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शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

Shrirama Crown Price Coronation श्रीराम यौवराज्याभिषेक तिथि का निर्धारण राजा दशरथ ने किया


अद्य चन्द्रोऽभ्युपगतः पुष्यात्पूर्वं पुनर्वसू
श्वः पुष्ययोगं नियतं वक्ष्यन्ते दैवचिन्तकाः
ततः पुष्येऽभिषिञ्चस्व मनस्त्वरयतीव माम्
श्वस्त्वाऽहमभिषेक्ष्यामि यौवराज्ये परन्तप
महातेजस्वी, समस्त भूतों में स्वयम्भू के समान, कौशल्या के सुत वैसे जैसे अदिति के वज्रपाणि इन्द्र, रूपोपन्न, वीर्यवान, अनसूयक, भूमावनुपम, प्रशान्तात्मा, मृदुभाषी, दूसरों की कठोर बातों का भी प्रत्युत्तर न देने वाले अर्थात प्रतिक्रियावादी नहीं, कृतज्ञ, अपकारास्मर, शील-ज्ञान-वय-वृद्धों से विमर्शी, बुद्धिमान, प्रियम्वद, अविस्मित, नानृतकथ, विद्वान, वृद्धप्रतिपूजक, प्रजानुरञ्जक, जितक्रोध, सानुक्रोश, ब्राह्मणप्रतिपूजक, दीनानुकम्पी, धर्मज्ञ, प्रग्रहवान, शुचि, कीर्तिमानी, कुलोचितमति, क्षात्रधर्ममानी, नाश्रेयरत, विरुद्धकथाऽरुचि, वाचस्पतिसम उत्तरोत्तरयुक्ति वक्ता, अरोग, तरुण, वाग्मी, वपुष्मान, देशकालविद, पुरुषसारज्ञ, लोकसाधु एक, प्रजा के प्राणप्रिय, सम्यक विद्या युक्त स्नातक, साङ्गवेदविद, धनुर्विद्या में पिता से भी श्रेष्ठ, धर्मार्थदर्शीद्विजशिक्षित, स्मृतिमान, धर्मकामार्थतत्त्वज्ञ, प्रतिभानवान, लौकिक समयाचार कृतकल्पविशारद, निभृत, संवृताकार, गुप्तमन्त्र, सहायवान, अमोघहर्षक्रोध, त्यागसंयमकालविद...

... यौवराज्याभिषेक की भूमिका में आदर्श राजा के गुणों को गिनाते व उनके राम में होने को बताते हुये महामुनि वाल्मीकि अयोध्याकाण्ड के पहले सर्ग में ही मर्यादा पुरुषोत्तम के भावी रामराज्य की झाँकी दिखा देते हैं जो दशरथ के सुराज से भी बढ़ चढ़ कर होगी। नगर-वन-नगर के राम अयन के अन्तिम युद्धकाण्ड के अन्त में सम्राट के राज्याभिषेक में विस्तार से लिखने को कुछ बचा ही नहीं, राम का जीवनवृत्त एक ऐसा वृत्त है जिसका आदि अन्त ही नहीं ...

दृढभक्तिः स्थिरप्रज्ञो नासद्ग्राही न दुर्वचाः
निस्तन्द्रिरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित्
शास्त्रज्ञश्च कृतज्ञश्च पुरुषान्तरकोविदः
यः प्रग्रहानुग्रहयोर्यथान्यायं विचक्षणः
सत्संग्रहप्रग्रहणे स्थानविन्निग्रहस्य च
आयकर्मण्युपायज्ञः संदृष्टव्ययकर्मवित्
श्रैष्ठ्यं शास्त्रसमूहेषु प्राप्तो व्यामिश्रकेषु च
अर्थधर्मौ च संगृह्य सुखतन्त्रो न चालसः
वैहारिकाणां शिल्पानां विज्ञातार्थविभागवित्
आरोहे विनये चैव युक्तो वारणवाजिनाम्
धनुर्वेदविदां श्रेष्ठो लोकेऽतिरथसम्मतः
अभियाता प्रहर्ता च सेनानयविशारदः
अप्रधृष्यश्च संग्रामे क्रुद्धैरपि सुरासुरैः
अनसूयो जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी
न चावमन्ता भूतानां न च कालवशानुगः
एवं श्रेष्ठगुणैर्युक्तः प्रजानां पार्थिवात्मजः
सम्मतस्त्रिषु लोकेषु वसुधायाः क्षमागुणैः
बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यो वीर्येणापि शचीपतेः
तथा सर्वप्रजाकान्तैः प्रीतिसञ्जननैः पितुः
गुणैर्विरुरुचे रामो दीप्तः सूर्य इवांशुभिः

°°°
लोकपाल इन्द्र के समान ऐसे राम को अपना नाथ बनाने हेतु मेदिनी ही मानो कामना कर उठी!
इत्येतैर्विविधैस्तैस्तैरन्यपार्थिवदुर्लभैः
शिष्टैरपरिमेयैश्च लोके लोकोत्तरैर्गुणैः
तं समीक्ष्य महाराजो युक्तं समुदितैः शुभैः
निश्चित्य सचिवैः सार्धं युवराजममन्यत

