोई प्रमुख आधार वाक्य, मत, सिद्धांत या विश्लेषण यंत्र मार्क्स की रचनाओं से नहीं आया है। यह नकारने की कोई जरूरत नहीं है कि कई अर्थों में मार्क्स उन्नीसवीं सदी के एक प्रमुख इतिहास पुरुष थे, जिनकी लम्बी छाया इक्कीसवीं सदी की दुनिया पर अभी भी पड़ रही है; फिर भी शायद यह कहना कठोर हो, अर्थशास्त्र प्रोफेसनल के लिहाज से, जैसा कि प्रो. पॉल सैमुएल्सन ने कहा है, मार्क्स एक "अदने उत्तर-रिकार्डियन" थे। थॉमस सोवेल्ल, ऑन क्लासिकल इकोनॉमिक्स [येल, 2006] पृ.184-186 


"तुम जो आ रहे हो, हर आशा का त्याग कर दो"      
दांते एल्लीघीरी, द डिवाइन कॉमेडी, इंफर्नो, 3:9  
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कार्ल मार्क्स (1818-1883) के पास नैतिकता का सिद्धांत नहीं था; उनके पास इतिहास का सिद्धांत था। इस प्रकार, मार्क्सवाद सही या ग़लत का सिद्धांत न होकर इतिहास में क्या घटेगा इसका सिद्धांत था। मार्क्स उन लोगों के प्रति निन्दा भाव रखते थे जो बात, वस्तु या तथ्य को नैतिक अवधारणाओं से परखते थे। लेनिन, स्टेलिन, माओ, कास्त्रो, हो और डेनियल ओरटेगा की अपने कृत्यों के प्रति अवधारणा के बावजूद भी जब कट्टर अनुयायी यह कहते हैं कि मार्क्सवाद वास्तव में कभी 'आजमाया' नहीं गया, वे यह नहीं समझते कि मार्क्सवाद व्यवहार या कर्म के कार्यक्रम का कोई नियम नहीं बल्कि निश्चयात्मक क्रियातंत्र का सिद्धांत था, यह क्रियातंत्र भविष्य का 'उत्पादक' होने वाला था, ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण सहज स्वाभाविक तरीके से उठ खड़े होने वाली क्रियाओं का सिद्धांत -- हालाँकि हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि लोग , जिनमें हम भी सम्मिलित हैं,  किस तरह के कर्म करेंगे -- जैसा कि,  मार्क्स ने कहा था कि उनके काम का उद्देश्य संसार को केवल समझना नहीं, बदलना था। (जारी)
पूर्वानुमति के बाद  डा. केली रॉस के अंग्रेजी लेख   के अंश का ब्लॉग लेखक द्वारा अनुवाद   

