शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

.. यह सम्बन्ध भगवान ने सोच समझ कर तोड़ा है ? - एक सिपाही की गोली बिंधी डायरी..

मेरी प्यारी प्यारी लक्ष्मी!
मेरी प्यारी प्यारी मीठी पत्नी, आय लव यू।..
मैं जहाँ भी रहूँगा तुम्हें प्यार करता रहूँगा, सातो जनम तुम्हें प्यार करता रहूँगा, मर भी गया तो भी तुम्हें प्यार करता रहूँगा...
लक्ष्मी मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ..तुमने मुझे एक बेटा और एक बेटी दिया है। मेरे जीवन का सबसे सुखद समय था 15 दिसम्बर 1988, जब मुझसे तुम्हारी शादी हुई थी...
कॉंस्टेबल सूरज बहादुर थापा की गोली बिंधी डायरी : 
चित्र और सामग्री इंडियन एक्सप्रेस से साभार
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अगर मैं न रहूँ ..तुम बेटा बेटी दोनों की अच्छी तरह परवरिश करना ..मेरा हर समय यहाँ जान का खतरा रहता है, कभी कहीं कुछ भी हो सकता है.. ड्यूटी पे जान हाथ में लेके चलना पड़ता है। ...
माई डियर लक्स, मैं तुम्हारे बिना एक पल भी जी नहीं सकूँगा। तुमसे मेरा जो सम्बन्ध भगवान ने जोड़ा है, शायद कुछ सोच समझ के ही जोड़ा है...
संग-संग चलूँगा बन के तेरा साजन
आ तेरी माँग भर दूँ मेरी दुल्हन...
.. मैं जानता हूँ कि मैं परिवार के लिए कुछ खास नहीं कर सकता और तुम हो जिसे सभी जिम्मेदारियाँ निभानी हैं... मैं तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहता हूँ..जब मैं तुम्हें खुश देखता हूँ तो मुझे शांति मिलती है..जो प्यार तुमने दिया है लक्ष्मी, पैदा होने से अब तक किसी से नहीं मिला.. बहुत कम लोग ऐसे भाग्यशाली होते हैं जिन्हें तुम सी पत्नी मिलती है..
अभी देश का हाल खबर ठीक नहीं है .. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ लेकिन अपने देश को भी प्यार करता हूँ। अपने देश की स्थिति दिनों दिन खराब होती जा रही है। ..कुछ लोगों की पार्टी पॉलिटिक्स ने अपने देश के वजूद को ही खतरे में डाल दिया है। हम झेल रहे हैं।.... 
यह अंश है माओवादियों द्वारा मार दिए गए इस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स के जवान सूरज बहादुर थापा की डायरी से ..15 फरवरी को वह वीरगति को प्राप्त हुए।
..रोहन और ईशा थापा के साथ अब कौन फोटो खिंचाएगा ? लक्ष्मी की माँग अब कौन भरेगा ?  
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नरक के रस्ते से निकलना मेरे लिए कठिन है। ये फागुन, ये बसंती बयार ... मन हिलोर लेता है कि फिर वे रस्ते खींच लेते हैं अपनी तरफ ... ये दुनिया इतनी असंगत क्यों है? ...
आज सुबह से ही ...
माओवादियों के अपने तर्क हैं.. राज्य के अपने तर्क हैं.. सबकी अपनी अपनी लड़ाई है ... कोई लक्ष्मी कोई रोहन कोई ईशा क्यों इन लड़ाइयों की परिणति से ..? क्यों ??
मन सूख गया है। मैं कुछ नहीं लिख सकता। 'प्यासा' का गीत टुकड़ा टुकड़ा हो मेरे मस्तिष्क मेरे भाव सबको सुखा रहा है:
ये इंसा के दुश्मन समाजों की दुनिया
..एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी
निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनियां है या आलम-ए-बदहवासी
.. ये बस्ती है मुर्दा परस्तों की बस्ती
यहां पर तो जीवन से मौत सस्ती
... ये दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है।

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

खम्भे जैसी खड़ी है ...