ऐसी स्थिति हो जाने पर कि राम योग्यता में उनसे बहुत आगे हो चुके हैं, राजा ने 'समीक्षा' कर, सचिवों के साथ विमर्श कर राम को युवराज बनाने का निर्णय लिया।
आत्मनश्च प्रजानां च श्रेयसे च प्रियेण च
प्राप्तकालेन धर्मात्मा भक्त्या त्वरितवान् नृपः

प्राप्तकालेन, उचित अवसर आ चुका था। उस पद हेतु राम न्यूनतम वय की सीमा भी पूरी कर चुके थे। राम का जन्मदिन आ पहुँचा था, राजा ने बिना विलम्ब के त्वरित ही चन्द्रमा के समान मुख वाले रामचन्द्र का अभिषेक करने का निर्णय लिया, जो वैसे ही शोभते हैं जैसे चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र के साथ -
तं चन्द्रमिव पुष्येण युक्तं धर्मभृतां वरम्
यौवराज्ये नियोक्तास्मि प्रीतः पुरुषपुंगवम्

साथ ही सभा में उपस्थित विविध राजाओं की सम्मति माँगी कि परस्पर विरोधी मतों के घर्षण पश्चात ही ऐसा महत्वपूर्ण काम किया जाना चाहिये -
यद्यप्येषा मम प्रीतिर्हितमन्यद्विचिन्त्यताम्
अन्या मद्यस्थचिन्ता हि विमर्दाभ्यधिकोदया

राजतन्त्र का लोकतन्त्र था, समस्त प्रजा के प्रतिनिधि उपस्थित थे। सबने एक स्वर से अनुमोदन किया किन्तु दशरथ ने तब भी पूछा कि ऐसा क्या है मेरे कहे में जो सभी मान गये?
श्रुत्वैव वचनं यन्मे राघवं पतिमिच्छथ
राजानः संशयोऽयं मे तदिदं ब्रूत तत्त्वतः

प्रतिनिधियों व राजाओं ने वही गुण दुहराये जो ऊपर लिखे जा चुके हैं।
सुभ्रूरायतताम्राक्षः साक्षाद् विष्णुरिव स्वयम्
रामो लोकाभिरामोऽयं शौर्यवीर्यपराक्रमैः
तब दशरथ ने वसिष्ठ, वामदेव व अन्य ब्राह्मणों से कहा -
चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पितकाननः
यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम्

वसिष्ठ मुनि ने अगले दिन अभिषेक हेतु सारी व्यवस्थायें करने का आदेश दे दिया।
पिता ने पुत्र को बुला कर कहा, पुष्ययोग में तुम्हारा अभिषेक होगा -

तस्मात्त्वं पुष्ययोगेन यौवराज्यमवाप्नुहि।
कहा कि यद्यपि तुम गुणवान हो, तथापि -
भूयो विनयमास्थाय भव नित्यं जितेन्द्रियः
कामक्रोधसमुत्थानि त्यजेथा व्यसनानि च
विनयी रहो, जितेन्द्रिय हो, काम, क्रोध व व्यसनों का त्याग कर के!
...
समय का निर्णय दशरथ का था, वसिष्ठ मुनि ने कार्यक्रम निर्धारित किया। दशरथ की चेतावनी मानो भावी हेतु ही उनके अवचेतन से निस्सृत हुई थी।
पौराणिक व लौकिक लन्तरानियों से इतर मूल को पढ़ें, ध्यान से। व्यर्थ के वितण्डा से मुक्ति मिलेगी। रामायण हो या महाभारत, राजन्यों के ज्योतिष ज्ञान के विशद विवरण बिखरे पड़े हैं। तब मुहूर्त देख कर काम नहीं किये जाते थे, काम करने का निर्णय ले कर उपलब्ध में से शुभ का चयन कर लिया जाता था। दोनों में अन्तर है।
जिस दिन निर्णय लिया गया, चैत्र माह में चन्द्र पुनर्वसु नक्षत्र पर थे, राम की जन्मतिथि। पुनर्वसु की अधिष्ठात्री मघवा माता अदिति हैं। उपेन्द्र विष्णु से अधिक राम की गढ़न महेन्द्र की है।
पुनर्वसु का अगला नक्षत्र पुष्य था, बृहस्पति का।