...रोवें देवकी रनिया जेहल खनवा




पुनर्प्रस्तुति 
वाराणसी। अर्धरात्रि। छ: साल पहले की बात। सम्भवत: दिल्ली से वापस होते रेलवे स्टेशन पर उतर कर बाहर निकला ही था कि कानों में कीर्तन भजन गान के स्वर से पड़े:
“....रोवें देवकी रनिया जेहल खनवा
इतनी करुणा और इतना उल्लास एक साथ। कदम ठिठक गए। गर्मी की उस रात मय ढोलक झाल बाकायदे बैठ कर श्रोताओं के बीच मंडली गा रही थी। पता चला कि शौकिया गायन है, रोज होता है। धन्य बाबा विश्वनाथ की नगरी ! रुक गया - सुनने को।
भादो के अन्हरिया
दुखिया एक बहुरिया
डरपत चमके चम चम बिजुरिया
केहू नाहिं आगे पीछे हो हो ऽऽऽ
गोदि के ललनवा लें ले ईं ना
रोवे देवकी रनिया जेहल खनवा ऽऽ
जेलखाने में दुखिया माँ रो रही है। प्रकृति का उत्पात। कोई आगे पीछे नहीं सिवाय पति के। उसी से अनुरोध बच्चे को ले लें, मेरी स्थिति ठीक नहीं है। मन भीग गया। लेकिन गायक के स्वर में वह उल्लास। करुणा पीछे है, उसे पता है कि जग के तारनहार का जन्म हो चुका है। तारन हार जिसके जन्म पर सोहर गाने वाली एक नारी तक नहीं ! क्या गोपन रहा होगा जो बच्चे के जन्म के समय हर नारी का नैसर्गिक अधिकार होता है। कोई धाय रही होगी? वैद्य?
देवकी रो रही है। क्यों? शरीर में पीड़ा है? आक्रोश है अपनी स्थिति पर ? वर्षों से जेल में बन्द नारी। केवल बच्चों को जन्म दे उन्हें आँखों के सामने मरता देखने के लिए। तारनहार को जो लाना था। चुपचाप हर संतान को आतताई के हाथों सौंपते पति की विवशता ! पौरुष की व्यर्थता पर अपने आप को कोसते पति की विवशता !! देवकी तो अपनी पीड़ा अनुभव भी नहीं कर पाई होगी। कैसा दु:संयोग कि एक मनुष्य विपत्ति में है लेकिन पूरा ज्ञान होते हुए भी अपने सामने किसी अपने को तिल तिल घुलते देखता है - रोज और कौन सी विपत्ति पर रोये, यह बोध ही नहीं। मन जैसे पत्थर काठ हो गया हो। देवकी क्या तुम पहले बच्चों के समय भी इतना ही रोई थी ? क्यों रो रही हो? इस बच्चे के साथ वैसा कुछ नहीं होगा
ले के ललनवा
छोड़बे भवनवा कि जमुना जी ना
कइसे जइबे अँगनवा नन्द के हो ना
इस भवन को छोड़ कर नन्द के यहाँ जाऊँ कैसे? बीच में तो यमुना है।
रोए देवकी रनिया जेहल खनवा ऽऽऽ
माँ समाधान देती है।
डलिया में सुताय देईं
अँचरा ओढ़ाइ देईं
मइया हई ना
रसता बताय दीहें रऊरा के ना,
जनि मानिं असमान के बचनवा ना
रोएँ देवकी रनिया जेहल खनवा ऽऽ
जेल मे रहते रहते देवकी रानी केवल माँ रह गई है। समाधान कितना भोला है ! कितना भरोसा । बच्चे को मेरा आँचल ओढ़ा दो ! यमुना तो माँ है आप को रास्ता बता देंगी। लेकिन यहाँ से इसे ले जाओ नहीं तो कुछ हो जाएगा।
तारनहार होगा कृष्ण जग का, माँ के लिए तो बस एक बच्चा है।
आकाशवाणी तो भ्रम थी नाथ ! ले जाओ इस बच्चे को ।. . . मैं रो पड़ा था।
..उठा तो गाँव के कीर्तन की जन्माष्टमी की रात बारह बजे के बाद की समाप्ति याद आ गई। षोडस मंत्र 'हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।' अर्धरात्रि तक गाने के बाद कान्हा के जन्म का उत्सव। अचानक गम्भीरता समाप्त हो जाती थी। सभी सोहर की धुन पर नाच उठते थे। उस समय नहीं हुआ तो क्या? हजारों साल से हम गा गा कर क्षतिपूर्ति कर रहे हैं।
कहँवा से आवेला पियरिया
ललना पियरी पियरिया
लागा झालर हो
ललना . . .
उल्लास में गवैया उत्सव के वस्त्रों से शुरू करता है।
"बच्चे की माँ को पहनने को झालर लगा पीला वस्त्र कहाँ से आया है?"
मुझे याद है बाल सुलभ उत्सुकता से कभी पिताजी से पूछा था कि जेल में यह सब? उन्हों ने बताया,
"बेटा यह सोहर राम जन्म का है।"
"फिर आज क्यों गा रहे हैं?"
"दोनों में कोई अंतर नहीं बेटा"
आज सोचता हूँ कि उनसे लड़ लूँ। कहाँ दिन का उजाला, कौशल्या का राजभवन, दास दासियों, अनुचरों और वैद्यों की भींड़ और कहाँ भादो के कृष्ण पक्ष के अन्धकार में जेल में बन्द माँ, कोई अनुचर आगे पीछे नहीं ! अंतर क्यों नहीं? होंगे राम कृष्ण एक लेकिन माताएँ? पिताजी उनमें कोई समानता नहीं !
 हमारी सारी सम्वेदना पुरुष केन्द्रित क्यों है? राम कृष्ण एक हैं तो किसी का सोहर कहीं भी गा दोगे ? माँ के दु:ख का तुम्हारे लिए कोई महत्त्व नहीं !
 वह बनारसी तुमसे अच्छा है। नया जोड़ा हुआ गाता है लेकिन नारी के प्रति सम्वेदना तो है। कन्हैया तुम अवतार भी हुए तो पुरुषोत्तम के ! नारी क्यों नहीं हुए ?

