शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

मैं मैं ही हूँ



जानते हो?
मेरे पाँव तले अनन्त काल शेष रह जाता है।
जानते हो?
वह नाद जिस पर नृत्य कर रही निहारिकायें, नक्षत्र, विवर, सूर्य, ग्रह, चन्द्र,
जिसकी प्रतिध्वनि ही काल की सीमा है,
वह उस कइन की पोर में एक साँस मात्र है जिससे,
तुम्हारा यह कान्ह उस गइया को हाँकता है जिसे तुम भूमा कहते हो!
जानते हो?है वसुन्धरा का वसु मेरी छिंगुरी पर टँगे भूधर में,
जिसे निज कर से बरसाती लक्ष्मी ने,
बना रखा है सृष्टि को निज भ्रूविलास का विषय।
जानते हो?
मैं अनन्तशायी हूँ।
अनन्त कुछ नहीं, यश:दा यशोदा के स्तनों से झरते
क्षीरसर का पान करते
मेरे मन का है ठाँव मात्र।
मैं मैं ही हूँ!

रविवार, 4 अगस्त 2019

Met Museum New York Vishnu-s न्यूयॉर्क संग्रहालय के दो विष्णु

(१) केशव 
केशव Keshava
विष्णु के विविध रूप नाम चार हाथों में चार अस्त्रों/उपादानों के क्रम से आते हैं। यह केशव रूप है। न्यूयॉर्क संग्रहालय The Met, 1000 Fifth Avenue, New York, NY 10028 में स्थित इस प्रतिमा का विवरण इस प्रकार है :
Artist:Dasoja of Balligrama
Period:Hoysala period
Date:first quarter of the 12th century
Culture:India (Karnataka, probably Belur)
Medium:Stone
Dimensions:H. 56 1/2 in. (143.5 cm); W. 28 in. (71.1 cm); D. 9 1/4 in. (23.5 cm)
Classification:Sculpture
Credit Line:Rogers Fund, 1918
Accession Number:18.41
दशावतार विकास के अनेक चरण रहे हैं तथा दक्षिण भारत का इसमें योगदान अधिक रहा। साम्प्रदायिक आग्रह, मतभेद, श्रेष्ठता की भावना आदि के कारण दाशरथि राम के पश्चात तथा वराह के पूर्व के क्रम एवं उपस्थिति, दोनों में विविधता रही। आज जो मान्यता है उसमें वराह, नृसिंह, वामन, दाशरथि राम एवं कल्कि को ले कर कभी समस्या नहीं रही।
मत्स्य, कूर्म, जामदग्न्य राम, संकर्षण राम, बुद्ध; इन पाँच को लेकर समस्यायें हैं जो कृष्ण को मिला कर जटिल हो जाती हैं। 
१३०० वि. का यह केशव विष्णु शिल्प होयसल राजाओंं के समय का है। यह बल्लिग्राम के दसोजा नामक शिल्पकार द्वारा निर्मित है। 
ऊपर पाँच पाँच कर दशावतार दिये गये हैं। दाशरथि राम के पश्चात हलधर संकर्षण राम, तब परशुधारी जामदग्न्य राम, तब बुद्ध एवं सबसे अंत में कल्कि हैं। श्रीकृष्ण को सर्वोच्च मान कर केशव में ही समाहित माना गया है अर्थात यह एक विशेष वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बंधित कृति है। उल्लेखनीय है कि राम जामदग्न्य संकर्षण राम के पश्चात दर्शाये गये हैं तथा बुद्ध दशावतार में हैं।

