मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

लोक : भोजपुरी - 4 : गउरा सिव बियाह

पिछली कड़ियाँ: 
(1) साहेब राउर भेदवा 
(2) कवने ठगवा 
(3) लोकसुर में सूर - सिव भोला हउवें दानी बड़ लहरी 
 
कहते हैं कि महाशिवरात्रि के दिन शिव का विवाह गौरी से हुआ था। दिगम्बर शिव से लिपट गौरी ने उन्हें दिव्याम्बर कर दिया। वही गौरी जिनके बिना शिव उनके शव को कन्धे पर लिये ब्रह्मांड में घूमने लगे और सृष्टि से शव लुप्त हो चले।

तो आइये देखते हैं कि लोक इस विवाह के बारे में क्या कहता है? लोक जीवन में गउरा महादेव एक आदर्श कम, सामान्य दम्पति के रूप में अधिक पहचाने जाने जाते हैं। उनमें आपसी झगड़े होते हैं, मेल मिलाप होते हैं; वे झगड़ा लगाते भी हैं और भेष बदल सुलझाते भी हैं। जाने कितनी लोक कथाओं में यह दम्पति गुम्फित है।
पिछली पोस्ट की इन पंक्तियों को देखिये:

खोआ मलाई के हाल न जानें, भँगिया पीसि के पीयेलें
भाँग पिसत में गउरा रोवें, गउरा रानी धइले बाड़ी नइहर के डगरीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।

भाँग पीसते पीसते हाथ दुखते हैं, गउरा रोती हैं और फिर रूठ कर नैहर चली जाती हैं! आम जनजीवन से कितने जुड़े हैं ये दोनो! भारत ने महादेव दम्पति को घरेलू सा बना रखा है। 

अम्मा से जब गीत रिकॉर्ड करवा रहा था तो अचानक अम्मा ने गउरा बियाह गाने को कहा। मुझे क्या, जो मिल जाय वही अमृत।  

गीत बहुत सीधा सा है। शिव बारात का वर्णन है। शिव के गले के सर्प की फुफकार और उनके रूप को देख गौरी की माँ और उनकी सखियाँ डर जाती हैं, सब फेंक फाक भाग खड़ी हो उठती हैं। मैना महतारी कहती हैं ऐसे वर से गौरी का विवाह नहीं करना। मेरी गौरी कुमारी ही रहेगी।

तब कलश की ओट से गौरी उनसे निवेदन करती हैं कि एक क्षण के लिये ही सही भेष बदल दीजिये ताकि नैहर के लोक पतिया लें। इतना सुनते ही महादेव गंगा स्नान कर भभूत उतार देते हैं। चन्दन लेप करते हैं और पुकारते हैं – मेरी सास जी कहाँ हैं? मेरी सरहज कहाँ है? अब मेरा रूप देखें। उनका यह रूप देख मैना देवी गौरी शंकर के विवाह को राजी हो जाती हैं। अर्थ सहित गीत (अम्मा की मानें तो कीर्तन) इस प्रकार है: 


