शनिवार, 17 मार्च 2012

लोक: भोजपुरी- 9: पराती, घरनियों का सामगायन

रात पहर भर शेष है लेकिन अदृश्य पहरुओं ने जगा दिया है। मैं उस संसार में हूँ जो मेरा नितांत अपना है - मेरा अंत:संसार। वह संसार जहाँ की अनुभूतियाँ मुझे स्वयं के भीतर किसी और का अनुभव कराती हैं और जिनमें डूबते उतराते मैं लिखता हूँ...जाने कितने वर्षों तक अपना अस्तित्त्व पसर गया है- मैं कहीं और हूँ।
ग्रीष्म है, भोर है, गाँव है, गुमधुम शोर है। घर के बाहरी चबूतरे पर स्त्रियाँ इकठ्ठी हैं - चचेरे भाई का 'लगन लग' गया है। काका किनारे बैठे लाठी पर ठोड़ी  टेके प्रतीक्षा में हैं। मैं बगल में बैठ जाता हूँ - का होई?
"पराती गावे जुटल बालोऽ, नाहीं जानेलऽ?"
उनके प्रश्न को तोड़ता हुआ एक किशोरी का स्वर - सबके कहि अइनी  हो चाचीऽ! सभे आ गइल बाऽ। जैसे चाची यानि मेरी अम्मा को संकेत मिल गया हो। वह कढ़ाती हैं -    
ए भोरऽ भऽइल भीनुसहराऽ चिरइया एक बोलेले।
सधा हुआ ग्राम्य गृहिणी स्वर - ताल, आरोह, अवरोह; किसी सुने हुये से साम्य है। समवेत स्वर जुड़ गये हैं - आह्वान है या प्रार्थना या कामना? आकाशवाणी का स्वरसुधा कार्यक्रम - सामगायन पर आधारित प्रोग्राम। हाँ, कुछ कुछ सामगायन सा लगता है। तो आदिस्वर लोक में ऐसे सुरक्षित है?...
...वर्षों बाद - अम्मा पराती गाउ न?
अम्मा हँसती हैं - अरे बेटा, बियाहे में गावल जालाऽ। अइसे  कइसे गा दीं?
'अम्मा! तोहनी के बाद के गाई? रिकार्ड क लेब त सबदिन खातिर हो जाई'
'तोहार अम्मा अब बूढ़ हो गइली, ठीक नाहीं आई।' मैं मचल जाता हूँ - गाना पड़ेगा।
वेदध्वनियों को परम्परा ने श्रुति, तप और समर्पण से आज तक सुरक्षित रखा है, लोकसाम को कौन रखेगा, कैसे? यही तो राह है!
अम्मा बताती हैं - बहुत पवित्र गायन है यह! भोर में ही गाया जाता है। हाथ मुँह धो के बसिये मूँहे! वह शुरू करती हैं और मुझे भान होता है - जीवन से प्रेम करने वाली बली आर्य परम्परा का। प्रकृति ने सन्देश दे दिया है, यह आह्वान है - देवों का, पितरों का; इसमें बसने वाले नये घर के लिये मंगल कामना है। घर घरनी की सनातन परम्परा को आदर और आशीष देती अमृत वाणी। कभी ऋषियों ने कहा - अमृतस्य पुत्रा: और लोक में हर विवाह जीवन यज्ञ के प्रारम्भ को अमृत बरसाती गृहिणियाँ कहती हैं  -  'एसे हो दूऽध बइठेलाऽ तियुरियाऽ त आऽमृत जोरन'। इसमें आस्था ही आस्था भरी हुई है और कहीं दीन दैन्य नही!    
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ए भोरऽ भऽइल भीनुसहराऽ चिरइया एक बोलेले
ए भोरऽ भऽइल भीनुसहराऽ चिरइया एक बोलेले 
 
ए जाइ रे जगवहू बरमा बिस्णू बाबा जासो दुहावन
ए नाहिं मोराऽ धेनूऽ बकेनाऽ सवइया घरे ओसर 
 
ए पुतवा नऽ भरेलाऽ कचहरीऽ पतोहियाऽ न घर भरे
ए दुधवाऽ के चलेलाऽ दहेड़ियाऽ त मठवाऽ के नारि बहे
 
एसे हो दूऽध बइठेलाऽ तियुरियाऽ त आऽमृत जोरन
एसे हो दहियाऽ खइलें दुऽलहे बाबू होंइहें अख्खे अम्मर 
 
