रविवार, 24 जुलाई 2011

तिब्बत - चीखते अक्षर (14)

पूर्ववर्ती: 
तिब्बत - चीखते अक्षर : अपनी बात 
तिब्बत - चीखते अक्षर : प्राक्कथन 
तिब्बत – क्षेपक 
तिब्बत-चीखते अक्षर:(1),(2),(3),(4),(5),(6),(7),(8),(9),(10),(11),(12),
(13)
अब आगे ...


उद्योग


1976 तक तिब्बत में उद्योगों की संख्या 272 बताई जाती थी। उनमें एक डेरी प्लांट जिसमें डिब्बाबन्द सुखाये गये दूध का उत्पादन होता है, चमड़े के कारखाने और ऊन की मिलें सम्मिलित हैं। हालाँकि, जैसा कि दूसरे उद्योगों के साथ होता है, उत्पादित की गई सामग्री तिब्बत से बाहर चीन, हांगकांग और नेपाल ले जाई जाती है। आधिकारिक रूप से यह बताया जाता है कि उत्पाद ‘राज्य को अर्पित किये गये’। कार्मिकों का अधिकांश (75-80% या अधिक) चीनी है और समस्त महत्त्वपूर्ण पदों पर वही बैठे हैं। तिब्बत में कोयले का उत्खनन, विशेषकर फेन्पो क्षेत्र में, वृहद स्तर पर होता है और दिसम्बर 1977 के दौरान उत्पादन 87400 टन था। सोने की खुदाई त्सोना क्षेत्र में होती है जब कि लौह अयस्क जांग क्षेत्र से निकाला जाता है। शरणार्थी वृहद स्तर पर खनिज उत्खनन, उन्हें चीन भेजे जाने और क्रोम की खदानों में तिब्बतियों से काम लिये जाने की बातें बताते हैं। ल्हासा रेडियो ने सूचना दी कि ल्हासा में एक बड़े भूवैज्ञानिक सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें तिब्बती पठार में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के 36 खनिजों का विश्लेषण किया गया जिनमें से कुछ बहुत अत्यल्प मात्रा में मिलते हैं और उनमें यूरेनियम तथा प्लूटोनियम सम्मिलित हैं।
        
