पिछली कड़ियाँ:
(1) साहेब राउर भेदवा
(2) कवने ठगवा
(3) लोकसुर में सूर - सिव भोला हउवें दानी बड़ लहरी
(1) साहेब राउर भेदवा
(2) कवने ठगवा
(3) लोकसुर में सूर - सिव भोला हउवें दानी बड़ लहरी
कहते हैं कि महाशिवरात्रि के दिन शिव का विवाह गौरी से हुआ था। दिगम्बर शिव से लिपट गौरी ने उन्हें दिव्याम्बर कर दिया। वही गौरी जिनके बिना शिव उनके शव को कन्धे पर लिये ब्रह्मांड में घूमने लगे और सृष्टि से शव लुप्त हो चले।
तो आइये देखते हैं कि लोक इस विवाह के बारे में क्या कहता है? लोक जीवन में गउरा महादेव एक आदर्श कम, सामान्य दम्पति के रूप में अधिक पहचाने जाने जाते हैं। उनमें आपसी झगड़े होते हैं, मेल मिलाप होते हैं; वे झगड़ा लगाते भी हैं और भेष बदल सुलझाते भी हैं। जाने कितनी लोक कथाओं में यह दम्पति गुम्फित है।
पिछली पोस्ट की इन पंक्तियों को देखिये:
खोआ मलाई के हाल न जानें, भँगिया पीसि के पीयेलें
भाँग पिसत में गउरा रोवें, गउरा रानी धइले बाड़ी नइहर के डगरीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।
भाँग पिसत में गउरा रोवें, गउरा रानी धइले बाड़ी नइहर के डगरीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।
भाँग पीसते पीसते हाथ दुखते हैं, गउरा रोती हैं और फिर रूठ कर नैहर चली जाती हैं! आम जनजीवन से कितने जुड़े हैं ये दोनो! भारत ने महादेव दम्पति को घरेलू सा बना रखा है।
अम्मा से जब गीत रिकॉर्ड करवा रहा था तो अचानक अम्मा ने गउरा बियाह गाने को कहा। मुझे क्या, जो मिल जाय वही अमृत।
गीत बहुत सीधा सा है। शिव बारात का वर्णन है। शिव के गले के सर्प की फुफकार और उनके रूप को देख गौरी की माँ और उनकी सखियाँ डर जाती हैं, सब फेंक फाक भाग खड़ी हो उठती हैं। मैना महतारी कहती हैं ऐसे वर से गौरी का विवाह नहीं करना। मेरी गौरी कुमारी ही रहेगी।
तब कलश की ओट से गौरी उनसे निवेदन करती हैं कि एक क्षण के लिये ही सही भेष बदल दीजिये ताकि नैहर के लोक पतिया लें। इतना सुनते ही महादेव गंगा स्नान कर भभूत उतार देते हैं। चन्दन लेप करते हैं और पुकारते हैं – मेरी सास जी कहाँ हैं? मेरी सरहज कहाँ है? अब मेरा रूप देखें। उनका यह रूप देख मैना देवी गौरी शंकर के विवाह को राजी हो जाती हैं। अर्थ सहित गीत (अम्मा की मानें तो कीर्तन) इस प्रकार है:
लेहु नाहीं बरिया रे हाथे के सोपरिया होऽ, देखि आव सिवा बरियात।
कइ सए हाथी आवे कइ सए घोड़ा आवे, कइ सए आवे बरियात?
(एक स्त्री माली से कहती है कि हाथ में सुपारी ले उसे देने के बहाने शिव की बारात देख आओ न! वह उससे पूछती है कि कितने सौ हाथी आये हैं, कितने सौ घोड़े और कितने सौ बाराती? वह आँखो देखा हाल सुनाता है।)
दस सए हाथी आवें, दस सए घोड़ा आवें, बीस सए आवे बरियात।
बसहा बरध सिवाजी घुरुमत आवेलें, आठो अंगे भभूती लगाइ।
(दस सौ यानि एक हजार हाथी आये हैं और उतने ही घोड़े आये हैं। दो हजार बारात आई है। पर शिव तो बसहा बैल पर सवार हो घूमते हुये आ रहे हैं और उन्हों ने अष्टांग पर श्मशान की राख पोत रखी है।)
दस सखी आगे भइली, दस सखी पाछे भइली, दस सखि गोहने लगाइ।
परिछ्न चलेली सासू मएना देबी, सरफ छोड़ेलें फुफुकार।
(भोजपुरी क्षेत्र में वर को स्त्रियों द्वारा परीक्षित करने की परम्परा है जिसमें मसाला पीसने वाला लोढ़ा थाली में ले कर अक्षत, हल्दी आदि में उसे बोर कर वर के चेहरे के चारो ओर घुमाया जाता है। शिव की भावी सास मैनादेवी दस दस सहेलियों के समूह के साथ उन्हें परिछ्ने गईं तो शिव के गले के सर्प की फुफकार से डर गईं।)
कतो बिगली लोढ़ा, कतो बिगली थाली हो, पिछऊड़ भागेलि पराइ।
अइसन बउरहवा सिवा से गउरा नाहीं बिअहब, मोर गउरा रहीहें कुँवारि।
(एक ओर लोढ़ा तो दूसरी ओर थाली फेंक पीछे हटते हुये भाग चलीं। ऐसे बौराये शिव से मैं अपनी गौरी का विवाह नहीं करूँगी। मेरी गौरी कुमारी रहेगी।)
कलसा के ओटे भइले बोलेलि गउरा देई, सिवाजी से अरज हमार।
छ्ने एक ए सिवाजी भेस बदलतीं हे, नइहर लोग पतियाइ।
(तब कलश की ओट ले गौरी ने शिव से प्रार्थना की। एक क्षण के लिये ही सही, अपना वेश बदल लीजिये ताकि मायके के लोग विश्वास कर लें।)
एतना बचन जब सुनेलें महादेव, चलि भइले गंगा असनान।
आठो अंगे भभूती उतरले महादेव, आठो अंगे चन्दन लगाइ।
(उनकी प्रार्थना सुन महादेव ने गंगा स्नान कर अष्टांग से विभूतिभस्म उतार दिया और चन्दन लेपन किया।)
कहाँ गइली सासू, कहाँ गइली सरहज, अब रूप देखन हमार।
अइसन सुन्दर सिवा से गउरी हम बिअहबि, मोर गउरा होइहें बियाह।
(उन्हों ने पुकार लगाई – मेरी सास और सलहज कहाँ हैं? अब आकर मेरा रूप देखें। उनका सुन्दर रूप देख मैनादेवी ने कहा कि ऐसे शिव से मैं अपनी गौरी का विवाह करूँगी। वह विवाहिता होगी।)
लीजिये सुनिये सीधी अम्मा की सादी गायकी:
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अगले अंक में:
घुमंतू जोगी - जइसे धधकेले हो गोपीचन्द, लोहरा घरे लोहसाई