लेहु नाहीं बरिया रे हाथे के सोपरिया होऽ, देखि आव सिवा बरियात।
कइ सए हाथी आवे कइ सए घोड़ा आवे, कइ सए आवे बरियात?  
(एक स्त्री माली से कहती है कि हाथ में सुपारी ले उसे देने के बहाने शिव की बारात देख आओ न! वह उससे पूछती है कि कितने सौ हाथी आये हैं, कितने सौ घोड़े और कितने सौ बाराती? वह आँखो देखा हाल सुनाता है।)    
दस सए हाथी आवें, दस सए घोड़ा आवें, बीस सए आवे बरियात।  
बसहा बरध सिवाजी घुरुमत आवेलें, आठो अंगे भभूती लगाइ।
(दस सौ यानि एक हजार हाथी आये हैं और उतने ही घोड़े आये हैं। दो हजार बारात आई है। पर शिव तो बसहा बैल पर सवार हो घूमते हुये आ रहे हैं और उन्हों ने अष्टांग पर श्मशान की राख पोत रखी है।)     
दस सखी आगे भइली, दस सखी पाछे भइली, दस सखि गोहने लगाइ।  
परिछ्न चलेली सासू मएना देबी, सरफ छोड़ेलें फुफुकार।  
(भोजपुरी क्षेत्र में वर को स्त्रियों द्वारा परीक्षित करने की परम्परा है जिसमें मसाला पीसने वाला लोढ़ा थाली में ले कर अक्षत, हल्दी आदि में उसे बोर कर वर के चेहरे के चारो ओर घुमाया जाता है। शिव की भावी सास मैनादेवी दस दस सहेलियों के समूह के साथ उन्हें परिछ्ने गईं तो शिव के गले के सर्प की फुफकार से डर गईं।)    
कतो बिगली लोढ़ा, कतो बिगली थाली हो, पिछऊड़ भागेलि पराइ।  
अइसन बउरहवा सिवा से गउरा नाहीं बिअहब, मोर गउरा रहीहें कुँवारि।
(एक ओर लोढ़ा तो दूसरी ओर थाली फेंक पीछे हटते हुये भाग चलीं। ऐसे बौराये शिव से मैं अपनी गौरी का विवाह नहीं करूँगी। मेरी गौरी कुमारी रहेगी।)   
कलसा के ओटे भइले बोलेलि गउरा देई, सिवाजी से अरज हमार।  
छ्ने एक ए सिवाजी भेस बदलतीं हे, नइहर लोग पतियाइ।
(तब कलश की ओट ले गौरी ने शिव से प्रार्थना की। एक क्षण के लिये ही सही, अपना वेश बदल लीजिये ताकि मायके के लोग विश्वास कर लें।)  
एतना बचन जब सुनेलें महादेव, चलि भइले गंगा असनान।  
आठो अंगे भभूती उतरले महादेव, आठो अंगे चन्दन लगाइ।  
(उनकी प्रार्थना सुन महादेव ने गंगा स्नान कर अष्टांग से विभूतिभस्म उतार दिया और चन्दन लेपन किया।)
कहाँ गइली सासू, कहाँ गइली सरहज, अब रूप देखन हमार।  
अइसन सुन्दर सिवा से गउरी हम बिअहबि, मोर गउरा होइहें बियाह।
(उन्हों ने पुकार लगाई – मेरी सास और सलहज कहाँ हैं? अब आकर मेरा रूप देखें। उनका सुन्दर रूप देख मैनादेवी ने कहा कि ऐसे शिव से मैं अपनी गौरी का विवाह करूँगी। वह विवाहिता होगी।)   

लीजिये सुनिये सीधी अम्मा की सादी गायकी:
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अगले अंक में: 
घुमंतू जोगी - जइसे धधकेले हो गोपीचन्द, लोहरा घरे लोहसाई 

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

लोक : भोजपुरी -3: लोकसुर में सूर - सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।

पिछली कड़ियाँ: 
(1) साहेब राउर भेदवा 
(2) कवने ठगवा 


 महाशिवरात्रि। आकस्मिक कारण से गाँव आना पड़ा। सोचा कि अनाम गायक की खोज भी कर लूँ  और आखिरकार मिल ही गये इलाके के अनाम गायक यानि शंभू पाण्डेय
shambhooआयु - 35 वर्ष
मौजा – खुर्द मठिया
टोला – जोगी छपरा
पोस्ट – सिंगहा
जिला – कुशीनगर
मोबाइल - 0-9936203868
(बिजली रहेगी तो चार्ज होने पर ऑन वरना ....)
इनके मिलने की कहानी फिर कभी। इसलिये कि महापर्व पर उपेक्षा और भयावह ग़रीबी के बीच जीवन जीने की त्रासदी को बयाँ करना कठिन होगा।
अभी सुनिये इनके स्वर में शिव स्तुति। परम वैष्णव सूरदास द्वारा भोजपुरी में शंकर का आश्रय ले बनवारी की स्तुति! यह लोक में ही सम्भव है।
संत कवियों की लोक में पैठ इतनी व्यापक है कि बिना भाषा, क्षेत्र, बोली आदि की परवाह किये सीधे सादे शब्दों में रची गई रचनायें उनके नाम हो जाती हैं। भोजपुरी इलाके में कबीर और अवधिया तुलसी के लिये यों समर्पण तो समझ में आता है, लेकिन सूरदास? यह लोक में ही सम्भव है:
बड़ऽ लहरी ए , बड़ऽ लहरी
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।
बसहा बएलवा साथ में लेहलें, हाथ में लेहलें डमरूऽ 
बगला में मिरछाल के दाबें, जटवा में गंगा लहरीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।
 