सोमवार, 28 अक्टूबर 2019

आलिङ्गन भर गोवर्द्धन


कृष्ण ने भर अँकवार उस शिला को पकड़ा और उपाटने लगे...
... कान्हा जाने कितने कष्ट में था, साँवली देह की प्रत्येक पेशी उभर आई थी, उसे सहायता देने को भी स्थान नहीं था। रक्त वाहिनियाँ जैसे विद्रोह कर बाहर आ जाना चाहती थीं, स्निग्ध सुचिक्कण रक्ताभ वदन और श्याम लोहित हो चला।
विवश राम का रोम रोम हाहा कर उठा। क्रोध में भर उसने अपनी मुट्ठी शिला पर दे मारी। जैसे संकेत हो, अनेक गोपों ने अपनी लाठियाँ अड़ा दीं और तब जैसे चमत्कार हुआ। शिला श्लथ हुई। उसके श्लथ होते ही पाँवों तले धरा बैठने लगी मानो उस कुञ्जिका शिला ने पूरा धरातल ही थाम रखा था।
सब नीचे धसने लगे, लगा जैसे कि गोवर्धन उठ रहा हो। वह शिला गुहा द्वार पर अड़ी थी जिसे कान्हा ने जाने कब अपनी बाँसुरी से ठुक ठुक कर जान लिया था।
विराट कन्दरा निकल आई थी, अरे, इसमें तो सारा व्रज शरण पा सकता है!
विह्वल राम अपने कान्ह से लिपट गया। हास या अश्रु या दोनों? राम के नयनों से देवकी यशोदा बह चलीं - कान्ह, तुमने कर दिखाया। तुमने तो गोवर्धन पर्वत को ही उठा दिया कान्ह!
... और तब राम का भीमादेश स्वर तड़ित झञ्झा को विलीन करता गूँजा - सभी गुहा में चलो, शीघ्रता करो।
रुको राम! भीतर हिंस्र पशु हो सकते हैं, सर्प भी - सावधान कृष्ण ने अपनी साँसों को थामते हुये अनुनय किया किन्‍तु अप्रतिहत राम के उत्साह को अब कौन थाम सकता था - मैं हूँ न!
समवेत स्वर में गोपों ने जयध्वनि की - जय कान्ह!
मघवा की पराजय निश्चित थी। गिरियज्ञ पूर्ण हो चुका था।
..

अद्याहमिममुत्पाट्य सकाननवनं गिरिम्
...
एवं सचिन्तयित्वा तु कृष्ण: सत्यपराक्रमः
...
दोर्भ्यामुत्पाटयामास कृष्णो गिरिरिवापर:
...
स लम्बमान: कृष्णस्य भुजाग्रे सघनो गिरिः
...
शैलोत्पाटेनभूरेषा महती निर्मिता मया
...
प्राविशन्त ततो गावो गौपैर्यूथप्रकल्पिता:
...
तस्य शैलस्य विपुलं प्रदरं गह्वरोदरम्

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

जल्लिकट्टु और बरद के बहाने

...रोरवती सरस्वती नदी का विस्तीर्ण क्षेत्र। समय पश्चिम का उष:काल। वृष साँड़ पीठ पर उत्तुंग कुकुद और गले से लटकती प्राकृतिक माला लिये मस्त हो चोकर रहे हैं। कविगण को धरा सींचने वाले आकाशी इन्द्र की गर्जना, मस्ती और सौन्दर्य के लिये इनसे अच्छे रूपक नहीं मिलते। धरती पर बीज वर्षा कर उसे गर्भिणी बनाने वाले इन्द्र वृषभ बन ऋचाओं में पूजित होते हैं। जिनके कन्धों पर व्यापार तंत्र टिका है, खेती का भार है उन्हें अपनी सुन्दर दिनांक और बैच वाली मुद्राओं पर सेठ लोग स्थान देते हैं। 

दान दक्षिणा पा कृतकृत्य पुरोहित वर्ग के लिये सारे देवता ही कृपा बरसाने वाले वृषभ हो जाते हैं जो जजमान का भी बराबर कल्याण करते हैं। भरत रूपी अग्नि को आगे रख उनके कन्धों पर जुआठा चढ़ा खेती का विस्तार करता क्षेत्र भारत होता जाता है।

... वन वन अपने श्वान और शस्त्रास्त्र के साथ भटकता कभी वनदेवी अरण्यानी से तो कभी ग्रामदेवी से आहार की भीख माँगता औघड़ लाल रुद्र किसी पर्वतीय वनप्रांतर में अपनी गोरी से मिलता है। ढेर सारी खट पट और मान मनव्वल वाले जीवन में रुद्र पर धीरे धीरे गौरी का रंग चढ़ने लगता है। घर बसता है, व्याध का त्रिशूल जाने कब खेतिहर का हल हो जाता है, गौरा पार्वती जाने कब आम घरनी हो घर घर की खबर रखने लगती हैं और सूरज की ताप से झँउस कर लाल हुये रुद्र, लाल शिव घर की छाँव में कर्पूर गौर शम्कर हो जाते हैं – जो सब बाधाओं का शमन कर देवी अन्नपूर्णा को इस योग्य बनाये रखे कि उसके द्वार से कोई खाली न लौटे । उनकी लाली गोलवा बैल में समा जाती है!
जिसके आँगन खर पतवार से ले कर साँप बिच्छू तक सबको ठाँव है और जिसके खेतों पर रात में सोम अमृत उड़ेल समस्त प्रजा को अमृतस्य पुत्रा: कर देता है। यह गृहस्थ गँवई भारत है जो ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी सबका पेट भरने वाला सबसे ऊँचा महादेव है। 

