मंगलवार, 1 जुलाई 2014

मैं, शंकर के समर्थन में

हदीस की मानें तो भारत विजय अरबश्रेष्ठतावादी मजहब के संस्थापक की अंतिम इच्छाओं में से एक थी। यदि यह मजहब नहीं होता तो भारत के सांस्कृतिक इतिहास के अद्यतन प्रस्थान बिन्दु आदिशंकर (आचार्य) होते जिनके अंतिम समय के बारे में पाँचवीं सदी ईसापूर्व से नवीं सदी ईस्वी तक की मान्यता है।
सन् 711 में सिन्ध पर इस्लामी आक्रमण हुआ। उस समय वहाँ ब्राह्मण वंश का शासन था। उसके तत्काल पूर्व के राय वंश ने शैव आराधना के कीर्तिमान स्थापित किये थे। राय वंश ने सिन्ध के पार जा कर खलीफा के राज्य के कई भाग अपने नियंत्रण में कर लिये थे। सिन्धु नदी खिलाफत और बुत(बुद्ध)परस्त राज्यों के बीच की 'प्राकृतिक सीमा' मानी जाती थी जिसका जब तब दोनों ओर से अतिक्रमण किया जाता रहा। रायवंश की अंतिम रानी मंत्री पर अनुरक्त थी और राजा की मृत्यु के पश्चात उन दोनों ने गुप्त विवाह कर लिया जिसका रहस्य तब तक नहीं खोला गया जब तक कि मंत्री ने रानी की सहायता से सभी निकटवर्ती अधिकारियों का विनाश कर स्वयं को राजा नहीं घोषित कर दिया।
कासिम के सिन्ध आक्रमण के समय इस नये वंश का तत्कालीन राजा दाहिर लोकप्रिय नहीं था। कारण - एक भविष्यवाणी को असत्य सिद्ध करने के लिये उसने अपनी बहन से ही विवाह कर लिया था और विरोध में उठे अपने भाई की मृत्यु का कारण भी बना था। निम्नवर्गीय प्रजा और लड़ाके जाट कबाइली संस्कृति से अनुप्राणित बौद्ध धर्म के अनुयायी थे जब कि उच्च कुलों और जनसामान्य में सनातन धर्म के साथ साथ दार्शनिकता से भरपूर विद्रोही बौद्ध धर्म का प्रभाव भी था। सभी धर्मों के प्रति राज्य के सहिष्णु व्यवहार के होते हुये भी राजनीतिक वर्चस्व के लिये शीतयुद्ध एक वास्तविकता थी।  इस जटिल समीकरण में अरबों के आक्रमण के समय जाट उनके साथ हो गये। आगे का इतिहास सबको पता है।
अपने प्यारे संस्थापक की अंतिम इच्छा की पूर्ति के लिये तब से ले कर आज तक अरबी हर तरीका अपनाते रहे हैं जिनमें तक़िया भी एक है जिसके अनुसार मजहब विस्तार के लिये छल, प्रपंच, धोखा, पाखंड, आवरण या किसी भी तरह का किया गया अपराध न केवल परम कर्तव्य है परन सवाब(पुण्य) दायी भी। पूरे भारत में पसरे अगणित औलिया, फौलिया, मजार, कब्र आदि तक़िया हेतु ही स्थापित किये गये। ध्यान देने योग्य है कि अरब में ऐसे स्थान हैं ही नहीं, हो भी नहीं सकते क्यों कि वास्तव में वे कुफ्र हैं।
धर्मप्राण किंतु मूर्ख हिन्दू बहुसंख्यकों की किसी को भी पूज देने की प्रवृत्ति का सबसे सफल दोहन मध्यकाल में पुष्कर के समान्तर केन्द्र स्थापित करने में अजमेर में हुआ और ब्रिटिश काल में सिर्डी में। अपने सम्मोहक संगीत और प्रतीक शैली के साथ प्रसरित हुये सूफियों के अवदान अल्प नहीं हैं किंतु यह भयानक सत्य है कि तक़िया के रूप में सूफी मत ने भारतीय प्रतिरोध को बिन तलवार न केवल नष्ट कर दिया अपितु मानसिक दोहन कर युगों युगों तक के लिये उसकी नियति भी लिख दी।शंकर न हुये होते तो अरबी संस्कृति सिन्धु के इस पार गांगेय क्षेत्रों से ले कर ब्रह्मपुत्र तक अपना परचम फहरा रही होती। शंकर पीठों पर भले अयोग्य बैठे हों किंतु आज किसी ने अनजाने ही यदि तक़िया के भयानक षड्यंत्र के विरुद्ध स्वर उठाया है तो मैं उसके समर्थन में हूँ।  