एसे हो दहियाऽ खइहें दुलहिनिया देईऽ सिर के सोहाग बढ़ो
ए झाँझर लेइ मुख धोवें आरसि ले परीखें त सूरही सनोहें 
 
ए नाहिं मोरा धेनू बकेनाऽ...
एक भरे पुरे आर्य घर की बात है। दूध दही है। सभा समाज में, जो कि कालक्रम में वैसे ही 'कचहरी' हो गया है जैसे बाबा 'पापा' और मंडप 'खपरैल वाला सवैया घर', परिवार की उपस्थिति बनी रहने की कामना है तो भरे हुये घर की भी। आती हुई ऊषा को देख वैदिक ऋषि भले नाच कर गा उठा हो,  ग़ृहिणी की तरह उसने चिड़ियों की चहचहाहट से स्वयं को नहीं जोड़ा! देवों का आह्वान यहाँ भी है लेकिन एकदम घरेलू गँवई रूप में ...भोर भिनसार हो गयी है और एक चिड़िया कहती है - जाओ! ब्रह्मा और विष्णु को जगाओ, उनसे मेरी गाय दुहवाओ!  मेरी गाय अभी बकेना नहीं हुई है, भरपूर दूध देती है। मेरा घर ओसारे वाला सवैया घर है यानि उसमें नये जोड़े के लिये पर्याप्त स्थान है। मेरे घर में कमी है तो बस इसकी कि इतने पुत्र नहीं हैं जो सभा में परिवार की उपस्थिति ढंग से दर्ज करा सकें और इसको भरने वाली पुत्रबधू भी नहीं है। मेरे यहाँ इतना दूध होता है कि उससे जमने वाली दही से निकले मठ्ठे से नाली भर जाती है! यह दूध जब विवाह समारोह के अतिथियों के भोज के लिये बनने वाले चूल्हे पर चढ़ेगा तब उसमें अमृत का जामन पड़ेगा। उस दही को खाने से दुल्हा अमर हो जायेगा और दुल्हन खायेगी तो उसके सिर के सौभाग्य में वृद्धि होगी। ब्रह्मा विष्णु से कहो कि  यह झरनेदार पात्र लें, हाथ मुँह धो कर आइना देख स्वयं को परख लें और सुराही के पानी से सब कुछ पवित्र कर दें...
... लोकगीतों में महादेव ही नहीं, ब्रह्मा विष्णु भी घरेलू मनई की तरह ही हैं। शुभ अवसर पर उनसे स्वयं को और अन्य सब कुछ को भी साफ शुद्ध कर  दूध दुहने को कहा जा सकता है - मेरे पुत्र का विवाह है, कोई ऐसा वैसा आयोजन थोड़े है!  यहाँ दूध में जोरन का पड़ना विवाह संस्कार जनित पवित्र मिलन का प्रतीक है। इससे जो परिवार बढ़ेगा वह समाज और परम्परा दोनों के लिये बढ़ोत्तरी का कारण होगा।...
...आज अनुमान लगा पा रहा हूँ उस आह्लाद भरी पवित्रता की जिसकी अनुभूति विश्वामित्र को हुई होगी और गायत्री अवतरित हुई। समझ पा रहा हूँ अपने उस भाव को जिसने इसे रचवा दिया - तुम्हें नमन है आदित्य!
सुनिये अम्मा का स्वर पुन: जो सामगायन के साथ मिश्रित है - सामस्वर कभी तानपुरे जैसा है तो कभी लोकस्वर को सहारा देता सा लगता है।     
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पराती का लड़की के घर गाया जाने वाला रूप भी है। आपलोगों के यहाँ किस तरह का है, यहाँ बताइयेगा। 

अगले अंक में:
जामाता दशमो ग्रह: की धौंस में मेरी मौसिया सासू जी का गाया कन्यादान का गीत जिसने मेरी आँखें नम कर दीं।
भिनसारे कौन सा ग्रहण लगता है और भरी दुपहर कौन सा?

16 टिप्‍पणियां:

  1. यह सुन-पढ़ लेने का बाद और क्‍या भा सकता है भला.

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  2. तो सामवेदी गायन परंपरा का लोक गीतों में इस प्रकार समावेश हुआ है. बड़ी अलौकिक अनुभूति रही. अम्मा को प्रणाम.