खोआ मलाई के हाल न जानें, भँगिया पीसि के पीयेलें
भाँग पिसत में गउरा रोवें, गउरा रानी धइले बाड़ी नइहर के डगरीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।
  
कोठा मारी के हाल न जानें, खोजें टुटही पलानीऽ
हाथ कवंडल, गल में सरप, पारबती धइले बाड़ीऽ बसहा के डोरीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।
 
भस्मासुर जब किया तपेस्सा, बर दिहलें तिमुरारीऽ
जिनके  सर पे हाथ धरो तो, जरि के होय जयछारीऽ।
सिव भोला हउवें दानी, बड़ऽ लहरीऽ।
 
सिव के सर पे हाथ धरन को, मन में दुस्ट बिचारीऽ
तीन लोक में भगें महादेव, कहिं ना मिललें मुरारीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।

पारबती के रूप बना के, आ गइलें बनवारीऽ
जो तू मुझको नाच देखावो, चलबे साथ तुम्हारीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।

नाच करन के भस्मासुर जब कइ दिहलें तइयारीऽ
अपने सिर पर हाथ धरें तो, जर के होंय जयछारीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।
भस्मासुर के भस्म के कइलें, संकर के दुख टारीऽ
सूर स्याम प्रभु आस चरन के,  हरि चरन हितकारीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।
 
‘त्रिपुरारी' को मुरारी से जोड़ 'तिमुरारी' कर देना रोचक है। सुनिये इस महापर्व के अवसर पर शम्भू जी के स्वर में शंकर चरित:



अगले अंक में: सिव गउरा के बियाह  

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

उसके लिये जो कभी नहीं थी

अंग्रेजी कविताओं और गीतों में गोते लगाने और रचने का भी मुझे शौक रहा है। पाश्चात्य ध्वनियों में प्रवीणता न होने के कारण उन्हें प्रस्तुत करने से बचता रहा हूँ। कभी इनके लिये एक अंग्रेजी ब्लॉग भी बनाया था लेकिन ....
जोगी के गाये गीत के ऑडियो का परिष्कार करने के प्रयास में लगा हूँ तब तक एक अनाम काल्पनिक प्रेमिका के नाम रची इन अंग्रेजी कविताओं का आनन्द उठाइये:

(1) I seek your kiss

I seek your kiss!
flowers will die and leaves shall fall
this moment when dew is still falling
I seek your kiss
a little later
everything will turn to smoke
I shall die and fly high in the sky
never again to fall
this moment when dew is still falling
I seek your kiss. 


(2) I know

When you melt outside
There are sweating and tears.
But I know a melting inside
Latent heat of which
Burns us, then we are warm
And then
We freeze together
And time dies!

इसका हिन्दी भावानुवाद ऐसे किया:

गुप्त ऊष्मा
बाहर पिघलन – स्वेद।
भीतर पिघलन – हवन।
तपते हम - जमते हम
काल – दिवंगत!

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

लोक : भोजपुरी - 2 : कवने ठगवा - वसुन्धरा और कुमार गन्धर्व : एक गली स्मृति की

(1) लोक : भोजपुरी - 1: साहेब राउर भेदवा से आगे ... 