उदारीकरण और धार्मिक स्वतंत्रता

तिब्बती आँसू - सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडल का स्वागत 
 1979/80 में तिब्बत में एक बहुप्रचारित उदारीकरण कार्यक्रम का प्रारम्भ हुआ। परंतु ऐसा नहीं प्रतीत होता कि इसका बहुत प्रभाव पड़ा और सम्भवत: यह इस वास्तविकता पर हताशा भरी प्रतिक्रिया थी कि यह सिद्ध हो गया था कि तिब्बत से बौद्ध धर्म का निर्मूलन असम्भव था। चीनी निस्सन्देह रूप से आशान्वित थे कि प्रतीतमान सुधारों को देखते हुये दलाई लामा लौट आयेंगे। वह चीनियों के लिये एक मूल्यवान परिसम्पत्ति की तरह होंगे क्यों कि तिब्बती लोग उनके प्रति बहुत असाधारण आदर की भावना रखते हैं। पूरे तिब्बत में झुंड के झुंड तिब्बती सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडलों को देखने को इकठ्ठे हुये क्यों कि वे जानते थे कि उन्हें दलाई लामा ने भेजा था और बहुत सी बड़ी बैठकों का फिल्मांकन हुआ। अक्सर लोगों ने प्रतिनिधियों तक पहुँचने और उन्हें छूने के प्रयास अपने बच्चों को तिब्बती नाम देने की प्रार्थना के साथ किये। कई बच्चे और युवा हाथों में फूल लिये उन तक यह कहने के लिये पहुँचे कि ‘बुद्ध की शिक्षाओं का सूरज एक दिन पुन: उदित हो’। सर्वाइवल इन्टरनेशनल के स्टीफेन कोरी ने जिसे ‘तीस वर्षीय विकृत हिंसक दमन’ कहा है, बौद्ध धर्म उससे बचने में सफल हुआ जिससे पुराने दौर के शासन के दौरान इसके कथित दमनकारी स्वभाव का चीनी दावा झूठा साबित होता है।       
यह एक असंदिग्ध सत्य है कि उत्तर भारत में दलाई लामा की निर्वासित सरकार चीनियों के लिये एक नित वर्धमान उलझन का एक ऐसे समय कारण बनी हुई है जब कि चीनी तकनीकी विशेषज्ञता और ज्ञान हासिल करने के प्रयास में अंतरराष्ट्रीय समाज के सामने एक निष्पाप रुख प्रस्तुत करने के लिये संघर्षरत हैं। प्रतीत होता है कि उदारीकरण के इस काल में कुछ करों को समाप्त कर दिया गया लेकिन ऐसा कुछ समय के लिये ही था। तिब्बत के कुछ भागों में अस्थायी रूप से भले कुछ कम्यूनों को भंग कर दिया गया होगा लेकिन किसी को निश्चित रूप से यह पता नहीं है कि वास्तविक नीति क्या है। तिब्बतियों को भारत अपने सम्बन्धियों से मिलने जाने के लिये अनुमति दी गई लेकिन उनके परिवार तिब्बत में ही रहे ताकि गये लोगों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित रहे। धार्मिक स्वतंत्रता में कुछ बढ़ोत्तरी की गई लेकिन तिब्बती तब भी दलाई लामा के चित्र रखने के लिये बन्दी बनाये जा सकते थे क्यों कि चीनी यह आरोप लगा देते थे कि उसका राजनैतिक महत्त्व था। यह भी है कि तिब्बतियों के धार्मिक रंग लिये खुले आयोजनों जैसे प्रार्थना ध्वजारोहण, साष्टांग प्रार्थना, अगरबत्तियाँ जलाने और प्रदक्षिणा (जिन्हें पर्यटक देख सकते हैं) पर चीनी ध्यान नहीं देते लेकिन धर्म के वास्तविक अनुगमन को वे प्रतिबन्धित करते हैं। अक्सर सम्वाददाता धार्मिक उत्साह के ऐसे खुले प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग उनके पीछे छिपी वास्तविकताओं की अपर्याप्त समझ के साथ करते हैं। चीनियों ने यह स्पष्ट रूप से कह रखा है कि कोई भी व्यक्तिगत स्तर पर पूजा करने के लिये स्वतंत्र है लेकिन वह दूसरों को धर्मपालन हेतु प्रभावित नहीं कर सकता – इसका अर्थ यह हुआ कि वृद्ध लोग नई पीढ़ी को शिक्षित नहीं कर सकते। यह एक तथ्य ही यह भंडाफोड़ कर देता है कि तिब्बत में धार्मिक स्वतंत्रता का पूरा बाह्यावरण शेष संसार को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं है।
इसके अतिरिक्त, वे अवतारी लामाओं की खोज और पहचान का निषेध करते हैं। उन्हों ने यह घोषणा कर रखी है कि अठ्ठारह वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति भिक्षु नहीं बन सकता; यह भी कि जो लोग भिक्षु जीवन चुनते हैं उन्हें अपने लिये स्वयं व्यवस्था करनी चाहिये और वे लोग अपने परिवार पर आश्रित नहीं रह सकते; धार्मिक उद्देश्यों के लिये चन्दा नहीं माँगा जा सकता और माता पिता अपने बच्चों को धार्मिक समारोहों में नहीं ले जा सकते। यह सब इसे स्पष्ट कर देता है कि चीनियों की वास्तविक नीति तिब्बत जैसे बलात कब्जा किये क्षेत्रों के साथ चीन के सभी भागों से धर्म का उन्मूलन बनी हुई है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति का वैचारिक मुखपत्र ‘लाल ध्वज’ इस नीति को पूर्ण रूप से स्पष्ट कर देता है 1। तथापि तिब्बतियों ने अपने धर्म को छोड़ना स्वीकार नहीं किया है।
सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडल के आगे विह्वल रोती
इस तिब्बती स्त्री ने जाने कितनी यातनायें सही होंगी।  
साधारणतया यह संज्ञान में नहीं लिया जाता कि उदारीकरण के दौर में भी यातना और पिटाई व्यापक रूप से जारी थे जब कि चीनी मुख्य रूप से, उनके अनुसार सांस्कृतिक क्रांति के दौरान, की गई ‘ग़लतियों’ को स्वयं स्वीकार रहे थे। उदाहरण के लिये, तिब्बती स्त्री त्सेरिंग ल्हामो को 1979 में पहले सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडल के दौरे के दौरान चीन-विरुद्ध नारे लगाने के लिये बिजली के झटकों द्वारा यातना देकर पागल बना दिया गया। वैज्ञानिक बौद्ध संगठन और तिब्बती बौद्ध संस्थायें उसका मामला एमनेस्टी इंटरनेशनल तक ले गईं और इस बात की सूचना मिली कि उसे मई 1982 में मुक्त किया गया। उसका पुत्र लोब्सांग चोडाग भी गिरफ्तार हुआ था और इस बात का पता चला है कि उसकी पिटाई होती रही है जिससे सम्भवत: उसका जबड़ा भी टूट गया है। कुछ रिपोर्टें यह भी सुझाती हैं कि त्सेरिंग ल्हामो को हाल ही में पुन: बन्दी बना लिया गया होगा लेकिन इस समय उसके बारे में और सूचना नहीं है। उदारीकरण के उस दौर में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की समिति के तत्कालीन प्रथम सचिव यिन फटांग ने 1981 में ल्हासा में हुये पार्टी प्रतिनिधि सम्मेलन में यह सूचना दी कि ‘तिब्बत में आम जन समर्थित प्रतिरोध के साथ गम्भीर उपद्रव और तोड़ फोड़  व्यापक स्तर पर फूट पड़े हैं’। मई 1982 में तिब्बती उपनगर शिगात्से में 115 लोगों को प्रकट रूप से ह्रासोन्मुख पश्चिमी तौर तरीकों जैसे लम्बे केश रखने आदि में लिप्त होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया (उन्हें राजनैतिक आरोपों के आधार पर गिरफ्तार नहीं किया गया, चीनी अब उनका प्रयोग यदा कदा ही करते हैं)। बहुतों को बुरी तरह से पीटा गया।
यह सब उदारीकरण के दौर में घटित हुये जब कि चीनियों ने दूसरे सत्यशोधक प्रतिनिधिमंडल के दौरे में एकदम प्रारम्भ में ही कतर ब्योंत कर दी क्यों कि तिब्बतियों की एक भारी भीड़ ने दलाई लामा के समर्थन में एक प्रदर्शन किया जो स्पष्टतया प्रतिनिधियों को चीनी शासन के बारे में अपनी भावनाओं से अवगत कराना चाह रही थी। चीनियों ने बलपूर्वक बहुत से उपस्थित सम्वाददाताओं को प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से प्रश्न पूछने से रोका और विश्व प्रेस में इस घटना की व्यापक रिपोर्टिंग हुई। (जारी)
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'लाल ध्वज The Red Flag' के दिनांक 16/06/1983 के सम्पादकीय अंश का अंग्रेजी पाठ इस प्रकार है:
'.... under the guise of protecting freedom of religious belief, we greatly develop the socialist economy, culture, science and technology.... so as to gradually eliminate the social and cognitive sources that have given rise to religion and enable it to exist'. 
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आगे भाग (15)
आतंक का नया दौर
स्वायत्तता का झूठ
और
उपसंहार   

