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मंगलवार, 18 अगस्त 2009

बाउ मण्डली और बारात एक हजार - प्रसंगांत

पिछ्ले भाग से जारी . . .
दिन की घनी छाई अन्हरिया जैसे खत्म हो गई हो - बजनिओं के मेठ नोखे ने चैती छेड़ी। फिर कहरवा, फगुआ और कजरी की धुनों ने खलिहान पर बारहमासी बयार बहा दिया। समधी भात खाने चले थे।
दुल्हन के घर की ओर समधी के साथ प्रस्थान करते नोखे ने सोहर धुन शुरू की। अष्टभुजा नहा धो वस्त्र बदल कर साथ हो लिए।
कृषक बाला के आँगन में खेलते नन्हें नन्हें छौनों की सम्भावना से नाहरसिंह गुलगुल हो गए। गाछे कटहर ओठे तेल - भीतर की सारी कटुता और अभिमान भूल मन ही मन नोखे की धुन पर सोहर गाने लगे।
कहवाँ से आवेला पियरिया ललना ss पियरी पियरिया लागा झालर हो s
कहवाँ से आवेला सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss
नैहर से आवेला पियरिया ललना ss पियरी पियरिया मोती झालर हो s
ललना ससुरा से आवेला सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss
कहवाँ धरबे पियरी पियरिया लागा झालर हो ललना ss
कहवाँ धरबे सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो s
पेटिया में धरबे पियरिया ललना पियरी पियरिया लागा झालर हो ss
कोहबर धरबे सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss
फाटि चुटि जैहें पियरिया ललनाss पियरी पियरिया लागा झालर होs
जुगे जुगे बाढ़ो सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो s, ललना ss।“
धुन सुनते मिसिर जैसे बाउ को सोहर का भाष्य सुना रहे थे – “देख ss , सोहर में नइहर के पियरी के फटहा बना देहल बा लेकिन ससुरा के सेनुर त सोहाग ह । वोके जुग जुग बढ़ावल बा। गुलरि के फूल परि गइल बा का? अरे, सोहाग हे।(1)“
बाउ,” हूँ ss। सारे ए बेरा बजाई कबो सोचलो नाहीं रहलीं हे। नीक लागता।(2)“ मिसिर गमछा सँभालते और बाउ को पीछे छोड़ते विवाह के घर की ओर झड़क चले।
झलकारी ने बाजा की आवाज सुनी तो भाग दौड़ शुरू करा दीं। खलिहान काण्ड की खबर उन्हें लग चुकी थी। लेकिन बनमानुख बेटे पर भरोसा था. .
“समधी आवतने। जल्दी कर सो।(3)” उनकी जल्दी को कोसती बालाएँ काम में लग गईं।
(व)
झिनिया चावल का महर महर सुगन्धित भात, घी से बघारी अरहर की दाल, दहिबाड़ा, रिंकवच, सजाव दही, बरी कढ़ी, अँचार, चटनी, करैली, पाकल कोंहड़ा, केला और परवल की सब्जियाँ – यह थे मिसिर के बारह व्यञ्जन।
सब्जियों का चयन मिसिर की पाककला के ज्ञान का परिचायक था – करैली (तीत), पाकल कोंहड़ा (मीठ), केला (कसैला) और परवल (सुन्न) जैसे जीवन के चार रसों के परिचायक थे। समधी को सूक्ष्म सन्देश , हमारी बेटी तुम्हारे परिवार में सभी रस भर देगी, इस भात की शपथ उसकी बेकदरी न करना।
नाहरसिंह ने मंडप की गाँठ खोली और हिला कर स्थिर कर दिया। सम्बन्ध पक्का हो गया। सगोतियों के साथ खाने बैठे तो बगल में अष्टभुजा बाबा भी आकर बैठ गए। ब्राह्मण राजपूत के साथ पंक्ति में! सभी संकोच में आ गए। बाबा बहके,” रजा बाभन अगिनमुख होलें। अरे, हमार तोहार गोत्र त एके ह। साथे नाहिं बइठब त गारी कइसे सुनSब?(4)”। मिसिर ने सहमति में सिर हिलाया। आँखों में शरारत नाच रही थी। उधर परोसना शुरू किए और इधर भीतर से अंचरा से मुँह ढाँप झलकारी देवी ने आलाप लिया:
कंचन मड़वा बिसकरमा बनवलें भात रचली अनपुरना हे
बइठीं समधी दशरथ जी पिढ़इया जनि करिं मन काठ हे........
