शुक्रवार, 1 जून 2012

भाग 2 : बबुनवा आ चिरई, खूँटा, बढ़ई के कथ्था

पिछले भाग से आगे ... 


रात का एकांत है। बबुनी ने बबुनवा से पूछा है – हमरे बिछुवा गोड़ काहें धइल हो (मेरे बिछुओं पर तुमने अपने पैर क्यों रखे)? बबुनवा मुँह फुला पलंग के दूसरे किनारे सरक गया है। पलंग में मेड़ होती तो उससे चिपक जाता लेकिन बबुनवा करे भी तो क्या करे – सरकने में  भी सँभल कर रहना है वरना नीचे धरती पर घम्म से...! हालाँकि चोट गाँव की मेंड़ बिना धरती पर गिरने की तुलना में कम ही लगेगी लेकिन फिर भी।
 अभी तो जो धरती पलंग पर सवार है उससे पार पाना बहुत मुश्किल है। धरती सिमट कर पास आ गई है – पूरी पलंग खाली। अब बबुनवा पलंग की मेड़ हो गया है जिससे धरती चिपक गई है। वही सवाल – हमरे बिछुवा गोड़ काहें धइल हो?     
 जवाब में बबुनवा ने आँखें मूँद ली हैं। वह चिपकी धरती के इतिहास में घूम रहा है। जो सोंधी बास लिये चिपकी है उसके भूगोल फिलहाल कोई भाव नहीं उपजा रहे!
... बबुनी सोलह की थी तो बबुनवा से उसका बियाह हुआ। रजपूत की बरात अहिर के यहाँ गई थी। द्वारपूजा के लिये बाबू ने नदी पार रजवाही से बारह हाथी मँगाये थे। जून का महीना – हाथी पानी से निकलने का नाम न लें। उन्हें बाहर लाते महावतों की आतें सरक गईं!  
लगन ठीक ठाक नहीं थी लेकिन हाथियों का जुगाड़ उसी दिन के लिये हो पाया था इसलिये पुरोहित ने पुराणों के बजाय वैदिक रीति अपनाई और महर्षि दयानन्द की काशी विजय गाथा भी सबको सुनाई। हाथियों की चिघ्घाड़ से उस दिन सारा अहिराना दलदला उठा था – गाँव में ऐसी बारात कभी नहीं आई थी। भला अहिर के यहाँ रजपूत की बरात क्यों आई?
बबुनी के काका, वह अपने पिता को काका कहती है, सनकी माने जाते थे। गाँव के लंठ कहते -  
सनकी बेटी के सनकी बाप
कहाँ के रसरी कहाँ के साँप?
तमाम गँवारू तुकबन्दियों की तरह ही इसका भी कोई अर्थ नहीं था लेकिन गँवार मौज के लिये ऐसे निरर्थक तो हमेशा से ही सार्थक रहे हैं सो यह तुकबन्दी भी थी।  
काका की गाँव में किसी से नहीं पटती। बिन घरनी घर का भोजन विचित्र था – बारहो महीना सीजन के हिसाब से रोटी आ परोरा नाहीं त आलू के तरकारी और गिलास भर दूध। काका खुदे घरनी थे, बबुनी को कभी चूल्हे के दुआर फटकने नहीं दिये। काका को गोरू गोथान की गन्ध पसन्द नहीं थी और चाकर तो ऐसे घर में ठहरने से रहे! सो रम्मन जादो दूध पहुँचाते जिसमें उठौना जैसी बात नहीं थी। जितना दूध उनके यहाँ होता उसका तिहाई हिस्सा काका के यहाँ खुद पहुँचा आते। हिसाब भी अजीब था। बगइचे के सारे आम, बड़हर, कटहर, फरसा आदि की फसलों पर रम्मन जादो का हक होता। बाप बेटी को खाने को फल मिल जाते, तरकारी के लिये कटहर तो भेजना ही नहीं था – बाप बेटी के लिये सिवाय परोरा और आलू के सब तिउना गोमांस बराबर! बबुनी के लिये रम्मन जादो लाला थे तो उसके काका के लिये मितऊ माने कि दोनों के नाम एक थे, आया समझ में?  