...वर्षा है, वन प्रांतर है, वनस्पतियाँ हैं, उपज है लेकिन पेट भरने को पर्याप्त नहीं। धरती तो माँ है उसके साथ छेड़छाड़ कैसे हो सकती है, वह अहल्या है! बिना छेड़छाड़ के उपज कैसे बढ़े? गोतम प्रकृति के साथ बरजोरी के समर्थक नहीं।  वर्षों से भूमि को हेरते तप कर रहे हैं कि कोई राह मिले। प्रजा का संयम टूटने को है।
खेती का विस्तार करने वालों का नायक इन्द्र किंचित प्रलोभन द्वारा और किंचित बलपूर्वक अहल्या पर हल चला ही देता है। कुपित गोतम दोनों को शाप देते हैं – ऐसी भूमि का त्याग करो, यह विधि कोई न अपनाये। बैल की सहायता से अहल्या पर हल चला। उस वृषभरूप को हल चलाने योग्य बनने के लिये अपने पुंसत्त्व अर्थात वृषण अंडकोष से मुक्त होना पड़ा, बधिया होना पड़ा, बरदा बलिवर्द बनना पड़ा। जनता ने उसे भी इन्द्र स्वरूप वृषभ पर गोतम के शाप की तरह समझा – आँड़ी थुरा गे!
अहेरी शिव के धनुष को अपने यहाँ रखवा कर शिकार बन्द करवाने वाले और कृषियज्ञ में स्वयं हल चलाने वाले राजा हैं जनक। अपनी पुत्री को भूमिजा कह सीता नाम दिये हैं, सीता अर्थात खेत का घोहा! उनकी राह में गोतम का शाप वर्षों से खड़ा है – खेती बढ़ नहीं रही! प्रतीक तोड़ने और नये प्रतीक गढ़ने का समय आ गया। राजा घोषणा करते हैं – मेरी पुत्री सीता वीर्यशुल्का है, जो वीर शिवधनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा मेरी पुत्री उसी का वरण करेगी।
प्रतापी इक्ष्वाकु वंश। वनस्पतियों की अथर्वण परम्परा का पोषक। वह वंश जिसमें कभी पुरंजय हुये जिन्हों ने देवताओं का साथ देना तब स्वीकार किया जब उनका राजा वृषभ इन्द्र उन्हें अपने कुकुद (भारतीय बैल के पीठ का उभार) पर बैठा कर उनकी सवारी बनने पर तैयार हुआ। इस कारण वे काकुत्स्थ कहलाये। उसी वंश में हुये प्रतापी रघु और दशरथ नन्दन राम।
बैल की सवारी करने वाले काकुत्स्थ का कोई वंशज ही दूसरे बरद के सवार का निवारण कर सकता था। कथायें गुंफित हुईं। राम जनक क्षेत्र पहुँचे। आश्रम की वर्षों से बंजर पड़ी अहल्या धरा का स्पर्श कर खेती की विधि को शापमुक्त किया, उसकी जनस्वीकारता सुनिश्चित की;  शिव का धनुष तोड़ अहेरी वनचारियों को सदा सदा के लिये तिरस्कृत बनच्चर बना दिया और सीता का वरण कर गाँव गाँव के वह रघुवा किसान बन जन जन में रम गये जिसकी घरवाली सीता थीं। सुदूर दक्षिण दंडकारण्य से भी आगे तक उनके रामराज्य का मॉडल आदर्श मान अपना लिया गया। एकराट राम के अनुशासन वाला भारत इस तरह उभरा। 

...किसी और कालखंड में पशुचारण और कृषि के बीच समन्वय की कमी को पहचाना एक काले कन्हैया ने। उन्हों ने इन्द्र को ठेंगा दिखा कृषि द्वारा आक्रांत होती गोचारण भूमि को सम्मान दिया – गोवर्धन पूजा उनकी पहचान हुई। पशुचारी कृष्ण के साथ उनके बड़े भाई गौर राम हलधर बने - चरवाहे और कृषक की आपसी खटपट के बीच भातृभाव बनी रहा। गोवंश और कृषि के आपसी सम्बन्ध के वे 'अन्नकूट' थे। दोनों ने जब अलग अलग राहें पकड़ीं तो महाविनाश हुआ – महाभारत। 
... इन सबके पश्चात ऐसा संश्लिष्ट गँवई भारत विकसित हुआ जिसकी पोषण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था गोवंश पर टिकी थी, जिसकी उपज और रसोई का जुआठा दुआर के बैलों के कन्धों पर था।
 उसकी कथाओं, कहानियों, नाटकों, लोरियों, सोहर, नृत्य, झूमर, कजरी, जन्मपत्री, हास परिहास, धर्म, स्मृति, पुराण, लोकोक्ति, पर्व आदि आदि सबमें वही शिव, वही राम, वही कन्हैया, वही गौरा, वही सीता जाने कितने रूप बदल पगते चले गये:

रामाद् याञ्चय मेदिनिम् धनपते बीजम् बलालांगलम्।
प्रेतेशान महिष: तवास्ति वृषभम् त्रिशूलेन फालस्तव।।
शक्ताहम् तवान्न दान करणे, स्कन्दो गोरक्षणे।
खिन्नाहम् तवान्न हर भिक्ष्योरितिसततं गौरी वचो पातुव:।।    
   
