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मंगलवार, 31 जुलाई 2012

एक परम्परा ऐसी भी

चित्राभार :  http://www.kamat.com/database/pictures/corel/515043.jpg  
रुक जाऊँगा एक दिन जब चलने को राह नहीं रहेगी और कहीं किसी लैब में कोई वैज्ञानिक पृथ्वी की परिधि  माप लेगी। 
इस युग की तमाम घिसी पिटी बातों से नुकीली तराश लिये एक बात - एकला चलो रे! मुझसे नहीं जुड़ती। 
मैं कभी अकेला नहीं होता, मेरे साथ होती हैं - कानों में ऊष्म फुसफुसाहटें, पैरों में तलवे काँटों से मढ़े  - मैं चलता हूँ।  

मुठ्ठियों में भिंचे काँटेदार शब्द राहत पाने को करवटें बदलते हैं, रक्त रिसता है - पैरों से नहीं, हाथों से - मैं लिखता हूँ।
चित्राभार: http://www.cse.iitk.ac.in/~amit/birds/good/0650sw_brahminy-chased-off-by-babbler_14.10.jpg
मैं चलता हूँ वह लीक पकड़ जिस पर हैं विशाल झंखाड़ बरगद, पाकड़ - अमरबेलों के बलियूप। 
कभी बोये थे रक्तबीज पथिकों ने, जिनके हाथ रिसते थे, जो लिखते भी थे। 

हाँ, मुझे पता है कि हैं कुछ उद्यान, सदियों से परिरक्षित ज्ञान, कहलाते जीवंत!  
जिनमें खेलती हैं नई पीढ़ियाँ, जिनकी बेंचों पर बैठ बूढ़े करते हैं लेखजोख सभ्यताओं की मृत्यु के! 
और युवा नशा पीते हैं, संसार को जीते हैं।
चित्राभार : http://previews.agefotostock.com/previewimage/bajaage/b44450dcfd457e8ef02516a1ed7f9720/IBR-591303.jpg
मैं नहीं वहाँ यायावर अक्सर, नहीं अच्छे लगते वे, साज सँभाल बनाती है शंकालु मुझे, मृत्यु की बातें बनाती हैं दयालु मुझे वहाँ बू आती है - षड़यंत्रों, दुरभिसन्धियों की, समझ सकता हूँ जिन्हें समझा नहीं सकता, सूँघ सकता हूँ सूत्रों में सँजो नहीं सकता -गन्ध सूत्रबद्ध न हुये कभी, न होंगे कभी। 
मैं बता नहीं सकता कि शब्द भिंचे छ्टपटाते छोड़ने पड़ेंगे, मुठ्ठियाँ खोलनी होंगी, होना होगा अकेला निपट - 
मैं अकेले चल नहीं सकता और रुकना मुझे स्वीकार नहीं। मैं हूँ वाहक घनचक्करों की परम्परा का - भाषा है, भाष्य नहीं।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

