शनिवार, 24 नवंबर 2018

श्रीरामवनगमन एवं सरोजस्मृति


तेषां वचः सर्वगुणोपपन्नं,
प्रस्विन्नगात्रः प्रविषण्णरूपः। 
निशम्य राजा कृपणः सभार्यो, 
व्यवस्थितस्तं सुतमीक्षमाणः ॥ 
...
रथ पर आरूढ़ श्रीराम, सीता एवं लक्ष्मण वन को जा रहे हैं। दशरथ एवं कौशल्या देवी की पीछे से पुकार है, थमो सुमंत्र, थमो - तिष्ठ तिष्ठ। श्रीराम का आदेश है, भगाओ सुमंत्र सुमंत्र भगाओ, दु:ख को खींचना पापकर्म है - चिरं दुःखस्य पापिष्ठमिति, भगाओ - याहि याहि! - तिष्ठेति राजा चुक्रोश याहि याहीति राघवः।
सुमंत्र विचित्र परिस्थिति में हैं एवं राम ! मुड़ मुड़ कर पीछे देखते हैं, पुन: पुन: आगे। वाल्मीकि जी लिखते हैं, रथ के पीछे भागती, रुकती, आगे पुत्र को देखती, पीछे मुड़ कर पति को देखती कौशल्‍या देवी की गति ऐसी थी मानों नृत्य कर रही हों - नृत्यन्तीमिव मातरम्। प्रिय पुत्र बहू एवं अनुज सहित नयनों से दूर हो रहा है, पति की स्थिति चिंताजनक है, दो दूर होते प्रियपात्रों के बीच कौशल्या की स्नेह से बँधी इस स्थिति हेतु तुम्हें यही उपमा सूझी आदि कवि!
दो विरोधी पुकारों के बीच सुमंत्र की स्थिति कैसी है? मानों दो चक्रों के अंतर में सु मंत्री का मन पड़ गया हो!   
तिष्ठेति राजा चुक्रोश याहि याहीति राघवः। 
सुमन्त्रस्य बभूवात्मा चक्रयोरिव चान्तरा ॥ 
रथ दूर हो गया। बिछड़न बेला का वह गतिशील बिम्ब ठहर गया, जिसे जाना था, चला गया। मंत्रियों ने कहा, जिनके लौटने की हमें इच्छा है, उनके पीछे दूर तक नहीं जाते - यमिच्छेत्पुनरायान्तं नैनं दूरमनुव्रजेत्।
ऊपर का उपेन्‍द्रव्रजा छन्द उसी समय का है जब सहसा ही सब रुक जाता है, दु:ख जड़ीभूत हो जाता है कि मंत्रियों की वाणी सर्वगुणसम्पन्न है, मान जाओ तथा स्थिति वैसी हो जाती है कि हाथ मलते रह जाना होता है। रथ के पीछे भागते रहने से गात स्वेद से भीग गया है, दु:ख से भरा रूप विषण्ण है, समस्त अस्तित्त्व ही दु:खपूरित कृपण है तथा पुत्र को तकते राजा रानी के साथ ठगे से खड़े रह जाते हैं।
इस श्रांत दु:ख भरे क्षण को कवि 'ण' वर्ण के प्रयोगों द्वारा स्थिर कर देते हैं। देखें कि प्रत्येक चरण में ण है। तीन पंक्तियों का पूर्वार्द्ध भौतिक स्थिति है तो उत्तरार्द्ध प्रभाव की जिसमें 'ण' है, विषण्ण विविध :
वच: > गुण: 
प्रस्विन्न > विषण्ण 
निशम्य > कृपण: 
अंतिम पंक्ति में क्रम उलट जाता है, प्रभाव पहले है, कारक अनंतर - व्यवस्थित<सुतमीक्षमाण, पुत्र को देखते देखते ठहर गये ! सुर बढ़ा बढ़ा, एकाएक खींच लिया !
...
यह भारतीय काव्य का सौंदर्य है जिसमें वर्णगरिमा ध्यातव्य है। यह न अरबी मुगलई उर्दू में मिलेगा न उस 'मिजाज' वाले इसे समझ या सराह पायेंगे। आयातित संस्कृति आप को बड़े प्रेम से आप से ही काटती है।
'ण' की इस गरिमा को आधुनिक काव्य में देखना हो तो निराला की सरोज स्मृति पढ़ें। पुत्री की असमय मृत्यु के पश्चात उसका 'तर्पण' करता कवि पिता जाने क्या क्या उड़ेल देता है, दु;ख है, गहन दु:ख है किन्‍तु किसी महर्षि की भाँति उसे अभिव्यक्त करता है :
ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;
तनये, ली कर दृक्पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!
गीते मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम
पूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह - "पित:, पूर्ण आलोक-वरण
करती हूँ मैं, यह नहीं मरण,
'सरोज' का ज्योति:शरण - तरण!"  

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

छठ पर्व, स्कन्द एवं सूरसंहारम, कृष्ण, सन्तान गोपाल मन्‍त्र

यह मास कार्त्तिक कहलाता है क्यों कि इस मास पूर्णिमा के दिन चन्‍द्र कृत्तिका नक्षत्र पर होंगे। कृत्तिकायें अतिप्राचीन काल से ही गाँवों के स्वच्छ आकाश में अपनी विशिष्ट समूह आकृति के कारण नाक्षत्रिक प्रेक्षण एवं कथाओं का केन्द्र रहीं। ऋषि पत्नियाँ होने से ले कर स्कन्द माता होने तक कृत्तिकाओं की परास बहुत ही व्यापक है, जटिल है। वैदिक ग्रर्न्थों में वे सप्तर्षियों की सात पत्नियाँ हैं जिनका संयोग नहीं हो पाता क्यों कि सप्तर्षि उत्तर में रहते हैं तो कृत्तिकायें पूरब में।
एक बहुत ही प्राचीन प्रेक्षण है जब वसन्‍त विषुव (आज का 21 मार्च) के दिन सूर्य कृत्तिका नक्षत्र में उगते एवं नववर्ष का आरम्भ होता। कृत्तिका नक्षत्र के साथ नवरस नवसृष्टि भी जुड़ा हुआ था तथा कृत्तिकायें प्रजा या संतान प्राप्ति में सहयोगी पाई गईं। बहुत ही पुराने एवं अब सीमित प्रचलित मान्यताओं में शिव सूर्य स्वरूप हैं जिसके अवशेष आज भी प्रत्येक माह की कृष्ण त्रयोदशी/चतुर्दशी को शिवरात्रि मनाने से है जब पूरब में सूर्योदय से पूर्व द्वितीया कला समान दिखते चंद्र अस्त होते हैं तथा प्रतीत होता है कि शिव रूपी सूर्य चंद्र रूपी सोम को सिर पर धारण किये हुये थे। सूर्य में ताप है, ऊष्मा है तथा उनका अग्नि रूप वैदिक ग्रंथों में मिलता है। अग्नि की पत्नी स्वाहा सात ऋषि पत्नियों में से अरुंधती को छोड़ कर छ: के रूप धारण कर पति ऋषियों से युगनद्ध हुईं। कृत्तिका के सात तारों के छ: कृत्तिकाओं में परिवर्तन की कथा का मूल यह है। आगे शिव के पुत्र स्कन्द का जन्म हुआ जिन्हों ने देवसेना का नेतृत्त्व कर धरा को त्रास से मुक्ति दी। योद्धा पुत्र की जननियों के रूप में छ: कृत्तिकाओं की प्रतिष्ठा हो गयी तथा एक लम्बे कालखण्ड में स्कन्द एवं उनकी माताओं की आराधना होती रही जैसे आज कृष्ण एवं यशोदा की होती है। अग्नि अज अर्थात बकरे की सवारी करते दिखाये जाते हैं। अजमुख एक देवता भी होते थे - नैगमेष जिनकी बहुत प्रतिष्ठा थी तथा वे शिशुओं के संरक्षक रूप में माने जाते थे। नैगमेष को बाल स्कन्‍द एवं छ: माताओं के साथ चित्रित किया जाता था।
सूर्य-शिव-स्कन्‍द की समेकित संश्लिष्ट आराधना पद्धति आगे विकसित होती रही। कार्त्तिक मास के शुक्ल पक्ष की छठी तिथि एवं छठ मइया के मूल में यह धारा है जिसका सूर्य केंद्रित पक्ष शास्त्रों की आँखों से ओझल है। सन्दर्भ मिले तो लिखूँगा। स्कंद एवं छ: स्कंद माताओं की उपासना धारा के मूल में योग्य पुत्र की प्राप्ति की अभिलाषा रही जो कृष्ण आराधना की प्रबलता के साथ साथ क्रमश: तिरोहित होती चली गयी। पुत्रेष्टि यज्ञ आप ने सुना होगा जो कि अथर्वण परमरा केंद्रित था। उसी उद्देश्य से सरल पौराणिक रूप आया - सन्‍तान गोपाल मन्‍त्र अनुष्ठान जिसमें कृष्ण से अच्छी संन्तति हेतु प्रार्थना की जाती है - देहि मे तनयं कृष्ण .. एवं जिसका विधि विधान आज भी उपलब्ध है। विशाखा को स्कन्दप्रिया भी कहा जाता है, संयोग से आज सूर्य विशाखा नक्षत्र पर ही हैं। छ्ठ व्रत में पुरोहितों के न्यूनतम हस्तक्षेप होने का कारण लुप्त स्कन्द परम्परा से है जिसका कोई सूर्य पक्ष भी रहा होगा। छठ के स्कंद से जुड़े होने का प्रमाण अब दक्षिण में मिलता है। आज की तिथि कन्द षष्ठी के रूप में मनाई जाती है, व्रत उपवासादि होते हैं। व्रत प्रतिपदा से आरम्भ हो कर छ: दिन षष्ठी तक किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन स्कन्‍द या मुरुगन ने सूरपद्मन नामक दैत्य का वध किया था। यह दिन सूरसंहारम कहलाता है।
चित्र आभार : drikpanchang.com
कृत्तिकाओं पर कुछ और रोचक जानना हो तो यह आलेख भी पढ़ें।

रविवार, 11 नवंबर 2018

किशोर नाक्षत्रिकी - 1

पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, साथ में अपने अक्ष पर घूमती भी है (परिभ्रमण) जैसे कि कोई लट्टू नाचते हुये किसी बिंदु का चक्कर भी लगा रहा हो।
उसके घूमने का अक्ष परिक्रमा के तल से प्राय: 23.5 अंश झुका हुआ है। सर्कस में झुकी हुई मोटरसाइकिल के साथ चालक का एक गोले में घूमना समझें, केवल यह मान कर कि चालक ऐसी सीट पर सवार है जो अपने अक्ष पर भी घूम रही है।


धरती का परिभ्रमण अक्ष उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं को निश्चित करता है तथा उसके लम्बवत जिन दो बिंदुओं के निकटवर्ती क्षेत्र में सूर्य क्रमश: उगता एवं अस्त होता दिखता है, वे क्रमश: पूरब एवं पश्चिम होते हैं। जब इण्टरनेट, जी पी एस आदि नहीं थे तथा हम प्रकृति से इतने कटे नहीं थे, तब लोग दिशाओं को बिना किसी यंत्र के ही बता सकते थे क्यों कि उनकी आंतरिक समझ सूर्य गतियों से अधिक जुड़ी थी, दिन में भी अंधेरा कर कृत्रिम प्रकाश से चलने वाले कार्यालय भी नहीं होते थे।

अक्ष के झुकाव के कारण सूर्य प्रतिदिन ठीक पूरब में उगता या पश्चिम में अस्त होता नहीं दिखाई देता, इस दो दिशाओं के सापेक्ष उस काल अवधि में दोलन करता दिखता है जिसे हम वर्ष कहते हैं। वर्ष क्या है?

अक्ष पर पृथ्वी के इस झुकाव के कारण ऋतुयें होती हैं। ऋतु अर्थात एक निश्चित आवृत्ति से धरती के वातावरण में गरमी, ठण्ड, सूर्य के दिखने के घण्टों में घटबढ़। यदि झुकाव नहीं होता तो घटबढ़ नहीं होती, सूर्य सदैव एक बिंदु पर उगता दिखता, एक ही बिंदु पर अस्त होता अर्थात धरती के विविध क्षेत्र उसके गोले अपनी अपनी विशेष स्थिति के अनुसार सदा सदा एक ही मात्रा में ऊष्मा प्राप्त करते।

मनुष्य हेतु सबसे स्पष्ट निश्चित आवृत्ति से होने वाली प्राकृतिक घटना वर्षा है। मनुष्य ने देखा कि एक निश्चित आवृत्ति से कुछ महीने या दिन ऐसे आते हैं जब वह वर्षा अधिक होती है, निरंतर होती है जो कि कृषि अर्थात पेट पालन के लिये अन्न आदि उत्पन्न करने के उद्योग हेतु बहुत लाभकारी होती है। उस निश्चित आवृत्ति को वर्ष नाम दे दिया गया।

वास्तव में वर्ष पृर्थ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लिया गया वह समय है जिसे एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक की समय इकाई 'दिन' या 'दिनमान' में मापा जाता है। जो कि मनुष्य के अपने विभाजन से 36 मुहूर्त या 24 घण्टे होता है।

मनुष्य ने पाया कि वर्ष 365 से 366 दिन तक का होता है जिसे गणना में सुविधा के लिये उसने 360 का निकट मान कर विविध इकाइयाँ बनाईं।

उसने ऋतुओं अर्थात एक निश्चित कालखण्ड में देह पर, कृषि पर, पेड़ पौधों पर, जलवायु पर होने वाले समेकित प्रभावों को नाम दिये। मोटा मोटी जाड़ा, गरमी, वर्षा।

भारत में रहने वाले मनुष्य ने इन तीन का पौधों एवं त्वचा पर प्रभावों को देखते हुये दो दो में विभाजन और किया - वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शीत तथा छ: ऋतुयें हो गईं।

उसने पाया कि वसंत के समय जब कि चहुँओर पुष्प खिले होते हैं, त्वचा एवं मन पर नया नया सा प्रभाव होता है, एक दिन सूर्य ठीक पूरब में उगता है तथा ठीक पश्चिम में अस्त होता है। प्राय: आधा वर्ष बीत जाने पर ऐसा पुन: होता है। ये दो दिन विषुव कहे गये।

ऐसे ही एक समय ऐसा भी होता है जब सूर्य के उदय का बिंदु उत्तर की दिशा में झुकते झुकते एक समय के पश्चात पुन: लौटने लगता है, यही बात एक अन्य समय के साथ दक्षिणी झुकाव में भी होती है मानों सूर्य एक डोरी से बँधा लोलक हो जो दोलन कर रहा हो!

इस चार बिंदुओं ने उसकी नींव डाली जिसे हम आज कैलेण्डर कहते हैं। वसंत ऋतु वहाँ भी होती है जहाँ आज सम्पूर्ण विश्व में मान्य ग्रेगरी का कैलेण्डर विकसित हुआ। यह कैलेण्डर ऋतु सापेक्ष है तथा वसंत विषुव प्रत्येक वर्ष एक निश्चित दिनांक (~ 21 मार्च) को ही पड़ता है।

पृथ्वी की अन्य ऐसी भी गतियाँ हैं जिसकी आवृत्ति वर्ष से हजार लाख गुना है अर्थात बहुत धीमी है। उनके प्रभाव पर आगे बात करेंगे किन्‍तु अभी वर्ष पर ही केंद्रित रहते हैं।

वर्ष के साथ समस्या यह है कि वह न तो ठीक 365 दिन का होता है, न ही 366 दिन का। वह इन दो के बीच, लगभग 365 दिन एवं 5 घण्टों एवं उससे भी अल्प समयावधियों को मिला कर होता है जो एक पूर्ण घण्टे से कम होती हैं।

कैलेण्डर में तो केवल दिन होते हैं, घण्टे नहीं। अनेक वर्ष बीतने पर यह अतिरिक्त अवधि बढ़ते हुये गड़बड़ करने लगती है यथा चार वर्ष पश्चात लगभग एक पूरे दिन का अंतर तथा घण्टे से लघु अवधियों के कारण आगे के सैकड़ो हजारो वर्षों में जुड़ने वाले अंतर। इस कारण ही समायोजन किया जाता है - लौद या लीप वर्ष, प्रत्येक 4 वर्ष पर एक दिन जोड़ कर 366 दिन का वर्ष मानना। अन्य समायोजन भी घण्टे से लघु अवधियों हेतु होते हैं जिन्हें हम आगे देखेंगे।

ध्यान देने योग्य यह बात है कि ग्रेगरी के कैलेण्डर में समायोजन इस प्रकार सदैव चलता रहेगा। ऋतु आधारित इस वर्ष गणना में किसी ऋतु का आरम्भ प्राय: निश्चित दिनांक पर ही होगा (लौद समायोजन के कारण कुछ एक दिनों का ही अंतर हो सकता है)। यह स्थिति हजारो वर्षों तक ऐसे ही रहेगी क्यों कि समायोजन कर के एक निश्चित दिनांक को वसंत विषुव हेतु सुरक्षित रखा जाता रहेगा।

यह हुआ पूर्णत: ऋतु या पृथ्वी से दर्श सूर्य गति आधारित कैलेण्डर किंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती। आकाश में रात में चंद्रमा भी दिखता है, उसका क्या? क्या ऐसे वर्ष भी हो सकते हैं जो सूर्य के अतिरिक्त चंद्र गति पर भी आधारित हों या केवल चंद्र गति पर ही आधारित हों?

उत्तर हाँ है। इस हाँ में मानव की विराट मेधा एवं प्रेक्षण क्षमता के प्रमाण हैं जिन्हें हम अगले अंक में देखेंगे।

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

रावण द्वारा सीताहरण : रामेति सीता दु:खार्त्ता ... हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक !

रावण ने छल का रूप धारण किया - शिखा, दण्ड, कमण्डल, काषाय वस्त्र, पाँवों में उपानह, छाता - एक परिव्राजक, परिभ्रमण करने वाले भिखारियों का जो रूप होता है, वह धारण किया। (3044001-3)
तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः । स विकाङ्क्षन्भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव ॥
तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तरमास्थितः । अभिचक्राम वैदेहीं परिव्राजकरूपधृक् ॥
श्लक्ष्णकाषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही । वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू ।
परिव्राजकरूपेण वैदेहीं समुपागमत् ॥

इतना कायर था कि लक्ष्मण के रहते वहाँ नहीं आया, चले जाने की प्रतीक्षा करता रहा। सीता तो सरलमना हैं, अपहृत होने से पूर्व उनका उसके साथ का जो संवाद है, वह उनके मन में करुणा जगाता है जो आगत जानते हैं। सीता कुछ नहीं छिपातीं। आज भी गाँव गिराम में भ्रमण करते वैरागियों के प्रति स्त्रियों का जो सहज भाव होता है, वह वाल्मीकि के वर्णन में निखर उठता है एवं विडम्बना पर पाठक का मन त्राहि त्राहि करने लगता है (साथ ही मुण्डियों, जटिलों आदि से स्त्रियों को दूर रखने की नीतिज्ञों की चेतावनी भी प्रतिध्वनित होने लगती है।)
उसके आगमन की भयानकता को रेखांकित करने हेतु वाल्मीकि नाक्षत्रिक एवं भौमिक, दोनों उपमाओं का आश्रय लेते हैं, निकट बहती नदी तक मन्द हो जाती है ! राम, लक्ष्मण के न होने पर सीता ऐसे जैसे सूर्य एवं चंद्र के बिना संध्या हो, रावण ऐसे जैसे चित्रा नक्षत्र पर शनि की छाया हो, जैसे तृणों से ढका कुँआ हो ! सीता पति एवं देवर के कुशल की चिन्‍ता में थीं, सोच के कारण भव्य रूप अभव्य हो रहा था किन्‍तु अतिथि  ब्राह्मण के सत्कार हेतु पूर्णत: प्रस्तुत हुईं :   
3044001a तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः
3044001c स विकाङ्क्षन्भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव
3044002a तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तरमास्थितः
3044002c अभिचक्राम वैदेहीं परिव्राजकरूपधृक्
3044003a श्लक्ष्णकाषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही
3044003c वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू
3044003e परिव्राजकरूपेण वैदेहीं समुपागमत्
3044004a तामाससादातिबलो भ्रातृभ्यां रहितां वने
3044004c रहितां सूर्यचन्द्राभ्यां संध्यामिव महत्तमः
3044005a तामपश्यत्ततो बालां राजपुत्रीं यशस्विनीम्
3044005c रोहिणीं शशिना हीनां ग्रहवद्भृशदारुणः
3044006a तमुग्रं पापकर्माणं जनस्थानरुहा द्रुमाः
3044006c समीक्ष्य न प्रकम्पन्ते न प्रवाति च मारुतः
3044007a शीघ्रस्रोताश्च तं दृष्ट्वा वीक्षन्तं रक्तलोचनम्
3044007c स्तिमितं गन्तुमारेभे भयाद्गोदावरी नदी
3044008a रामस्य त्वन्तरं प्रेप्सुर्दशग्रीवस्तदन्तरे
3044008c उपतस्थे च वैदेहीं भिक्षुरूपेण रावणः
3044009a अभव्यो भव्यरूपेण भर्तारमनुशोचतीम्
3044009c अभ्यवर्तत वैदेहीं चित्रामिव शनैश्चरः
3044010a स पापो भव्यरूपेण तृणैः कूप इवावृतः

देवी सीता के रूप को देख रावण कामबाण से आहत हो गया तथा वेदमन्त्र पढ़ने लगा जिससे कि उनमें विश्वास हो जाय कि यह तो कोई महापुरुष हैं ! दृष्ट्वा कामशराविद्धो ब्रह्मघोषमुदीरयन् । तत्पश्चात उसने उनके रूप का विशद वर्णन उन्हीं से किया।
ब्रह्मघोषं को वेद वाचन मानें या ब्राह्मण होने का उद्घोष, दोनों ही स्थितियों में तत्कालीन समय अनुसार छल की पराकाष्ठा ही परिलक्षित होती है।
आर्यावर्त के दो महान कुलों का संस्कार था, देवी सीता ने अतिथि ब्राह्मण का आदर करते हुये पाद्य अर्घ्य समर्पित किया एवं भोजन हेतु निमंत्रण भी दिया किन्‍तु कथित रूप से परम विद्वान, पौलस्त्य राक्षस रावण के मन में तो कुछ और ही था !
3044033a द्विजातिवेषेण समीक्ष्य मैथिली; तमागतं पात्रकुसुम्भधारिणम्
3044033c अशक्यमुद्द्वेष्टुमुपायदर्शना;न्न्यमन्त्रयद्ब्राह्मणवद्यथागतम्
3044034a इयं बृसी ब्राह्मण काममास्यता;मिदं च पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति
3044034c इदं च सिद्धं वनजातमुत्तमं; त्वदर्थमव्यग्रमिहोपभुज्यताम्
3044035a निमन्त्र्यमाणः प्रतिपूर्णभाषिणीं; नरेन्द्रपत्नीं प्रसमीक्ष्य मैथिलीम्
3044035c प्रहस्य तस्या हरणे धृतं मनः; समर्पयामास वधाय रावणः
3044036a ततः सुवेषं मृगया गतं पतिं; प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा
3044036c निरीक्षमाणा हरितं ददर्श त;न्महद्वनं नैव तु रामलक्ष्मणौ

ब्राह्मणवेशधारी राक्षस रावण ने परिचय पूछा एवं देवी सीता ने परिचय देने से पूर्व एक मुहूर्त (दो घटी या आज का 48 मिनट) तक विचार किया - दुविधा समझी जा सकती है कि अपरिचित आगंतुक से कुछ अधिक बताना ठीक नहीं, किन्‍तु ब्राह्मण है, वेदघोष करता है, न बताने पर कहीं रुष्ट हो शाप दे बैठा तो!
3045001a रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा
3045001c परिव्राजकरूपेण शशंसात्मानमात्मना
3045002a ब्राह्मणश्चातिथिश्चैष अनुक्तो हि शपेत माम्
3045002c इति ध्यात्वा मुहूर्तं तु सीता वचनमब्रवीत्

अपना परिचय देने के पश्चात देवी सीता ने रावण से परिचय पूछा जो कि समयसम्मत था कि ब्राह्मण से नाम, गोत्र एवं कुल का परिचय पूछा जाना चाहिये - स त्वं नाम च गोत्रं च कुलमाचक्ष्व तत्त्वत: ।
रावण ने क्या ब्राह्मणत्व वाला परिचय दिया !
हे सीता ! देव, सुर, मनुष्य सहित जिससे समस्त लोक त्रस्त हैं, मैं वह रावण नामधारी राक्षसराज हूँ - 
येन वित्रासिता लोका: सदेवासुरमानुषा: ।  अहं स रावणो नाम सीते रक्षोगणेश्वर: ॥
लम्पट ने पटरानी होने का प्रस्ताव रख दिया । देवी सीता तो जैसे आकाश से गिरीं ! श्रीराम के प्रति महेन्द्र एवं सागर, दोनों की उपमा देते हुये मानों उन्हों ने उनके प्रति अपने दृढ़ एवं गहन प्रेम का परिमाण प्रस्तुत कर दिया - ‍महागिरिमिवाकम्प्यं महेन्‍द्रसदृशं पतिं । महोदधिमिवाक्षोभ्यमहं राममनुव्रता ॥
आगे उन्हों ने उसे जो खरी खोटी सुनाई है, वह अप्रतिम है - जम्बुक: सिंहीं इच्छसि ! ब्रह्मराक्षस रावण अपनी लम्पटता के कारण जगविख्यात था। सीता को अपने अपहरण की आशंका हो गई, उन्होंने उसे श्रीराम का बल प्रभाव बताते हुये चेताया कि जलती हुई आग को कपड़े में बाँध ले जाना चाहता है! मारा जायेगा।
राक्षस समझ गया कि प्रलोभन से नहीं मानेगी, स्यात कुल की डींग हाँकने से मान जाय ! कुल के डींग की प्रवृत्ति आज भी दशहरे के निकट कुछ में मरोड़ने लगती है - सवर्ग प्रीति।
उसने कहा - मैं वैश्रवण कुबेर का सौतेला भाई हूँ - भ्राता वैश्रवणस्याहं सापत्न्यो वरवर्णिनि। सीता ने उत्तर दिया - अरे, वे तो समस्त देवों के पूजनीय हैं। तुम उनसे अपने को जोड़ पापकर्म करता है - कथं वैश्रवणं देवं सर्वभूतनमस्कृतम् !
श्रीराम के प्रति विश्वास फूट पड़ा - इंद्र की पत्नी शचि का अपहरण कर सम्भव है जीवित रहना किंतु राम की पत्नी का हरण कर कुशल से रह पाना - असम्भव!
अपने प्रति अभिमान भी भर आया - मेरे जैसी स्त्री का अपहरण कर तू अमृत भी पी ले तो जीते जी तुम्हें छुटकारा नहीं होना - न मादृषीं धर्षयित्त्वा पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्ष: !
रावण ने सौम्य रूप त्याग कर विकराल रूप धारण कर लिया, कामलोलुप हो उन्हें पकड़ लिया मानों बुध ने अपनी माता रोहिणी को उस भाव से पकड़ने का दुस्साहस किया हो - बुध: खे रोहिणीमिव ।
जो ब्रह्मबंधु यह लिखते नहीं थकते कि रावण ने देवी सीता को छुआ तक न था (उनके लिये जब तक बलात्कारी यौन कर्म सम्पन्न न हो जाय, तब तक छुआ क्या?) उनके लिये यह श्लोक :
वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण स: । 
ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना ॥
उसने बायें हाथ से कमलनयनी सीता के केश पकड़े, दाहिने हाथ को उनकी जंघाओं के नीचे लगा उठा लिया । 
खरयुक्त: खरस्वन: - गधों से जुता एवं उनके समान ही ध्वनि करने वाले महारथ पर बिठा कर ले चला। 
सीता दु:खी एवं आर्त्त हो राम लक्ष्मण को पुकारने लगीं - रामेति सीता दु:खार्त्ता ... हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक !

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

निजी हिन्दी चिट्ठाकारी - एक सिंहावलोकन




मैंने दस वर्ष पूर्व विक्रम संवत 2065 में चिट्ठा (blog) हिंदी में लिखना आरम्भ किया तथा उसे पूरब की माटी के अनुकरण में 'चिठ्ठा' कहा, 'ठ' का डेढ़त्व 😄। उस वर्ष मात्र एक प्रविष्टि रही । 
तब से अब तक दो मुख्य एवं अन्य चिट्ठों को मिला कर प्राय: सवा ग्यारह सौ प्रविष्टियाँ लिख चुका हूँ।
गद्य लेखन हेतु मुख्यत: 'आलसी का चिठ्ठा' है तो पद्य हेतु 'कवितायें और कवि भी'। पद्य एवं गद्य प्रविष्टियों में अनुपात ‍~ 1:2 का रहा है। 2067 सबसे उर्वर वर्ष रहा जिसमें लगभग पौने तीन सौ प्रविष्टियाँ आईं तथा पद्य एवं गद्य की लगभग समान संख्या रही। आगे के दो वर्ष संख्या घटी किन्‍तु नव्य विषयों पर नई विधाओं में रचना कर्म हुआ। 2069 के पश्चात 2070 में सहसा ही प्रविष्टि संख्या पहले की 55% रह गई, आगे के वर्षों में भी संख्या घटती चली गयी। वर्ष 2072 में मात्र 27 प्रविष्टियाँ आईं, तब से अब अति मंद गति से उठान है इस वर्ष अब तक 36 प्रविष्टियाँ हो चुकी हैं।
इन वर्षों में भाषा अनिवार्यत: संस्कृतनिष्ठ होती गयी यद्यपि पद्य में नागरी उर्दू में कुछ ऐसी रचनायें, नज़्में एवं ग़जलें भी आईं जिन्हें उस अप्रकट चुनौती का उत्तर कहा जा सकता है जिसके अनुसार उर्दू काव्य कोई शतघ्नी है। यह कहना उचित होगा कि उनका छन्द या लय विधान अनेक स्थानों पर देसी है, हिन्दी है।
महा/खण्ड काव्य के अतिरिक्त काव्य की प्राय: हर विधा में रचा। लम्बी कविता 'नरक के रस्ते' में उसका सार है जो मुझे कम्युनिस्ट मार्ग से मिला जिससे अब बहुत दूर आ चुका हूँ। इतना सब होते हुये भी मैंने सदैव अपने काव्य को ‌_विता कहा क्यों कि कवि कर्म को मैं आज कल के अर्थ में नहीं लेता।
गद्य में नाटक के अतिरिक्त प्रत्येक विधा में लिखा, बहुत लिखा। कविता एवं गद्य, दोनों में विपुल प्रयोग भी किये, जिनमें कुछ को भयानक, जुगुप्सित या बालपन भी कहा जा सकता है :) अपनी रची कहानियों को कहानी कहते हुये भी सङ्कोच होता है किन्‍तु उनके भी ग्राहक हैं ।
गद्य में कोणार्क शृंखला को पाठकों ने बहुत सराहा । मेरी समस्त सर्जनात्मकता का निचोड़ 'एक अधूरा प्रेमपत्र' एवं 'बाउ कथा', इन दो धारावाहिकों में है। विशाल किन्‍तु अधूरा 'अधूरा प्रेमपत्र' अब पाठकों को उपलब्ध नहीं है तथा बाउ कथा उपलब्ध होने पर भी ठहरी हुई है क्यों कि प्रवाह टूटने के पश्चात वह विशेष क्षण नहीं आ रहा जिसके आगे सब तट पर तज बहना पड़ता है। जहाँ तक मेरी प्रतीति है, इन दो को पढ़ने वाले भी अल्प ही मिलेंगे किन्‍तु इन दो को पुस्तक रूप में प्रकाशित किये बिना धरा से प्रयाण नहीं करना है । :)
भारतविद्या यथा रामायण, नाक्षत्रिकी, शब्द, पुराण, वेदादि पर भी बहुत लिखा एवं लिखे जा रहा हूँ।
2070 से फेसबुक एवं ट्विटर पर सक्रिय उपस्थिति है, जुड़ तो 2065 में ही गया था। इन पर कितना लिखा, आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। किसी दिन इन्हें भी खँगालना है। लगभग दो वर्ष पूर्व मघा पत्रिका में लिखना आरम्भ किया जो अनवरत चल रहा है।
अपने चिट्ठों को देखता हूँ तो वर्तनी शुद्धता 95% से नीचे नहीं लगती जिसे
 मैं अपनी एकमात्र उपलब्धि मानता हूँ। शेष तो पाठक जानें। 
चिठ्ठाकारी के आरम्भ में मैं एक द्विपदी कहता था :
' पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं,
तफसील पूछोगे तो कह दूँगा - मुझे कुछ नहीं पता। '

प्रेमकथा हो या बाउ कथा, उनके लिये लिखा करता था -
' ...एक भटकता औघड़ है जिसके आधे चेहरे चाँदनी बरसती है और आधा काजल पुता है। संसार जो भी कहे, उसे सब स्वीकार है। वह तो रहता ही अँधेरी गुफा में है जिसकी भीतों पर भी कालिख पुती है ... वह जाने क्या क्या बकता रहता है। '
तथा
' मेरे पात्र बैताल की भाँति,
चढ़ जाते हैं सिर और कंधे पर, पूछते हैं हजार प्रश्न ।
मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूँ उत्तर
...प्रतिदिन मेरा सिर हजार टुकड़े होता है।'

बड़ा ही देसी प्रकार का आत्मविश्वास था, जो आज भी बना हुआ है। मेरा मात्र यही है, मैं कोई आचार्य वाचार्य नहीं हूँ। किञ्चित समर्पण हो तो आप भी वह कर सकते हैं जो मैं इन वर्षों में करता रहा हूँ, उसकी लब्धि क्या रही, सिद्धि क्या रही, मुझे नहीं पता।
‌‌‌____________
हिन्‍दी चिट्ठों के पते ये हैं :


https://girijeshrao.blogspot.com
 https://kavita-vihangam.blogspot.com/
शब्द आधारित अंतर्जाल स्थल यह है :

 http://nirukta.in/
इनके अतिरिक्त भी हैं किन्‍तु सक्रियता अत्यल्प है। परिवार के साथ साथ उन सब का भी ऋणी हूँ जिन्हों ने सराहा, प्यार दिया, प्रोत्साहित किया तथा उपयोगी सुझाव भी दिये। 
_____________________
॥ त्वदीयं वस्तु गोविन्‍दं तुभ्यमेव समर्पये ॥