रविवार, 15 जून 2014

साक्षी भ्रमण ध्यान - 1

10413419_10204078153622312_9166858868039137010_nकठभठ्ठा नोनछा माटी की लीक। ध्यान सी स्थिति - भ्रमण ध्यान। आरम्भ है किंतु अनुभूति ऐसी जैसे कि ध्यान में थिर हुये चौथाई घड़ी बीत चुकी हो। कानों में धीमी अनवरत सीटी बज रही है, स्वरमय शांति है - टी टी टूँ, टुँइ, टुइँ टिर टिर टिर च्यूँ चू, टिउ टिउ टिउ ट ट ट टी टी टूँ, टी टी टूँ। खगछ्न्द के विन्यास,  सुर ताल मन में निर्वात भरते - कोरा, पुरानी धोती सा मन धुलते धुलते धूसर रंग स्वच्छ, लुप्त श्वेतकांति।

यह लीक कहीं नहीं जाती, पग चलते हैं पगले दंडियों के, पगडंडियाँ बनती हैं! खेतों के किनारे श्रमकण खिचड़ी श्मश्रुओं में उलझते हैं, नमी जड़ों तक पहुँचती है, पत्तियों के तीखे कोर बाहों की मछलियों पर गोदने जड़ते हैं, अन्न उपजता है, क्षुधा शांत होती है, ध्यान पकता है। लीक पौढ़ा होती है।

भाठ तापस गेरुआ नहीं ओढ़ता, उसके मटमैलेIMG_20140608_075801841 यादृच्छ चेकित वस्त्र के कोर से हरियाली फूटती है। मुग्ध धरा का हास उनमें जड़ता है, गुड़हल फूलते हैं। पूजा की थाली में मृत पुहुप नहीं, तोड़े गये बलिपुष्प सजते हैं और अक्षत आराधनाओं के घूँघट धूप धूम चर्चित होते हैं। कपूर प्रतिदिन उड़ते हैं, समिधायें पूछती हैं - धरे! जीवन क्या है? वह अनमना उत्तर देती है - अस्थिर संतुलन - फूलने सा, उड़ने सा, जलने सा, बरसने सा और आँकुर अँखुआने सा। 

IMG_20140608_080308670खिले अर्क ने स्वागत किया है। पत्तियों की हरिताभा में शिराओं की दुग्धधार मचल रही है। अभिषेक को न शिव हैं और न हिरण्यपुरुष। भस्मवसना शिवा ने सैरीय नीललोहित वासंत से रंग चुरा निज क्षार दूध मिला दिया तो तुम उपजे? देवी को तो अरुण अड़हुल अर्पित कर चुका, किस आस तुम खिले हो एकाकी??

खिली तो अनामपुष्पा भी है। लहकती किशोरी समीरा का हल्का सा स्पIMG_20140608_081217436र्श होगा और सृष्टि के नियम आदिबाबा की पोटली से रवरोर करते निकल भागेंगे। उड़ उड़ यहाँ वहाँ भैंस की पीठ, कौवे की पाँख, दादा की काँख, पगड़ी, चोटी, आँचल, बोरा, टट्टर की छाँव – सब पर सब ओर सवार अचीन्हे अनदेखे फैल जायेंगे नरम गदबदे फाहों के बीच सिमटे नान्हें से बीज। एक ओस आँसू भर किसी मेड़ पर गिरेगा और अंकुरित होगी नान्ही सी घास - धरती एक तिरिन और लजा जायेगी।

IMG_20140608_080834815रोग लदी हवा हवा हुई। लुप्तप्राय शिंशपा अब लहराने लगे हैं। इनकी सूखी मृत देह ने मन काठ होने का मुहावरा दिया। अभी तो इन्हें लहराते देख मन बाग बाग हुआ जाता है। नीरवता में, ध्यान में उच्छृंखलता आती है, जाती है। द्र्ष्टा हूँ मैं - कहो कि तुम्हारी छाँव इस गोपन में कितनी अभिसारसन्धियों पर अधराक्षर हुये? स्वीकारते अनजाने कौन सी नई फुनगी मसली गयी और कौन सी डार मरोड़ मुड़ महक उठी?

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मौन प्रश्न - लटजीरे सी लटों में मोती पिरोये अकेली! पी कहाँ? कंटक इक्ष्वाकुओं की नगरी में तुम्हें अकेली छोड़ कहाँ गया??
सर सर उत्तर - मेरा सखा तो नभ में है। जानते हो, रोहिन गई, मृगडाह लगने वाला है। उसके आने में अभी देर है। जब आयेगा तब इक्ष्वाकुओं की कँटीलियाँ रसभरी होने लगेंगी, मदमाती मेरे सारे मोती छीन लेंगी। तुम साखी हो हमारे, बताना कि उसकी प्रतीक्षा में मैं कैसी सजी थी और मेरे साथ इन्हों ने क्या किया। कहीं वह मुझे छोड़ उन पर न लुभ जाय!

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किसे कह रही है वह बैरन कँटीली? वह तो यहाँ है। भोली आशाओं जैसे कंटक लिये, पूरी हों तो चाहतें और चुभती हैं, न पूरी हों तो बेधती हैं। सुन्दरता हो तो ऐसी। समय संग परिवर्तन ओढ़ती, निर्वसन होती, सिमटती और ... लहूलुहान करती। छूना मत!!

(जारी)

सोमवार, 2 जून 2014

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 28

पिछले भाग से आगे...
राम राम बिहान में सोहित झटके से उठ बैठा। भुँइयाँ मत्था टेकने के बाद भउजी की कोठरी में झाँकने गया। उजास से अन्हार में आया था, बिछौना खाली सा दिखा। पलखत भर में आँखें अभ्यस्त हुईं और करेजा धक्क! उसने नजर इधर उधर दौड़ाई और डेहरी मे ऊपर भउजी की देह लटकती दिखी, समझ आते ही बैस्कोप की तरह से पिछला सब कुछ मन में घूमता चला गया और फिर कोर्रा हो गया। सीने में कहीं लुकारा भभक उठा, तीखा असहनीय कष्ट। चरम यातना छ्न भर में चीर गयी  – भ ...उ...जीsss। सोहित झपट कर लटकते गोड़ ऊपर उठाते डेहरी पर चढ़ा।
 जैसे तैसे कर देह को छुड़ाया ही था कि डेहरी भहरा गई। तोपना, जोड़ और मुँह सब खुल गये, घर की अनपुरना की देह लिटा ही पाया, निकलता धान देह को घेरने लगा। धरती, धान, धरनी घरनी सब जलछार! माटी की रक्षा के लिये इतना कुछ करने वाली भउजी लहास माटी माटी में उतान, देवी जइसन मुँह ओइसन के ओइसन!! सोहित धरती पर हाथ पीटता सिर पटकने लगा। आघात से उबरते मन में धुँधली सम्भावनायें उठने लगीं और नयन बरस पड़े। मन साफ होता गया, आँखें सूखती गयीं।
इसरभर आया तो ढोर नाद पर नहीं लगे थे। देरी होने पर मालिक खुद लगा देते हैं, क्या हुआ आज? उत्सुकता वश घर के भीतर हेरता घुसता गया। मलकिन की कोठरी में हिम्मत कर झाँका और जो दिखा वह अकल्पनीय था! उसके मुँह से आतंक भरी घिघियाहट निकली – ओs ओs मलिकाssssन, भुँइया घस्स से बैठ गया।  सोहित वैसे ही रहा जैसे पता ही न चला हो। इसरभर को सँभलने में थोड़ी देर लगी।...  
...पीठ पर हाथ और साथ के स्वर से चेत हुआ – मालिक! सोहित ने पहचाना – भइया!
“भइया त कब के सरगे गइलें। भइया नाहीं मालिक, ईसर। ई का हो गइल? मलकिनि ...”
सोहित ने सिर उठाया-ईसर? इसरभर??
सिर घूम रहा है ... भँवर है, नद्दी मइया का भँवर। सोहित ने नाव से हाथ बढ़ा भइया की देह उड़ेली है, अब भउजियो जइहें नद्दी में, माटी जाई पानी में? स्वाहा, सब जलछार??
टूटते मन ने बचने के लिये उस अभाव की ओर खुद को मोड़ा जिस पर अब तक सोहित का ध्यान नहीं गया था – भवनिया, केन्ने? का भइल होके??
शोकग्रसित करेजा संतान को ले चिंतित हुआ। सोहित किससे पूछे? खदेरन पंडित? ना! मतवा? ना! रमैनी काकी? ना!
बस एक राह – जुग्गुल काका। बूड़त बिलार कइन सवार।
भउजी की देह वैसे ही छोड़ वह बाहर की ओर भागा, इसरभर भी पीछे पीछे।
...
ज्वर मन्द पड़ गया था। मतवा का मन रह रह सोहित के यहाँ जा हाल चाल लेने को कर रहा था लेकिन पंडित अभी दिसा मैदान से लौटे नहीं थे। बेदमुनी को अकेले छोड़ जाना जाने क्यों ठीक नहीं लग रहा था। दतुअन कर मिट्ठा खा मतवा ने पहली घूँट ली और पानी लगा!
चौकी पर लोटा रख थोड़ा अगोरने लगीं कि मन्द पड़े तो पानी पियें, तभी नेबुआ झँखाड़ की ओर से शोर उठने लगा। मतवा से अब नहीं रुका गया। लबदी उठा लँगड़ाती घर से निकलीं तो रमैनी काकी की गोहार सुनाई दी – मतवा हो! बड़हन खेला भइल बा, दउरि आवs।
राह में काँटे बिछा लहूलुहान करने वाली दौड़ कर खेला देखने का बुलावा दे रही थी! मतवा के पैर न आगे बढ़ें न पीछे जायँ!  
...
नेबुआ नियराया तो खदेरन को लोगों का घेरा दिखा। घेरे की भीतर से जुग्गुल की ऊपरी देह भर दिख रही – लाल बस्तर पहने वह किसी ओझा गुन्नी की तरह उछल रहा था। (जारी)           

सोमवार, 26 मई 2014

चढ़ते सूरज को सलामी भर थी!

ये सुब्ह है खास कि हवाओं में है उनके पहियों की धूल
वो जिनके आने से उट्ठे हैं हजारो दिलों में शूल
वो जिनके आने से खिले हैं लाखों दिलों में फूल
वो आयेंगे कि उनके आने से उजली होंगी खादियाँ
वो आयेंगे जिनके आने से तमीजदार होंगी खाकियाँ
उनके आने से उतरेगी इजलास की दीवारों से मैल
चमकेंगे वे खम्भे जो उठाये हैं ईमान और दर्द के बोझ
गर्दमन्द पब्लिक की मदहोशियाँ और बीमारियाँ
उड़ा देते हैं जो इक झटके में बैठे एसी कमरों में नेक
वो सीखेंगे नई कोर्निशें दुखती पीठों को सेंक
हमे हैं उम्मीद कि ग़ायब होंगे गड्ढे हमारे रस्तों से
हमें है उम्मीद कि ठगी ग़ायब होगी बोझिल बस्तों से
हमें है उम्मीद कि होगी तीमारदारी उन जनानियों की
जो जनते उम्मीद सहती रहती हैं उकूबतें सड़कों की
हमें है उम्मीद कि जन की बेवकूफियाँ होंगी शुमार
माजी की उन किताबों में जिन्हें पढ़ती रहीं नस्लें बीमार
ये सुब्ह है खास कि दिल है उदास और निगाहों में प्यास
ये सुब्ह है खास कि तिजोरियों में खिलखिला रही चाभियाँ
और सोने के तमगे टँगे हैं खादी की वर्दियों में
ये सुब्ह है खास कि जो होता रहा वक्त की दहाइयों में
उससे अब है आस कि होगा कुछ खास चन्द बरसों में
मेरे हाथ की कालिखों पर नज़र न डालो इन लम्हों में
देखो कि दिया है बाला भरपूर रोशनी में भी यह जताने को
चन्द कतरे ही बचे हैं आँसुओं के बाती की देह
बुझ जायेगी ग़र तुमने ग़ौर फरमाया नहीं
सूरज आते हैं जाते हैं साँझें घिरती हैं अन्धड़ों के साथ
देखो कि यह सुब्ह रहे खास आगामी सदियों तक
कुछ करो कि न हो हमें तकलीफ सोच बरसों में
जो किया हमने वह चढ़ते सूरज को सलामी भर थी!
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~ गिरिजेश राव 

सोमवार, 12 मई 2014

मतदान के दिन लौटती बारात के संग

... बारात प्रात: 5 बजे ही वापस चल दी। प्रयाग से बलिया पहुँच कर मतदान अनिवार्यत: करना था, भले बस सीधे बूथ पर ले जानी पड़े! मैं उत्साह को देख अभिभूत हो गया।
लौटती बारात एक स्थान पर चाय के लिये उतरी तो पार्श्वासीन श्वेतकेशी वृद्ध समाचारपत्र ले आये और बस के चलते ही उद्घोषणा किये - अपने ही जड़ मट्ठा डाल दिया! ग़ैर क़ानूनी माल उनके काशी ऑफिस में पकड़ा गया।
मैं नेट पर पहले ही प्रशासन की इस मामले में हुई छीछालेदर पढ़ चुका था लिहाजा मैंने उन्हें वैसे ही सलाह दी जैसे इस मंच पर वहाबियों और सेकुलरों को देता रहता हूँ - पहले पढ़ तो लीजिये!
उन्हों ने मेरी ओर तिरस्कार भरी दृष्टि फेंकी ही थी कि पीछे से नमो समर्थकों के शब्द रेले आये - अरे, पूरा बताइये तो सही, क्या हुआ?
सज्जन समाचार पढ़ कर वास्तविकता जान चुके थे लेकिन हार कैसे मानें? पुन: दुहरा दिये  - ग़ैर क़ानूनी माल ...
मुझसे रहा नहीं गया - बासी समाचार है दद्दू! कुछ भी ऐसा वैसा नहीं मिला और जो बरामद हुआ था, उसे वापस भी कर दिया बिना कोई केस किये!
आगे बैठे युवा को मसखरी सूझी - ये बताइये चचा, अबकी किसे भोट देंगे?
चचा उवाच - अब की तो कुंजर को
युवा - कुंजर को या चक्रिका को देने से अच्छा है कि कर को ही दे दें।
चचा भड़क उठे - काहें?
युवा - चुनाव के बाद ये दोनों कर का ही दंडवत करने वाले हैं। दलालों के बजाय सीधे महरानी को ही न दिया जाय, कम से कम क्रय विक्रय जोड़ तोड़ तो न होंगे!
बस में ठहाके गूँज उठे। खिसियाये वृद्ध ने कहा - अरे, मेरे एक भोट से क्या होगा?
युवा ने कहा - वही तो सब सोचते हैं, इसीलिये तो बंटाधार है।
... मामला और लम्बा खिंचता किंतु बस का वीडियो प्लेयर ठीक हो गया था। कलात्मक फिल्म 'गुंडईराज' चल पड़ी और बाल, किशोर, युवा, वृद्ध सभी मुँह बाये, आँखें फाड़े, आँखें चुराते, निर्विकार आदि आदि मुद्राओं में शांत हो महासाहित्यिक भोजपुरी गीत 'देख'ने लगे - ले ल, ले ल, ले ल ... ले ल हमके कोरा में, चोली के बटाम खोल ...
मुझ रात भर के जगे को नींद आने लगी, पब्लिक तो  हँचड़ के खाने के बाद ए सी डॉरमेट्री में फसड़ के सोयी थी, तरो ताजा थी सो बटन खुलने के बाद के 'गुंडईराज' की कल्पना के साथ दृश्य़ श्रव्य नृत्य का आनन्द लेने लगी।
मैं इस सोच को लिये निद्रालीन हो गया - इस पब्लिक को लोकतंत्र के बन्द खुलने के बाद उससे हो रहे बलात्कार को देखने में मजा आता है... 'गुंडईराज' सनातन है!