भोजपुरी शृंखला में आज एक प्रसिद्ध निरगुन। रचयिता एक बार पुन: कबीर और गायकद्वय कुमार गन्धर्व और वसुन्धरा। मेरा प्रयास अनजान जन द्वारा गाये और आम जन जीवन में घुले गीतों को प्रस्तुत करने का रहेगा। यू ट्यूब आदि पर जो कुछ पहले से उपलब्ध है उसे भरसक नहीं दुहराऊँगा लेकिन यह गीत मेरे लिये बहुत ही खास है।

आकाशवाणी गोरखपुर की प्रात: वन्दना में इसे पहली बार सुना था। घर में रेडियो था और हमलोग उसके वन्देमातरम से जगते थे। जाड़े के दिन थे। पिताजी की गोद में रजाई में दुबका था और तभी यह गीत बजना शुरू हुआ। दुलराते (इंटरमीडिएट में पढ़ते पुत्र को भी दुलराया जा सकता है! और वह पिता के पास सोने की ज़िद भी कर सकता है!!) पिताजी एकदम शांत हो गये और मैं भी। “कवने ठगवा नगरिया लूटल हो!” – लगा जैसे भीतर वैराग और पवित्रता की धारायें बहने लगी हों। गीत समाप्त होने पर पिताजी ने कहा – कुछ होता जिससे इसे रोज सुन पाते (हमारे घर में ग्रामोफोन या टेपरिकॉर्डर नहीं थे)। उन्हों ने उसी दिन भिनसहरी गायन की परम्परा बताई। कुछ था उस निरगुन में, उन स्वरों में, गायन में जो मनप्रस्तर पर अमिट अंकित हो गया। पता किया तो बस यही जाना कि शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में कुमार गन्धर्व बहुत बड़ा नाम है।

उसी दिन से मैं शास्त्रीय, उपशास्त्रीय और शाम को आकाशवाणी से ही प्रसारित जुगानी भाई द्वारा प्रस्तुत गाँव देहात भोजपुरी प्रोग्राम में सुनाये जाने वाले लोकगीतों में सुरों को ढूँढ़ने लगा। एक ऐसी यात्रा का प्रारम्भ हुआ जिसने मुझे लोक, शास्त्रीय, पश्चिमी, रॉक, डिस्को, ओपेरा, सूफी, कंट्री, जोगी और जाने किन किन संगीत धाराओं में अब तक नहाने का सुख दिया है जब कि संगीत का स भी मुझे नहीं आता। बाद में अम्मा से जाना कि जब मैं गर्भ में था तब गाँव की हर शाम लोकगीतों की होती थी – कीर्तन, फगुआ, चैती, निरगुन, कजरी, सोरठी, आल्हा आदि आदि और अम्मा ओसारे में बैठी सुनती रहती थीं। कुमार गन्धर्व ने सुप्त संस्कारों को जगा दिया!
.....
आकाशवाणी केन्द्रों में जाने कितने ही लोकगायकों के लोकगीत तालों में बन्द हैं। कितने ही एल पी रिकॉर्ड नष्ट हो गये/हो रहे हैं। आवश्यकता है कि उन्हें लोकहित में आम कर दिया जाय। कोई सरकारी बाबू सुन रहा है?
....
गोरखपुर इंजीनियरिंग करने गया तो खोज शुरू हुई। गोलघर में गीतांजलि म्यूजिक स्टोर को एक सिख परिवार चलाता है। स्टोर काफी समृद्ध है। मैं वहाँ पहुँचा और सहमते हुये फरमाइश कर दी। सरदार जी ने मुझे अजीब नज़रों से देखा और फिर से पूछा जैसे विश्वास न हुआ हो। मुझे आश्चर्य हुआ जब उन्हों ने एच एम वी के चार कैसेटों का डीलक्स संस्करण अलबम सामने लाकर रख दिया। तीन कैसेट तो शुद्ध शास्त्रीय थे लेकिन चौथे में त्रिवेणी नाम से ‘सूर, मीरा और कबीर’ की रचनायें संग्रहीत थीं – एक से बढ़ कर एक जैसे ‘सखी मोरि नींद नसानी हो’, ‘नीरभय नीरगुन’। दाम देखकर पाँव तले धरती खिसक गई (सम्भवत: तीन सौ रुपये, तब छ: सौ में महीने भर का खर्च चल जाता था!) । एक कैसेट लायक मुद्रा पास में थी और उसे खर्चा भी जा सकता था। मुझे पूरा विश्वास था कि एक वह कैसेट दिखाने पर पिताजी टेपरिकॉर्डर खरीद देंगे। डरते डरते सरदार जी से पूछा कि क्या वह केवल एक कैसेट देंगे? उन्हों ने उपेक्षा से मुँह बिचका कर उत्तर दिया – यही तो समस्या है। बाकी तीन कौन लेगा? वह अलबम वापस ले दूसरे ग्राहकों की ओर मुड़ गये। 
निराश मैं इन्दिरा गार्डेन, सिनेमा रोड और जाने कहाँ कहाँ घूम आया। जो चाहिये वह सामने था और मैं...!  साहस कर पुन: पहुँचा और इस बार अपने समवयस्क लड़के से जो सरदार जी का पोता था, पूछ बैठा। उसने भी अलबम सामने लाकर रख दिया। मैंने केवल एक कैसेट लेने की इच्छा जताई तो उसने भी वही उत्तर दिया। मैंने प्रस्ताव रखा – आप अभी केवल एक कैसेट दे दें। वादा करता हूँ कि एक एक कर बाकी तीनों भी ले जाऊँगा। जाने समआयु का असर था या मेरी कातरता का, लड़के ने यह कहते हुये कि किनारे रख रहा हूँ, जल्दी ले जाना और दुकान पर सिर्फ मुझसे माँगना; वह कैसेट मुझे दे दिया। अगले रविवार कैसेट पिताजी के सामने था और उसके अगले रविवार हमारे घर में पहला कैसेट रिकॉर्डर आया जिस पर बाद में मैंने घुमंतू जोगी का गाया एक गीत बैटरी लगा कर रिकॉर्ड किया। 