पार्वती जी शंकर जी को उनकी दरिद्रता पर उलाहना दे रही हैं। आप का भिक्षाटन ठीक नहीं है इसलिए आप भगवान राम से थोड़ी सी भूमि, कुबेर से बीज और बलभद्र से हल माँग लीजिए। आप के पास एक बैल तो है ही, यमराज से भैंसा माँग लीजिए। त्रिशूल फाल का काम देगा। मैं आप के लिए जलपान पहुँचाऊँगी। कार्तिकेय पशुओं की रक्षा करेंगे। खेती करिए, आप के निरंतर भिक्षाटन से मैं खिन्न हूँ। 
  
परुवा के दिन कहीं यह भारत अपने बैलों को सजाता, उनकी सेवा करता है और उनसे कोई काम नहीं लेता है तो कहीं उनकी दौड़ आयोजित करता है। 

दूर पश्चिम में उनकी पूजा होती है तो दक्षिण में बैलगाड़ियों की दौड़ होती है। 
संक्रांति में जलिकट्टु के बहाने बैल को नियंत्रित करने की जोर आजमाइश कर जवानों के वीरता और कौशल की परीक्षा होती है। 



हृष्ट पुष्ट बैल किसान की मजबूती का प्रमाण होते हैं। कहना नहीं होगा कि इन सबके बहाने उस भारतीय गोवंश को सुरक्षित और शुद्ध रखा गया जिसकी धाक कभी सुमेरिया तक थी। 

 जलिकट्टु पर प्रतिबन्ध गँवई ‘देव’ भारत की वैज्ञानिक सोच और जीवनपद्धति पर उन ‘अ-सुर’ शहरातियों का प्रहार है जो भूमि और जड़ से कटे, आयातित मेधा और बोतलबन्द पानी पर जी रहे हैं; जिन्हें इतना भी नहीं पता कि साँड़ के अंडकोश नष्ट कर मनुष्य ने अपनी संतति की बाढ़ और सभ्यता सम्स्कृति का प्रसार सुनिश्चित किया। जिन्हें नहीं पता कि बली बलिवर्द की वासना कहीं न कहीं उसके संरक्षण और किसान की अर्थव्यवस्था से जुड़ती है।  
 जिन्हें नहीं पता कि किसान का लाड़ प्यार नकली पशु ‘अधिकारों’ के घेरे से बहुत बाहर तक फैला है और जिन्हें यह भी नहीं पता कि ट्रैक्टर और कल्टिवेटर के इस युग में भी बरदा बाबा उस उपज को अपने कन्धों पर धारण किये हुये हैं जिसके बीज ‘ऑर्गेनिक उत्पादों’ के पैकेट में बन्द उन विराट बाजारू मालों में मिलते हैं जिनकी वायु तक जीवनहीन और प्रदूषण से भरी होती है!
 जिन्हें यह भी नहीं पता कि चावल धान नामक एक घास से उपजाया जाता है और रिफाइंड राइस ब्रान ऑयल किसी छत्ते से नहीं टपकता!            

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

'राम की शक्तिपूजा' - निराला : एक स्वर आयोजन की भूमिका


Sktnirala2
वाचक का वक्तव्य:
'...भूमिका में मेरा अपना कुछ नहीं है। वाल्मीकि, चतुरसेन और नरेन्द्र कोहली के अध्ययन से रामकथा की जो समझ बनी, उसका अत्यल्प निराला की कालजयी रचना की पठन प्रस्तुति की भूमिका के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
समग्र तो 'लघु उपन्यास अग्निपरीक्षा' के कलेवर में कभी आयेगा। लिखित रूप नहीं दे रहा, यह तो सुनने के लिये है। ...वर्तमान में बंगलुरू में रहते श्री ललित कुमार का आभारी हूँ जिन्हों ने स्वयं पढ़ कर मुझे राह दिखाई कि जो भी करना है, कर डालूँ। ...स्वास्थ्य ठीक नहीं है। ज्वर की थकान  के कारण मेरा साधारण स्वर और दोषपूर्ण हो गया है लेकिन संतोष है कि आरम्भ कर दिया...यह वर्षों से बेचैन निज कामना को शांत करने का एक आयोजन है।'
                                               - गिरिजेश राव   

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जहँ जहँ चरन पड़े राघव के
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शनिवार, 21 नवंबर 2009

