श्वः पुष्ययोगं नियतं वक्ष्यन्ते दैवचिन्तकाः
श्वस्त्वाऽहमभिषेक्ष्यामि यौवराज्ये परन्तप
हिमच्छाया सी थी। प्रकाश के लट्टू ठिठुरते सैनिकों से टिमटिमा रहे थे - सावधान! दक्षिणी आकाश में ऐरावत की शुण्ड फुफकारते फणि सी दिख रही थी। और माँ बैठी थी नीचे, झर झर झरती शेफालिका के नीचे अनगढ़ शिव का शृङ्गार करती, हनुमान जी को टीकती, गँवई मंत्र पढ़ती जिसके अधिकार उसके पास सदातन थे और जिनके निकट आते ही मंत्रद्रष्टाओं की दीठें धुँधला जाती थीं - जय हनुमान जी, जय राम जी, किस्ना जी, जय दुर्गा मैया की, काली माई की जय ... जाने कितने देव देवी उसे सुन रहे थे। ये वे मंत्र थे जो समस्त गर्भगृहों के ध्वस्त होने पर भी माताओं ने अपने उदरों में छिपा लिये थे, जिन्हें बारम्बार जन्म देती हर स्त्री जननी थी, संतति को अमरत्व की मधुरिम धार पिलाती, मुस्कुराती।
पूजा समाप्त हुई और आसन पर बैठे हुये ही मैंने उनकी एक बाँह अपने हाथ ले ली - झुर्रियाँ ही झुर्रियाँ! त्वचा और अस्थियों के बीच जैसे केवल धमनियाँ ही बची थीं।
काहे अम्मा, ई का?
उनके मुख पर मानों रश्मियाँ हास बन कर खिल उठीं। मैं समझ गया कि अम्मा केवल इतने से उस पुरुषदुर्लभ सुख में है कि बेटे को इतना तो दिखा! वैसे ही उसने उत्तर दिया - तोहार माई बूढ़ भइली बेटा, सबदिन ओइसहीं रहिहें? ठीऽक बानीं हम! ... मैं ठीक तो हूँ और जाने को उठ गई!
मैंने रोकना चाहा तो उसने झिटका, रहऽ हो! बिहाने के बेरा कार करीं कि बइठि के बतकूचन करीं?
अम्मा मानों अदिक्षित उदासी सम्प्रदाय की थी - बहुत सी बातों पर उदासीन, अनासक्त। स्वावलम्बी, स्वाभिमानी अम्मा मृत्यु का कभी नाम तक न ली किंतु प्रतिनिश सोने से पूर्व उसकी प्रार्थना यही रहती कि हे भगवान! केहू के असरइत न बनइह! हे इसवर! चलते फिरते उठा लीह!! ... सभी प्रार्थनायें सुनी जातीं तो संसार कितना सुंदर होता! ...
... हरे राम हरे राम राम राम हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ... मंद स्वर में यह महामंत्र चल रहा है। मुझे लगता है कि अम्मा ने जब जाना कि दूसरों का आश्रय लेने का समय आ गया तो अपने भगवान को सायास बुला लिया।
... इतने दिनों के पश्चात भी मेरे आँसू सूखे ही हैं।
अम्मा जाने से पूर्व शेफालिका का वृक्ष कटवा गई थीं - उसमें धोंधड़ बन गया था जिसमें साँपों का बसेरा होने की सम्भावना थी। साँप माने विष, विष माने मृत्यु। अम्मा जाने के पूर्व हम सबको सुरक्षित कर के गई। उसके लिये मंत्रों की सिद्धि इतनी ही थी, झरते फूल तो निठल्ले जन के लिये होते हैं!
मेरी आँखों के समक्ष आज भी वही श्यामपट यथावत है जिससे लड़ने के लिये, जिसके पार देख पाने के लिये मैंने बलात अपनी पूर्वचर्या को अपनाया, बलात हास्य, बलात समस्त कार्यव्यापार कि उस परिभाषाहीन विषाद का कारण जानूँ जिसे कह भी नहीं पा रहा, मुझे मुक्ति मिले किंतु मैं तो उदासी सम्प्रदाय का नहीं न!