(२) महाविष्णु 
महाविष्‍णु Mahavishnu
महाविष्णु। तोमर काल। वर्तमान के पञ्जाब, हरयाणा एवं दिल्ली क्षेत्र। प्रतिमा अब न्यूयॉर्क संग्रहालय में, विवरण इस प्रकार है : 
Date:10th–11th century 
Culture:India (Punjab)
Medium:Sandstone 
Dimensions:H. 43 1/2 in. (110.5 cm); W. 25 5/8 in. (65.1 cm); D. 10 in. (25.4 cm) 
Classification:Sculpture 
Credit Line:Rogers Fund, 1968
Accession Number:68.46
विचार करें कि प्रतिमा किसी मन्दिर में ही रही होगी। कहाँ गया वह मन्दिर? उत्तर भारत के प्राय: समस्त बिखरे महालय मुसलमानों ने नष्ट कर दिये, उन पर मजार, मकबरा, मस्जिद बना दिये। परमर्दिदेव द्वारा निर्मित एवं जयपुर शासकों द्वारा परिवर्द्धित वह मन्दिर एक उदाहरण मात्र है जिसे आज ताजमहल कहते हैं।लोद़ियों से ले कर हुमायूँ के मकबरे तक, किसी की भी खुदाई हो, मन्दिर अवशेष मिलेंगे। भूचुम्बकीय सर्वेक्षण से भी जाना जा सकता है।
सभी बड़े मन्दिर शिक्षा के केन्द्र भी हुआ करते थे। अग्रहार या ग्रामदेय व्यवस्था के कारण शिक्षक वृत्ति हेतु शासन पर निर्भर नहीं रहता था तथा धर्मानुशासन उसे नियन्त्रण में रखता था, न कि आज के सब धान २२ पसेरी जैसा दण्डविधान।
सब समाप्त हो गया। आज इन क्षेत्रों की अधिकांश जनसंख्या अर्द्ध व्यञ्जन का उच्चारण तक नहीं कर पाती!
समझें कि शिक्षा एवं संस्कृति की लड़ी जब विछिन्न होती है तो युगीन दुर्घटनायें होती हैं। पीढ़ियाँ भ्रष्ट हो अपनी ही शत्रु हो जाती हैं।
कश्मीरी पत्थरबाजों के पुरखे सिकन्दर बुतशिकन के पूर्व वाजश्रवाओं के तुल्य होते थे।
शारदा देवी को आप वीणावादिनी तक सीमित जानते हैं। वृत्रहन्ता वाजिनी सरस्वती का वास्तविक रूप कश्मीर में सुरक्षित था।
... सब नष्ट हो गया। 