पुरानी रामायण - 1

1 आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण का यह संस्करण गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा संवत 2017 (सन 1960) में छापा गया। प्रतियाँ थीं 10000। आठ वर्षों के पश्चात 15000 प्रतियाँ छपीं, जब पिताजी उनमें से एक घर ले आए। दो भाग थे - मूल्य दोनों का मात्र बीस रूपए। उस जमाने के हिसाब से सस्ता नहीं कहा जा सकता लेकिन गुणवत्ता के क्या कहने ! गेरुए रंग की कपड़े की मजबूत जिल्द (आज तक नहीं फटी है), त्रुटिहीन, स्वच्छ छपाई और सौन्दर्य का खयाल। प्रति वर्ष 1250 प्रतियाँ बिकीं तो कहीं धार्मिक भावना से अधिक प्रोडक्सन क़्वालिटी का योगदान ही रहा होगा।


hastaaxarश्वेत श्याम और रंगीन चित्र इतने नयनाभिराम थे कि आँखें बरबस ठहर सी  जाती थीं/हैं। जैसा कि पिताजी द्वारा पाठन के विराम को ओंकार चर्चित दिनांक से अंकित करने से स्पष्ट है, सन 1971 में भी वह इसे पढ़ रहे थे।  हमलोग इसके दो भागों के नयनाभिराम चित्रों को देखते हुए बड़े हुए और अनजाने ही संस्कारित होते चले गए। राम के अनेक रूप, सीता की सहज सुन्दरता, वीर बजरंगी के वज्र शरीर से फूटती ऊर्जा .....  सब सम्मोहित कर देते थे। बड़े होते जब पढ़ने लगा तो समझ बढ़ते बढ़ते बहुत कुछ नोटिस किया जो इस लेख के दूसरे भाग में बताऊँगा - अभी तो चित्रों पर ही केन्द्रित रहूँगा।  ये चित्र विशुद्ध भारतीय शैली में विशुद्ध भारतीय सौन्दर्य दृष्टि से पात्रों को दर्शाते हैं - इसीलिए मन को मोहते हैं। मुख्य पात्रों के अलावा बैकग्राउण्ड के विन्यास और अंकन में अनुपात की त्रुटियाँ हो सकती हैं लेकिन सम्प्रेषण की सटीकता इतनी बोल्ड है कि उसके आगे सब कुछ छिप जाता है।
(1) जरा मंत्रणा करते सुग्रीव, वानर समाज और राम लक्ष्मण को देखिए! बैकग्राउण्ड के दो शिखर दोनों भाइयों के कोमल आनुपातिक शरीरों को पौरुष की गरिमा दे रहे हैं। डीटेलिंग न्यून रखते हुए चित्रकार कैसे वानर वीरों के शरीर सौष्ठव को उभार रहा है !!
(2) समुद्र लाँघते हनुमान की विराटता देखिए! समुद्र की लहरों में रेखाओं के घुमाव, चाप और अपूर्णवृत्तवत वक्र रेखाएँ भारत की सनातन कलाकारी को दर्शाती हैं। इस कलाकारी ने एक तरफ तो अनगढ़ ब्राह्मी लिपि को सुन्दर आकार दिए तो दूसरी तरफ खजुराहो की मूर्तियाँ भी दीं।
(3),(4),(5) सीता के सौन्दर्य को निरखिए - मूर्तिमान पवित्रता ! उत्तर भारतीय नारी का गरिमामय सौन्दर्य और सखी सरमा अपने सारे रक्ष सौन्दर्य के साथ कितनी आत्मीय है!!
(6) अशोकवाटिका का विध्वंश करते मारुति का पौरुष, उल्लास और कौतुक निरखिए! पेंड़, भागते राक्षस और मन्दिर सभी कितने लघु हो गए हैं!!
(7) रावण की सभा में राक्षसों का चित्रांकन तो अति उत्तम है लेकिन भव्यता सादगी के आगे पराजित हो गई है। पर्सपेक्टिव का दोष है क्या?
(8) सीता को ढूढ़ कर लौटते वानर समूह, भ्राताद्वय और सुग्रीव का चित्रांकन अद्भुत है। घने छाए बादलों के बीच से प्रकट होता वानर समूह राम, लक्ष्मण और सुग्रीव की मन:स्थिति से एकदम से जुड़ रहा है। पात्रों के चित्रांकन के तो क्या कहने !
(9)  समुद्र को शासित करते राम का यह रूप ! सोचता हूँ कि फिर कोई चित्रकार बना पाएगा!! समुद्र की लहरों की उठान श्रीराम के क्रोध से कैसे मिल सी जा रही है और उनके मध्य दीन सा समुद्र। मैं अभिभूत रह जाता हूँ।
(10) राम से मिलने आते विभीषण के इस चित्र में वानर समूह की मुद्राओं का सौन्दर्य कितना स्वाभाविक लगता है !
(11)  कुम्भकर्ण को जगाने का यह दृश्य बहुत कमजोर प्रस्तुति है। भैंसे, राक्षस, हाथी वगैरह सब एक ही आकार के ! चित्रकार महोदय चूक गए !
(12)  कुम्भकर्ण वध के इस दृश्य में राम और हनुमान के लाघव और गति का चित्रण दर्शनीय है।
(13)  संजीवनी लाते हनुमान के इस चित्र में हताशा, आशा और कौतुहल एक साथ दिखते हैं।
(14) गरुड़, राम और लक्ष्मण का सजीव चित्रण !
(15) मेघनाद वध के इस दृश्य में लक्ष्मण और हनुमान की क्षिप्रता और लाघव को निरखिए।
(16) इन्द्र सारथी मातलि और श्रीराम के इस रंगीन चित्र में सब कुछ साधारण है।
(17) हनुमान के कन्धे पर बैठ रावण से युद्ध करते राम के इस चित्र में  रावण सारे ऐश्वर्य के बावजूद कितना हास्यास्पद लगता है! राम और हनुमान तो वीरता साक्षात हैं। इस चित्र में भी लैण्डस्केप की न्यूनता और कैनवास का संकुचन इसे साधारण कोटि का बना देता है।
(18)  रावण वध के इस दृश्य में बस राम और रावण को देखिए और देखते रह जाइए। कितनी उदारता से चित्रण हुआ है!
(19)  विजय के पश्चात विभीषण को वानरों का सत्कार करने का निर्देश देते राम यहाँ चित्रित हुए हैं। यह चित्र मुझे कमजोर लगता है।
(20) लक्ष्मण द्वारा विभीषण के राज्याभिषेक का यह चित्र अवसरोचित गरिमा का वातावरण लिए हुए है। एकबार फिर वैष्णवी सादगी के मोह के कारण कैनवास लघु हो गया है और भव्यता की उपेक्षा हुई है।
(21)  ऋषियों द्वारा श्रीराम के अभिनन्दन के इस दृश्य में वैष्णवी गरिमा अपने शिखर पर है।
                                                                                                