स्वर्ण मंडप विश्वकर्मा से बनवाया है। अन्नपूर्णा से भोजन रचाया, हे राजा दशरथ भोजन करने के लिए पीढ़े पर बैंठें लेकिन काठ के आसन पर बैठ मन को काठ न करें।“ ओरहन को समझ और खलिहान की घटना याद कर नाहरसिंह लजा कर रह गए।
बेटी की माँ। आँखों से गंगा जमुना बह रही लेकिन रीत तो निभानी है। सुरसतिया की माई ने बोल उठाए:
ओरियन ओरियन बइठे बरियतिया
मुहवाँ झुरइले ए बेटी नयना बहे लोरिया
केकरा के सौंपी ए समधी अपनी पुतरिया
हँसेलें समधी दशरथ जी
हमरा के सौंपि ए समधिन अपनी पुतरिया
रहिया खियइबे समधिन पाकल पनवा
घरवा पिअइबे सुरहिया गाइ के दुधवा
रउरा पुतरिया ए समधिन हमरे घर के लछमिनिया
हमरा के सौंपि ए समधिन अपनी पुतरिया।
युगों युगों से चले आ रहे उलाहने के स्वर। राजा दशरथ तुमने तो बहुत वादे किए थे। राह चलती पतोहू पान खाएगी इसका तक खयाल रखा था, लेकिन निकाल दिया न चौदह साल के लिए ! मेरी बेटी सीता को याद कर रो रही है समधी। कैसे तुम्हें सौंप दूँ अमानत? तुम भी तो उसी दगाबाज दशरथ की श्रेणी के हो।
बाउ का गला भर आया। नाहर मन्डली चुपचाप मिसिर का बनाया स्वादिष्ट भोजन भकोस रही थी।
मिसिर ने भारीपन महसूसा तो लकार लगाई,” अरे, गरियो शुरू होखे।(5)“
झलकारी देवी ने उत्तर सा दिया।
जेवन बइठेलें समधी राजा दशरथ बोलेलें सकुचि लजाइ जी
भितरा से समधिन हमरा के देखीं हम रउरा मेहमान जी
अँगना से बोलेलें राजा जनक जी अदला के बदला न लजाइँ जी
दशरथ - अरे समधिन हम तुम्हारे मेहमान हैं। थोड़ा हमरी ओर भी नजरिया हो। आँगन से जनक जी उत्तर दिए ,लजाना मत । अदला बदली होगी।“
राजा दशरथ उर्फ नाहर सिंह और राजा जनक उर्फ पँड़ोही सिंह घरैतिनों की अदला बदली करेंगे ! बाउ को इस सम्भावना से ही गुदगुदी हो चली – अच्छे भइल बियाह नाँइ कइनी(6)। उसी रौ में मिसिर को इशारा किए । दही परोसते मिसिर ने अचानक तउला पटका और कछाड़ बाँध दुसह गारी गायन कढ़ा दिए। बेटे हरिहर ने बाप का यह रूप देखा तो हतप्रभ सा लजाते हुए दुआरे भाग गया।
सब सखियाँ मिलि जेवना परोसें हो
समधी बिगड़ल बैला हाय सीताराम से बनी।
अरे समधी तो बिगड़ा बैल है, उसे सुन्दरी सखियाँ मिल व्यञ्जन क्यों परोस रही हैं?
वृद्ध गरिमामय मिसिर का यह रूप ! न तो नाहर ने सोचा था और न अष्टभुजा ने। बिचारे खिसियाए से मजे लेने लगे। मिसिर तो झगड़ालू फूआ की भूमिका पूरी करने पर आमादा थे। एक के बाद एक गालियाँ निकलती चली गईं:
समधी के बहिना के तीनि गो भतरवा
भरवा, कोंहरा, सोनरा हाय सीताराम से बनी
समधी ने अपनी बहन ऐसे दरिद्र घर ब्याही है कि उसका भरण पोषण करने के लिए तीन तीन भतार लगे हैं – वो भी कौन? भर, कुम्हार और सोनार। अब तो सीताराम ही बिगड़ी बना पाएँगे“
कटाक्ष गजब का था ! उपर से एक पुरुष को यह सब गाता कभी देखा ही नहीं था। नरसिंघवा मगन हो गया।
मिसिर बउरा गए थे। हाथ चमकाते अगली फुलझड़ी छोड़ी,
समधी के भगिना दबले बा जोबना
सुतल रहली खरिहाने, रचना राम से बनी।
समधी की बहन यौवन भार से दबी इतनी बौरा गई है कि खलिहान में सोती पाई गई है। ऐसी रचना भी विधाता ने इसके घर ही रचाया ।“ राजा दशरथ तुम्हारी कोई बहन भी थी क्या?