मंगलवार, 4 मई 2010

असहमति - जाने किससे

-एक वयस्क सुशिक्षित लड़की एक वैसे ही लड़के से बिना किसी सावधानी के शारीरिक सम्बन्ध बनाती है, गर्भवती होती है और तीन महीने (मतलब कि शिशु को जन्म देने को मानसिक रूप से तैयार) तक मृत्युपर्यंत गर्भ धारण रखती है। क्या उसका अपने माँ बाप के प्रति, जो कि पुराने विचारों के थे और वैसे ही समाज में रहते थे, कोई दायित्त्व नहीं था ?

-लड़का खुलेआम टेसुए बहाता, हीरो बना घूम रहा है। लड़की के पोस्टमार्टम के समय क्या यह आवश्यक नहीं था कि गर्भ का डी एन ए परीक्षण कराया जाता ताकि लड़के का पिता होना सिद्ध हो सकता और उसको क़ानून के शिकंजे में लिया जा सकता ?

- एक आतंकवादी जिसने खुलेआम सैकड़ों हजारों लोगों की उपस्थिति में राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ा, सैकड़ों की हत्या की, पूरी मशीनरी को बन्धक बनाए रखा; महीनों तक की क़ानूनी प्रक्रिया के बाद और 45 करोड़ उसके उपर खर्चने के बाद दोषी ठहराया जाता है और फिर भी फैसला सुरक्षित रखा जाता है। उसी देश में उक्त लड़की की हत्या के लिए उसके माँ बाप पर आरोप लगता है और सभी उन्हें दोषी मानने लगते हैं। क्या न्यायालय के फैसले के आने तक उन्हें उनके हाल पर छोड़ नहीं देना चाहिए ? अरे उनकी इकलौती लड़की मरी है, रहम करो। क्या कहा? घर बुला कर मार दिया ! निर्णय लेने के पहले प्रतीक्षा कर लीजिए न ।

- एक आरुषि नामक लड़की की हत्या हुई थी। क्या आप बताएँगे कि आज कल उस केस में क्या हो रहा है? क्या प्रगति है?

- कहीं ऐसा तो नहीं कि सारा बवाल बस इस लिए है कि मरने वाली पत्रकार थी और उसे मारने का पहला कदम लेने वाला ( उसे गर्भवती कर) उसका कथित प्रेमी भी पत्रकार है? कहीं प्रेमी अपने को बचाने के लिए जमात इकठ्ठी कर यह नौटंकी तो नहीं फैला रहा? कहीं ऐसा तो नहीं होगा न कि कल सुबूत मिले कि लड़के ने उसके साथ छिप कर शादी कर ली थी ?

- कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी घटनाएँ बच्चे की परवरिश का जिम्मा राज्य के सिर नहीं होने से हो रही हैं ? यह पुरातन समाज तेजी से बदलते माहौल के साथ कदम नहीं मिला पा रहा तो कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके लिए विवाह संस्था ही दोषी है ?

- आप में से कितने गिरिजेश अपने नाम से 'राव' हटाने को और अपने बच्चे को भी जाति सूचक उपनामों से मुक्त करने को तैयार हैं? ..मैं गिन रहा हूँ। संख्या बहुत कम है। .. तो भैया बहिनी! आप लोग उपनाम तक हटाने को तैयार नहीं; जाति व्यवस्था पर इतनी हाय तौबा क्यों?

