पाठक मेरे!
हाँ मैंने पढ़ी है तुम्हारी हर टिप्पणी
अक्षर, अक्षर , मात्रा , मात्रा
मैंने उनमें लय ढूढ़ने के जतन किए हैं
अपने लिए सम्मान प्यार तिरस्कार सब ढूढ़ा है
पाया है।
वह बेचैनी भी ढूढ़ी है -
काश ! थोड़ा ऐसे लिख दिया होता
क्या बात होती !
कम्बख्त ने कबाड़ा कर दिया।
मैंने पाया है कई बार
स्तब्ध मौन - जब तुम बिना कुछ कहे चले गए।
वह स्पष्ट निन्दा बघार
मेरे स्वर व्यंजन - व्यंजन स्वाद।
सब सवादा है।....
पाठक मेरे !
मैं मानता हूँ
तुम भी पढ़ते होगे मुझे इसी तरह।
गुरुवार, 19 नवंबर 2009
शनिवार, 14 नवंबर 2009
हमहूँ मुक्तिबोध
हमहूँ मुक्ति
हमहूँ बोध
हमहूँ मुक्तिबोध।
बोधुआ भी कर रहा
मुक्ति पर शोध
जो केहु टोके
करता है किरोध।
हमने कहा छोड़ आगे बढ़
हमने कहा छोड़ आगे बढ़
का मुक्तिबोध के बाद कोई नहीं हुआ
उठाया जिसने अभिव्यक्ति का खतरा ?
उसने देखा
हमने जारी रखा अपना फेंका,
अगर ये सच है कि मुक्तिबोध के बाद
अगर ये सच है कि मुक्तिबोध के बाद
तुम्हें कोई नहीं दीखता
तो उनके ही शब्दों में
भारी भयानक सच है।
खतरनाक है।
हिन्दी क्या इतनी बाँझ है?
अगर कोई हुआ है
तो ये जन्मदिन पर क्या हुआँ हुआँ है?
कोई जरूरी है कि किसी को सिरफ
जन्मदिन पर ही याद करो?
फर्ज अदायगी करो
और फिर भूल जाओ अगले साल तक !
बोधुआ रे!
बोधुआ रे!
सही कहूँ तो हमको मार्क्सवाद अस्तित्त्ववाद वादबाद
कछु नहीं बुझात है
बुझात है सिरफ कि कामायनी की आलोचना
दूर की कौड़ी है
उनकी सभी लम्बी कविताएँ एक सी लगत हैं
तुम तो उन्हें सबसे बड़ा विचारक बनाए बैठे हो !
हमको तो विजय साही जियादा सही लगत हैं
एतना जो सुना
निकाला बोधुआ ने जूता ..
हमने पकड़ा उसका हाथ
हमने पकड़ा उसका हाथ
समझाया
उन्हों ने गढ़ मठ तोड़ने की बात कही थी
है कि नहीं ?
उसने जूते की जुतारी भरी
खतरा टला जान हमने बात आगे करी
अब ये बताओ उनके नाम पर
तुम लोग काहे गढ़ मठ रचत हो ?
उसने बकास सा हमरी ओर देखा
हम खुश हुए अपनी झकास पर।
बात आगे बढ़ाई
देखो आँख खोल देखो
पाँच रुपए घंटा माँ
और एकाध सौ घंटा माँ
तुम नेट से जान जाओगे
कि दुनिया बहुते आगे जा चुकी है।
कि गढ़ मठ कुआँ बना
चेहरे पर मुर्दनी सजा
छापो तिलक लगा
राम राम मुक्ति मुक्ति जपत हैं।
हिन्दी मइया तकत हैं
हमका बोध कब होयगा
जे हाल है उस पर किरोध कब होयगा?
रुकी ग्रामोफोन की सुई
डीजे वीजे के जमाने में
मुक्तिबोध के सहारे लगे नौकरी हथियाने में ।
प्यार करो आदर करो
लेकिन उनके घेरे से बाहर चलो
हिन्दी अबहूँ दलिद्दर है
शोध के लिए कछु और चुनो
भूल गए क्या?
“ ... मेरे युवकों में होता जाता व्यक्तित्वान्तर,
विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह से करते हैं संगर,
मानो कि ज्वाला-पँखरियों से घिरे हुए वे सब
अग्नि के शत-दल-कोष में बैठे !!
द्रुत-वेग बहती हैं शक्तियाँ निश्चयी।“
विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह से करते हैं संगर,
मानो कि ज्वाला-पँखरियों से घिरे हुए वे सब
अग्नि के शत-दल-कोष में बैठे !!
द्रुत-वेग बहती हैं शक्तियाँ निश्चयी।“
बोधुआ ने हमरी ओर देखा
जूते को फेंका
चल दिया बड़बड़ाता,
”पागलों के मुँह क्या लगना ?
जूते मार कर भी क्या होगा?"
मैं गली में आगे चल दिया
एक और बोधुआ की तलाश में ...
शब्दचिह्न :
गजानन माधव मुक्तिबोध,
व्यंग्य कविता,
Muktibodha
शुक्रवार, 13 नवंबर 2009
.. ये आग नहीं आसाँ
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यह लेख बहुत सरल तरीके से आम जनता और विशेषकर युवा वर्ग को तेल या गैस डिपो में लगने वाली आग के एक अनछुए से पहलू से अवगत कराने के लिए लिखा गया। कृपया तकनीकी बारीकियों की अपेक्षा न रखें।
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यह लेख बहुत सरल तरीके से आम जनता और विशेषकर युवा वर्ग को तेल या गैस डिपो में लगने वाली आग के एक अनछुए से पहलू से अवगत कराने के लिए लिखा गया। कृपया तकनीकी बारीकियों की अपेक्षा न रखें।
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आग जिन्दगी है। कोई जिन्दा है कि नहीं, यह उसके शरीर की गर्मी से जाना जाता है। मनुष्य आग जलाना सीखने के बाद ही सभ्य हुआ। इसीलिए दुनिया के सभी पुराने धर्मों में आग को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ऋग्वेद का पहला सूक्त ही अग्नि को समर्पित है।
आग को जलाने के लिए तीन चीजें आवश्यक हैं – फ्यूल, ऑक्सीजन और स्पार्क। ये तीन मिलते हैं तो आग पैदा होती है। इन्हें फायर ट्रैंगल भी कहा जाता है। तीनों साइड पूरे हों तो आग लगती है। अगर कोई एक नहीं रहेगा तो आग नहीं जलेगी। इस जानकारी का उपयोग आग को रोकने और उसको बुझाने में किया जाता है।
तेल के डिपो या एक्स्प्लोजिव स्टोरेज में यह प्रयास किया जाता है कि स्पार्क न पैदा हो क्यों कि फ्यूल और ऑक्सीजन तो ऐसी जगहों पर रहते ही हैं। इसीलिए ऐसे स्थानों पर स्मोकिंग, कुकिंग वगैरह वर्जित होते हैं। लाइटिंग और स्विच भी स्पार्करोधी होते हैं और विस्फोटक विभाग के लाइसेंस के बाद ही बनाए जाते हैं। ऐसी जगहों पर यदि किसी कारण से आग लग गई और शुरू के कुछ मिनटों, जी हाँ मिनटों- घंटों नहीं, में नियंत्रित नहीं हुई तो विस्फोटक होने के कारण उसे बुझाया नहीं जा सकता। असल में हवा गर्म होकर उपर उठती है और खाली स्थान भरने को अगल बगल से हवा जोरों से आती है । इस कारण यह पूरा प्रॉसेस दुगुना चौगुना रफ्तार से बढ़ता जाता है। पानी का कोई असर नहीं होता। प्रोडक्ट के पूरी तरह जल जाने पर ही आग बुझती है। कुछ आधुनिक तकनीकें जैसे विस्फोट कर ऑक्सीजन को आग वाले स्थान पर एकदम समाप्त कर देना बहुत महंगी, कठिन और अप्रभावी साबित हुई हैं। बड़ी स्केल की आग को नियंत्रित करना कितना कठिन है यह इससे समझा जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया जैसा विकसित देश भी अपने जंगलों में लगी आग को नियंत्रित नहीं कर पाता है और वहाँ इससे हाल के वर्षों में बहुत नुकसान हुआ है। ऐसी आग की सूरत में आबादी खाली कराने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।
आग से बचाव और नागरिकों की सुरक्षा के लिए ही तेल और एल पी जी डिपो आबादी से बहुत दूर बनाए जाते हैं। लेकिन ऐसी जगहों के चारो ओर रोजगार के अवसर बढने से आबादी बसती जाती है। दुर्भाग्य से भारत में नागरिक जागरूक नही हैं और न ही सरकारें आबादी के बसाव को रोकती हैं। लॉ और ऑर्डर का मामला होने के कारण तेल कम्पनियाँ अपनी बाउंड्री के बाहर आबादी की ऐसी बाढ़ को रोकने के लिए कुछ अधिक नहीं कर पातीं । ऐसी आबादी आग लगने का कारण हो सकती है और आग लगने पर उसका आसान शिकार भी।
डिपो के भीतर सुरक्षा के तमाम इन्तजामात होते हैं। सुरक्षा के उपर खर्च 30 से 35% तक भी हो जाता है। सारे कर्मचारी आग न लगने देने की सावधानियों और आग पर समय रहते काबू पाने के लिए ट्रेंड होते हैं। शेड्यूल के हिसाब से नियमित रूप से मॉक फायर ड्रिलें होती हैं जिनमें प्रशासन और फायर डिपार्टमेंट भी हिस्सा लेता है। आग लगने पर कौन कर्मचारी क्या करेगा, यह सब पूर्व निर्धारित रहता है। मॉक ड्रिल में इसी हिसाब से कर्मचारी ऐक्शन लेते हैं ताकि हादसा होने पर किसी तरह का कंफ्यूजन न हो।
सवाल यह है कि इतनी तैयारी के बाद भी आग लग कैसे जाती है? ऐसे समझिए कि सावधानियों के चलते ही आग की घटनाएँ बहुत कम होती हैं नहीं तो जिस तरह के प्रोडक्ट होते हैं, उनसे बार बार आग लगे ! गैस या पेट्रोल का हवा के साथ मिश्रण बहुत ज्वलनशील होता है। मानवीय चूक या मशीनरी के फेल्योर से अगर इनका लीकेज बहुत देर तक होता रहे तो ये अदृश्य वेपर क्लाउड बनाते हैं। यह क्लाउड हवा में तैरता रहता है। इस क्लाउड में ऑक्सीजन और फ्यूल का एक निश्चित अनुपात होने पर जरा सी चिनगारी कहर मचा सकती है क्यों कि पूरा क्लाउड एकदम से आग पकड़ता है। अब आप कहेंगे कि चिनगारी आएगी कहाँ से? होता यह है कि हवा के साथ यह अदृश्य क्लाउड बहुत दूर तक डिपो की बाउंड्री के पार भी चला जा सकता है। अब यदि आबादी में कहीं किसी ने कुछ सुलगाया तो आग क्लाउड को पकड़ डिपो तक आ जाती है और फिर तबाही पक्की ! इसीलिए डिपो के चारो ओर आबादी का हिस्सा न बनें और दूसरों को भी ऐसी बस्ती न बनाने के लिए चेताएँ।
अब तो आप समझ ही गए होंगें, ये आग नहीं आसाँ ।
मंगलवार, 10 नवंबर 2009
मुड़े तुड़े अक्षर
... बहुत पीड़ादायक होता है एक कविता का खो जाना। ऐसी कविता जो आप की विकसित होती संवेदना, कल्पना, पीड़ा, आक्रोश, क्षोभ, यातना, परदु:खकातरता, संसार को बदल देने, उलट पुलट देने के ज़ुनून और मन के नरक की वर्षों तक साक्षी रही हो ...अचानक पता चले कि गुम हो गई तो क्या हो? उच्चाटन ?? अनिद्रा ??? 
कविता जो किताबों के कवर पर लिखी गई, कापियों के बीच लिखी गई, छुट्टे पन्नों पर लिखी गई ..... जब मन बेचैन हुआ तब लिख दी गई – पेंसिल से, पेन से... रोमन, देवनागरी, ग्रीक लिपियों में अपने को लिखाती चली गई, अचानक पाया कि खो गई !
..पुरानी डायरी के साथ ही क्लिप वाले पैड में दबा कर रखे गए मुड़े तुड़े अक्षर, तिरछे वाक्य, बारिश की बूँदों से फैल गए शब्द, प्रेम मिलन के पूर्व भोर में धीमी रोशनी में रचे गए सरताज, कभी कुछ अचानक सूझ जाने पर यूँ ही पढ़े जाते उपन्यास के पन्ने के हाशिए पर उतार दिए गए जज्बात ... सब गुम हो गए !
...गहरी यातना, दु:ख। अज्ञेय की मानें तो दु:ख मांजता है। जिन्हें माजता हो वो जानें, मैं तो खरोंचों के घाव लुहलुहान होता जा रहा हूँ। क्या करूँ .. दुबारा रचूँ? चलूँ पन्द्रहों वर्ष पीछे? लेकिन वे अनुभूतियाँ कैसे आएँगी? .. यह तो दुहरी यातना होगी ! ... स्मृति दोष .. बहुत कुछ छूट जाएगा। फिर टुकड़ा टुकड़ा याद आ कर सताएगा.. मुझे याद है उस कभी न समाप्त होने जैसी लगती कविता की अंतिम पंक्तियाँ जब लिखी थीं तो लगा कि अनुभूति के अंत पर पहुँच गया हूँ – प्रगाढ़ प्रशांति ! ..वो यातनाओं का नरक, कुम्भीपाक लुप्त हो गया था अंतिम अक्षर के विराम पर ! ... बाद के वर्षों में पाया कि कविता साधारण थी और उसका अंत तो और भी साधारण था ...फिर वह प्रशांति क्या थी? क्या इसी लिए स्वांत: सुखाय की बात की जाती है? वह कविता तो दूसरों के किसी काम की न थी, न शब्दों का यातु, न शिल्प का विधान, लय हीन, छन्द हीन। तो वह अनुभव? क्या वह कविता बस मेरे लिए थी? ... ऐसी थी तो आज जब एक मंच मिला तो उसे साझा करने की बेचैनी क्यों? ढूढ़ता क्यों रहता हूँ उसे? ....
कभी सोचा ही न था कि छपवाऊँगा ! ...
.. याद आती है कब्रिस्तान के उपर बने उस तिमंजिला प्राइवेट हॉस्टल की कोठरी में गरमी की बिताई गई वह दुपहर। कमरा बन्द कर जोर जोर से मैं पढ़ता चला गया था। तब वह कविता समाप्त नहीं हुई थी। ...
.. अगले दिन अपने साहित्यिक मित्र आनन्द को कविता सुनाई तो वह स्तब्ध हो गए थे । जब बताया कि मैंने फाड़ कर दुबारा लिखा है तो उन्हों ने यही कहा था,”ठीक नहीं किया।“ ....अधूरी ही छपने के लिए भेजा तो न छपी और न वापस आई। मेरा सरलीकरण प्रयास अपनी नियति को प्राप्त हुआ था .. हाँ, वह मेरा पहला प्रयास था। ... मेरे पास फिर बँचे रह गए थे - क्लिप वाले पैड में दबा कर रखे गए मुड़े तुड़े अक्षर, तिरछे वाक्य, बारिश की बूँदों से फैल गए शब्द, प्रेम मिलन के पूर्व भोर में धीमी रोशनी में रचे गए सरताज, कभी कुछ अचानक सूझ जाने पर यूँ ही पढ़े जाते उपन्यास के पन्ने के हाशिए पर उतार दिए गए जज्बात ...