रविवार, 21 जुलाई 2019

देवता : वीर भोग्या वसुंंधरा Prime Numbers

चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुँचे एवं सहस्राब्दियों में पसरे सनातन वाङ्मय का देवता वैविध्य भौतिक एवं आध्यात्मिक, दोनों स्तरों पर समेकित चिंतन एवं अभिव्यक्ति का द्योतक है।
द्यौ, भू एवं आप: (जल), विराट परिवेश के इन तीन स्पष्ट क्षेत्रों में ग्यारह ग्यारह देवताओं की उद्भावना के साथ कुल ३३ देवता बताये गये - त्रयादेवाऽएकादश त्रयस्त्रिंसासुराधस ।
पाँच तत्त्वों का अभिज्ञान रहा ही। ऋग्वेद से ले कर उपनिषदों तक संख्याओं के बारे में बहुत कुछ है ही, उनके विविध विभाजनों को ले कर भी बहुत कुछ है। प्रतीत होता है कि अविभाज्यता उनकी चेतना में रही होगी। एक ब्रह्म, दो पुरुष प्रकृति, तीन लोक, पाँच तत्व (पञ्चजन भी)। यहाँ तक आते आते इन अभाज्य संख्याओं (Prime Numbers) का योग ग्यारह हो जाता है। पाँच एवं ग्यारह के बीच सप्तमात्रिकायें ही अभाज्य बचती हैं, जिनका अपना तन्‍त्रमार्ग है।
३३ देवताओं को आगे पाँच तत्त्वों के समूह में बाँटे गये द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, अष्ट वसु एवं भूत भूतेतर को दर्शाते प्रजापति-इन्‍द्र या दो अश्विनीकुमारों का युग्म।
आदित्य पृथ्वी पर जीवन के कारक हैं, बारह महीनों में सूर्य के विविध रूप। रुद्र सम्पूर्ण भूतों का समन्‍वित रूप है, मानव सहित सभी पशु कहे गये हैं जिनकी बलि सृष्टि का विराट यज्ञपुरुष लेता रहता है, एकीकृत रुद्र पशुपति है। याज्ञिक बलि की इस प्रतीकात्मकता को न समझ पाने के कारण या नितान्‍त स्थूल शब्दार्थ लेने के कारण बहुत से अनर्थ हुये। आठ वसु धरा की सम्पदायें हैं। ज्येष्ठराजा इन्‍द्र की वासव संज्ञा हो या वीर राजन्यों हेतु कहा गया वीर भोग्या वसुंंधरा ; वसुओं का रूप स्पष्ट होता है।
छंदों को देवताओं का छाजन कहा गया जिनमें 'मृत्यु के भय' से देवता शरण लेते हैं। ध्यान दें तो १२, ११ एवं ८ की संख्यायें क्रमश: जगती, त्रिष्टुप एवं गायत्री छंदों से जुड़ती हैं जो क्रमश: (उत्पादक) वैश्य, (रक्षक) क्षत्रिय एवं (मन्त्री) ब्राह्मण छन्‍द कहे गये हैं। 
इन्‍हें घेरे दो सीमान्‍त प्रतीक, सत एवं असत, ऋग्वेद के प्रसिद्ध नासदीय सूक्त से समझे जा सकते हैं। अश्विनों में नासत्य जहाँ दयालु एवं पोषक है, वहीं दस्र भयङ्कर एवं संहारक। प्रजापति एवं इन्‍द्र को भी ऐसे ही जाना जा सकता है। पूर्वी बौद्ध देशों की यिन-यान संकल्पना हो या ऊपर बताये पुरुष प्रकृति, चक्रीय क्रम में ऐसे समझे जाने चाहिये।
अंत में समस्त देवताओं के एक रूप विश्वेदेवा देवता को समर्पित एक मन्त्र का अंश देखें, वीरभोग्या वसुन्‍धरा का मर्म अधिक प्रतिभाषित हो जायेगा :
आहुतयो मे कामान्त्समर्धयन्‍तु भू: स्वाहा। 
आहुतियाँ मेरी समस्त कामनाओं को समृद्ध करें। भू मेरे लिये सु-वह हो। 
ःःःःःःःःःःःःःःःःः
(उद्धरण अंश शुक्ल यजुर्वेद से हैं।) 

(३३ करोड़ देवताओं का सम्बन्ध संवत्सर गणना के क्रमश: सूक्ष्म एवं परिशुद्ध होते जाने से है। उस पर कभी लिखेंगे।) 
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रविवार, 14 जुलाई 2019

गुरु आधारित संवत्सर चक्र एवं पञ्चाङ्ग संशोधन की आवश्यकता - दैत्यगुरु शुक्र, देवगुरु बृहस्पति एवं शनि