अगले दो महीनों में मैंने बाकी तीन कैसेट भी खरीद लिये और आज तक उस निर्णय पर नाज करता हूँ। उस लड़के से चलती फिरती मित्रता हो गई, इतनी कि बैजू बावरा के एक गीत में मामूली सी गड़बड़ी की मेरी शिकायत पर उसने पूरा लॉट ही वापस कर दिया। कॉलेज से निकल जाने के कई वर्षों बाद एक दिन गोरखपुर गया तो सहज उत्सुकता से लड़के से मिलने (हमदोनों एक दूसरे का नाम तक नहीं जानते थे) गया। डबडबायी आँखों से सरदार जी ने सड़क दुर्घटना में उसकी मृत्यु की बात बताई ... लौट कर बहुत देर तक मैं चुप इन्दिरा गार्डेन में बैठा रहा। उसके बाद दुबारा वहाँ जाने का साहस आज तक नहीं कर पाया ....
....
कबीर की बानी का क्षेत्र पश्चिम में दूर पंजाब तक है। गुरुग्रंथसाहब में भी उनकी बानी दर्ज है। दक्षिणवासी कुमार—वसुन्धरा के स्वरों में अंत में ‘-ल हो’, ‘लयो’ और 'लओ' तीनों ध्वनित हैं लेकिन वह भोजपुरी ‘-ल हो’ ही है। वैसे भी कबीर को क्या बाँधना? एक पंक्ति में कहते हैं ‘आये जमराज पलंग चढ़ि बैठा’(व्याकरण की दृष्टि से देखें तो बिगड़ी पश्चिमी भाषा) और तुरंत दूसरी पंक्ति में कहते हैं ‘नयनन अँसुआ टूटल हो’ – ‘नयनन अँसुआ’ पर पुराने हिन्दुस्तानी का प्रभाव है तो ‘–ल’ से अंत होने वाली क्रिया विशुद्ध भोजपुरी। ‘चार जने मिलि’ भोजपुरी है तो ‘खाट उठाइन’ अवधी(?)। ‘चहुँदिसि’ ब्रजावधी है तो ‘धुमधुम’ ध्वनि भोजपुरी की। भाखा बहता नीर और सधुक्कड़ी के पर्याय कबीर किसी व्याकरण में नहीं बँधते लेकिन लोक में ‘कहत कबीर सुनो भइ साधो’ की टेक वाली रचनायें भोजपुरी की हैं जिनमें सधुक्कड़ी की चलती भाखा घुलमिल गई है। फक्कड़ी घुमंतू जोगियों के स्वरों ने उन्हें संस्कारित किया है।
  