1_Shriram_sugreev
2_hanuman_sagar_langhan
3_seeta_sarma
4_sita_hanuman
5_hanuman_sita_conversation
6_hanuman_ashokvatika
7_ravan_sabha_hanuman
8_vanar_returning
9_Ram_samudra
10_vibheeshan_in_ramcamp
11_kumbhakarna
12_kumbhakarna_vadh
13_hanuman_with_booti
14_Shriram_Laxman_Garud
15_meghnad_vadh
16_Ram_Matali
17_ram_ravan_hanuman_yuddha
18_ravan_vadh
19_ram_vibheeshan_pushpak
20_Vibheeshan_rajyabhishek
21_ram_with_saints

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सारे चित्र चित्रकार जगन्नाथ ने बनाए हैं। गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित वाल्मीकि रामायण की आजकल की प्रतियों में ये चित्र नहीं मिलते। सोचा कि इन्हें भविष्य के लिए सहेज दूँ और आप सब का इनसे परिचय कराता चलूँ। गीताप्रेस, गोरखपुर का इन चित्रों के लिए मैं आभारी हूँ। बिना अनुमति लिए पोस्ट करने की धृष्ठता कर रहा हूँ इसके लिए गीताप्रेस से क्षमाप्रार्थी हूँ। अपनी शुभेच्छा पर भरोसा है। कोई व्यवसायिक उद्देश्य तो है ही नहीं। (दूसरे भाग में जारी)
चलते चलते :
22 अक्टूबर 2009 को प्रयोग करते भूलवश यह लेख अधूरा ही प्रकाशित हो गया था। अग्रिम क्षमा की सावधानी के बावजूद यह 
पोस्ट तीन बहुत ही महत्त्वपूर्ण ब्लॉगरों की टिप्पणियाँ सहेज लाई।
उसके बाद मैंने टिप्पणी का विकल्प हटा दिया था। चूँकि उस पोस्ट को आज हटा रहा हूँ इसलिए उन टिप्पणियों  को यहाँ मान दे रहा हूँ:  
 हिमांशु । Himanshu ने कहा… प्रयोग आप कर रहे हैं, धैर्य आप रखें । टिप्पणीकार तो टिप्पणी कर ही जायेगा । October 22, 2009 2:10 PM 
 संगीता पुरी ने कहा… हिमांशु जी ने सही कहा .. धैर्य तो आपको रखना था .. आपने आधा अधूरा प्रकाशित क्‍यूं किया ? October 22, 2009 2:32 PM 
 Arvind Mishra ने कहा… अधूराकाम अनुचित है -हमारे धैर्य की परीक्षा मत लें ! October 22, 2009 2:42 PM 