गुरुपत्नी राजपत्नी मित्रपत्नी तथैव च ।
पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैताः मातरः स्मृताः ॥  
(गुरु, राजा, मित्र, पत्नी की मातायें एवं अपनी माता, इन पाँच को माता माना जाता है।) 
... 
सुदर्शन एवं दिव्यरूपधारी चन्द्र ने अपने गुरु बृहस्पति की पत्नी तारा को लुभा लिया। वह आश्रम तज अपने प्रेमी के घर आ गई। बड़ी पञ्चायतों एवं देवासुर सङ्ग्राम के पश्चात चंद्र ने उसे लौटाया तो वह गर्भवती पाई गई। पूछने पर उसने बताया कि भावी संतान के पिता बृहस्पति नहीं, चंद्र हैं। उसके गर्भ से बुध का जन्म हुआ। बुध से ही आगे चन्द्रवंश चला।
(इस कथा को अभिधात्मक सत्य मानने वाले आगे न पढ़ें क्योंकि उनका मन नहीं रमेगा, व्यर्थ के प्रश्न उठेंगे। )
...
बृहस्पति का वर्ष पृथ्वी के लगभग बारह वर्षों के तुल्य होता है अर्थात वह किसी नक्षत्र पर लगभग 27/12 = सवा दो वर्ष रहते हैं। चंद्र के दैनिक नक्षत्र परिवर्तन की दृष्टि से या सूर्य के किसी नक्षत्र पर मात्र सवा दो महीने रहने की दृष्टि से यह लम्बी अवधि है।
कथा किसी ऐसे नाक्षत्रिक कूट की है जब बृहस्पति किसी नक्षत्र तारा के साथ पतिभाव में थे तथा अपनी दैनिक गति में चंद्र वहाँ पहुँचा। यह वह समय था जब सामान्यतया सूर्य से बहुत निकट होने के कारण आँखों से ओझल बुध का अभिज्ञान पूर्ण हुआ था। उस समय ही धरा पर सूर्यवंशियों अर्थात पूर्णत: सूर्यकेंद्रित वर्ष ज्योतिष अनुसार चलने वाले राजाओं के साथ साथ सूर्य एवं चंद्रसमन्वित वर्ष ज्योतिष मानने वाले चंद्रवंशियों का भी अभ्युदय हुआ। विमर्शों के लम्बे एवं अनेक सत्र चले होंगे, मतभेद आदि भी हुये होंगे।
तारा कौन हो सकती है? अनुमान लगायें?
पुष्य नक्षत्र के देवता गुरु बृहस्पति हैं तथा स्वामी शनि। बृहस्पति देवों की प्रज्ञा को दर्शाते हैं तो शनि स्थिरता का। राजन्यों में पुष्य की प्रतिष्ठा थी तथा महत्त्वपूर्ण अभियान पुष्य नक्षत्र देख कर किये जाते थे। रामायण एवं महाभारत में भी इसके संदर्भ हैं।
एक अन्य नक्षत्र ज्येष्ठा ध्यान में आता है जिसक देवता देवराज इन्‍द्र हैं तथा स्वामी बुध। मूल एवं ज्येष्ठा, इन दो नामों से परोक्ष रूप से किसी बहुत ही पुरातन काल में नक्षत्रमाला के आरम्भ के संकेत मिलते हैं। 'तारा' का अभिज्ञान स्वतन्‍त्र अध्ययन की माँग करता है किन्‍तु मेरा अनुमान पुष्य या ज्येष्ठा में से किसी के होने का है। 
कहा गया है कि चंद्र ने लालन पालन हेतु बुध को रोहिणी एवं कृत्तिका को सौंप दिया।
महाभारत युद्ध के समय वसंतविषुव रोहिणी पर था।
यदि आप नक्षत्रों के प्रारम्भ परिवर्तन को देखेंगे तो पायेंगे कि 'प्रागैतिहासिक' आरम्भ नक्षत्रों मूल एवं ज्येष्ठा के पश्चात पहला वैदिक प्रमाण इस उक्ति में मिलता है कि वत्सर आरम्भ श्वान नक्षत्र से है। आरम्भ नक्षत्र का अगला परोक्ष उल्लेख मिलता है मृगशिरा में। यह भी सम्भव है कि तब श्वान एवं मृग तक एक बड़ा नक्षत्रक्षेत्र माना जाता रहा हो।
मृगशिरा के पश्चात स्पष्ट प्रमाण रोहिणी छोड़ कृत्तिका के मिलने लगते हैं। उससे आगे भरणी तज आज कल अश्विनी से आरम्भ है। बीच बीच के छोड़े नक्षत्र सङ्क्रमण काल को दर्शाते हैं। वेदविभाजन एवं पुराण 'पुनर्रचना' वाला महाभारत काल सङ्क्रमण काल तो था ही।
बुध को रोहिणी एवं कृत्तिका को सौंपा जाना भी एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है। धरा एवं आकाश को मिला कर कहने की पौराणिक प्रवृत्ति के कारण ऐसी कूट कथायें प्रचलित हुईं।
शुक्र ग्रह एवं पृथ्वी के वर्षों में लगभग स्वर्णिम अनुपात का सम्बंध है।
कथित स्वर्णिम अनुपात होता है, φ = (√5+1)/2 ≈ 1.6180.