मार मुधइ के, बाबा त मउगा बानें(7) - बुढ़ऊ के इस अन्दाज पर नारियाँ भी मुँह दबाए भीतर भाग चलीं। बाउ ने हाथ पकड़ चेताया तो मिसिर चुपाए। अष्टभुजा की गारी सुनने की पिपाशा तृप्त हो चुकी थी। डकार लेते उठ गए।
विदाई के रूप में बाउ ने नाहरसिंह के हाथ में अपनी भुअरी भैंस का पगहा पकड़ा दिया। नरसिंघवा नाम जेहन से गायब हो चुका था। नाहर से इनकार करते न बना। हाथ जोड़ कर बाउ बोले,” कहल सुनल माफ कइ दीं। रउरे बहिन के खयाल राखब । गाँव के दुलारी रहलि हे . . .”(8)। आगे मारे भावुकता के कुछ बोल न पाए।
(श)
लोचना फिर बोलने लगा था। लेकिन नाहरसिंह के पास उसकी सफाई सुनने वाला मन ही नहीं रहा . . आने वाले छोटे छोटे छौनों की किलकारी को मन के आँगन में बसा रहे थे। . . .बरस भितरे पहले की आस थी। नाती ! .. हाथी गए हाथीशाला की ओर। घोड़े दौड़े घुड़साल। बारात विदा हो गई।
(ष)
परछावन और खोंइछा की रस्म पूरी हुई । उस समय आम तौर पर पाया जाने वाला अनासक्त वातावरण गायब था।
बुढिया काली माई के स्थान पर गमगीन भींड़। गाँव जवार से उखड़ती बेल दु:ख के सहारे लिपट विलाप कर रही थी ! बिदाई के समय का रूदन, सुरसतिया ने किसी को नहीं छोड़ा। रुला दिया सबको। रूदन ने कारुणिक लय ले ली थी:
अरे ए हमार बहिना ....अरे ए हमार भइया...
काका, केकरा खातिर टिकोरवा तू तूरब . .
काकी तोहार बरवा के झारी
के तोहार ढेंका चलाई...(9) हो अ ह ह हँ....
रोते हुए पँडोही ने बेटी को दुल्हे के साथ पिनिस में बिठाया। कहाँरों ने पिनिस उठाया कि अचानक दहाड़ मारती भइया भइया करती सुरसतिया कूद कर बाउ से लिपट पड़ी। औरतों ने सँभाल कर वापस चढ़ाया। फूट फूट कर रोते बाउ ने मुँह में गमछा ठूँसा और पोखरे की ओर भाग चले।
निबिया के पेंड़ जनि कटिह हो बाबा चिरइया खोतवना झोंझ हे ss,
भइया के जनि कुछ बोलिह हो बाबा, भइया बड़ी बरजोर हे ss
नीम के पेंड़ पर रहने वाली चिड़िया, उसके घोंसले और भइया के जिद्दी स्वभाव के बारे में बाबा को चेताती बेटी विदा हो गई। लगे हाथ दुआरे की नीम को न काटने का अनुरोध भी करती गई। सावन में आने पर झूला जो झूलना था ! हर घर का एक सदस्य कम हो गया। घरघुमनी जो चली गई थी।. . .
(ह)
सोहर मंत्र पढ़ते मानव प्रेत ने कट चुके ‘पोखरा पर के बाबा’ की जगह आँसुओं से सींच एक शीशम रोप दिया। मन्नत सी माँगी, बाबा गाँव की सब बेटी बहिनों को सुखी रखना !