गड़बड़ हुई अमरुच (अमरूद) के कारण। काका के बड़े बागीचे में एक भी अमरुच का पेंड़ नहीं और लाला के आँगन में परयागराज वाला अकेला झारी, बबुनी की जीभ पर भारी। लाला अँगोछा में अमरुच भर भर लाते, पेटी वाले चाकू से काट काट कर ललका मरिचा और नून की बुकनी लगा कर बबुनी को अपने हाथ से खिलाते।
दिन बीतते रहे और बबुनी बारह की हो गई। तीन बदलाव और हुये - काका ने गलमुच्छे बढ़ा लिये, लाल टीका और चूनर वाला साफा लगाने लगे। लाला सफाचट रहने लगे और अँगोछे की पगड़ी बाँधने लगे। बबुनी लखनी की अघोषित चैम्पियन मान ली गई।  
उस साल लाला को फैलेरिया पकड़ ली। चलना फिरना बन्द हो गया लेकिन बड़के रमाकांत के हाथ दूध भेजवाते रहे। बबुनी रमाकांत को भइया बुलाती और वह उसे कनिया। दोनों एक दूसरे को देख हँसते और ढिलई अँठई (केश की जूँ और जानवरों पर लगने वाली एक परजीवी) की बात कहने में प्रतियोगिता करते। रमाकांत कहता – कनिया के केस ढिलई तो बबुनी कहती – भइया के भगई अँठई। दोनों फिर से हँसने लगते – हो, हो, हो और बबुआन लोग दाँत पीसने लगते, कुछ में इतना जोर होता कि आँखें फूट जातीं तो भी अचरज नहीं होता।
लाला जब चलने लायक ठीक हो चले थे कि एक दिन आँगन में ऊपर देखे तो अमरुच फलार गई थी। उन्हें बबुनी याद आई:
उज्जर उज्जर अमरुच लाल लाल दागी
लाला भखें अकेल्ले मोछिया लागे आगी।
लौंडे सरेह में थे। खुद से तोड़ा नहीं जाता और बुढ़िया लग्गी से उतना ही नफरत करती थी जितनी भुअरी भैंस लुग्गा (साड़ी) से। लाठी ठेगते लाला मितऊ के यहाँ पहुँच गये। बबुनी ने कुछ नहीं कहा। बैठा कर गोद में सिर रख लेट गई – हमरे बारे में से ढीलो निकाड़ि द। भइया रिगावेलें (मेरे केशों से जुँये निकाल दीजिये। भइया चिढ़ाता है)। ढील निकालते हुये लाला ने अमरुच की बात बताई तो बबुनी मचल गई – अब्बे चलबे (अभी चलूँगी)। मितऊ थे नहीं लेकिन लाला ने यह सोच कि खिला कर वापस पहुँचा दूँगा, लाठी के अलावा बबुनी का कन्धा थाम उसे ले चले।
दूजे टोले अपने घर पहुँचे तो बुढ़िया रिसिया गई – दुसरे के सयान कनिया ए तरे ले के आ गइले रे बँड़ेर! अहिरपाड़ा अइसहीं नाहीं मसहूर (दूसरे की सयानी कन्या इस तरह ले कर आ गये उठाइगीर! अहिर ऐसे ही बदनाम नहीं हैं)। लाला ने एक भरमूँहा गाली दे चुप रहने को कहा और आँगन में आ गये। पहली बार बबुनी घर आई थी सो देह में फुर्ती भी आ गई। झड़हा (लकड़ी का छोटा डंडा जिस चला कर ऊँचाई के फल को तोड़ गिराया जाता है।) मार  चलने लगा, अमरुच गिरने लगे लेकिन बबुनी को जमे नहीं। तभी उसकी नज़र पुतली (पेंड़ की चोटी) पर एक अमरुच पर पड़ी और वह ताली पीट नाचने लगी –
उज्जर उज्जर अमरुच लाल लाल दागी
लाला भखें अकेल्ले मोछिया लागे आगी।
लाला अब असहाय थे। कुछ करना जरूरी था नहीं तो मूँछ में बबुनी आग लगा देने वाली थी। कितना भी झड़हा चलायें अमरुच पर लगे ही नहीं और बबुनी की तुकबन्दी रुके नहीं सो लाला पेंड़ पर चढ़ने लगे। पुतली तक पहुँच अमरुच को तोड़ लाला चिल्लाये –
उज्जर उज्जर अमरुच लाल लाल दागी
लाला के गमछा सगर भाग जागी।
चिल्लाहट का जोर कुछ अधिक था, नज़र का भटकाव पेंग मार गया। पेंड़ से लाला गिरे धड़ाम! बायाँ गोड़ (पैर) टूट गया। बुढ़िया रोते धोते दोनों को कोसने लगी और बबुनी सब अमरुच मोरी में फेंक सुबकने लगी।
जोखन कोइरी ने आ कर कमाच (कमानी) बाँधा, पसियाने से कच्ची मँगाई  - कमाच पर चुआने के लिये और लाला को पिलाने के लिये भी।
शराब? राम राम राम। लाला मारे दर्द के चिल्लायें भी और पीने से मना भी करें। लौंडे लौट आये थे। किसी का कहना न माने लाला। चिल्लाहट भी बढ़ने लगी।