... अंतिम प्रयास सफल रहा था - उसी आनन्द सोमानी ने कराया था – नई दुनिया, इन्दौर से एक दूसरी छोटी सी कविता छपी थी... मुझे याद है उस दिन बहुत खुश था। बाद में पिताजी ने उसे सहेज कर रख लिया था ... अब की दशहरे में गाँव गया तो पता चला कि टाउन वाली मकान को किराएदार के लिए खाली करते समय जो कबाड़ फेंका गया था – उसमें नई दुनिया का वह पेज भी ... हाँ, पिताजी ने एक एक पृष्ठ को खुद छाँटा था!
.. यह आप ने क्या किया पूज्य? वह एक पन्ना इतना गढ़ू हो गया था !! .. या फिर आप ने यह सोचा कि अब इसका क्या काम ? .. ले दे के वही बात – कविता किस काम की?..
..आप को क्या पता पूज्य! अनिद्रा के उन अनगिनत हफ्तों में आप जब अपनी गोद में चिपटा कर सुलाया करते थे तो कुम्भीपाक की यातना के सामने आप का यह पुत्र अपने को निरीह सा पाता था लेकिन एक लम्बी कभी खत्म न होने वाली कविता ही उसे लोरी सुना बल दे जाती थी।... पैदा होने के कुछ घंटों के भीतर ही आप की गोद में आ गया था। .उस दिन मेरे अस्तित्त्व को आप की आँखों ने रात भर सींचा था! आप की गोद में इतने बड़े होने पर भी नींद तो आनी ही थी।
.. लेकिन लोरी वही कविता सुनाती थी। ..और वह खो गई।
.. अब मैं बड़ा हो गया हूँ, दो बच्चों का पिता हो गया हूँ। पिताजी! सोचता हूँ कल जब मुझे बड़े होते बच्चों को कभी गोद में ले खुद लोरी गाते सुलाना पड़ेगा, तब अगर वह कुम्भीपाक फिर सिर उठाएगा तो . . ?
उन दिनों क्या आप के पास भी कोई कभी खत्म न होने वाली कविता थी?
सोमवार, 9 नवंबर 2009
क्षमा करिए
क्षमा करिए,सुबह मुझे आँसू भरी लग रही है।
क्षमा करिए मैं क्षोभग्रस्त हूँ।
क्षमा करिए मुझे निरपेक्ष प्रशांत बौद्धिकता से घृणा हो रही है।
क्षमा करिए अपनी सुविधाजीवी नपुंसक मनोवृत्ति के तले मैं स्यापा कर रहा हूँ।
क्षमा करिए मैं साम्प्रदायिक हूँ।
क्षमा करिए मुझे मानवाधिकार सिर्फ जुमला लग रहा है।
क्षमा करिए मैं यह मान बैठा हूँ कि आप को अंग्रेजी आती ही है।
क्षमा करिए आज अंग्रेजी ब्लॉग का यह लिंक दे रहा हूँ।
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Roots In Kashmir
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क्षमा करिए मैं क्षोभग्रस्त हूँ।
क्षमा करिए मुझे निरपेक्ष प्रशांत बौद्धिकता से घृणा हो रही है।
क्षमा करिए अपनी सुविधाजीवी नपुंसक मनोवृत्ति के तले मैं स्यापा कर रहा हूँ।
क्षमा करिए मैं साम्प्रदायिक हूँ।
क्षमा करिए मुझे मानवाधिकार सिर्फ जुमला लग रहा है।
क्षमा करिए मैं यह मान बैठा हूँ कि आप को अंग्रेजी आती ही है।
क्षमा करिए आज अंग्रेजी ब्लॉग का यह लिंक दे रहा हूँ।
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Roots In Kashmir
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शब्दचिह्न :
इस्लाम,
कश्मीर,
कश्मीरी पंडित,
हिन्दू
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