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  3. ऐसी ही स्मृतियाँ और भाव विभोरता लिए लौटे हैं हम भी गाँव से .....
    आप उन्हें व्यक्त कर पा रहे हैं -आपके ही वश की बात है ..प्रकारान्तर से हम भी लाभान्वित हैं ..लोक लाभान्वित है !

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  4. सनातन स्वर साम्य को अच्छा पकड़ा है आपने! तभी तो मुझे लगता था कि इस स्वर लहरी का उद्भव कहाँ से है ?

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  5. "अम्मा! तोहनी के बाद के गाई?" आत्मा में गहरे तक आंसू बन जाते हैं।
    धन्य हैं आप और धन्यभाग्य हमारे।

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  6. लोकगीतों में सब देवता घर के सदस्यों जैसे हो जाते हैं, सिमटा सा विश्व या फैला मन।

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  7. भरपूर आनंद देती एक और शानदार पोस्ट।
    लोकगीतों को संग्रहित करने की आवश्यकता को महसूस करते हुए बनारस के साहित्यकार डा0 जितेन्द्र मिश्र जी ने अकथ प्रयास से हिंदू संस्कारों के अवसरो पर गाये जाने वाले लोकगीतों को ढूँढ ढूँढ कर, लोगों से मांग मांग कर प्रकाशित किया था। आपका यह प्रयास भी वैसा ही है। आने वाली पीढ़ी को ऐसे ही झलक दिखाई जा सकती है। सब गुम तो हो ही रहा है।

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  8. अचानक एक दिन ऐसे ही लगा कि बच्चे कैसे जानेंगे पर्व- त्यौहार, लोक परम्पराओं के बारे में , जब हम ही ज्यादा नहीं जानते ! अच्छा है आप यह सब सहेज रहे हैं , मेरी कोशिश रहती है बच्चों को इन परम्पराओं और लोकगीतों के बारे में बताती रहूँ ...
    संस्कृति और मिट्टी से यह जुडाव अच्छा लगा !

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  9. इस प्रयास के लिए... क्या कहें ! धन्य हुए.

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  10. गाया तो जाता है... शादी में.... कौवा बोलने के पहले सुबह और फिर शाम को..जिसे संझा पराती कहते हैं।

    अ जाई जगावउ... ऐसे ही तो कुछ और ईश्वर के बाद घर के सारे पूर्वजों को जगा कर विवाह में शामिल होने का न्यौता मिलता है ना...

    बड़ी सुंदर प्रथा लगती है मुझे ये, जिसमे कितने पुराने लोगों की वंशावली पढ़ कर उन्हे कम से कम इस दिन सम्मान तो देते हैं....

    याद नही पूरी तरह क्योंकि शायद ये काम घर की बुजुर्ग महिलाएं ही करती है, कभी इसमें शामिल नही हुई, इस बार मैं भी पूछूँगी माँ से....

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  11. लोकगीतों में महादेव ही नहीं, ब्रह्मा विष्णु भी घरेलू मनई की तरह ही हैं।
    सच है बाबा. एक गीत में राम जी से कहा जाता है कि 'देखो, अपनी माता कौशल्या से कह दो कि सिया से ज्यादा काम न करवाएं, वो बड़े नाजों से पाली गयी हैं.' जैसे सीता भी कोई राजकुमारी ना होकर हमारे घर की कोई बेटी हो.
    विवाह के गीत मुझे हमेशा से बहुत रोमांचित करते हैं. गाँव में जब किसी के घर में ब्याह होता था और गीत गाये जाते, तो मैं बड़ी कठिनाई से समझ सकने के बाद भी बहुत ध्यान से सुनती थी, तब भी बचपन से बाहर रहने के कारण बहुत से शब्द समझ में नहीं आते. यहाँ आपने ये काम आसान कर दिया.
    मिश्र जी ने ऊपर सही लिखा है कि ये आपके ही बस की बात है कि इस अद्भुत अनुभव को अभिव्यक्त कर पाते हैं.
    आप धन्य हैं बाबा!

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  12. बहुत सुन्दर है ये तो, गाँव में बहुत बार इस तरह के गीत सुने हैं..... बाकि सब याद हो जाते थे और उन्हें गाने में भी बहुत अच्छा लगता था पर ये वाला बहुत कठिन होता हमारे लिए, कभी गा नहीं पाई....घर याद आया आज बहुत बहूत ज्यादा आभार आपका सुनाने के लिए

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