तब बबुनी ने बोतल उठाया। पितरहवा बड़का गिलास (पीतल के बड़े गिलास) में उड़ेला और कहा – शरबत पी ल लाला! लाला जैसे अगोरा में थे – गट्ट गट्ट पी गये। सोने से पहले बबुनी को घर जाने के लिये मनावन करते करते हार भी गये लेकिन बबुनी टस्स से मस्स नहीं हुई! बिहने जाइब (कल जाऊँगी)। बुढ़िया की आँखें निकल पड़ीं – कुँवार धिया दुसर जाति घरे राति भर रही? हरे किसन हरे किसन, ई पाप हमसे नाहीं होई (कुमारी कन्या दूसरी जाति वाले के घर रात भर रहेगी? हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, यह पाप मुझसे नहीं होगा)। उसने रमाकांत को ललकारा कि कनिया को घसीटते हुये बबुआने पहुँचा दे तो वह हँसने लगा। बुढ़िया लउरी (लाठी) ले उसके पीछे दौड़ी तो वह घुमरी पारने (चक्कर काटने) लगा – कनिया के केस ढिलई। बबुनी कहाँ मानने वाली थी! सब कुछ भूल वह भी घुमरी पारने लगी – भइया के भगई अँठई।  
बाकियों से कहने का कोई मतलब नहीं था और गाँव के किसी और को इसके लिये कह नहीं सकती थी, बुढ़िया सिर पर हाथ रख बैठ गई।
 गदबेर (गोधूलि) के दीया बरले (दीपक जलाने) के बेरा के बाद काका घर आये तो सन्नाटा था। यह सोच कि कहीं दिसा मैदान (शौच कर्म) गई होगी, दीया बार (दीपक जला) अगोरने लगे लेकिन बबुनी न लौटी। जिस पहले ने आ कर बताया कि लाला के साथ जाती दिखी थी उसने यह भी कहा कि बिहने हजाम भेजि देब, गलमोछि उतरवा दीह। तोहार कनिया भागि गइल (कल हजाम भेज दूँगा, गलमुच्छे उतरवा देना। तुम्हारी लड़की भाग गई)
रात चढ़ी तो बबुआने घर घर चटक्की चढ़ गई – अपने बेटा कंतवा खातिर अहिरा सनकिया के भगा ले गइल (अपने बेटे रमाकांत के लिये अहिर पगली कन्या को भगा ले गया)!
इमिरती फूआ (बुआ) ने जब आ कर बताया कि बबुनिया के त कपड़ा लागि गइल बा! अब कवने मूँहे कन्यादान करब? नरक जइब नरक!(बबुनी तो रजस्वला हो चुकी है! अब किस मुँह से कन्यादान करोगे? नरक जाओगे, नरक!) तो काका को काटो तो खून नहीं – कुल आ कापड़ रखले से रहेलें।
काका रात भर नहीं सोये। पहली किरण के साथ ही कन्यात्याग का संकल्प लिये। हजाम सचमुच ही आ पहुँचा था। चुपचाप गलमुच्छे मुड़वा दिये और उसके बाद चुनरी पगड़ी उतार मुँह में ठूँस हों हों कर रो उठे। बबुनी ने लाला की मूँछ नहीं, काका की मूँछ लेस (जला) दी थी! ...
बबुनवा कुनमुनाया है – अजीब संयोग है – जाने कौन सी टेंढ़ी मूँछ सीधी करने के चक्कर में माई का बाबू से ब्याह हुआ और ससुर जी की जाने कौन सी मूँछ बबुनी ने लेस दी जो ...
बबुनी ने बबुनवा को भींचा है। बबुनवा ने कहा है – अभी तुमसे कोई कथा नहीं सुननी। तुम्हारी पुरानी खुद को सुना रहा हूँ।
॥इति तृतीयोध्याय:॥
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कथा जारी रहेगी और सबसे प्रिय ब्लॉग की खोज भी।
आप लोग अपना मत व्यक्त करते रहिये।

4 टिप्‍पणियां:

  1. सब आँखों के सामने घाट रहा हो जैसे| हे सूत्रधार, तुम्हारी जय हो|

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  2. राम जी,

    नमन आचार्य - आपकी कल्पना को - आपकी लेखनी को

    देशज साहित्य का गागर यूँ ही भरता रहे.

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  3. अब सोचता हूँ चुपचाप पढ़ के निकल लिया करूँ, गदगद हूँ हे कथाकार!
    @बड़हर ....... ३-४ बरस हुए देखे भी, काहे तरसाते हैं प्रभु!
    ढिलई, अँठई, अमरुच.... मैं गाँव, दालान, बगीचा, ओसारा, मेड, खलिहान सब देख आता हूँ।

    धन्यवाद एक अत्यंत छोटा शब्द है।

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