π तो जानते ही हैं ≈ 3.1416।
इन दोनों का लगभग सम्बन्ध है,
π ≈ 6/5×φ²
...
स्वर्णिम अनुपात की व्युत्पत्ति इससे है कि ऐसी संख्या जो अपने विलोम में एक जोड़ने पर पुन: अपना रूप प्राप्त कर ले :(1/φ)+1=φ
..
स्वर्णिम अनुपात में आकार आँखों को तुलनात्मक रूप से अधिक भाते हैं किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल उसी अनुपात में होने पर ही आकार अच्छे लगें।
इस अनुपात को ले कर आधुनिक काल में बहुत टण्टा किया जाता रहा है, खींच तान, मिथ, असत्य, छल आदि सब। परन्तु इस अनुपात का प्रयोग कर वस्तुयें सुगढ़ तो बनाई ही जा सकती हैं यथा यदि घर बना रहे हों तो शयन कक्ष की लम्बाई एवं चौड़ाई का अनुपात 1.6 के निकट रखें।
जितने समय में पृथ्वी सूर्य की आठ परिक्रमायें करती है, उतने में शुक्र तेरह कर लेता है। पृथ्वी एवं सूर्य के मध्य केवल दो ग्रह हैं - बुध एवं शुक्र। बुध सूर्य के अति निकट होने के कारण प्रेक्षण दुर्लभ है जब कि प्रात: (भुरकुवा, भोर का तारा) एवं साँझ के 'तारे' के रूप में दैदीप्यमान सुंदर शुक्र सबका परिचित है।
पृथ्वी से देखने पर शुक्र एक ऐसा चक्र दर्शाता है जिससे रहस्यमय पञ्चकोण बनता है। इस पञ्चकोण की भुजायें भी एक दूसरे को स्वर्णिम अनुपात में बाँटती हैं।
शुक्र, स्वर्णिम अनुपात एवं इनके अनुसार ज्योतिषचक्र पर दृष्टि  रखने दितिपुत्र दैत्य (कालांतर के असुर) थे। वास्तु एवं शिल्प आदि सुंदर रचनाओं में ये निष्णात होते थे। इनकी संततियाँ इसाइयत द्वारा लुप्त कर दी गयी पगान जनसंख्या में थीं।
इसके विपरीत अपेक्षतया स्थिर बृहस्पति हैं, देवगुरु। इनके अनुसार संवत्सर पर दृष्टि रखने वाले देव। बृहस्पति की सूर्यपरिक्रमा अवधि के बारह पृथ्वीवर्ष देव सभ्यता में बड़े महत्त्वपूर्ण रहे। बारह वर्ष तपस्या, बारह वर्ष पश्चात संन्यासी का अपने जन्मस्थान पर एक बार लौटना, बारह वर्ष के प्रयाण अभियान आदि आज भी जाने जाते हैं।
शनै: चर शनैश्चर सूर्य की परिक्रमा लगभग तीस पृथ्वी वर्ष में करता है। इन दोनों का ल.स. है साठ अर्थात यदि आज शनि एवं गुरु किसी नक्षत्र पर एक साथ हैं तो साठ वर्षों पश्चात पुन: उसी पर एक साथ होंगे या आज उनकी जो सापेक्ष स्थिति है, साठ वर्ष पश्चात यथावत होगी।
यह बड़ा चक्र गणना संशोधन एवं प्रेक्षण की दृष्टि से बड़ा उपयोगी है। इसमें सौर अधिवर्ष संशोधन के पंद्रह चक्र पूरे हो जाते हैं तथा चंद्र मेटॉनिक उन्नीस वर्षीय चक्र के तीन, यद्यपि दो से तीन वर्ष शेष रहते हैं किंतु उसे अन्य प्रकार से समायोजित किया जा सकता है।
कलियुग सोया है, द्वापर उठ बैठा, त्रेता खड़ा हुआ एवं कृत चल पड़ा!
प्रत्येक ४ वर्ष पर अधिवर्ष वैदिक वाङ्मय में भी है। 365 दिन तथा एक बटे चार और अर्थात 6 घण्टे।
कलि आरम्भ सूर्यास्त से - साँझ से 6 घण्टे आगे आधी रात तक शयन।
वर्ष बीतने के पश्चात आगे 6 घण्टे और अधिक, द्वापर, अर्द्धरात्रि से प्रात:काल तक दूसरा पाद, उठ बैठा। दूसरे के पश्चात तीसरा वर्ष त्रेता, 6 घण्टे आगे बढ़ा, उठ खड़ा हुआ प्रातःकाल से मध्याह्न तक।
तीसरा वर्ष बीता चौथा आया, मध्याह्न पश्चात चलता रहा साँझ तक, चक्रपूर्ति कर ली गयी - कृतयुग।
विष्णु के त्रिविक्रम को समझें कि तीन चरण पश्चात बलि रूपी सिर से चक्र पूरा हुआ।
प्रत्येक 19 वर्ष पर सौर दिनांक एवं चन्द्र तिथि का सम्पात अपने को दुहराता है।
कलि-द्वापर-त्रेता-कृत; प्रत्येक 4 वर्ष पर सौर अधिवर्ष होता है।
19×4=76, 76 वर्षों पर दुहराव और सटीक होना चाहिये। इस चक्र के पूर्ण होने के अगले 19 वर्ष पश्चात 95 वर्षों का एक वैदिक चक्र पूरा होता है। कहाँ लिखा यह?
76 का एक गुण देखें।  76ⁿ ≈ φ, जहाँ n = 1/9

