-एक वयस्क सुशिक्षित लड़की एक वैसे ही लड़के से बिना किसी सावधानी के शारीरिक सम्बन्ध बनाती है, गर्भवती होती है और तीन महीने (मतलब कि शिशु को जन्म देने को मानसिक रूप से तैयार) तक मृत्युपर्यंत गर्भ धारण रखती है। क्या उसका अपने माँ बाप के प्रति, जो कि पुराने विचारों के थे और वैसे ही समाज में रहते थे, कोई दायित्त्व नहीं था ?
-लड़का खुलेआम टेसुए बहाता, हीरो बना घूम रहा है। लड़की के पोस्टमार्टम के समय क्या यह आवश्यक नहीं था कि गर्भ का डी एन ए परीक्षण कराया जाता ताकि लड़के का पिता होना सिद्ध हो सकता और उसको क़ानून के शिकंजे में लिया जा सकता ?
- एक आतंकवादी जिसने खुलेआम सैकड़ों हजारों लोगों की उपस्थिति में राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ा, सैकड़ों की हत्या की, पूरी मशीनरी को बन्धक बनाए रखा; महीनों तक की क़ानूनी प्रक्रिया के बाद और 45 करोड़ उसके उपर खर्चने के बाद दोषी ठहराया जाता है और फिर भी फैसला सुरक्षित रखा जाता है। उसी देश में उक्त लड़की की हत्या के लिए उसके माँ बाप पर आरोप लगता है और सभी उन्हें दोषी मानने लगते हैं। क्या न्यायालय के फैसले के आने तक उन्हें उनके हाल पर छोड़ नहीं देना चाहिए ? अरे उनकी इकलौती लड़की मरी है, रहम करो। क्या कहा? घर बुला कर मार दिया ! निर्णय लेने के पहले प्रतीक्षा कर लीजिए न ।
- एक आरुषि नामक लड़की की हत्या हुई थी। क्या आप बताएँगे कि आज कल उस केस में क्या हो रहा है? क्या प्रगति है?
- कहीं ऐसा तो नहीं कि सारा बवाल बस इस लिए है कि मरने वाली पत्रकार थी और उसे मारने का पहला कदम लेने वाला ( उसे गर्भवती कर) उसका कथित प्रेमी भी पत्रकार है? कहीं प्रेमी अपने को बचाने के लिए जमात इकठ्ठी कर यह नौटंकी तो नहीं फैला रहा? कहीं ऐसा तो नहीं होगा न कि कल सुबूत मिले कि लड़के ने उसके साथ छिप कर शादी कर ली थी ?
- कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी घटनाएँ बच्चे की परवरिश का जिम्मा राज्य के सिर नहीं होने से हो रही हैं ? यह पुरातन समाज तेजी से बदलते माहौल के साथ कदम नहीं मिला पा रहा तो कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके लिए विवाह संस्था ही दोषी है ?
- आप में से कितने गिरिजेश अपने नाम से 'राव' हटाने को और अपने बच्चे को भी जाति सूचक उपनामों से मुक्त करने को तैयार हैं? ..मैं गिन रहा हूँ। संख्या बहुत कम है। .. तो भैया बहिनी! आप लोग उपनाम तक हटाने को तैयार नहीं; जाति व्यवस्था पर इतनी हाय तौबा क्यों?
- सार्वजनिक स्थानों पर दिन में खुलेआम सेक्स सम्बन्ध बनाते (जी हाँ, अब यह होने लगा है) कितने कुँवारे जोड़ों को आप ने टोका है ? मेरा मतलब यह है कि बच्चों पर क्या प्रभाव पडता होगा, यह सोचा है आप ने ? न न , सिनेमा वगैरह से इतर मामला है यह । कल अगर आप का बच्चा आप से पूछ बैठे तो क्या कहेंगे उसे ? वो जो कुत्ते करते हैं न वही कर रहे हैं - ऐसा कह पाएँगे आप ? ..सेक्स एजूकेसन। ... बच्चे सम्भोग करने के पहले उसकी ज़िम्मेदारी तो समझें...