इस निरगुन को कुमार गन्धर्व ने अपनी धर्मपत्नी वसुन्धरा के साथ गाया है। कुमार गन्धर्व उन गायकों में थे जिन्हों ने शास्त्रीय संगीत का उत्स लोक से ही माना और शास्त्रीयता को लोक के ऊपर कभी चढ़ने नहीं दिया। लोक प्रभाव और मस्त उन्मुक्तता के कारण उनके गायन की बहुत आलोचनायें भी हुईं लेकिन कुमार तो कुमार! हम इसक मस्ताना, हमको दुनियादारी क्या! एक मस्ताने कबीर और दूजे ‘नीऽरभय नीऽरगुन’ कुमार। सुनिये ये दोनों जब मिलते हैं तो कैसा दिव्य सर्जित होता है: 
कवने ठगवा नगरिया लूटल हो
चन्दन काठ के बनल खटोला, तापर दुलहिन सूतल हो।
उठ्ठो सखी री माँग सँवारो, दुलहा मोसे रूठल हो
आये जमराज पलंग चढ़ि बैठा, नयनन अँसुआ टूटल हो।
चार जने मिलि खाट उठाइन, चहुँ दिसि धुमधुम ऊठल हो
कहत कबीरा सुनो भइ साधो, जग से नाता छूटल हो।
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अगले अंक में : घुमंतू जोगी -जइसे धधकेले हो गोपीचन्द! लोहरा घरे लोहसाई

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

लोक: भोजपुरी-1: साहेब राउर भेदवा

भोजपुरी लोक की बात आते ही आजकल कतिपय जन मुँह बिचका देते हैं। उनके लिये भोजपुरी माने अश्लीलता होती है। भोजपुरी की वर्तमान गीत गवनई पर बहुत बहसगालियाँ हो चुकी हैं। नेट पर कोस भर भर उपलब्ध हैं। मैं भोजपुरी क्षेत्र का हूँ जो मेरे रग रग में बसा है। अपनी संस्कृति और परम्परा को बहुत पास से देखा, सुना है। भोजपुरी माटी में जन्म हुआ, उसी में मिल जाऊँगा। जब चन्द सिक्कों के लालची कथित कलाकारों के कुकर्मों की धुन्ध फैली हो तो भ्रम स्वाभाविक है लेकिन मुझे कष्ट होता है। बहुत दिनों से सोचे जा रहा था कि उस समृद्ध पुरातन को सामने लाने का छोटा ही सही, प्रयास करूँ लेकिन टलता रहा।
यह धरती कबीर और रैदास की धरती है। भिखारी ठाकुर की धरती है। काव्य हो, संगीत हो, रस हों, वैविध्य हो – क्या नहीं है यहाँ? बस सामने लाने की आवश्यकता है। मैंने घुमंतू जोगियों को गाते देखा सुना है – किशोरावस्था में ही जोगी बन गोपीचन्द माँ से भीख माँगने आये हैं। माँ गुदड़ी देते रो पड़ती है और उसके दुख में जैसे समूची सृष्टि ही जार जार हो उठती है:
धइली हो गुदरिया ए माईऽ, बाबू के समझाई...
गाँव के अगिया सुन हो बेटा, गाँव के लोग बुझाई,
कोखिया के अगिनिया हो बेटाऽ दुनिया में कोइ ना मेटाईऽ। 
 