साठ वर्षों का आज भी प्रचलित बृहद संवत्सर चक्र इस प्रकार गुरु प्रेरित है, बारह पचे साठ! अनेक जटिल समांतर परम्पराओं के कारण साठ वर्षीय संवत्सर चक्र का आरम्भ भी अब जटिल हो चला है, दक्षिण एवं उत्तर में अंतर हैं तथा चक्र आरम्भ का भौतिक प्रेक्षण रूप से गुरु-शनि वास्तविक युति का उन आरम्भों से मेल नहीं लगता। क्यों न नये से पुनरारम्भ करें?
वैदिक वाङ्मय में इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि एक साथ दो संवत्सर पद्धतियाँ चलती थीं। जन सामान्य हेतु सूर्य का उत्तरायण होना नववर्ष आरम्भ होता तथा ज्योतिर्विदों हेतु वसन्तविषुव का दिन।
आगामी 21 दिसम्बर 2020 ग्रे. को जब कि मूल नक्षत्र विराजमान सूर्य वार्षिक उत्तरायण यात्रा आरम्भ करेंगे, गुरु एवं शनि साठ वर्षों के पश्चात एक साथ उत्तराषाढ़ नक्षत्र पर होंगे तथा दोनों छायाग्रह क्रमश: मृगशिरा एवं ज्येष्ठा पर, क्यों न पञ्चाङ्ग संशोधन सहित नये संवत्सर चक्र की आधारशिला रखी जाय!