बाउ मण्डली और बारात एक हजार - प्रसंगांत

पिछ्ले भाग से जारी . . .
दिन की घनी छाई अन्हरिया जैसे खत्म हो गई हो - बजनिओं के मेठ नोखे ने चैती छेड़ी। फिर कहरवा, फगुआ और कजरी की धुनों ने खलिहान पर बारहमासी बयार बहा दिया। समधी भात खाने चले थे।
दुल्हन के घर की ओर समधी के साथ प्रस्थान करते नोखे ने सोहर धुन शुरू की। अष्टभुजा नहा धो वस्त्र बदल कर साथ हो लिए।
कृषक बाला के आँगन में खेलते नन्हें नन्हें छौनों की सम्भावना से नाहरसिंह गुलगुल हो गए। गाछे कटहर ओठे तेल - भीतर की सारी कटुता और अभिमान भूल मन ही मन नोखे की धुन पर सोहर गाने लगे।
कहवाँ से आवेला पियरिया ललना ss पियरी पियरिया लागा झालर हो s
कहवाँ से आवेला सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss
नैहर से आवेला पियरिया ललना ss पियरी पियरिया मोती झालर हो s
ललना ससुरा से आवेला सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss
कहवाँ धरबे पियरी पियरिया लागा झालर हो ललना ss
कहवाँ धरबे सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो s
पेटिया में धरबे पियरिया ललना पियरी पियरिया लागा झालर हो ss
कोहबर धरबे सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss
फाटि चुटि जैहें पियरिया ललनाss पियरी पियरिया लागा झालर होs
जुगे जुगे बाढ़ो सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो s, ललना ss।“
धुन सुनते मिसिर जैसे बाउ को सोहर का भाष्य सुना रहे थे – “देख ss , सोहर में नइहर के पियरी के फटहा बना देहल बा लेकिन ससुरा के सेनुर त सोहाग ह । वोके जुग जुग बढ़ावल बा। गुलरि के फूल परि गइल बा का? अरे, सोहाग हे।(1)“
बाउ,” हूँ ss। सारे ए बेरा बजाई कबो सोचलो नाहीं रहलीं हे। नीक लागता।(2)“ मिसिर गमछा सँभालते और बाउ को पीछे छोड़ते विवाह के घर की ओर झड़क चले।
झलकारी ने बाजा की आवाज सुनी तो भाग दौड़ शुरू करा दीं। खलिहान काण्ड की खबर उन्हें लग चुकी थी। लेकिन बनमानुख बेटे पर भरोसा था. .
“समधी आवतने। जल्दी कर सो।(3)” उनकी जल्दी को कोसती बालाएँ काम में लग गईं।
(व)
झिनिया चावल का महर महर सुगन्धित भात, घी से बघारी अरहर की दाल, दहिबाड़ा, रिंकवच, सजाव दही, बरी कढ़ी, अँचार, चटनी, करैली, पाकल कोंहड़ा, केला और परवल की सब्जियाँ – यह थे मिसिर के बारह व्यञ्जन।
सब्जियों का चयन मिसिर की पाककला के ज्ञान का परिचायक था – करैली (तीत), पाकल कोंहड़ा (मीठ), केला (कसैला) और परवल (सुन्न) जैसे जीवन के चार रसों के परिचायक थे। समधी को सूक्ष्म सन्देश , हमारी बेटी तुम्हारे परिवार में सभी रस भर देगी, इस भात की शपथ उसकी बेकदरी न करना।
नाहरसिंह ने मंडप की गाँठ खोली और हिला कर स्थिर कर दिया। सम्बन्ध पक्का हो गया। सगोतियों के साथ खाने बैठे तो बगल में अष्टभुजा बाबा भी आकर बैठ गए। ब्राह्मण राजपूत के साथ पंक्ति में! सभी संकोच में आ गए। बाबा बहके,” रजा बाभन अगिनमुख होलें। अरे, हमार तोहार गोत्र त एके ह। साथे नाहिं बइठब त गारी कइसे सुनSब?(4)”। मिसिर ने सहमति में सिर हिलाया। आँखों में शरारत नाच रही थी। उधर परोसना शुरू किए और इधर भीतर से अंचरा से मुँह ढाँप झलकारी देवी ने आलाप लिया:
कंचन मड़वा बिसकरमा बनवलें भात रचली अनपुरना हे
बइठीं समधी दशरथ जी पिढ़इया जनि करिं मन काठ हे........
स्वर्ण मंडप विश्वकर्मा से बनवाया है। अन्नपूर्णा से भोजन रचाया, हे राजा दशरथ भोजन करने के लिए पीढ़े पर बैंठें लेकिन काठ के आसन पर बैठ मन को काठ न करें।“ ओरहन को समझ और खलिहान की घटना याद कर नाहरसिंह लजा कर रह गए।
बेटी की माँ। आँखों से गंगा जमुना बह रही लेकिन रीत तो निभानी है। सुरसतिया की माई ने बोल उठाए:
ओरियन ओरियन बइठे बरियतिया
मुहवाँ झुरइले ए बेटी नयना बहे लोरिया
केकरा के सौंपी ए समधी अपनी पुतरिया
हँसेलें समधी दशरथ जी
हमरा के सौंपि ए समधिन अपनी पुतरिया
रहिया खियइबे समधिन पाकल पनवा
घरवा पिअइबे सुरहिया गाइ के दुधवा
रउरा पुतरिया ए समधिन हमरे घर के लछमिनिया