दक्षिण की दिशा यम की है। आकाश में आज भी फणिधर फुफकारता है, रहेगा और मैं आज भी मानों उन झुर्रियों को देखता विश्वास ही नहीं कर पा रहा कि... कितना काम बचा है और कुछ नहीं हो रहा!
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत् प्रकेतः
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास
तम आसीतीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्
तुच्छ्येनाम्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्
को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आ बभूव
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेद
रामेण तापसी पृष्ठा सा सिद्धा सिद्ध सम्मता
शशंस शबरी वृद्धा रामाय प्रति अवस्थिता
ऐसे हाल चाल पर सिद्धों द्वारा सम्मत उस सिद्धा ने राम के लिये स्वयं को अवस्थित कर उत्तर दिया:
अद्य प्राप्ता तपः सिद्धिः तव संदर्शनात् मया
अद्य मे सफलम् जन्म गुरवः च सुपूजिताः
अद्य मे सफलम् तप्तम् स्वर्गः चैव भविष्यति
त्वयि देव वरे राम पूजिते पुरुषर्षभ
तव अहम् चक्षुषा सौम्य पूता सौम्येन मानद
गमिष्याम्यक्षयांलोकांस्वत्प्रसादादरिन्दम
तुम्हारे आज दर्शन हो गये राम! तप सिद्धि हो गयी।
आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज गुरु की पूजा सफल हुई।
आज मेरे जो भी तप थे, सफल हुये और स्वर्ग भी होगा।
हे पुरुषोत्तम! आज मैंने तुम्हारा स्वयं पूजन किया।
तुमने
अपने सौम्य रूप का दरस दे आँखें जुड़ा दीं, मुझे इतना मान दिया। हे अरिंदम!
तुम्हारे प्रसाद से मैं अब तुम्हारे लोक जाना चाहती हूँ।
शबरी
के लिये महर्षि वाल्मीकि सञ्ज्ञायें प्रयोग करते हैं - श्रमणीम् धर्म
संस्थिताम्। दोनों भाइयों को पाद्य और अर्घ्य अर्पित करती है - यथाविधि।
धर्मसंस्थिता श्रमणी यथाविधि सत्कार करेगी और जूठे बेर खिलायेगी? कदापि नहीं।
अतिथि
को जूठा नहीं खिलाया जाता ।
शबरी के घर तो स्वयं आराध्य अतिथि बन कर पधारे
थे । ऋषियों के सान्निध्य में रहने वाली तपोधनी इतनी मर्यादा भी नहीं
जानती होगी ?
देसी भाषा में रचना के समय भक्तिधारा का मार्ग भिन्न था, वाल्मीकीय रामायण देखिये जो समस्त सरिताओं का हिमालय है।
...
मुनीनाम् आश्रमो येषाम् अहम् च परिचारिणी - मैं ऋषियों के आश्रम की परिचारिणी भी हूँ।
मया तु विविधम् वन्यम् संचितम् पुरुषर्षभ
तव अर्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायाः तीर संभवम्
ऋषि ने कहा तो हे पुरुषोत्तम, तुम्हारे लिये लिये इस पम्पा तीर पर वन में उपजने वाले विविध खाद्य सङ्गग्रहीत कर रखी हूँ।
शबरी राम को आश्रम के दर्शन कराती हैं। राम विस्मित हैं - प्रहर्सम् अतुलम् लेभे आश्चर्यम् इदम् च अब्रवीत् ।
आराध्या
'वृद्धा रामाय प्रति अवस्थिता' से आराध्य इतना चकित है कि बिन माँगे ही
सरि फूट पड़ती है - अर्चितो अहम् त्वया भद्रे गच्छ कामम् यथा सुखम्।
शबरी
निहाल हैं, अब किसलिये यह देह धारण करना ? जो स्वयं चल कर आया है, क्यों न
उसके लिये आहुति ही दे दूँ !
आहुति के समय वाल्मीकि क्या लिखते हैं - जटिला चीर कृष्ण अजिन अंबरा । अनुज्ञाता तु रामेण हुत्वा आत्मानम् हुत अशने... आहुति के पश्चात शबरी कैसी हो जाती हैं?