जोगी तपस्या की ऊँचाई को छूते प्रेम की नासमझी को भी समझाता है:
आगि के महलिया तोहरी, कइसे आईं हो जोगीऽ
लागि जइहें आगि देहियाँ, जरि जाई सारी सगरीऽ। 
 
दूर बिहार से कोई घुमंतू ठाकुर आता है और सबको रुला जाता है:
गवना कराइ सइयाँ घरे बइठवलें हो, अपने बसेलें परदेस रे बिदेसियाऽ
 
नभ से भी ऊपर उठान लेते मुहम्मद खलील वय:सन्धि की रेख को झँझोर जाते हैं:
बन बन ढूँढली, दर दर ढूँढली, ढूँढली नदी के तीरे
साँझ के ढूँढली राति के ढूँढली, ढूँढली होत फजीरे।
... सगरी उमिरिया धकनक जियरा कबले तोहके पाईं ...
कह नहीं सकता कि उस आवाज़ ने मुझे क्या से क्या कर दिया!... 
 
... आज उस सनातन पुरातन परम्परा के स्वर सुनाना चाहता हूँ।
कवितायें और कवि भी... पर शृंखला प्रस्तुत करना चाहता था लेकिन उसकी पहुँच आलसी जितनी नहीं है, इसलिये यहाँ। जनवरी में अनुज गाँव गया तो इलाके से मेरे लिये कुछ लेकर आया। एक देहाती कलाकार के स्वर में निरगुन। नहीं पता कि इसे कबीर ने रचा था या साधो से कहने सुनने की परम्परा को आदर देते गायक ने अपने गीत को उनके नाम कर दिया लेकिन है अद्भुत!
गायक का परिचय है:
नाम – अनाम
आयु – 45 के आसपास
ग्राम – सिंगहा
जिला – कुशीनगर, उत्तरप्रदेश
व्यवसाय – यायावरी
एक बेटा है जो छठी में पढ़ता है। एक बार आकाशवाणी गोरखपुर में भी गाया लेकिन वादे के बावज़ूद मेहनताने का एक पैसा तक नहीं मिला। गायक दुबारा ‘सीकरी’ नहीं गया। काठमांडू पशुपतिनाथ के दरबार में भी यह स्वर गूँज चुका है लेकिन आज उपेक्षित अनाम अज्ञात है।
वादा है कि इस बार गाँव गया तो इनसे अवश्य मिलूँगा और बहुत कुछ ले कर आऊँगा। मुझे सुनना है कि भर भर नयनों में लहरें कैसे उठती हैं:
बोले पिजड़ा में मयनवा, बड़ऽ लहरी
 रोइहें भरि भरि ऊ नयनवा, बड़ऽ लहरी। 
गीत कुछ इस तरह है:
जाने ना कोई कोई ए, साहेब राउर भेदवा हो जाने न कोई कोई।
ये देहिया ले बैल बाध बा निरमल खेतिय होई
राम हि नाम के हरवा जुअठवा, रनल बा मोतिया न बोई।
पानिय ले ल साबुन ले ल, मलि मलि काया धोई
अन्दर अघि के दाग न छूटे, निरमल कहवाँ से होई।
तोया क ल ए माया से, तोर मोर भेंट न होई
जाके प्राण परल बा मटिया, ना जाने मटिया के कवन गति होई।
साधुअ मुनिउँ अ सन्यासी, शेष नाग प धोई
जिन जिन जनम लिये धरती पर, अमर भइल नहिं कोई।
कहे कबीर सुनो भइ साधो, चेत करो मन रोई
अइसन अवसर फिर ना अइहें, मानुस तनवा ए दुरलभ होई।
 
जाने कौन साहेब है यह? और यह भेदिया कौन है? अब सुनिये मोबाइल की रिकॉर्डिंग। बढ़िया प्रभाव के लिये हेडफोन लगा कर सुनिये और समझिये कि लहरी भोजपुरी क्या होती है!यह स्वर प्रशिक्षित स्वर नहीं, सहजिया स्वर है जिसमें खेतिहर लोक का बैरागी रस है: