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बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

राम आ रहे हैं ... परमानंदं भरत: सत्यविक्रम:

राम आ रहे हैं, सुन कर भरत परमानंद में हैं - श्रुत्वा तु परमानन्दं भरतः सत्यविक्रमः। अयोध्यावासियों के लिये राजाज्ञा प्रसारित होती है - नगरवासी पवित्र हो कुलदेवता एवं सर्वसाधारण देवताओं के मंदिरों में सुगंधि, माला और वाद्य के साथ अर्चन करें - दैवतानि च सर्वाणि चैत्यानि नगरस्य च। 
सूत, वैतालिक, विरुदावली गाने वाले एवं पुराणज्ञ उनके स्वागत में कुशल बजनियों एवं नचनियों के साथ नंदिग्राम हेतु प्रस्थान करें।
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शत्रुघ्न व्यवस्था में लग गये- मार्ग के ऊँच नीच सम कर दिये जायँ। हिमशीतल जल का छिड़काव किया जाय - सिञ्चंतु पृथिवीं कृत्स्नां हिमशीतेन वारिणा। वीथियों के किनारे पताकायें फहरें, मार्ग पर पुष्प और लाजा बिखेर दिये जायँ। सूर्योदय के पूर्व ही भवनों की सजावट पूरी कर दी जाय - शोभयन्तु च वेश्मानि सूर्यस्योदयनं प्रति। 
पुष्प पंखुड़ियाँ बिखेर दी जायँ एवं सुगंधित पाँच रङ्गों (की अल्पनाओं) से राजमार्ग सजा दिया जाय - स्रग्दाममुक्तपुष्पैश्च सुगन्धैः पञ्चवर्णकैः। 
... 
अश्वारोही, गजारूढ़ योद्धा, रथी और पदाति सैनिक ध्वजायें लहराते चल पड़े। मातायें उनके साथ नंदिग्राम पहुँच गयीं। 
घोड़ों के खुरों, रथों, शंख एवं दुंदुभि के सम्मिलित नाद का ऐसा प्रभाव हुआ मानो मेदिनी काँप उठी! 
अश्वानां खुरशब्दैश्च रथनेमिस्वनेन च। 
शङ्खदुन्दुभिनादेन संचचालेव मेदिनी॥ 

... 
भरत की क्या स्थिति थी? 
उपवासकृशो दीनश्चीरकृष्णाजिनाम्बरः - उपवास से दुबले हो गये थे, दीन स्थिति में चीर वस्त्र और मृगचर्म पहने हुये थे। 
प्रसन्नता है कि सँभल नहीं रही, आशंका भी है कि क्या यह सच है। राम दिख नहीं रहे... 
भरत हनुमान से पूछ बैठे - कहीं अपनी (वानर) स्वभाव की चञ्चलता वश तो मुझे बनाने नहीं आ गये? कच्चिन्न खलु कापेयी सेव्यते चलचित्तता
हनुमान जी ने उत्तर दिया, "ध्यान से सुनिये, मुझे तो वानर सेना द्वारा गोमती नदी पार करने की ध्वनि सुनाई पड़ रही है - मन्ये वानरसेना सा नदीं तरति गोमतीम्। 
उड़ती धूल देखिये, साल वृक्ष शाखाओं का झूमना देखिये, मन्ने लागे कि वानर आ रहे हैं! 
रजोवर्षं समुद्भूतं पश्य वालुकिनीं प्रति। 
मन्ये सालवनं रम्यं लोलयन्ति प्लवङ्गमाः॥

आकाश में उड़ते विमान के लिये विमल चंद्र और तरुण सूर्य, दोनों की उपमायें हनुमान जी ने दीं - दृश्यते दूराद्विमलं चन्द्रसंनिभम् ... तरुणादित्यसंकाशं विमानं रामवाहनम्। 
जनघोष हुआ - यह तो राम हैं - रामोऽयमिति कीर्तितः
... 
भरत जी प्रमुदित हैं, बारम्बार स्वागत कर रहे हैं - राममासाद्य मुदितः पुनरेवाभ्यवादयत्। 
श्रीराम क्या करें? 
14 वर्ष बिछुड़न में बीते हैं, दीन मलीन अवस्था में भाई समक्ष है, अभिवादन कर रहा है, क्या करूँ? ... 