दिव्यम् आभरण संयुक्ता दिव्य माल्य अनुलेपना
दिव्य अंबर धरा तत्र बभूव प्रिय दर्शन
विराजयन्ती तम् देशम् विद्युत् सौदामिनी यथा
दो
विरुद्ध स्थितियों के बीच साधक और साध्य; अग्नि एवं आहुति जैसे एकाएक
दीप्त हो उठे हों! वाल्मीकि भक्त और ईश्वर के साक्षात्कार को अद्भुत प्रभा,
ऊर्जा और संलयन प्रदान करते हैं - विराजयन्ती तम् देशम् विद्युत् सौदामिनी
यथा।
...
इसे कहते हैं जीवन की सिद्धि कि आगे के लिये कुछ बचा ही नहीं!
जाने शबरी के भाव कैसे रहे होंगे, दर्शन तो राम ने बहुतों को दिये।
अरिंदम
अर्थात शत्रुओं का दमन करने वाला शब्द प्रयोग चिह्नित करने योग्य है। शबरी
के लिये राम अरिंदम सिद्ध हुये, भीतर जो भी विकारी दोष शत्रु थे, नष्ट हो
गये। वह मुक्त हो गयीं।
यह कोई नई कथा नहीं है। इसे अनेक ने अपने अपने ढंग से सुनाया है।
मैंने सोचा कि मैं भी एक संस्करण प्रस्तुत करूँ।
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एक बड़ा ही उद्विग्न युवा था जिसे जीवन की सिद्धि, अर्थ, उद्देश्य आदि से जुड़े प्रश्न उतप्त किये रहते। किसी साधु पुरुष ने उसे पर्वत की ऊँचाई पर रहने वाले ध्यानी बाबा के बारे में बताया कि तुम्हें वहाँ समाधान मिल सकते हैं।
अरुणोदय की बेला में युवक यह सोच कि सूरज चढ़े, इससे पूर्व ही पहुँच जाऊँगा, चढ़ने लगा।
पहली किरणों के सम्मोहन से उबर किशोर ने झोला गले में लटकाया और द्वार की साँकल पर पाँव रख ऊपर चढ़ गया। काठ के तीरों से वस्त्र बचाते भीतर कूद पड़ा, भद्द!
एक किशोरी की चीख सुन वह चकित रह गया। बाहर उजाले में हरसिंगार से बरसते मदगन्ध तले पहुँचा और वह मुड़ी।
अपार सौन्दर्य! वैसा तो कभी देखा ही न था। दोनों को समझ में नहीं आया कि नवरातन के पहले दिन हेतु चोरी छिपे फूल लोढ़ने कोई अन्य भी वहाँ आ कैसे आ सकता है? किशोर ने पूछा, फूल लेने आई हो?
पाटल दल खुले और दाड़िम दन्तावली मुस्कुरा उठी, नयनों के भँवरे उड़ चले,"हाँ, मैं उधर से, पड़ाव के पार से आई हूँ... माँ ने बताया था।"
"किन्तु वहाँ तो बँगले पर ऐसे ही बहुत फूल हैं। यहाँ क्यों?"
"जवाकुसुम नहीं हैं।"
"जवाकुसुम?"
"हाँ, नहीं जानते? वो रहे।"
"वे तो अड़हुल हैं।"
"अड़हुल? .... छि! कैसा नाम!"
दाड़िम दन्तावली पुन: खिल खिल चमक उठी। किशोर को नाम की नहीं पड़ी थी और पड़ी भी थी। नये पाये नाम में उसे बिहाने बिहाने सन्ध्या सुन्दरी दिख रही थी - साँझ की लाली में उड़ते धवल क्षौम। वह कुछ और सोचता कि सुनाई पड़ा, वे फूल तोड़ दोगे?
कँटीले तारों के पार अँड़हुल, नहीं, जवाकुसुम खिले थे - लाल लाल।
काठ के तीरों से बचा कर आया था किन्तु कालायस के काँटे तो जैसे थे ही नहीं। कैसे उस पार गया, ज्ञात नहीं, लौटा तो नयनभ्रमर प्रतीक्षा में थे। दुपट्टा पसर गया - इसमें, इसमें रख दो।
किशोर ने रखा और बचते हुये हरसिंगार के पुहुप चुनने लगा। वैसा ऊँचा, घना वृक्ष उसने कभी न देखा था, धरती पर देवी के भूषण बिछे थे, रजतपुष्प हिरण्य बिन्दु।
"हे, हे... भुँइया के फूल नहीं चढ़ते!" किशोर ने बिना देखे ही जवाकुसुम फूलते सुना।
"अम्मा कहती हैं कि हरसिंगार में दोष नहीं लगता।"
"अरे, जब पेंड़ से ले सकते हो तो भुँइया के क्यों चुनना?"