हमरा के सौंपि ए समधिन अपनी पुतरिया।
युगों युगों से चले आ रहे उलाहने के स्वर। राजा दशरथ तुमने तो बहुत वादे किए थे। राह चलती पतोहू पान खाएगी इसका तक खयाल रखा था, लेकिन निकाल दिया न चौदह साल के लिए ! मेरी बेटी सीता को याद कर रो रही है समधी। कैसे तुम्हें सौंप दूँ अमानत? तुम भी तो उसी दगाबाज दशरथ की श्रेणी के हो।
बाउ का गला भर आया। नाहर मन्डली चुपचाप मिसिर का बनाया स्वादिष्ट भोजन भकोस रही थी।
मिसिर ने भारीपन महसूसा तो लकार लगाई,” अरे, गरियो शुरू होखे।(5)“
झलकारी देवी ने उत्तर सा दिया।
जेवन बइठेलें समधी राजा दशरथ बोलेलें सकुचि लजाइ जी
भितरा से समधिन हमरा के देखीं हम रउरा मेहमान जी
अँगना से बोलेलें राजा जनक जी अदला के बदला न लजाइँ जी
दशरथ - अरे समधिन हम तुम्हारे मेहमान हैं। थोड़ा हमरी ओर भी नजरिया हो। आँगन से जनक जी उत्तर दिए ,लजाना मत । अदला बदली होगी।“
राजा दशरथ उर्फ नाहर सिंह और राजा जनक उर्फ पँड़ोही सिंह घरैतिनों की अदला बदली करेंगे ! बाउ को इस सम्भावना से ही गुदगुदी हो चली – अच्छे भइल बियाह नाँइ कइनी(6)। उसी रौ में मिसिर को इशारा किए । दही परोसते मिसिर ने अचानक तउला पटका और कछाड़ बाँध दुसह गारी गायन कढ़ा दिए। बेटे हरिहर ने बाप का यह रूप देखा तो हतप्रभ सा लजाते हुए दुआरे भाग गया।
सब सखियाँ मिलि जेवना परोसें हो
समधी बिगड़ल बैला हाय सीताराम से बनी।
अरे समधी तो बिगड़ा बैल है, उसे सुन्दरी सखियाँ मिल व्यञ्जन क्यों परोस रही हैं?
वृद्ध गरिमामय मिसिर का यह रूप ! न तो नाहर ने सोचा था और न अष्टभुजा ने। बिचारे खिसियाए से मजे लेने लगे। मिसिर तो झगड़ालू फूआ की भूमिका पूरी करने पर आमादा थे। एक के बाद एक गालियाँ निकलती चली गईं:
समधी के बहिना के तीनि गो भतरवा
भरवा, कोंहरा, सोनरा हाय सीताराम से बनी
समधी ने अपनी बहन ऐसे दरिद्र घर ब्याही है कि उसका भरण पोषण करने के लिए तीन तीन भतार लगे हैं – वो भी कौन? भर, कुम्हार और सोनार। अब तो सीताराम ही बिगड़ी बना पाएँगे“
कटाक्ष गजब का था ! उपर से एक पुरुष को यह सब गाता कभी देखा ही नहीं था। नरसिंघवा मगन हो गया।
मिसिर बउरा गए थे। हाथ चमकाते अगली फुलझड़ी छोड़ी,
समधी के भगिना दबले बा जोबना
सुतल रहली खरिहाने, रचना राम से बनी।
समधी की बहन यौवन भार से दबी इतनी बौरा गई है कि खलिहान में सोती पाई गई है। ऐसी रचना भी विधाता ने इसके घर ही रचाया ।“ राजा दशरथ तुम्हारी कोई बहन भी थी क्या?
मार मुधइ के, बाबा त मउगा बानें(7) - बुढ़ऊ के इस अन्दाज पर नारियाँ भी मुँह दबाए भीतर भाग चलीं। बाउ ने हाथ पकड़ चेताया तो मिसिर चुपाए। अष्टभुजा की गारी सुनने की पिपाशा तृप्त हो चुकी थी। डकार लेते उठ गए।
विदाई के रूप में बाउ ने नाहरसिंह के हाथ में अपनी भुअरी भैंस का पगहा पकड़ा दिया। नरसिंघवा नाम जेहन से गायब हो चुका था। नाहर से इनकार करते न बना। हाथ जोड़ कर बाउ बोले,” कहल सुनल माफ कइ दीं। रउरे बहिन के खयाल राखब । गाँव के दुलारी रहलि हे . . .”(8)। आगे मारे भावुकता के कुछ बोल न पाए।
(श)
लोचना फिर बोलने लगा था। लेकिन नाहरसिंह के पास उसकी सफाई सुनने वाला मन ही नहीं रहा . . आने वाले छोटे छोटे छौनों की किलकारी को मन के आँगन में बसा रहे थे। . . .बरस भितरे पहले की आस थी। नाती ! .. हाथी गए हाथीशाला की ओर। घोड़े दौड़े घुड़साल। बारात विदा हो गई।
(ष)
परछावन और खोंइछा की रस्म पूरी हुई । उस समय आम तौर पर पाया जाने वाला अनासक्त वातावरण गायब था।
बुढिया काली माई के स्थान पर गमगीन भींड़। गाँव जवार से उखड़ती बेल दु:ख के सहारे लिपट विलाप कर रही थी ! बिदाई के समय का रूदन, सुरसतिया ने किसी को नहीं छोड़ा। रुला दिया सबको। रूदन ने कारुणिक लय ले ली थी:
अरे ए हमार बहिना ....अरे ए हमार भइया...
काका, केकरा खातिर टिकोरवा तू तूरब . .
काकी तोहार बरवा के झारी
के तोहार ढेंका चलाई...(9) हो अ ह ह हँ....
रोते हुए पँडोही ने बेटी को दुल्हे के साथ पिनिस में बिठाया। कहाँरों ने पिनिस उठाया कि अचानक दहाड़ मारती भइया भइया करती सुरसतिया कूद कर बाउ से लिपट पड़ी। औरतों ने सँभाल कर वापस चढ़ाया। फूट फूट कर रोते बाउ ने मुँह में गमछा ठूँसा और पोखरे की ओर भाग चले।
निबिया के पेंड़ जनि कटिह हो बाबा चिरइया खोतवना झोंझ हे ss,
भइया के जनि कुछ बोलिह हो बाबा, भइया बड़ी बरजोर हे ss
नीम के पेंड़ पर रहने वाली चिड़िया, उसके घोंसले और भइया के जिद्दी स्वभाव के बारे में बाबा को चेताती बेटी विदा हो गई। लगे हाथ दुआरे की नीम को न काटने का अनुरोध भी करती गई। सावन में आने पर झूला जो झूलना था ! हर घर का एक सदस्य कम हो गया। घरघुमनी जो चली गई थी।. . .
(ह)
सोहर मंत्र पढ़ते मानव प्रेत ने कट चुके ‘पोखरा पर के बाबा’ की जगह आँसुओं से सींच एक शीशम रोप दिया। मन्नत सी माँगी, बाबा गाँव की सब बेटी बहिनों को सुखी रखना !
पोखरे का तिलस्म टूट गया। जलप्रेत खत्म हो गए। अब बेटियाँ वहाँ पिंड़िया दहवाने जाती हैं। (प्रसंगांत)
अगला अंक – बित्तन बाबा
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लण्ठ महानिष्कर्ष: संकट से निपटने में सफलता त्वरित गति से सही दिशा में उठाए गए सही कदम पर निर्भर करती है। 'सही' का निर्धारण व्यक्ति के भीतर विद्यमान सनातन लण्ठई की मात्रा और उसकी बेवकूफी के अनुपात से होता है।
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अनुवाद:
(1) देखो, सोहर में नैहर की पियरी को फटा हुआ बताया गया है। लेकिन ससुराल का सिन्दूर तो सुहाग है सो उसे युगों युगों तक बढ़ता बताया गया है। जैसे सिन्होरा में गूलर का फूल पड़ गया हो – कभी खत्म नहीं होने की नियति लिए।
(2) साला इस समय बजाएगा सोचा ही नहीं था। अच्छा लग रहा है।
(3) समधी आ रहे हैं। तुम लोग जल्दी करो।
(4) राजा, ब्राह्मण अग्निमुख होते हैं। हमारा तुम्हारा गोत्र तो एक है। साथ नहीं बैठूँगा तो भोजन करते गाली गायन का आनन्द कैसे उठाऊँगा।
(5) अरे, कोई गाली भी शुरू करो।
(6) अच्छा हुआ जो मैंने विवाह नहीं किया।
(7) मुँह पकड़ कर मारो (औरतों का निजी गालीनुमा तकियाकलाम)। बाबा तो मउगा हैं।
(8) कहा सुना माफ करिए। आप बहन का खयाल रखिएगा। सारे गाँव की दुलारी है।
(9) काका किसके लिए तुम अमिया तोड़ोगे? काकी कौन तुम्हारे केश सँवारेगा और कौन तुम्हारा ढेंका (अनाज से छिलका निकालने और साफ करने का एक देहाती घरेलू यंत्र ) चलाएगा?
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शब्द सम्पदा:
मेठ – नायक; झड़क चलना – तेजी से चलना; झिनिया चावल – महीन चावल जिसे हमारी ओर काला नमक के नाम से जाना जाता है – धान काला होता है। वैसा सुगन्ध, स्वाद और रूप बासमती में क्या मिलेगा?; चैती – चैत के महीने में गाया जाने वाला ग्राम गीत;
गुलगुल – परमानन्द की स्थिति; गाछे कटहर ओठे तेल – एक भोजपुरी कहावत, पेंड़ में तो कटहल अभी लगा ही है। फल खाने के लिए अभी से होठों पर तेल लगाए बैठे हो ?; पियरिया – शुभ पीला वस्त्र; सिन्होरवा – सिन्दूर रखने का लकड़ी का बना पात्र; भात – पका हुआ चावल; रिंकवच - गहरी हरी अरबी के पत्ते को बेसन लपेट बनाई गई पकौड़ी; सजाव दही – उपले की आँच पर जला कर गाढ़े किए दूध से जमाई गई दही; पाकल कोंहड़ा – पका हुआ मीठा कद्दू; मीठ – मीठा; तीत – कड़वा; सुन्न – उदासीन स्वाद वाला; अँचरा – आँचल; ओरहन – उलाहना; तउला – दही जमाने का बड़ा मिट्टी का पात्र; कछाड़ – धोती को उपर उठा कस कर बाँधना; परछावन – दुल्हे की लोढ़ा (सिलबट्टा का बट्टा)से विदाई के समय की जाने वाली परीक्षा जिसमें नारियों द्वारा मंगल कामना और विदाई की जाती है; खोंइछा – दुल्हन की ओढ़नी में बाँधा जाने वाला मंगल अक्षत और धन; पिनिस – एक प्रकार की बड़ी पालकी जिसमें लम्बी यात्रा को काटने के सारे सुख साधन होते थे। सोलह कहाँर उठाते थे; पिंड़िया दहवाने – गोवर्धन पूजा के गोबर से बनी पिण्डिओं से लड़कियाँ महीने भर पूजा करती हैं। मन्नते माँगती हैं। बाद में जल में प्रवाहित कर देती हैं।