... 
स्नेह वात्सल्य उमड़ पड़ा। राजकीय स्वागत की मर्यादायें धरी रह गयीं। श्रीराम ने भरत को उठा गोद में बिठा आलिङ्गन में कस लिया (वैसे ही जैसे कभी बचपन में करते रहे होंगे)। 
 
तं समुत्थाप्य काकुत्स्थश्चिरस्याक्षिपथं गतम्
अङ्के भरतमारोप्य मुदितः परिषष्वजे
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सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

गच्छ सौम्य यथासुखम् [सुंदरकाण्ड - 4]


महर्षि कहते हैं कि हनुमान जी द्वारा मैनाक को इस प्रकार पार करना उनका दूसरा दुष्कर कर्म था – द्वितीयं हनुमत्कर्म दृष्ट्वा तत्र सुदुष्करम्। सागर को पार कर शत्रु क्षेत्र के अत्यंत अपरिचित, हिंस्र और दुर्जेय लङ्का में प्रवेश का निर्णय ले छलाँग भरना पहला दुष्कर कर्म था:
रामार्थं वानरार्थे च चिकीर्षन् कर्म दुष्करम्।
समुद्रस्य परं पारं दुष्प्रापं प्राप्तुमिच्छति॥

परीक्षा अभी पूर्ण नहीं हुयी थी - लङ्का पुरी में तो इच्छा अनुसार रूप धारण करने वाले कामरूपियों से पाला पड़ेगा जो कि भय के साथ बुद्धि को भी चुनौती देंगे, मारुति क्या उनसे पार पा सकेंगे?
राक्षसों से पीड़ित देव, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि; ये चार मिल कर नागमाता सुरसा के पास गये – मारुति के मार्ग में मुहुर्त भर के लिये विघ्न डाल दो। भय उत्पन्न करने वाली राक्षसी का भयंकर रूप बनाओ – द्रंष्टाकरालं पिङ्गाक्षं वक्त्रं कृत्वा नभ:स्पृशम्! हम सब पुन: मारुति के बल और पराक्रम को जानना चाह रहे हैं को संकट के समय ये उपाय कर तुम्हें जीतने के लिये कार्य करेंगे या विषाद में पड़ जायेंगे – त्वां विजेष्यत्युपायेन विषादं वा गमिष्यति?

राक्षसों की अजेयता का इतना आतङ्क था कि श्रीराम हित उनका भी कार्य सम्पन्न करने जा रहे मारुति को वे सभी ठोंक पीट कर परीछ लेना चाहते थे – आगे की सम्भावित दारुण परिणति से अच्छा है कि अभी निर्णय हो जाय। उन्हें केवल अपनी पड़ी है। पिटी पिटायी परिस्थिति में स्वयं अभियान न कर किसी अन्य उद्योगी को परीक्षित करना उसके लिये रजोगुणी बाधा उत्पन्न करना है। स्थैतिक बल और गतिक पराक्रम की पर्याप्तता जाँचना रजस है।
सुरसा अर्थात सुर-सा। नागमाता हैं किंतु उन चार के वर्गहित में पीड़ित नागों का भी हित देख कर नागमाता सहमत हो गयीं, रजोगुणी का यह भी एक लक्षण है। वह भयङ्कर रूप धारण कर पथ में अड़ गयीं - विकृतं च विरूपं च सर्वस्य च भयावहम्!

हनुमान! देवताओं ने तुम्हें भक्ष्य बता मुझे अर्पित कर दिया है। मैं तुम्हें खाऊँगी, मेरे मुख में प्रवेश करो। यहीं पर नहीं रुकीं, कहा कि यह तो मुझे पुराना ब्रह्म वरदान है – वर एष पुरा दत्तो मम! सुजन वरदानों के भ्रष्ट उपयोग और उनसे निवृत्ति के उदाहरण पूरी रामायण में व्याप्त हैं। विशिष्ट के विरुद्ध साधारण किंतु अप्रतिहत मानवीयता की अंतत: विजय ही तो रामाख्यान है। इस महत्त्वपूर्ण घड़ी भी उसे उपस्थित होना ही था। (आगे लङ्का में भी ऐसी स्थिति आनी है जहाँ दैहिक बल और पराक्रम से अधिक बुद्धि उपयुक्त होगी। महाकाव्य की विशेषता इसमें है कि मानवीयता को दृढ़ खड़ा रखता है - देखते हैं। सब कुछ जान समझ कर ‘देखी जायेगी’ कह कर उद्यत होने वाला रजस भाव यहाँ प्रतिष्ठित है।)    

मारुति ने धैर्य धारण किया, भयभीत तो हुये ही नहीं। प्रसन्नमुख अपना पक्ष निवेदित किये – प्रहृष्टवदनोऽब्रवीत्। राक्षसों से तो राम का भी वैर है और उनकी यशस्विनी पत्नी का हरण रावण ने कर लिया है – सीता हृता भार्या रावणेन यशस्विनी। अर्थात श्रीराम वैरी के वैरी हैं और पीड़ित स्त्री को मुक्त करना चाहते हैं, तुम तो राम की प्रजा भी हो। माता! ऐसे में तुम्हें तो उनकी सहायता करनी चाहिये – कर्तुमर्हसि रामस्य साह्यं विषयवासिनी। (उल्टे बाधा डाल रही हो?)

ध्यान देने योग्य है कि सीता यशस्विनी हैं, वनवास के वर्ष उन्हों ने ऐसे ही नहीं बिता दिये थे। राम के अभियान का जनपक्ष यहाँ भी उद्धृत है। नाग भी उनके विषयवासी प्रजा थे और वे भी राक्षसों से पीड़ित थे। अभियान साधारण नहीं था।

मारुति ने विकल्प भी दे दिया। मैथिली का दर्शन कर श्रीराम जी से मिल लूँगा तब तुम्हारे पास आ जाऊँगा, यह मेरा सत्यवचन है – आगमिष्यामि ते वक्त्रं सत्यं प्रतिशृणोमि ते, अभी तो जाने दे माँ! राजन्य वर्ग में वचन की बड़ी प्रतिष्ठा थी। इक्ष्वाकु कुल तो प्रसिद्ध ही था। मारुति ने यह कह स्मृति सी दिलायी कि मैं रघुवंशी राम का दूत हूँ, तुम्हें मेरे वचन को मान देना ही चाहिये।

राजा, प्रजा, कुल, वचन-प्रतिष्ठा, स्त्री पीड़ा आदि सबको मिला कर स्थिर प्रसन्न बुद्धि से मारुति ने जो संवाद किया उससे उनकी बुद्धिमत्ता प्रमाणित हो गयी लेकिन सुरसा को तो हनुमान की क्षमता भी जाननी थी – बलं जिज्ञासमाना, उसे युक्ति पूर्वक प्रयोग में ला भी सकता है या नहीं, यह भी तो जानना है।

माता ने मुख फैला दिया – तुम्हें तो मेरे मुख में प्रवेश कर के ही आगे जाना होगा, मेरी अवहेलना कर कोई आगे नहीं बढ़ सकता! निविश्य वदनं मेऽद्य गंतव्यं वानरोत्तम

हनुमान और उनमें होड़ सी लग गयी – वे मुख फैलाती गयीं, हनुमान भी बढ़ते गये। सीमा समझ हनुमान ने अपना आकार अंङ्गूठे के बराबर कर लिया, मुख में प्रवेश कर बाहर निकल नमस्कार मुद्रा में खड़े हो गये – दाक्षायणि! तुम्हें नमन है। अब तो तुम्हारा वर भी सत्य हो गया, मैं तुम्हारे मुख में प्रवेश कर बाहर जो आ गया। मैं अब वहाँ जाऊँगा जहाँ वैदेही हैं। (विद्वानों ने दाक्षायणि का अर्थ दक्ष पुत्री किया है। नागमाता का दक्ष पुत्री होना एक अलग विषय है।)

रजोगुणी परीक्षा पूर्ण हुई, बलबुद्धिनिधान हनुमान सफल हुये। आश्वस्त माता ने प्रकृत रूप धारण कर उन्हें आशीर्वाद दिया:
अर्थसिद्ध्यै हरिश्रेष्ठ गच्छ सौम्य यथासुखम्
समानय च वैदेहीं राघवेण महात्मना
हे हरिश्रेष्ठ! वांछित कार्यसिद्धि के लिये सुख पूर्वक जाओ। हे सौम्य! वैदेही को राघव से शीघ्र मिलाओ।

हमुमान जी द्वारा यह तीसरा दुष्कर कार्य सम्पन्न हुआ - तत्तृतीयं हनुमतो दृष्ट्वा कर्म सुदुष्करम्

... तमस परीक्षा आगे थी।  

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

जामवंत जी! उस पार कौन जायेगा?

निर्लिप्त हनुमान एकांत का आश्रय ले किनारे सुखपूर्वक बैठे हुये हैं। सामने महोदधि लहरा रहा है। वानरों के सामने बड़ी समस्या है कि पार कैसे करें?
नेता अङ्गद अन्य सबसे समुद्र को लाँघने की क्षमता के बारे में पूछते हैं। सभी बताते हैं लेकिन किसी की क्षमता पर्याप्त नहीं है। जाम्बवान भी वार्धक्य की दुर्बलता दर्शाते हुये अक्षमता बता देते हैं। 
अन्तत: अङ्गद जैसे तैयार हो रहे हों, अपनी सीमा बताते हैं – पार तो कर जाऊँगा लेकिन लौट पाऊँगा इसमें अनिश्चय है – निवर्तने तु में शक्ति: स्यान्न वेति न निश्चितं!  
वृद्ध बुद्धिमान जाम्बवान उनकी क्षमता का बखान करते हुये उन्हें ऐसा करने से बरजते हैं। जो कहते हैं वह बहुत ही समीचीन है:
नहि प्रेषयिता तात स्वामी प्रेष्य: कथंचन 
भवता अयम् जनः सर्वः प्रेष्यः प्लवग सत्तम 
भवान् कलत्रम् अस्माकम् स्वामि भावे व्यवस्थितः 
स्वामी कलत्रम् सैन्यस्य गतिः एषा परंतप
अपि वै एतस्य कार्यस्य भवान् मूलम् अरिम् दम
तस्मात् कलत्रवत् तात प्रतिपाल्यः सदा भवान्
मूलम् अर्थस्य संरक्ष्यम् एष कार्यविदाम् नयः
मूले हि सति सिध्यन्ति गुणाः पुष्प फल उदयः
कलत्रशब्द का अप्रचलित, पुराना मूल प्रयोग कर एक बार पुन: वाल्मीकि जी संहितासमांतर परम्परा के वाहक सिद्ध होते हैं। इस शब्द का अर्थ पूछेंगे तो ज्ञाता रूढ़ अर्थ बतायेंगे पत्नी किंतु यहाँ यह शब्द रक्षणीयअर्थ में प्रयुक्त हुआ है। पत्नी या भार्या रक्षणीय होती है क्यों कि वह धर्म की मूल है। इस शब्द का का अर्थ राजदुर्ग भी होता है जिसमें बहुत कुछ मूल्यवान जमा होता है इसलिये वह रक्षणीय होता है। इसका अर्थ गुह्य मर्मस्थल भी होते हैं जो रक्षणीय होते हैं। 
जामवंत कहते हैं नहीं कुमार, आप तो स्वामी प्रेषक हैं आप प्रेष्य सेवक कैसे हो सकते हैं? आप का कार्य तो कर्ता को नियुक्त करना है। आप हमारे कलत्र हैं जिसे हमने अपना स्वामीबना रखा है। आप की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है (हम वहाँ भेज आप को कैसे संकट में डाल सकते हैं?)। आप सेना के कलत्र हैं, आप की रक्षा करनी ही होगी। हे शत्रुदमन! आप इस कार्य के मूल में हैं (जैसे भार्या गृहधर्म की होती है) इसलिये हमें आप का प्रतिपालन कलत्रवत ही करना है। किसी भी उद्योग को करते समय उसके मूलार्थ की रक्षा करनी होती है। मूल के सुरक्षित रहने से सभी गुण सिद्ध होते हैं और फल फूल भी प्राप्त होते हैं। आप रक्षणीय हैं, आप को सङ्कट में नहीं डाल सकते।

रविवार, 18 सितंबर 2016

रामायण से दो कथायें: गङ्गावतरण और कार्तिकेय जन्म

(1) गङ्गावतरण:   
सगर=स+गर, जो गर यानि गरल (विष) के साथ उत्पन्न हुआ हो।
गर्भ में ही थे तो विमाता ने माता को (गर्भपात कराने हेतु) विष दे दिया। घबरायी माँ गयी भृगुकुल - क्या होगा मेरे गर्भ का भविष्य?
"जाओ रानी, तुम्हारे पुत्र को कुछ नहीं होगा। वह प्रतापी विष के साथ ही जन्म लेगा, सगर कहलायेगा।"
.... 
सगर की दो रानियाँ - विदर्भ की राजकन्या केशिनी और दूसरी गरुड़ की बहन सुमति। भृगु पुन: कथा में आते हैं -  एक को साठ हजार पुत्र होंगे और दूसरी को वंश चलाने वाला बस एक।
केशिनी को एक ही पुत्र हुआ - असमञ्ज। असमञ्ज दुष्ट अत्याचारी निकल गया। प्रजा के बालकों को पकड़ सरयू में फेंक देता, डूबते हुये आर्तनाद करते तो अट्टहास करता मोद मनाता। सगर ने उसे देशनिकाला दे दिया लेकिन वह योग्य युवराज अंशुमान के रूप में पुत्र छोड़ गया। उसके पश्चात क्षरित होते यथास्थितिवादियों और विस्तार लेती नवोन्मेषी इक्ष्वाकुओं के बीच संघर्ष प्रारम्भ हुआ।
...
 विन्ध्य और हिमवान के बीच के क्षेत्र में खनन का प्रारम्भ होता है:
विन्ध्यपर्वतमासाद्य निरीक्षते परस्परम्।
तयोर्मध्ये समभवद् यज्ञ: स पुरुषोत्तम॥
 आख्यान कहता है - यज्ञीय अश्व को इन्द्र चुरा ले गया था, उसकी खोज में ऐसा हुआ। सगर के साठ हजार पुत्र खंती, हल आदि ले 'मेदिनी' खोदने लगते हैं - खनत मेदिनीं। मेदा शरीर की एक अंतर्भाग होती है। कहते हैं कि पृथ्वी कभी मेदा से ढकी हुई थी।
खनन में क्या होता है? पूरा जम्बूद्वीप ही खोदा जा रहा है! - जम्बूद्वीपं खनंतो नृपशार्दूल सर्वत: परिचक्रमु।  देवता, नाग, यक्ष, गन्धर्व, पिशाच आदि सब मनुष्यों के इस वृहद अभियान से त्रस्त हो उठते हैं। कितने ही उनके हाथों मारे जाते हैं।
नागानां वध्यमानानामसुराणां च राक्षसानां दुराधर्षां सत्त्वानां निनदो... देवदानवरक्षांसि पिशाचोरगपन्नगा:!
वाल्मीकि लिखते हैं - वसुधा। वसुधा तो वासुदेव की महिषी है जिसकी रक्षा वह कपिल रूप धारण कर करते हैं। उनके कोप से ये दुस्साहसी भस्म हो जायेंगे, धैर्य धरो - यस्येयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमत:। महिषी माधवस्यैषा स एव भगवान् प्रभु:॥ ...
... कभी उपजाऊ रही मेदिनी अब अल्प उपजाऊ हुई पड़ी थी। सगर पुत्रों का अभियान उसके दोहन का पहला संगठित अभियान था। कपिल बहुत पुराने हैं और धरा को एक बार बन्ध्यत्त्व से मुक्त करा उपजाऊ बनाने के लिये जाने जाते हैं। राजा पृथु की सहायता से यह काम तब सम्पन्न हुआ था, धरा पृथ्वी कहलायी थी।