"गिरेंगे तो भुँइया ही न?"
"बुद्धू, देखो इधर।"
किशोरी ने दुपट्टे का एक भाग भूमि पर बिछा दिया - अब हिलाओ पेंड़। देखूँ तो कितने बलवान हो!...
.... किशोर वृक्ष हिला रहा है। झर झर झरते पुष्प किसी के आँचल में गिर रहे हैं। मुग्ध हँसी है, अनार फूले हैं, दुग्ध अभिषेक हो रहा है!
"बस, बस, बस... मैं भी फूल भरी हो गई।"
किशोर को लगता है कि उसके केशों से कुछ फूल चुन लेने चाहिये किन्तु साहस नहीं होता।....
किशोरी ने पत्तों के दोने बनाये। उनमें हरसिंगार और जवाकुसुम भरे, किशोर के झोले में रखा - चलें अब?
किशोर अवाक सा या सपनों में या जाने कहाँ था। हाँ... कुछ और न कहा, जैसे आया, वैसे ही लौट गया।
दूसरे दिन से ले कर अष्टमी तक अनुमति नहीं मिली। अम्मा बोलती, साँप रहते होंगे उधर। वह मन ही मन कहता कि पहले दिन भी तो रहे होंगे, तब क्यों?
अन्तिम दिन पुन:। वहीं, वही दुहराव।
"अरे तुम बीच में आये ही नहीं?"
"नहीं, पहले और अन्तिम दिन ही विशेष होता है हमारे यहाँ तो।"
"हुस्स... नवो दिन होना चाहिये। इधर का लोग बोका है।"
"मैं नहीं था तो जवाकुसुम कैसे?"
किशोरी ने मुँह बना लिया - ट्राई की थी, यह देखो! उसकी बाँह पर गहरी खँरोचें थीं।
"माँ ने देखा तो माली को बोल दिया लाने को। मैं तो केवल शेफा... जानते हो, हरसिंगार को शेफाली बोलते हैं, शेफालिका। मेरा नाम भी शेफाली है... मैं तो बिना भुँइया गिरे फूल लेने आती थी, उतना नहीं हो पाता था जितना पहले दिन... तुम हर दिन आते तो कितना अच्छा होता।"
जवाकुसुम चुन गये, दुपट्टे पर शेफालियाँ बरस गईं। दोने बनते व भरते देखता रहा किन्तु किशोर आगे कुछ पूछ नहीं पाया।
चलने के समय दाड़िम दन्तावली खिली, सोम को कलकत्ता चली जाऊँगी। जिसे माँ कहती हूँ न, वो मेरी मासी है। चलें अब?
"हाँ"
कुछ पग ही चला होगा कि सुनने को मिला... तुम बोका हो। खिल खिल खिल.... हरसिंगार की मादक गन्ध थी या हँसी की, किशोर कब घर पहुँचा, पता ही नहीं चला।
तब से आज तक हर लता, हर वनस्पति में वह शेफाली देखता है और उसे केवल एक रहस्य न जान पाने का दु:ख रहता है - वह भीतर आती कैसे थी? क्या वह भी द्वार के ऊपर से कूद कर?... नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।

वर्षा से सम्मोहित भारत ने संवत्सर को वर्ष कहा, वर्षा के देवता इंद्र को देवराज बनाया। काव्य में मेघ हों या बरसते पर्जन्य हों, भारतीय मनीषा ने मानवीय भावों को उनसे उन्मेषित कर दिया!राम के प्रति जितना विश्वास माता सुमित्रा में दिखता है, किसी अन्य में नहीं। कवि ने उन्हें 'वाक्योपचारे कुशला' कहा है जैसे बात कर के ही दु:ख के मेघ हर लेने वाली counsellor हों -
नारदपुराण में भगवान जगन्नाथ , यह पुराण पुरी में पाञ्चरात्र उपासना का भी उल्लेख करता है।
इस प्रश्न से पूर्व उनसे यह पूछा जाना चाहिये कि सोमनाथ हो या
विश्वनाथ, जो लिङ्ग भङ्ग कर दिये गये, उनके स्थान तक हड़प लिये गये, उनके लिये शास्त्र मर्यादा क्या है?
विश्वेश्वर के मूल स्थान पर तो आज रजिया की मस्जिद है। ज्ञानवापी
विश्वनाथ की तो कहानी ही कारुणिक है!
वास्तविकता यह है कि जीर्णोद्धार का प्रावधान है तथा दुष्टलिङ्ग जैसी सञ्ज्ञा भी है। या तो वे पण्डे सूक्ष्म विधान समझ नहीं पा रहे
या स्वार्थवश वितण्डा में लगे हैं।
अग्निपुराण में बहुत विस्तार से जीर्णोद्धार का विधान है किंतु
शब्दावली ऐसी है जो ऐसा करने को बहुत ही असामान्य स्थिति में अनुमति देती है। सारा
बखेड़ा चालन शब्द को ले कर है जिसका अभिधा अर्थ ले कर कि लिङ्ग को उसके स्थान
से नहीं हटाया जा सकता, वितण्डा चल रहा है।
चालन शब्द प्रस्तर प्रतिमा हेतु नहीं, मूल स्थान हेतु है अर्थात मूल स्थान वही रहेगा, वहाँ स्थापित लिङ्ग यदि दुष्टलिङ्ग अर्थात दोषयुक्त हो गया हो तो
उसे चलायमान कर नया स्थापित किया जा सकता है।
शास्त्रकार लिङ्ग को पाषाण प्रतिमा न मान कर शम्भु की बात कर रहा
है जबकि ये पण्डित लिङ्गप्रतिमा को ही सबकुछ माने बैठे हैं।
स्थानभङ्ग, वज्रपात, झुकाव व केंद्रस्थ स्थापना आदि दोषों की स्थिति (दुष्ट को दोष से
समझें) में पुन: वही लिङ्ग स्थापित किया जा सकता है यदि क्षत या व्रणचिह्न न हों - निर्ब्रणञ्च।
आगे बताता है कि विधिसम्मत ढङ्ग से पुन:स्थापित लिङ्ग अपने स्थान से नहीं हटाया जाना चाहिये -
इस श्लोक की दूसरी अर्द्धाली मात्र को ले कर पण्डे गाल बजा रहे हैं - अधूरी बात। ऐसे कर्म काशी में बहुत पहले से होते रहे हैं, कोई नई बात नहीं। अगला श्लोक देखें -
यदि स्थापना हेतु सौ (पूजार्पण आदि) करना है तो चालन हेतु हजार का।
इस प्रकार की पूजा से संयुक्त होने पर जीर्ण हुआ लिङ्ग भी सुस्थापित हो जाता है।
जीर्ण का अर्थ जिसकी स्थिति बिगड़ गयी हो परंतु जिसमें दोष न आये हों।
विधाय द्वारपूजादि स्थण्डिले मन्त्रपूजनं
मन्त्रान् सन्तर्प्य सम्पूज्य वास्तुदेवांस्तु पूर्ववत्
दिग्बलिं च
वहिर्दत्वा समाचम्य स्वयं गुरुः
ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु शम्भुं विज्ञापयेत्ततः
लम्बी प्रक्रिया है। संक्षेप में जानें कि विधि सम्मत मंत्रपूजा कर, तर्पण कर, वास्तुदेव को संतुष्ट
कर, दिग्बलि दे, ब्राह्मण भोजन आदि
करा कर स्वयं शम्भु को विज्ञापित करे -
इससे आगे अनेक विधि विधान वर्णित हैं तथा -
जो भी सत्त्व इस लिङ्ग मेंंआश्रय लिये हुये हैं, शिव की आज्ञा से इस लिङ्ग का त्याग कर जहाँ जाना चाहें, जायें। विद्या व विद्येश्वर से युक्त भव अर्थात शिव यहाँ बने
रहेंगे।
आगे सत्त्व शक्तियों को हटाने की विधियाँ हैं -
दत्वार्घं च विलोमेन तत्त्वतत्त्वाधिपांस्तथा
अष्टमूर्त्तीश्वरान् लिङ्ग पिण्डिकासंस्थितान् गुरुः
विसृज्य स्वर्णपाशेन वृषस्कन्धस्थया तथा
रज्वा बध्वा तया
नीत्वा शिवमन्तं गृणन् जनैः
तज्जले निक्षिपेन्
मन्त्री पुष्ठ्यर्थं जुहुयाच्छतं
तृप्तये दिक्पतीनाञ्च वास्तुशुद्धौ शतं शतं
इसके पश्चात महापाशुपत मंत्र द्वारा भवन को रक्षित कर गुरु नये
लिङ्ग की वहाँ विधिवत स्थापना करता है -
वितण्डावादी निम्न श्लोक का आधार ले कर शिवलिङ्गों को हटाये जाने
का विरोध उचित बता सकते हैं -
असुरों, मुनियों वा उनके
गोत्र वालों, तन्त्रविदों के
द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिङ्गों को; चाहे जीर्ण हों, चाहे भग्न हों; विधि
अनुसार भी चलायमान न करे।
क्या अर्थ है इसका?