- सार्वजनिक स्थानों पर दिन में खुलेआम सेक्स सम्बन्ध बनाते (जी हाँ, अब यह होने लगा है) कितने कुँवारे जोड़ों को आप ने टोका है ? मेरा मतलब यह है कि बच्चों पर क्या प्रभाव पडता होगा, यह सोचा है आप ने ? न न , सिनेमा वगैरह से इतर मामला है यह । कल अगर आप का बच्चा आप से पूछ बैठे तो क्या कहेंगे उसे ? वो जो कुत्ते करते हैं न वही कर रहे हैं - ऐसा कह पाएँगे आप ? ..सेक्स एजूकेसन। ... बच्चे सम्भोग करने के पहले उसकी ज़िम्मेदारी तो समझें...

बहुत से विचार गड्डमगड्ड हो रहे हैं। शायद मुझे आराम की जरूरत है। पाखंडी ऊर्जा क्षय अधिक करता है।

रविवार, 2 मई 2010

शिशु का परिच्छेदन (Circumcision)

इस लेख में दिए गए चित्र और सामग्री असामान्य हैं, 
जो कुछ सम्वेदनशील व्यक्तियों को विचलित कर सकते हैं। 
कृपया ऐसे लोग इसे न पढ़ें।
इस लेख का उद्देश्य केवल और केवल ज्ञानप्रसार है, 
भावनाएँ आहत करना नहीं। 
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एक शिशु के परिच्छेदन के चित्र नीचे दिए जा रहे हैं। मुक्तहस्त परिच्छेदन के ये चित्र आठवें दशक की एक ऑस्ट्रेलियाई नारी पत्रिका से लिए गए हैं। इनके मूल अनुशीर्षक किसी भी तरह से पूरी बात नहीं बता पाते थे। वस्तुत: ये चित्र शिशु की चीखों को सम्प्रेषित नहीं करते।
परिच्छेदन के पहले शिशु के पेट को पम्प से साफ कर दिया जाता है। यह सावधानी इसलिए ली जाती है कि कहीं वह हो रही शल्यक्रिया के उपर वमन न कर दे।