कपिल संरक्षित पृथ्वी के संकट से इक्ष्वाकुवंशी टकराते हैं और भस्म होते हैं। स्पष्ट है कि कपिल ने पहले जो कुछ भी किया था, वह अब पर्याप्त नहीं रह गया था। संकट सामने था। साठ हजार सगरपुत्रों की गाथा जाने कितनों के पानी के उद्योग में मर खप जाने की गाथा है।   
... अंशुमान चाचाओं को ढूँढ़ते कपिल के आश्रम पहुँचते हैं। उन्हें भस्म पा शोकग्रस्त कुमार तर्पण हेतु जल ढूँढ़ते हैं और तर्पण तक के लिये पानी नहीं! 
क्या है यह? भूजल के चुकते जाने की गाथा नहीं है क्या? कितना भी खोदो, पानी रसातल में जा चुका है, नहीं मिलने वाला!
 मृतकों के मामा गरुड़ जो कि ऊँचाई से धरा पर दृष्टि रखते हैं, कुमार को समझाने आते हैं। कहते हैं - वधोयं लोकसम्मत:। इनका वध तो लोक कल्याण के लिये हुआ है। कपिल की आग से ये दग्ध हुये हैं, इनके तर्पण के लिये लौकिक जल! कत्तई नहीं - सलिलं नार्हसि प्राज्ञ दातुमेषां हि लौकिकम्!
... और तब गरुड़ उस स्वप्न को अंशुमान की आँखों में उकेरते हैं, ऐसा स्वप्न जिसने आगामी पीढ़ियों की भी नींद उड़ा दी।
अंशुमान खप गये, उनके पुत्र दिलीप भी और बारी आई नि:संतान भगीरथ की। उन्हों ने भी पुरखों की परम्परा आगे बढ़ायी - इस स्वप्न को तो पूरा करना ही है।
क्या था वह स्वप्न, कैसे उद्योग की प्रस्तावना था?
गङ्गा हिमवतो ज्येष्ठा दुहिता पुरुषर्षभ।
तस्यां कुरु महाबाहो पितृणां सलिलक्रियाम्॥
.. कुमार अंशुमान! गंगा तो इस लोक की थी, हिमवान की बड़ी पुत्री। लोक कल्याण का बहाना ले देवता स्वर्ग ले गये। उतार लाओ उसे पृथ्वी पर, उसकी अब यहाँ आवश्यकता है। उसी के जल से तुम्हारे पितरों का तर्पण होगा।
...
पीढ़ियों तक चले उद्योग के आगे ब्रह्मा पिघले, शिव की जटायें आश्रय बनीं, गंगा का भी अहंकार चूर्ण हुआ, जटायें खुल गयीं, जह्नु का आश्रम अवरोध समाप्त हुआ। धरा को, पृथ्वी को पुन: उसका दाय मिला। पुरखे तृप्त हुये और आने वाली पीढ़ियों को युगों युगों तक के लिये जलसंकट से मुक्ति मिली। धरा को पुन: बंध्यत्व से मुक्ति मिली और कठिन कर्म के साधकों के लिये एक उपमा ने जन्म लिया - भगीरथ। 
'सप्तसैन्धव' एक ऐसी अवधारणा रही जिसे किसी क्षेत्र विशेष में सीमित कर देना उपयुक्त नहीं। अग्नि केन्द्रित पश्चिमी और ओषधि केन्द्रित पूर्वी वैदिक धाराओं के बारे में बताता रहा हूं, यह भी कि ऋग्वेद का कवि जह्नुक्षेत्र से परिचित है, कार्य व्यापार भी बताता है और संकेत भी देता है कि वह प्राचीन समांतर क्षेत्र था।