पोखरे का तिलस्म टूट गया। जलप्रेत खत्म हो गए। अब बेटियाँ वहाँ पिंड़िया दहवाने जाती हैं। (प्रसंगांत)
अगला अंक – बित्तन बाबा
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लण्ठ महानिष्कर्ष: संकट से निपटने में सफलता त्वरित गति से सही दिशा में उठाए गए सही कदम पर निर्भर करती है। 'सही' का निर्धारण व्यक्ति के भीतर विद्यमान सनातन लण्ठई की मात्रा और उसकी बेवकूफी के अनुपात से होता है।
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अनुवाद:
(1) देखो, सोहर में नैहर की पियरी को फटा हुआ बताया गया है। लेकिन ससुराल का सिन्दूर तो सुहाग है सो उसे युगों युगों तक बढ़ता बताया गया है। जैसे सिन्होरा में गूलर का फूल पड़ गया हो – कभी खत्म नहीं होने की नियति लिए।
(2) साला इस समय बजाएगा सोचा ही नहीं था। अच्छा लग रहा है।
(3) समधी आ रहे हैं। तुम लोग जल्दी करो।
(4) राजा, ब्राह्मण अग्निमुख होते हैं। हमारा तुम्हारा गोत्र तो एक है। साथ नहीं बैठूँगा तो भोजन करते गाली गायन का आनन्द कैसे उठाऊँगा।
(5) अरे, कोई गाली भी शुरू करो।
(6) अच्छा हुआ जो मैंने विवाह नहीं किया।
(7) मुँह पकड़ कर मारो (औरतों का निजी गालीनुमा तकियाकलाम)। बाबा तो मउगा हैं।
(8) कहा सुना माफ करिए। आप बहन का खयाल रखिएगा। सारे गाँव की दुलारी है।
(9) काका किसके लिए तुम अमिया तोड़ोगे? काकी कौन तुम्हारे केश सँवारेगा और कौन तुम्हारा ढेंका (अनाज से छिलका निकालने और साफ करने का एक देहाती घरेलू यंत्र ) चलाएगा?
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शब्द सम्पदा:
मेठ – नायक; झड़क चलना – तेजी से चलना; झिनिया चावल – महीन चावल जिसे हमारी ओर काला नमक के नाम से जाना जाता है – धान काला होता है। वैसा सुगन्ध, स्वाद और रूप बासमती में क्या मिलेगा?; चैती – चैत के महीने में गाया जाने वाला ग्राम गीत;
गुलगुल – परमानन्द की स्थिति; गाछे कटहर ओठे तेल – एक भोजपुरी कहावत, पेंड़ में तो कटहल अभी लगा ही है। फल खाने के लिए अभी से होठों पर तेल लगाए बैठे हो ?; पियरिया – शुभ पीला वस्त्र; सिन्होरवा – सिन्दूर रखने का लकड़ी का बना पात्र; भात – पका हुआ चावल; रिंकवच - गहरी हरी अरबी के पत्ते को बेसन लपेट बनाई गई पकौड़ी; सजाव दही – उपले की आँच पर जला कर गाढ़े किए दूध से जमाई गई दही; पाकल कोंहड़ा – पका हुआ मीठा कद्दू; मीठ – मीठा; तीत – कड़वा; सुन्न – उदासीन स्वाद वाला; अँचरा – आँचल; ओरहन – उलाहना; तउला – दही जमाने का बड़ा मिट्टी का पात्र; कछाड़ – धोती को उपर उठा कस कर बाँधना; परछावन – दुल्हे की लोढ़ा (सिलबट्टा का बट्टा)से विदाई के समय की जाने वाली परीक्षा जिसमें नारियों द्वारा मंगल कामना और विदाई की जाती है; खोंइछा – दुल्हन की ओढ़नी में बाँधा जाने वाला मंगल अक्षत और धन; पिनिस – एक प्रकार की बड़ी पालकी जिसमें लम्बी यात्रा को काटने के सारे सुख साधन होते थे। सोलह कहाँर उठाते थे; पिंड़िया दहवाने – गोवर्धन पूजा के गोबर से बनी पिण्डिओं से लड़कियाँ महीने भर पूजा करती हैं। मन्नते माँगती हैं। बाद में जल में प्रवाहित कर देती हैं।


शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

बारात एक हजार और बाउ मंडली -भूमिका (लंठ महाचर्चा)

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आप से अनुरोध है कि इस कथामाला को थोड़ा समय ले कर पढ़ें और पिछले को पढ़ने के बाद आगे के प्रसंग पढ़ें, आनन्द आएगा। यात्रा आगे बढ़ने के साथ साथ इसमें सारे रस मिलेंगे। भुलाई जा चुकी 'लंठई' को पुन: प्रकाशित और प्रतिष्ठित करने का यह एक विनम्र प्रयास है। साथ ही इस धारणा को ठेंगा भी कि ब्लॉग में साहित्य नहीं है।
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(1),(2) भूमिका

(3) लंठ महाचर्चा: बाउ हुए मशहूर, काहे?

(4) लंठ महाचर्चा:बाउ और परबतिया के माई- प्रथम भाग
लण्ठ महाचर्चा: बाउ और परबतिया के माई - अंतिम भाग
(5) ()
पूर्व कथन:
बाउ की लण्ठ मन्डली कोई औपचारिक संस्था नहीं थी। आस पास के आठ दस टोलों को मिला कर एक ढीला ढाला सा गाँव बनता था। टोले को उसके लोग सीना फुला कर गाँव ही कहते थे, जिसे बाकी टोलों के लोग मान भी लेते थे। समान तरह के आँगछ और स्वभाव वाले लोग अपने आप ही उम्र और पद के भेद किए बिना एक अनकही यारी/ भाईचारे/ बहिनापे में बँध जाते और गाँव के सीवान (सीमा) के भीतर उनकी भूमिका निश्चित हो जाती थी। यह भूमिका भी अनौपचारिक रूप से धीरे धीरे विकसित होती रूढ़ हो जाती थी।
जिस कन्या की बारात आज आ रही थी वह बाउ लंठ मंडली की महिला सदस्य थी। बाकी सदस्यों की पहचान का जिम्मा आप पर छोड़ता हूँ।
(ख)
सूरसती या सुरसतिया या सुरसत्ती आस पास के टोलों की प्रमुख ‘घरघुमनी’ थी। घरघुमनी माने जो घर घर घूमते पूरे गाँव का कम से कम रोज दो चक्कर लगाए। घरघुमनी अगर एक दिन न घूमे तो उसे खाना न पचे, दो दिन न घूम पाए तो जर (ज्वर) हो जाए और तीसरे दिन भी न घूम पाए तो पूरे गाँव में चर्चा का विषय हो जाय। लोग पुछार करने उसके घर धमक जाँय। कुछ अनिष्ट तो नहीं हो गया? लोगों को उसकी आदत सी पड़ गई थी। बहुतों ने तो खाने नहाने का समय सुरसतिया के आने जाने के हिसाब से फिट कर रखा था।
जाहिर सी बात है कि उस पैदल चालन जमाने में घरघुमनी का रोल अदा करना शारीरिक रूप से आसान कर्म तो कत्तई नहीं था। मानसिक रूप से भी एक घरघुमनी को बजरढीठ, प्रत्युत्पन्नमति, बेहया, मजाकिया और संवेदनशील एक साथ होना होता था। इस रोल में सुरसतिया सनेसिया (सन्देशवाहक) का काम करती, नव ब्याहताओं की जरूरतें पूरी करती, बुढ़ियों के तमाकू (तम्बाकू) के लेन देन का हिसाब रखती, ढील हेरने (जुएँ निकालने) या ढेंका चलाने में सहयोग के बहाने सबकी पोल पट्टी लेती, देती और बड़ी सफाई से सार्वजनिक करती। हर बारी (बागीचा) के हर आम के पेंड़ के टिकोरों (अमिया) का उसे पूरा ज्ञान था। कब टिकोरे आएँगे, कब खाने लायक होंगे, किन्हें नमक के साथ खाना है,किन्हें हरी मिर्च के साथ तो किन्हें बस ऐसे ही चबा जाना है? – जानना हो तो सुरसतिया से पूछ लें।
होश सँभालने के बाद से गाँव में पैदा हुए हर बच्चे का जन्म माह, समय और दिन उसे मुँह जबानी याद थे। संवत का उसे ज्ञान नहीं था। इसकी क्षतिपूर्ति वह पास पड़ोस की किसी महत्त्वपूर्ण घटना से सन्दर्भ जोड़ कर लेती थी।
सास बहू के झगड़े हों या ननद भौजाई के – घर का मालिक सूरसती की साक्षी जरूर लेता। ऐसे मौकों पर वह ग़जब की स्मरण शक्ति और निरपेक्षता का परिचय देती।
संक्षेप में कहें तो वह एक अजीब तरह की दुराव मिश्रित प्रेम की पात्र थी, विश्वस्त भी थी और हर घर के सदस्य की तरह थी। आज के तीसरे दिन उसे विदा हो ससुराल चले जाना था। पूरा गाँव खुश था – बहुत ही सुदर्शन, धनी और जोग (योग्य और सही जोड़ी वाला) वर के साथ उसका लगन हो रहा था। पूरा गाँव उदास था – गाँव के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण ‘दुर्घटना’ जो घटने वाली थी। घरघुमनी अपने पिया के घर जाने वाली थी। अब संचार माध्यम की भूमिका कौन निभाएगा? कौन निरपेक्ष गवाह बनेगा? कौन तमाकू . . . ?
(ग)
ठाकुर नाहर सिंह। जमींदार। अंग्रेज बहादुर आते तो ‘महल’ में ही रुकते। एकपत्नी व्रती नाहर जवानी में ही विधुर हो गए और फिर विवाह नहीं किए। समय के हिसाब से यह बड़ी भारी अपवाद था। जिसके कारण उनकी ‘मर्दानगी’ तक पर लोगों को सुबहा जैसा था। बाप बेटे ऐसे कि बोलें न और अंग्रेजी कपड़े पहना कर बाल भूरे रंग दो तो अंग्रेज ही लगें। महल के सूनेपन को शोखियों और किलकारियों से भर देने के लिए उन्हें एक ऐसी बहू की तलाश थी जो छुई मुई न हो और सुन्दर भी हो। कितने हजाम, पंडित, खोझवा (हिजड़े) आदि से पच्चीसो गाँव छ्नवा दिए। कोई रिश्तेदारी नहीं छोड़ी और एक बार तो फिरंगन तक को बहू बना कर लाने की सोच बैठे। वो तो उप्रोहित (पुरोहित) महाराज का अनशन था कि फिरंगन का मामला ठण्डा पड़ा। लिहाजा जब घरघुमनी की शोहरत उनके पास पहुँची तो खुद बैलों के सौदागर का वेश बना बाउ के गाँव आ धमके। जो देखा सुना उससे निहाल हो गए। असामी सरीखे बाबू पँड़ोही सिंह की क्या मजाल कि नाहर के घर वर देखाई करने जाँय? हाथी सवार नाहर एक दिन खुद पँड़ोही की बिटिया को अपनी बहू-बेटी बनाने के लिए उसका डोला माँगने आ पहुँचे। अवाक से पँड़ोही तो जैसे फालिश (पक्षाघात) मार जाय वैसे हो गए थे। चुप्प। फिर पगड़ी उतारी और नाहर के पैरों पर रख दी। नाहर सिंह ने बताया कि दहेज में बस पाँच चाँदी के सिक्के चाहिए। कन्या चार कपड़ों में विदा कर दें – कोई उज्र नहीं। बारात की संख्या के बारे में पूछने पर ठठा कर हँसे थे नाहर – ओकरे बिना बात बिगड़ी का (यह जाने बिना बात बिगड़ेगी क्या)? बाद में हजाम से कहलवा दिया – बारात तीन एक सौ होगी। तिलक चढ़ाने केवल पाँच जने गए जिसमें बाउ नहीं थे – उन्हें ऐसी भलमनसहत पर भरोसा नहीं हो पा रहा था।
(घ)
उस समय बारातें तीन दिन रुका करतीं। विवाह के अगले दिन औकात के हिसाब से भव्य जनवासा सजता जहाँ ‘मरजाद (मर्यादा)’ पूर्वक दोनों पक्षों का परिचय और फिर बौद्धिक/मानसिक प्रकार का मित्रतापूर्ण द्वन्द्व होता जो कभी कभी उल्टा रूप ही ले लेता। मरजाद के अगले दिन विदाई होती। ऊँची जातियों में चूँकि विवाह अपेक्षतया देर से होता सो बेटियाँ या तो उसी दिन विदा हो जातीं या एक साल के बाद गवना होता। राजपूतों में विदाई माने दुल्हन की विदाई होती इसलिए दुल्हन के साथ ही घर लौटते।
बाउ ने आज दुपहरी आध बाँस ढलते ही भैंस खोल दी। शाम को बारात के स्वागत सत्कार का जिम्मा जो सँभालना था। गरमी कुछ खास नहीं थी लेकिन उमस थी। ऐसे में खलिहान की तरफ से मैनवा अहिर को बेतहाशा भागते गिरते पड़ते आते देख बाउ सशंकित हो गए। बाउ! बाउ!! मैनवा बार बार यही कहे और बारी (खलिहान से लगा बागीचा) की तरफ इशारा करे।
बाउ तड़के,”धुर बुरधुधुर, कुछ कहबो करबे कि खाली चोनरइबे (अबे बेवकूफ, कुछ कहोगे भी कि केवल चापलूसी ही करोगे)?”। मैनवा ने तुरत बाउ का हाथ पकड़ा और बाउ को भैंस सहित खलिहान की तरफ खींच ले चला। बाउ पहुँचे। नजारा देख अवाक! क्रोध और चिंता एक साथ। अपने पूर्वाभास को साक्षात घटित देख ठिठक कर जैसे खड़े ही रह गए। . . . जारी