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

....रोवें देवकी रनिया जेहल खनवा

वाराणसी। अर्धरात्रि। छ: साल पहले की बात। सम्भवत: दिल्ली से वापस होते रेलवे स्टेशन पर उतर कर बाहर निकला ही था कि कानों में कीर्तन भजन गान के स्वर से पड़े:
"....रोवें देवकी रनिया जेहल खनवा"
इतनी करुणा और इतना उल्लास एक साथ। कदम ठिठक गए। गर्मी की उस रात मय ढोलक झाल बाकायदे बैठ कर श्रोताओं के बीच मंडली गा रही थी। पता चला कि शौकिया गायन है, रोज होता है। धन्य बाबा विश्वनाथ की नगरी ! रुक गया - सुनने को।
" भादो के अन्हरिया
दुखिया एक बहुरिया
डरपत चमके चम चम बिजुरिया
केहू नाहिं आगे पीछे हो हो Sss
गोदि के ललनवा लें ले ईं ना
रोवे देवकी रनिया जेहल खनवा SS”
जेलखाने में दुखिया माँ रो रही है। प्रकृति का उत्पात। कोई आगे पीछे नहीं सिवाय पति के। उसी से अनुरोध बच्चे को ले लें, मेरी स्थिति ठीक नहीं है। मन भीग गया। लेकिन गायक के स्वर में वह उल्लास। करुणा पीछे है, उसे पता है कि जग के तारनहार का जन्म हो चुका है। तारन हार जिसके जन्म पर सोहर गाने वाली एक नारी तक नहीं ! क्या गोपन रहा होगा जो बच्चे के जन्म के समय हर नारी का नैसर्गिक अधिकार होता है। कोई धाय रही होगी? वैद्य?
देवकी रो रही है। क्यों? शरीर में पीड़ा है? आक्रोश है अपनी स्थिति पर ? वर्षों से जेल में बन्द नारी। केवल बच्चों को जन्म दे उन्हें आँखों के सामने मरता देखने के लिए। तारनहार को जो लाना था। चुपचाप हर संतान को आतताई के हाथों सौंपते पति की विवशता ! पौरुष की व्यर्थता पर अपने आप को कोसते पति की विवशता !! देवकी तो अपनी पीड़ा अनुभव भी नहीं कर पाई होगी। कैसा दु:संयोग कि एक मनुष्य विपत्ति में है लेकिन पूरा ज्ञान होते हुए भी अपने सामने किसी अपने को तिल तिल घुलते देखता है - रोज और कौन सी विपत्ति पर रोये, यह बोध ही नहीं। मन जैसे पत्थर काठ हो गया हो। देवकी क्या तुम पहले बच्चों के समय भी इतना ही रोई थी ? क्यों रो रही हो? इस बच्चे के साथ वैसा कुछ नहीं होगा
" ले के ललनवा
छोड़बे भवनवा कि जमुना जी ना
कइसे जइबे अँगनवा नन्द के हो ना"
इस भवन को छोड़ कर नन्द के यहाँ जाऊँ कैसे? बीच में तो यमुना है।

"रोए देवकी रनिया जेहल खनवा SSS”
माँ समाधान देती है।
"डलिया में सुताय देईं
अँचरा ओढ़ाइ देईं
मइया हई ना
रसता बताय दीहें रऊरा के ना,
जनि मानिं असमान के बचनवा ना
रोएँ देवकी रनिया जेहल खनवा SS

जेल मे रहते रहते देवकी रानी केवल माँ रह गई है। समाधान कितना भोला है ! कितना भरोसा । बच्चे को मेरा आँचल ओढ़ा दो ! यमुना तो माँ है आप को रास्ता बता देंगी। लेकिन यहाँ से इसे ले जाओ नहीं तो कुछ हो जाएगा।

तारनहार होगा कृष्ण जग का, माँ के लिए तो बस एक बच्चा है।
आकाशवाणी तो भ्रम थी नाथ ! ले जाओ इस बच्चे को ।. . . मैं रो पड़ा था।

उठा तो गाँव के कीर्तन की जन्माष्टमी की रात बारह बजे के बाद की समाप्ति याद आ गई। षोड्स मंत्र 'हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।' अर्धरात्रि तक गाने के बाद कान्हा के जन्म का उत्सव। अचानक गम्भीरता समाप्त हो जाती थी। सभी सोहर की धुन पर नाच उठते थे। उस समय नहीं हुआ तो क्या? हजारों साल से हम गा गा कर क्षतिपूर्ति कर रहे हैं।
"कहँवा से आवेला पियरिया
ललना पियरी पियरिया
लागा झालर हो
ललना . . . “
उल्लास में गवैया उत्सव के वस्त्रों से शुरू करता है।
"बच्चे की माँ को पहनने को झालर लगा पीला वस्त्र कहाँ से आया है?"
मुझे याद है बाल सुलभ उत्सुकता से कभी पिताजी से पूछा था कि जेल में यह सब? उन्हों ने बताया,
"बेटा यह सोहर राम जन्म का है।"
"फिर आज क्यों गा रहे हैं?"
"दोनों में कोई अंतर नहीं बेटा"
आज सोचता हूँ कि उनसे लड़ लूँ। कहाँ दिन का उजाला, कौशल्या का राजभवन, दास दासियों, अनुचरों और वैद्यों की भींड़ और कहाँ भादो के कृष्ण पक्ष के अन्धकार में जेल में बन्द माँ, कोई अनुचर आगे पीछे नहीं ! अंतर क्यों नहीं? होंगे राम कृष्ण एक लेकिन माताएँ? पिताजी उनमें कोई समानता नहीं !

हमारी सारी सम्वेदना पुरुष केन्द्रित क्यों है? राम कृष्ण एक हैं तो किसी का सोहर कहीं भी गा दोगे ? माँ के दु:ख का तुम्हारे लिए कोई महत्त्व नहीं !

वह बनारसी तुमसे अच्छा है। नया जोड़ा हुआ गाता है लेकिन नारी के प्रति सम्वेदना तो है। कन्हैया तुम अवतार भी हुए तो पुरुषोत्तम के ! नारी क्यों नहीं हुए ?