सा तस्मिन् पतिता पुण्या पुण्ये रुद्रस्य मूर्धनि
हिमवत्प्रतिमे राम जटामंडल गह्वरे
भगीरथ के तप से धरा का ताप मिटाने को गंगा शूलिन की जटाओं में अवतरित हुईं। महर्षि वाल्मीकि विरोधी शब्दों को साथ रख कर अद्भुत गरिमा से संयुत कर देते हैं - नीचे आ कर पतिता हो गईं गंगा किन्तु पुण्या हैं 'पतिता पुण्या'। नीचे आईं तो किन्तु इतना पुण्य ले कर आईं कि रुद्र की जटाओं में स्थान मिला! कैसा पुण्य? लोक कल्याण हेतु पतिता होने का पुण्य।
बिन्दुसर में रुद्र ने गंगा जी को सात धाराओं में मुक्त किया  - यह सप्तसैंधव का पूर्वी संस्करण है।  तीन मंगलमयी धाराएँ प्राची की ओर बह चलीं - ह्लादिनी, पावनी और नलिनी। तीन धाराएँ प्रतीचि (पश्चिम) की ओर - सुचक्षु, सीता और सिन्धु महानदी। सातवीं धारा भगीरथ के पीछे पीछे चली, उनके पुरखों को तारने के लिए।
ह्लादिनी पावनी चैव नलिनी च तथैव च।
तिस्र: प्राचीं दिशं जग्मुर्गङ्गा: शिवजला: शुभा:॥
सुचक्षुश्चैव सीता च सिन्धुश्चैव महानदी।
तिस्रश्चैता दिशं जग्मु: प्रतीचीं तु दिशं शुभा:॥
सप्तमी चान्वगात् तासां भगीरथरथं तदा।
भगीरथोsपि राजर्षिदिव्यं स्यन्दनमास्थित:॥ 
तिस्र से बरबस ही ध्यान ऋग्वेद की तिस्रो देवियों सरस्वती, इळा और भारती पर चला जाता है। साथ ही अथर्वण संहिता के त्रिसप्ता तो ध्यान में आते ही हैं।
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आगे गंगा प्रवाह का सरल सहज वर्णन मुग्ध कर देता है। वाल्मीकी जी इस प्रकरण का महात्म्य बताना नहीं भूलते:
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुत्र्यं स्वर्ग्यमथापि च
... प्रीयंते पितरस्तस्य प्रीयंते दैवतानि च
इदमाख्यानमायुष्यं गंङ्गावतरणं शुभं
य: शृणोति च काकुत्स्थ सर्वान् कामानवाप्नुयात्
सर्वे पापा: प्रणश्यंति आयु: कीर्तिश्च वर्धते
इस आख्यान के सुनने से यश, आयु, पुत्र, स्वर्गसुख और कीर्ति में वृद्धि होती है।  सभी कामनायें पूरी होती हैं, पाप नष्ट हो जाते हैं।
'सुनना' बहुत कम समझा गया शब्द है। एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देना सुनना नहीं है, hearing और listening में अंतर है कि नहीं? सुनेंगे तो कर्मप्रवृत्त होंगे, यदि नहीं होते तो बस सुनी सुनाई बातें hearing भर है!  वेदों को श्रुति कहा गया है। श्रुति का 'योजन' यजु: कर्मकांड है, गायन साम है और अंग लगाना आंगिरस। बस सुन कर नहीं रह गए, कर्मरत हुये, जीवन में उतार लिए, ऐसे कि तन्मय हो गा उठे अंग अंग रससिक्त हो गया। वेदसम्मत जीवनाचार तो तब हुआ न!

ऐसे आचरण से ही कामनायें पूरी होती हैं। धूमेनाग्निरिवावृताः  - कर्म तो सदोष होता ही है लेकिन शुभ के लिये है तो कृत पाप भी नष्ट होते हैं, आयु और कीर्ति बढ़ते हैं। पीढ़ियों तक चला गंगा अवतरण अभियान  साक्षी है।     
भगीरथ का तप और गङ्गावतरण 
(2) कार्तिकेय का जन्म: 

सम्भव है, कार्तिकेय का जन्म भूले बिसरे युग में आकाश'गंगा' से हिमालय और कैलास क्षेत्र में हुये किसी उल्कापात और उसके कारण हुये विविध वृहद परिवर्तनों का क्लिष्ट रूपक हो।

रुद्र (आकाश का लुब्धक तारा?) का तेज स्खलित होता है , अग्नि देवता (कृत्तिका नक्षत्र के) 'आकाशगंगा' में उसे स्थापित करते हैं: 
इयमाकाशगङ्गा च यस्यां पुत्रम् हुताशन:

जनयिष्यति देवानां सेनापतिमरिन्दमम्॥ 

 गंगा उसे धारण करने में अपने को असमर्थ पाती हैं - अशक्ता धारणे देव तेजस्तव। इसके दाह से जली जा रही हूँ; ... 

अग्नि उसे हिमालय के पार्श्वभाग में स्थापित करने को कहते हैं। कैसा है वह तेज (उल्कापिंड?) कंचन के समान चमकता हुआ, उसके प्रभाव से बहुतों के रंग बदल कर रजत हो जाते हैं, दूरवर्ती क्षेत्र की वस्तुयें ताँबा और लोहा हो जाती हैं - ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत।

उस तेज की जो मैल है उससे सीसा और रांगा और अन्य कई धातुयें होती हैं:

मलं तस्याभवत् तत्र त्रपु सीसकमेव च।
तदेतद्धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत॥
पर्वत श्वेत सुवर्णमय जगमगाने लगता है। तृण, वृक्ष, लता और गुल्म सब काञ्चन।
और तब देवता उसे नहलाने और दूध पिलाने को कृत्तिकाओं को नियुक्त करते हैं। उन छ: माताओं का दूध पी वह शिशु बड़ा होता है, कार्तिकेय कहलाता है। उसके नेतृत्त्व में देवता दैत्यों पर विजय प्राप्त करते हैं। दैत्य कौन? दिति के पुत्र।
धातुयें, अयस्क, देवताओं द्वारा शोधन कर उन्नत शस्त्रास्त्रों का निर्माण और विरोधियों पर विजय। कब हुई यह घटना? तब तो नहीं जब महाविषुव कृत्तिका नक्षत्र पर पहुँचा?? 
___________________
संश्लिष्ट जटिल बिम्ब पुरातन सभ्यताओं के अपने ढंग रहे हैं - पीढ़ी दर पीढ़ी घटित की सीख को पहुँचाने को। मिस्र की कहानियाँ सुनाऊँ, यवनों की की?? 
भद्र!
उन गाथाओं की शक्ति पहचानो, जानो कि कितनी दीर्घजीवी हैं। आधुनिक समय में तो तुम्हें यह तक नहीं पता कि नेता जी कब तक और कहाँ कहाँ रहे
पुरनिये जानते थे कि 'यथार्थ' दीर्घजीवी नहीं होता। होना भी नहीं चाहिये, उसकी सीख होनी चाहिये।