... 
(चित्र में  गत तेरह जुलाई की रात बृहस्पति एवं चन्द्र पास पास! निकट ही जो वृश्चिक राशि का तारा दिखता है वह है - Antares (α scorpii), वैदिक ज्येष्ठराजा इन्द्र इसके देवता हैं।)

गुरुवार, 20 जून 2019

नववर्ष के पूर्व दिवस शुभकामनायें

कल २१ जून को ग्रीष्म अयनांत है अर्थात शीत अयनांत के दिन से उत्तरायण होते सूर्य कल अपनी उत्तरी यात्रा के चरम पर होंगे। उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे बड़ी अवधि का दिन होगा। इस दिन भारत के मध्य से जाती कर्क रेखा पर सूर्य लम्बवत होंगे। प्रेक्षण आधारित ज्योतिष हेतु ये समय एवं स्थान बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। आश्चर्य नहीं कि पुरातन काल से ही उज्जैन, ऐरण आदि स्थानों पर प्रेक्षण मंदिर एवं निर्माण रहे जिन्हें मुसलमान आक्रमणकारियों ने ध्वस्त कर दिया।
कर्क रेखा का यह नाम ही क्यों है? जिस समय इस रेखा का नामकरण किया गया, उस समय आज के दिन सूर्य कर्क राशि में होते थे। आज पश्चाभिगन के कारण इस समय वृष राशि में होते हैं एवं अगले ही दिन मिथुन राशि में प्रवेश कर जाते हैं। मैं पश्चिमी फलित ज्योतिष वाले राशि की बात नहीं कर रहा, आकाश में प्रेक्षणीय तारकसमूहों की बात कर रहा हूँ जो तुलनात्मक रूप से स्थिर माने जा सकते हैं। अर्थात किसी निश्चित दिनांक को सूर्य की स्थिर राशियों के सापेक्ष स्थिति कालक्रम में परिवर्तित होती रहती है। इस प्रकार किसी निश्चित अयन सापेक्ष (सायण) दिनांक को सूर्य की विविध राशियों में 'गति' का आवर्ती काल आज कल २५७७२ वर्ष पाया गया है। किसी निश्चित दिन को सूर्य जिस स्थिति में होता है उसी पर पुन: पहुँचने में इतने वर्ष लगते हैं अर्थात एक राशि से दूसरी राशि तक जाने में २५७७२/१२ = २१४७ वर्ष लगते हैं। कर्क से मिथुन तक एक राशि का अंतर है अर्थात कर्क रेखा का यह नाम आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व रखा गया था।
भारत में प्रेक्षण ज्योतिष का इतिहास बहुत पुराना है तथा ऋग्वेद में आज से नौ हजार वर्ष पूर्व के प्रेक्षण भी मिलते हैं। ऋग्वेद का जो पाठ आज मिलता है, वह इतना प्राचीन होते हुये भी अपना प्राचीनतम रूप नहीं लिये हुये है। बीच के मण्डलों में उस प्राचीनता के संकेत मिलते हैं तथा अन्य मण्डलों में 'पूर्वे', 'पूर्व' आदि शब्द उस प्राचीनता के संकेतक हैं जिसके बारे में पुराण कहते हैं कि वेद लुप्त हुये, भगवान ने उद्धार किया। अस्तु।
एक बात स्पष्ट हो जानी चाहिये कि जहाँ भी कर्क रेखा नाम मिले, वह अंश दो हजार वर्ष से पुराना नहीं हो सकता। ऐसे तथ्यों को काल निर्धारण में आंतरिक प्रमाण कहा जाता है।
प्राचीनतम उपलब्ध ज्योतिष ग्रंथ वेदांग ज्योतिष के आज से लगभग तीन हजार तीन सौ वर्ष पुराने होने के आंतरिक प्रमाण हैं।
ग्रीष्म अयनांत से शीत अयनांत तक छ: महीने की अवधि होती है। शीत अयनांत वही है जिसे आज उत्तरायण संक्रांति से मनाया जाता है। किसी समय शीत अयनांत एवं मकर संक्रांति सम्पाती थे, आज नहीं हैं।