6 टिप्‍पणियां:

  1. कुटिलता की अटलता कोई चीनियों से सीखे। 'लाल ध्वज' मुखपत्र का guise उनकी नीतियों की वास्तविकता की पोल खोल देता है। वे जो शुभेच्छा दर्शाते हैं, मंशा उसके उलट होती है। कुटिलता तो अपनी जगह है ही। हाल में दलाई लामा से मिलने के मामले में अमेरिका को आँख दिखाने का मामला हो या अरुणांचल प्रदेश के कराटे खिलाड़ियों के वीजा स्टेपल से जुड़ा विवाद हो - they are consistent in their wicked approach. यह तो पड़ोसियों को सोचना और सुधरना है कि कैसे रहें?

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  2. दर्दनाक विवरण, पता नहीं हम कब समझेंगे यह कुटिलता।

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  3. चीनियों की वास्तविक नीति तिब्बत जैसे बलात कब्जा किये क्षेत्रों के साथ चीन के सभी भागों से धर्म का उन्मूलन बनी हुई है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति का वैचारिक मुखपत्र ‘लाल ध्वज’ इस नीति को पूर्ण रूप से स्पष्ट कर देता है।

    मौलिक मानवाधिकारों का दमन ही लाल क्रांतियों(?) और ‘लाल ध्वज’ का आधार रहा है। दमनकारी बार-बार यह भूल जाते हैं कि जनता की सहनशीलता की सीमा टूटती अवश्य है और फिर उनकी स्वतन्त्रता का मार्ग कोई गोली/टैंक रोक नहीं पाता।

    साधारणतया यह संज्ञान में नहीं लिया जाता कि उदारीकरण के दौर में भी यातना और पिटाई व्यापक रूप से जारी थे जब कि चीनी मुख्य रूप से, उनके अनुसार सांस्कृतिक क्रांति के दौरान, की गई ‘ग़लतियों’ को स्वयं स्वीकार रहे थे।
    उघड चुके हर अपराध को तानाशाहीयाँ ग़लती बताते हैं और अगली बार उस दमन को अधिक क्रूर तरीके से उघडने की ग़लती के बिना करते हैं - जब तक कि उनके पाप का सागर उफ़नकर उन्हें डुबो न दे।

    स्वतंत्रता मानवमात्र का मौलिक अधिकार है। तिब्बत ही नहीं, चीन की जनता भी जल्दी ही कम्युनिस्ट दमन से मुक्त होगी!

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  4. all this is horrifying .. कैसे लिख पा रहे होंगे आप - पता नहीं | कैसे जी पाते होंगे ये लोग - पता नहीं | कैसे इन्सान इतना जुल्म कर पाते हैं दूसरे इंसानों पर - पता नहीं !!

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  5. आत्मा तिलमिला गयी. बचपन में उनकी सुन्दर सुन्दर पत्रिकाएं यथा चाइना पिक्टोरिअल, चाइना टुडे आदि प्राप्त कर प्रसन्न होते थे और एक भरम पाल लिया था.

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