बहुत से विचार गड्डमगड्ड हो रहे हैं। शायद मुझे आराम की जरूरत है। पाखंडी ऊर्जा क्षय अधिक करता है।
मंगलवार, 4 मई 2010
रविवार, 2 मई 2010
शिशु का परिच्छेदन (Circumcision)
इस लेख में दिए गए चित्र और सामग्री असामान्य हैं, जो कुछ सम्वेदनशील व्यक्तियों को विचलित कर सकते हैं। कृपया ऐसे लोग इसे न पढ़ें। इस लेख का उद्देश्य केवल और केवल ज्ञानप्रसार है, भावनाएँ आहत करना नहीं। |
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एक शिशु के परिच्छेदन के चित्र नीचे दिए जा रहे हैं। मुक्तहस्त परिच्छेदन के ये चित्र आठवें दशक की एक ऑस्ट्रेलियाई नारी पत्रिका से लिए गए हैं। इनके मूल अनुशीर्षक किसी भी तरह से पूरी बात नहीं बता पाते थे। वस्तुत: ये चित्र शिशु की चीखों को सम्प्रेषित नहीं करते। परिच्छेदन के पहले शिशु के पेट को पम्प से साफ कर दिया जाता है। यह सावधानी इसलिए ली जाती है कि कहीं वह हो रही शल्यक्रिया के उपर वमन न कर दे।
ब्लॉग लेखक चिकित्सीय क्षेत्र से सम्बन्धित नहीं है। उसने केवल अनुवाद भर किया है जिसमें त्रुटियाँ हो सकती हैं। स्पष्टीकरण के लिए अपने डाक्टर या विशेषज्ञ से सम्पर्क करें। यह ब्लॉग लेख Infant Circumcision का हिन्दी अनुवाद है, जिसे http://www.circumstitions.com से लिया गया है। यहाँ छापने से पहले ब्लॉग स्वामी से अनुमति ली गई है। अतिरिक्त जानकारी के लिए मूल आंग्ल ब्लॉग को देखें। |
शब्दचिह्न :
परिच्छेदन,
शिश्न,
Circumcision,
penis
गुरुवार, 29 अप्रैल 2010
कुरुक्षेत्र में ..क्या उखाड़ लोगे ?
जागरूक व्यक्तियों के अपने अपने कुरुक्षेत्र होते हैं । उनसे छुटकारा नहीं। चाहे कर्ण की तरह घुटते हुए लड़ें, अर्जुन की तरह मोहनिवृत्त हो लड़ें, अश्वत्थामा की तरह प्रतिशोध में लड़ें, भीष्म की तरह सिकुड़ी मर्यादाओं के पालन के लिए लड़ें .... लड़ना होता ही है।
घर के सामने का पार्क मेरे लिए कुरुक्षेत्र जैसा है।
लगभग चार एकड़ में फैला यह पार्क प्रशासन की दरियादिली और उपेक्षा दोनों का उदाहरण है। 600 पौधों का रोपण चहारदीवारी के साथ, पानी के लिए बोरवेल अगर दरियादिली के उदाहरण हैं तो इस घोर गर्मी में पानी देने के लिए स्थायी व्यक्तियों का न होना उपेक्षा का। ठीकेदार के भरोसे पौधे वैसे ही जीते, मरते, जीते, मरते के चक्र में पड़े हैं जैसे सरकारी खजाने को खाली करने से बनी हुई कोई भी चीज होती है।
जब आया तो इस विशाल पार्क में गाजर घास का बोलबाला था। एलर्जी की बिमारी के कारण घास के पौधों को छूते भी घबराता था। लेकिन आँखों की चुभन कुछ ही दिनों में एक अलग ही बिमारी हो गई। नई बिमारी से छुटकारा पाने को एक दिन अकेले ही इस घास के पौधों को उखाड़ने लगा। पहले दिन तो नहीं लेकिन दूसरे दिन से देखादेखी तीन चार लोग और धर्मप्राण माली भी आ जुटे। देखते ही देखते सात दिनों के भीतर ही पार्क गाजर घास से खाली हो गया। ...
पार्क के एक किनारे खाली प्लॉट पड़े हैं। अन्य एकांत जगहें होने पर भी सुविधा (?) और साफ जगह पर हगने के सनातन भारतीय चरित्र को चरितार्थ करते हुए आम जनता उन में सुबह शाम हगने का दैनिक देहकर्म सम्पन्न करती थी। कॉलोनी के लोग बदबू को सहते थे । महिलाएँ निर्लज्ज नंगई के कारण टहलने नहीं आती थीं। मुझे बड़ा अजीब लगता था कि कोई उन्हें टोकता नहीं था। एकाध से बात की तो ये सद्विचार आए:
- इस परम गोपनीय (खुले में हगना ?) कार्य करते हुओं को टोकना बेशर्मी होगी (गोया लाज शरम का हम ठेका लिए हैं और वे बेशर्मी का)
- अरे भाई, टोकने से सटक जाती है। बहुत स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।(जन स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता ?)
- कोई व्यवस्था नहीं है, कहाँ जाएँ सब ? ( तो यह है व्यवस्था! थोड़ी दूर जाएँ तो प्रकृति की व्यवस्था ही व्यवस्था है लेकिन कौन चल कर दूर जाय जब बगल में ही हगने की व्यवस्था है? व्यवस्था के वाहक झेल लेंगे लेकिन व्यवस्था बनाए रखेंगे ?) ...
हार कर(?) अर्जुन ने गांडीव उठाया। रोकना, डाँटना, समझाना, लानत भेजना .. तुणीर के शस्त्रास्त्र निकलने प्रारम्भ हुए। एक बार फिर उन्हीं तीन चार लोगों ने साथ देना शुरू किया और दस दिनों में ही हगने वाले दूर दीवार के पीछे सिमट गए। ..
जाड़ा आया। मेरे लिए प्रकृति का अभिशाप। घर की ऊष्मा के सुरक्षा कवच में मैं दुबका रहा। बचा रहा। डाक्टर की सलाह को मानते हुए मार्च और करीब पूरा अप्रैल सुबह शाम पुष्प पराग सुवासित वायु से बचता रहा। पिछ्ले सप्ताह से निकलना प्रारम्भ किया तो देखा कि कुरुक्षेत्र फिर से तैयार है। गाजर घास के सफेद फूल अपने चरम पर हैं। यही समय है कि उन्हें नष्ट किया जाय। श्रीमती जी कहती रहती हैं - एक अकेला क्या कर लेगा? कोई पुरुष मेरी बैचैनी देखता तो कहता - अकेले क्या उखाड़ लोगे ?
मुझे सेतु बन्ध की गिलहरी के गुण गाते विवेकानन्द याद आते रहते हैं। .. अभियान का प्रारम्भ घर के सामने की सड़क के लम्बे गलियारे से हुआ। एक सौ रूपए और दो दिनों में यह इलाका गाजर घास से साफ हो गया। ये रूपए तो किसी मद में बचाए ही जा सकते हैं।
पार्क के भीतर से माली ग़ायब हो गया है। गाजर घास बढ़ी हुई है और पौधे दो तीन दिनों के अंतराल पर पानी पा रहे हैं - कैजुअल व्यवस्था। लिहाजा जी रहे हैं, मर रहे हैं। पानी के लिए तो शिकायत ही की जा सकती है। इतना बड़ा पार्क कोई लॉन तो है नहीं कि पाइप उठाया और सींचने लगे!
एकड़ों में पसरी गाजर घास ने पहले तो हिम्मत पस्त कर दी लेकिन गिलहरी कहाँ बाज आती है ! लिहाजा कल से अकेले उखाड़ रहा हूँ । आज अनुमान लगाया कि करीब आठवाँ हिस्सा साफ हो गया। दाईं ओर एक छोटे भाग का चित्र लगा है। आज फिर से दो लोगों ने वाह वाही दी है और कल से हाथ बँटाने का वादा किया है। तो आशा कर रहा हूँ कि एक सप्ताह में पार्क गाजर घास से मुक्त हो जाएगा।
हगने वाले फिर से अपने कर्म में लग गए हैं। कल से टोका टोकी, समझाना और लानत मलामत शुरू कर दिया है। प्रभाव पड़ रहा है। आज टहलते दो अजनबियों ने भी मेरे साथ मोर्चा सँभाला। उम्मीद है कि कुछ दिनों में ही कौरव सेना समाप्त तो नहीं लेकिन पीछे जरूर हट जाएगी।
एक प्रश्न है - क्या आप भी कहीं उखाड़ते हैं ? यदि हाँ, तो यहाँ अपने अनुभव बताइए। यदि नहीं तो nice, सुन्दर प्रयास, लगे रहो जैसी फालतू टिप्पणियों के बजाय कहीं उखाड़ना शुरू कीजिए। आप के आस पास कुरुक्षेत्र अवश्य होगा।
घर के सामने का पार्क मेरे लिए कुरुक्षेत्र जैसा है।
जब आया तो इस विशाल पार्क में गाजर घास का बोलबाला था। एलर्जी की बिमारी के कारण घास के पौधों को छूते भी घबराता था। लेकिन आँखों की चुभन कुछ ही दिनों में एक अलग ही बिमारी हो गई। नई बिमारी से छुटकारा पाने को एक दिन अकेले ही इस घास के पौधों को उखाड़ने लगा। पहले दिन तो नहीं लेकिन दूसरे दिन से देखादेखी तीन चार लोग और धर्मप्राण माली भी आ जुटे। देखते ही देखते सात दिनों के भीतर ही पार्क गाजर घास से खाली हो गया। ...
पार्क के एक किनारे खाली प्लॉट पड़े हैं। अन्य एकांत जगहें होने पर भी सुविधा (?) और साफ जगह पर हगने के सनातन भारतीय चरित्र को चरितार्थ करते हुए आम जनता उन में सुबह शाम हगने का दैनिक देहकर्म सम्पन्न करती थी। कॉलोनी के लोग बदबू को सहते थे । महिलाएँ निर्लज्ज नंगई के कारण टहलने नहीं आती थीं। मुझे बड़ा अजीब लगता था कि कोई उन्हें टोकता नहीं था। एकाध से बात की तो ये सद्विचार आए:
- इस परम गोपनीय (खुले में हगना ?) कार्य करते हुओं को टोकना बेशर्मी होगी (गोया लाज शरम का हम ठेका लिए हैं और वे बेशर्मी का)
- अरे भाई, टोकने से सटक जाती है। बहुत स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।(जन स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता ?)
- कोई व्यवस्था नहीं है, कहाँ जाएँ सब ? ( तो यह है व्यवस्था! थोड़ी दूर जाएँ तो प्रकृति की व्यवस्था ही व्यवस्था है लेकिन कौन चल कर दूर जाय जब बगल में ही हगने की व्यवस्था है? व्यवस्था के वाहक झेल लेंगे लेकिन व्यवस्था बनाए रखेंगे ?) ...
हार कर(?) अर्जुन ने गांडीव उठाया। रोकना, डाँटना, समझाना, लानत भेजना .. तुणीर के शस्त्रास्त्र निकलने प्रारम्भ हुए। एक बार फिर उन्हीं तीन चार लोगों ने साथ देना शुरू किया और दस दिनों में ही हगने वाले दूर दीवार के पीछे सिमट गए। ..
जाड़ा आया। मेरे लिए प्रकृति का अभिशाप। घर की ऊष्मा के सुरक्षा कवच में मैं दुबका रहा। बचा रहा। डाक्टर की सलाह को मानते हुए मार्च और करीब पूरा अप्रैल सुबह शाम पुष्प पराग सुवासित वायु से बचता रहा। पिछ्ले सप्ताह से निकलना प्रारम्भ किया तो देखा कि कुरुक्षेत्र फिर से तैयार है। गाजर घास के सफेद फूल अपने चरम पर हैं। यही समय है कि उन्हें नष्ट किया जाय। श्रीमती जी कहती रहती हैं - एक अकेला क्या कर लेगा? कोई पुरुष मेरी बैचैनी देखता तो कहता - अकेले क्या उखाड़ लोगे ?
मुझे सेतु बन्ध की गिलहरी के गुण गाते विवेकानन्द याद आते रहते हैं। .. अभियान का प्रारम्भ घर के सामने की सड़क के लम्बे गलियारे से हुआ। एक सौ रूपए और दो दिनों में यह इलाका गाजर घास से साफ हो गया। ये रूपए तो किसी मद में बचाए ही जा सकते हैं।
पार्क के भीतर से माली ग़ायब हो गया है। गाजर घास बढ़ी हुई है और पौधे दो तीन दिनों के अंतराल पर पानी पा रहे हैं - कैजुअल व्यवस्था। लिहाजा जी रहे हैं, मर रहे हैं। पानी के लिए तो शिकायत ही की जा सकती है। इतना बड़ा पार्क कोई लॉन तो है नहीं कि पाइप उठाया और सींचने लगे!
एकड़ों में पसरी गाजर घास ने पहले तो हिम्मत पस्त कर दी लेकिन गिलहरी कहाँ बाज आती है ! लिहाजा कल से अकेले उखाड़ रहा हूँ । आज अनुमान लगाया कि करीब आठवाँ हिस्सा साफ हो गया। दाईं ओर एक छोटे भाग का चित्र लगा है। आज फिर से दो लोगों ने वाह वाही दी है और कल से हाथ बँटाने का वादा किया है। तो आशा कर रहा हूँ कि एक सप्ताह में पार्क गाजर घास से मुक्त हो जाएगा।
हगने वाले फिर से अपने कर्म में लग गए हैं। कल से टोका टोकी, समझाना और लानत मलामत शुरू कर दिया है। प्रभाव पड़ रहा है। आज टहलते दो अजनबियों ने भी मेरे साथ मोर्चा सँभाला। उम्मीद है कि कुछ दिनों में ही कौरव सेना समाप्त तो नहीं लेकिन पीछे जरूर हट जाएगी।
एक प्रश्न है - क्या आप भी कहीं उखाड़ते हैं ? यदि हाँ, तो यहाँ अपने अनुभव बताइए। यदि नहीं तो nice, सुन्दर प्रयास, लगे रहो जैसी फालतू टिप्पणियों के बजाय कहीं उखाड़ना शुरू कीजिए। आप के आस पास कुरुक्षेत्र अवश्य होगा।
शब्दचिह्न :
उखाड़ना,
कुरुक्षेत्र,
क्या उखाड़ लोगे,
गाजर घास,
हगना
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
एक देहाती बोध कथा
घने डरावने जंगल से एक धुनिया (रुई धुनने वाला) जा रहा था। मारे डर के उसकी कँपकँपी छूट रही थी कि कहीं शेर न आ जाय !
धुनिए को एक सियार दिखा । पहले कभी नहीं देखा था इसलिए शेर समझ कर भागना चाहा लेकिन भागने से अब कोई लाभ नहीं था - खतरा एकदम सामने था। सियार को धुनिया दिखा जिसने अपना औजार कन्धे पर टाँग रखा था, हाथ में डंडा भी था। सियार की भी वही स्थिति, हालत पतली हो गई -
राजा शिकार करने आ गया, अब मार देगा !
दोनों निकट आए तो उनके डर भी आमने सामने हुए। सियार ने जान बचाने के लिए चापलूसी की:
"कान्हें धनुष हाथ में बाना, कहाँ चले दिल्ली सुल्ताना"
कन्धे पर धनुष और हाथ में बाण लिए हे दिल्ली के सुल्तान! कहाँ जा रहे हैं?
धुनिए ने उत्तर दिया:
"वन के राव बड़े हो ज्ञानी, बड़ों की बात बड़ों ने जानी"
हे जंगल के राजा ! आप बड़े ज्ञानी हैं। बड़ों की बात बड़े ही समझते हैं । ...