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परिच्छेदन के पहले कुछ शिशुओं को सामान्य एनेस्थेटिक दिया जाता है। वस्तुत: सामान्य एनेस्थेटिक और EMLA क्रीम दोनों नवजातों के लिए प्रतिदिष्ट हैं। शिशु शिश्न के कोरोना के उभार की स्थिति देखें जो शिश्न की आधी लम्बाई से कम पर है। इससे शिश्न की तुलना में शिश्नग्रच्छद (foreskin) की अधिक लम्बाई का संकेत मिल जाता है। 
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DPNB तीन इंजेक्सनों में दी जाती है। यद्यपि यह पृष्ठ भाग को सुन्न कर देता है लेकिन पेरेनियल नर्व की निम्न पृष्ठीय स्थिति के कारण एनेस्थेसिया के बावजूद फ्रेनुलम (frenulum) काटे जाते समय अक्सर शिशु चीखने लगते हैं। उस पीड़ा को 'असुविधा' कहना मधुभाषी होना ही कहा जाएगा क्यों कि पीड़ा शल्य के बाद में ही नहीं, शल्य क्रिया के दौरान भी रहती है। हालाँकि AAP स्थानीय एनेस्थेसिया की सलाह देता है लेकिन इसका प्रयोग कम ही होता है। इंजेक्सन का प्रभाव शल्य क्रिया के पश्चात जाता रहता है और दूसरे दर्दनिवारक देने पड़ते हैं।
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शिश्न के उपर इतना कुछ केन्द्रित होने से उसमें उठान (erection) आ जाती है। एक वीडियो में डाक्टर को शिश्न को सहलाते दिखाया गया है ताकि उठान हो (क्यों कि ऐसा होता है)। शिशु का शिश्नग्रच्छद पीछे को नहीं जाता क्यों कि सामान्यत: यह मुख्यांग से जुड़ा रहता है। ऐसा लगता है कि आनन्द की इस अनुभूति के तुरंत बाद असहनीय पीड़ा की घटना शिशु के कामोत्तेजना के भावों में विभ्रम की स्थिति उत्पन्न करती है। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि परिणामत: बाद में सैडोमैसकिज़म (पीड़ा देकर प्रसन्न होना, एक मनोरोग) की प्रवृत्ति आ जाय।
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त्वचा को पीछे खींचना कहना हल्कापन होगा। कुछ शिशुओं में केवल त्वचा को पीछे खींचना ही पर्याप्त होता है लेकिन बहुधा शिश्नग्रच्छद और मुख्यांग के बीच एक प्रोब घुसाना पड़ता है ताकि सिनेकिया (synechia) को फाड़ कर अलग किया जा सके। इस चित्र में और इसके बाद वाले चित्र में मुख्यांग का लुहलुहान दिखना इसी कारण है। यदि यह ग़लत तरीक से किया जाय तो इससे कई नुकसान हो सकते हैं जैसे मूत्र नली फिस्टुला (fistula), मूत्र नली में दूसरा छेद हो जाना। इस प्रक्रिया में फ्रेनुलम फट सकता है जिससे कामोद्दीपक उतकों की न्यूनाधिक हानि हो सकती है।
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शिश्न को एक मिनट तक क्लैम्प में रख छोड़ना होता है ताकि उतक भोथरे और रक्तरहित हो जांय। यह वह बिन्दु है जब डाक्टर द्वारा मुख्यांग या उसके कुछ हिस्से के काट दिए जाने की आशंका रहती है। आजकल क्लैम्प के बजाय बोन फोर्सेप का प्रयोग किया जाता है। मुक्तहस्त परिच्छेदन में इसका खतरा अधिक रहता है। जब मुख्यांग को ढकने के लिए बेल (bell) का प्रयोग किया जाता है तो यह खतरा कम रह जाता है। कृपया ध्यान दें कि काटना नहीं दिखाया गया है।  
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घाव के किनारे एक दूसरे से लगे रहते हैं। यदि उन्हें रोका नहीं गया तो बाद में वे मुख्यांग से लग कर स्किन ब्रिजों (skin bridges) में परिणत हो सकते हैं। सामान्य अवधारणा के विपरीत एक परिच्छेदित शिश्न 'रखरखाव मुक्त' नहीं होता।
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म्युकोसा (mucosa) से विलग अंग का लघु कटा किनारा घाव भरने के बाद भद्दा दिखेगा।
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अत्यधिक और अनियंत्रित रक्तस्राव परिच्छेदन की महती समस्या है। इस प्रक्रिया में शिशु बहुत तेजी से प्राणनाशक सीमा तक खून बहा सकता है।  अपने प्रात:आहार के दशमांश के बराबर भी रक्तस्राव होने पर शिशु को खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ सकती है।
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शल्यचिकित्सक की अंगुलियों पर लगे रक्त को देखें। काटे जाने वाले 'अतिरिक्त' म्यूकोसा की मात्रा डाक्टर के अनुमान पर निर्भर है। इससे यह तय होता है कि वृहद-परिच्छेदन होगा या लघु। यदि वह बाहरी त्वचा को काटने का निर्णय लेता/ती है तो इससे ढीलेपन या तंगी का होना तय होगा, हालाँकि उसे इस बात का अनुमान भी नहीं होगा कि बड़े होने पर इसके क्या परिणाम होंगे। इसी स्टेज पर डाक्टर अधिक फ्रेनुलम काटने का निर्णय ले सकता है जिसका पुरुष की काम क्षमता पर कैसा भी अपूर्वानुमेय प्रभाव पड़ सकता है।
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सर्जिकल वस्त्रों पर रक्त के अतिशय दाग देखें।
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...और इसके बाद अंगी के जीवन के बारे में विचारें। मुख्यांग का नग्न स्वरूप स्पष्ट है। टाँकों के नीचे सूजन आने लगी है।
यह अनुक्रम शल्य क्रिया के बाद की सावधानी, संरक्षण के बारे में नहीं बताता। फिर कभी... ।
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यह ब्लॉग लेख Infant Circumcision का हिन्दी अनुवाद है, जिसे http://www.circumstitions.com से लिया गया है। 
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