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उस समय जब कि महीने के अंतिम सप्ताह पर्स वेतन का चेक अगोरता था - तुम थी और तुम्हारी पायलों की खनक  सिक्कों सी थी। 
 सामने तो तुम खनकती रहती थी लेकिन अकेलेपन के उन क्षणों में तुम्हारी उदास आँखें सूनी दीवार तकती थीं, शायद तुम्हें उदासी का भान भी नहीं था - सैंया नादान, बेटी तो थी ही। दीवार पर कोई चित्र न सही उससे लग कर एक टी वी तो आ ही सकता था। तुमने कभी कुछ नहीं कहा। 
फर्श पर सोना ठीक था कि टी वी न देखना ? विकल्प विकल्पहीन, दोनों ठीक थे। 
तुमने अपने योगी पति से कुछ नहीं कहा - जोगिया रंग की चादर बिछा हम फर्श पर सोते रहे।    
बी पी एल वन्दे मातरम सीरीज का 14" टी वी बॉस की बाइक पर सवार होकर घर आया - उस दिन समझ नहीं पाया कि तुम खुश हुई या नहीं? लेकिन सूनी दीवार के दोनो तरफ के आर सी सी खम्भे इंजीनियर की दृष्टि में पहली बार आए थे। देख कर भी न देखना और देखने देखने में अंतर होना - तड़ित द्युति सा आलोकित हो गया था मन। 
तुम्हारी साँस सहारे दो और जीवन जीते रहे। ..और वह दिन जब नन्हीं सी बेटी के साथ बाज़ार गया था। सौ की नोट को सब्जी वाले ने लेने के बाद पचास का बताया था, खूब कहासुनी हुई - उस समय पचास रुपए बड़ी सम्पति थे। घर आने पर बताने की गलती कर बैठा और तुमने योगी का सब्जी लाना बन्द करा दिया। ...उस दौरान योगी ज़मीन में कांक्रीट के खम्भे ढलवा रहा था - उसे शक्ति देने के लिए ...
..दूसरी संतान के समय और बाद में भी कुछेक दिनों को छोड़ तुम अकेली रही। अब आर्थिक तंगी जैसी बात नहीं लेकिन समय की तंगी थी। योगी दौरे पर था - सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के लिए पाइपलाइनों में ईंधन बहाना था लेकिन मन की नेह नहर सूखी ही रही, कभी सोचा ही नहीं कि ऊर्जा और ऊष्मा की आवश्यकता उस समय घर में अधिक थी। तुम चुप रही - घर आने पर नेह नीर चेहरे पर छलकता था, आँखों में नहीं ...उस मकान में खम्भे नहीं बस दीवारें थीं, क्या सचमुच ?   
.. याद आता है दिल्ली में भतीजे के जन्म के बाद हिजड़ों के आगे दीवार बन कर तुम्हारा खड़ा हो जाना। मेरी  सारी क़ानूनी करामातों को धता बताते हुए कितनी गरिमा और औदार्य से तुमने उनको संतुष्ट कर विदा किया था !  उल्लास की बेला का तुमने मान रखा था ... दिल्ली पुलिस आधे घंटे बाद आई थी।
... लखनऊ की डेढ़ साल की भटकन - एक अदद 'अपने घर' की तलाश और सैंया ग़जब का सनकी। उसे तो सिविल इंजीनियरिंग और वास्तुविद्या की सारी मान्यताएँ बस एक घर में ही चाहिए थीं - जेब में बस कौड़ियाँ खड़कती थीं और मन में मिस्री मन्दिरों जैसे विशाल खम्भे आकार लेते थे! 
... हुँह .. याद नहीं आता कभी तुमने ये कहा हो। छ्ल क्षद्म झेल, काले धन का खेल देख और शुभचिंतकों की मिट्टी पलीद कर जब झुके मन निराश आता तो तुम्हारे आस जगाते एक दो बोल सुनता और तन जाता एक खम्भा - झुका मन खुल कर आकाश हो जाता। 
.. आज 'अपना घर' है जिसमें सिविल इंजीनियरिंग और वास्तुविद्या की मान्यताएँ नहीं के बराबर हैं - अनगढ़ घर लेकिन अनेकों आर सी सी के खम्भों के बीच एक घूमता खम्भा है, वह इस 'अनगढ़' को 'गढ़' बनाता है - वह तुम हो।  
तुम्हारे सहारे ढेरों भंगिमाएँ बना सकता हूँ, निभा सकता हूँ। हाँ, पीछे झुकता जा सकता हूँ - पता जो है कि गतिशील खम्भा सम्हाल लेगा। आवश्यकता पड़ने पर आगे भी खड़ा हो जाएगा - मैं चुपचाप ओट ले सकूँगा। ..तुम हो तो सब हैं - घर, दीवार, बच्चेरसोई, सेमिनार, ट्रेनिंग, प्रोजेक्ट, फाइनेंस, निगोसिएसन, ब्लॉगरी ... तुम हो सब है..

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

हे देश शंकर !

चित्र - सम्बन्धित इंटरनेट साइटों से साभार

हे देश शंकर! 
फागुन माह होलिका, भूत भयंकर -
प्रज्वलित, हों भस्म कुराग दूषण अरि सर -
मल खल दल बल। पोत भभूत बम बम हर हर ।
हे देश शंकर।
स्वर्ण कपूत सज कर 
कर रहे अनर्थ, कार्यस्थल, पथ घर बिस्तर पर ।
लो लूट भ्रष्ट पुर, सजे दहन हर, हर चौराहे वीथि पर 
जगे जोगीरा सरर सरर, हर गले कह कह गाली से रुचिकर।
हे देश शंकर।
हर हर बह रहा रुधिर 
है प्रगति क्षुधित बेकल हर गाँव शहर 
खोल हिमालय जटा जूट, जूँ पीते शोणित त्रस्त प्रकर 
तांडव हुहकार, रँग उमंग धार, बह चले सुमति गंगा निर्झर 
हे देश शंकर।
पाक चीन उद्धत बर्बर 
चीर देह शोणित भर खप्पर नृत्य प्रखर 
डमरू डम घोष गहन, हिल उठें दुर्ग अरि, छल कट्टर ।
शक्ति मिलन त्रिनेत्र दृष्टि, आतंक धाम हों भस्म भूत, ढाह कहर 
हे देश शंकर।
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- गिरिजेश राव