मात्र अभिधात्मक? कौन करे, जिन लोगों पर अर्थ स्पष्ट करने का दायित्त्व है, वे तो स्वार्थी वितण्डा में लगे हैं!
बहुत सीधा सा समाधान है। असुर, मुनि, गोत्र वालोंं व तंत्रविदों को हटा दें तो बचते कौन हैं? सभी सनातनी तो किसी न किसी गोत्र के ही हैं न? जिनका ज्ञात नहीं, उनके लिये कश्यप हैं।
तब तो मात्र देवताओं, यक्ष, गंधर्व, किन्नर आदि के द्वारा
स्थापित लिङ्ग ही भग्न होने पर हटाये जा सकेंगे! नहीं!! दलहित नवबौद्ध, इसाई व मुसलमान तो शिवलिङ्ग की स्थापना करेंगे नहीं!!!
मुनिभिर्गोत्र का अर्थ कुछ जातिवादी ब्राह्मण जाति से लगाते हैं अर्थात असुर
स्थापित लिङ्ग तो रहेंगे, किंतु ब्राह्मणेतर
मनुष्यों के द्वारा स्थापित दुष्टलिङ्ग हटाये जा सकते हैं। यह तो अनर्गल बात हो
गई!
इसका अर्थ सरल है कि विशिष्ट जन द्वारा विशिष्ट विधानों सहित विशिष्ट स्थानों पर
स्थापित शिवलिङ्ग किसी भी स्थिति में हटाये नहीं जाने चाहिये। यह अतिरिक्त सावधानी है, अति महत्त्वपूर्ण स्थलों की मर्यादा को सुरक्षित रखने हेतु जिससे
कि लोग उपर्युक्त विधि विधानों का आश्रय ले मनमानी न करने लगें।
दुर्भाग्य से सोमनाथ हो या विश्वेश्वर विश्वनाथ; इसी श्रेणी के लिङ्ग थे। म्लेच्छों ने मूलस्थान तो हड़पे ही, मूल शिवलिङ्ग भी तोड़ दिये। पण्डों के अनुसार तो तब कुछ कर ही नहीं
सकते थे! है न? (आपद्धर्म केवल आपदा
हेतु नहीं, अभूतपूर्व स्थितियों
हेतु भी प्रयुक्त होता है, उन्हें कौन समझाये?)
क्या उससे सोमनाथ या विश्वेश्वर की आराधना भी समाप्त हो गई? नहीं। सनातन ने प्रवाह को रुकने नहीं दिया। हम लड़ते रहे, पुन: पुन: निर्माण कर अपनी आस्था सँजोते रहे। इन पण्डों की चली
रहती तो तीर्थ व दिव्यस्थल कब के लुप्त हो गये रहते! काशी परिक्रमा के जाने कितने
हो ही गये न!
निजी स्वार्थ वश जिन्हें सँजोना था उन्हें लुप्त व विकृत कर पण्डे
उनके लिये वितण्डा में लगे हैं जिनका कोई विशेष महत्त्व नहीं। यहाँ भी स्वार्थ है।
प्रश्न यह भी है कि किसके पास इतना समय है जो इनके वितण्डा प्रसार
की काट समय लगा कर करता रहेगा? क्या मिलना उससे? इस कारण भी इनकी लन्तरानियाँ चलती रहती हैं।
॥हर हर महादेव॥