धुनिए को एक सियार दिखा । पहले कभी नहीं देखा था इसलिए शेर समझ कर भागना चाहा लेकिन भागने से अब कोई लाभ नहीं था - खतरा एकदम सामने था। सियार को धुनिया दिखा जिसने अपना औजार कन्धे पर टाँग रखा था, हाथ में डंडा भी था। सियार की भी वही स्थिति, हालत पतली हो गई -
राजा शिकार करने आ गया, अब मार देगा !
दोनों निकट आए तो उनके डर भी आमने सामने हुए। सियार ने जान बचाने के लिए चापलूसी की:
"कान्हें धनुष हाथ में बाना, कहाँ चले दिल्ली सुल्ताना"
कन्धे पर धनुष और हाथ में बाण लिए हे दिल्ली के सुल्तान! कहाँ जा रहे हैं?
धुनिए ने उत्तर दिया:
"वन के राव बड़े हो ज्ञानी, बड़ों की बात बड़ों ने जानी"
हे जंगल के राजा ! आप बड़े ज्ञानी हैं। बड़ों की बात बड़े ही समझते हैं । ...
रविवार, 11 अप्रैल 2010
प्रसन्न होऊँ ? अपने केश नोचूँ ? निर्लज्जता जारी रखूँ ?
नौ महीनों की ज़िद्दी निर्लज्जता के बाद जब मेरे पड़ोसी खुले सीवर मैनहोल पर चैम्बर बना कर ढक्कन लगाने के कार्य का श्रीगणेश हुआ तो मैं अति प्रसन्न हुआ। अब यह टेंसन खत्म होना था कि कोई भैंस सरीखा जानवर या बच्चा उसमें फिर से गिर जाएगा ।
लेकिन अब मुझे समझ में नहीं आ रहा कि:
- प्रसन्न होऊँ ?
- अपने केश नोचूँ ?
- निर्लज्जता जारी रखूँ ?
या
उपर सुझाए तीनों काम करूँ ?
आप स्वयं देख लीजिए।
यह वही लखनऊ है जहाँ तीन हजार करोड़ की लागत से पथरीले पार्क बनाए गए हैं लेकिन मैनहोल का ढक्कन उपलब्ध नहीं है। मुझे यह अभी तक समझ में नहीं आया कि जब ढक्कन गोल था तो फ्रेम आयताकार क्यों लगवाया गया ? अनजाने में ही जल संस्थान ने मॉडर्न शिल्पकार का काम कर दिया है।
भारत की व्यवस्था का इससे अच्छा स्कल्प्चर नहीं हो सकता - आयताकार छेद पर गोलाकार ढक्कन जो ढक कर भी न ढक पाए। अन्दर की बजबजाहट दिखती रहे और काम पूरे होने की घोषणा भी हो जाय।
राष्ट्रीय दुर्व्यवस्था को हमारा शासकीय तंत्र ऐसे ही ढके हुए है।
लेकिन अब मुझे समझ में नहीं आ रहा कि:
- प्रसन्न होऊँ ?
- अपने केश नोचूँ ?
- निर्लज्जता जारी रखूँ ?
या
उपर सुझाए तीनों काम करूँ ?
आप स्वयं देख लीजिए।
यह वही लखनऊ है जहाँ तीन हजार करोड़ की लागत से पथरीले पार्क बनाए गए हैं लेकिन मैनहोल का ढक्कन उपलब्ध नहीं है। मुझे यह अभी तक समझ में नहीं आया कि जब ढक्कन गोल था तो फ्रेम आयताकार क्यों लगवाया गया ? अनजाने में ही जल संस्थान ने मॉडर्न शिल्पकार का काम कर दिया है।
भारत की व्यवस्था का इससे अच्छा स्कल्प्चर नहीं हो सकता - आयताकार छेद पर गोलाकार ढक्कन जो ढक कर भी न ढक पाए। अन्दर की बजबजाहट दिखती रहे और काम पूरे होने की घोषणा भी हो जाय।
राष्ट्रीय दुर्व्यवस्था को हमारा शासकीय तंत्र ऐसे ही ढके हुए है।
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