वेदांग से सैद्धांतिक ज्योतिष पर आते समय शीत अयनांत का वैदिक महाव्रत संक्रांति संक्रमित हो गया। शीत अयनांत जहाँ ज्योतिष विद्वानों हेतु नववर्ष होता, वहीं वसंत विषुव जब कि वसंत ऋतु में सम पर दिन रात समान अवधि के होते, ऋतु सुखद होती, जनसामान्य का नववर्ष होता। चंद्रआधारित मास नाम से समन्वय होने पर इसे वर्ष प्रतिपदा, गुड़ी पड़वा, युगादि नामों से मनाया जाता है।
शीत अयनांत से कल के ग्रीष्म अयनांत तक की अवधि गवां अयन कहलाती थी। अयन का अर्थ गति है, यथा रामायण राम की अयोध्या से लंका एवं लंका से पुन: अयोध्या तक की गति है। शीत अयनांत से छ: महीने की दूरतम झुकाव तक अर्थात पुनरावर्तन के बिंदु ग्रीष्म अयनान्त को विषुवंत कहा जाता था। विषुव एवं विषुवंत में अंतर है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या दो विषुव एवं दो अयनांत, इन चारो बिंदुओं से नववर्ष आरम्भ होते थे? उत्तर सकारात्मक है। ग्रीष्म अयनांत से ही वर्षा का आरम्भ ब्रह्मावर्त में होता। अत: एक वर्ष वर्षा से भी आरम्भ होता था। वर्ष नाम से वर्षा को मिला कर देखें। उस प्राचीनतम वर्ष को हम भुला चुके हैं। 
बच गया सितम्बर का विषुव, शरद विषुव। क्या उससे भी नववर्ष आरम्भ होता था? यहीं वे विश्वामित्र ध्यान में आते हैं जिन्होंने समांतर विश्व 'रच' दिया था। रचना को बनाने से न समझ एक नयी व्यवस्था के चलन से समझें। इस बात के उल्लेख मिलते हैं कि विश्वामित्र से श्रावण नक्षत्र से नववर्ष बताया। यदि इस पर शोध हो कि शरद विषुव कब श्रावण नक्षत्र पर था तो इस बात के काल पर किसी परिणाम पर पहुँचा जा सकता है। आजकल २३ सितम्बर के शरद विषुव पर सूर्य उत्तरा फाल्गुनी पर हैं। उत्तरा फाल्गुनी से श्रावण दस नक्षत्र की दूरी पर है अर्थात यह बात २५७७२/२७ x १० = ९५४५ वर्ष पुरानी बैठती है। सम्भव है कि उस समय अभिजित को ले कर २७ के स्थान पर २८ नक्षत्र रहे हों, ऐसी स्थिति में अभिजित की स्थिति महत्त्वपूर्ण होगी तथा यह समय १०१२४ वर्ष पूर्व तक हो सकता है, यह इस पर निर्भर है कि अभिजित को श्रावण से पूर्व मानते हैं या नहीं। इसकी संगति ऊपर ऋग्वेद के बारे में बताये गये से भी बैठती है। महाभारत में अभिजित के पतन की कथा है, उस पर पुन: कभी। यह सदैव ध्यान रखें कि पोषण सबसे महत्त्वपूर्ण है तथा कोई भी नववर्ष आरम्भ कृषि चक्र के किसी महत्त्वपूर्ण बिंदु से ही जुड़ा होगा। वर्षा का कृषि हेतु महत्त्व बताना होगा क्या?
नववर्ष के पूर्व दिवस पर शुभकामनायें। प्यासी धरा पर्जन्य को जोह रही है। वर्षा हेतु कल सामूहिक प्रार्थना करें। भूजल का दोहन नियंत्रित करें तथा उसकी पूर्ति हेतु उपाय करें।
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यस्यां पूर्वे भूतकृत ऋषयो गा उदानृचुः ।
सप्त सत्त्रेण वेधसो यज्ञेन तपसा सह ॥ 
सा न: पशून् विश्वरूपां दधातु दीर्घमायुः सविता कृणोतु ।
यस्यामन्नं व्रीहियवौ यत्रेमा: पञ्च कृष्टयः ।
भूम्यै पर्जन्यपत्न्यै नमोस्तु वर्षमेदसे ॥ 
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(अथर्ववेद पैप्पलाद शाखा, १७.४.११-१२)