बुधवार, 22 जुलाई 2009

बाउ मंडली और बारात एक हजार- पहला दिन -2 (लंठ महाचर्चा)

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गतांक से आगे....

(ट)
मैनवा ने जब पँड़ोही को बारात का समाचार दिया तो उन्हें लगा कि इस भवानी का जन्म ही समस्याओं के लिए हुआ है। अव्वल तो घर घर घूमने की आदत से परेशान रहे, पता नहीं नाहर सिंह को क्या दिखा कि इस पर ही लट्टू हो गए। उस दिन भी परेशान हुए थे। थोड़ी राहत मिली तब ये एक हजार बारात ! इज्जत गई कुएँ में! कैसे क्या होगा? सुरसतिया की ईया (दादी) ने नाहर को शरापना(शाप देना) प्रारम्भ कर दिया। मोछिउखरना, दहिजरा. . .वह अभी पूरी तरह लय भी नहीं ले पाई थीं कि धड़ाम !
पँड़ोही ने भितऊ (मिट्टी की भीति वाला) घर की बैठक में घुस दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया। दहाड़े मार रोने लगे। शुभ शुभ की यह घड़ी और ये रोना पीटना! सुरसतिया की माई ने गजब का संतुलन दिखाया। पहले सास का गाली पाठ बन्द कराया। फिर दरवाजे पर बैठ पति का निहोरा करने लगीं।बहरे निकलीं, तरे घबड़इले से का होई। कवनों कवनों रस्ता निकलबे करी (बाहर निकलिए। इस तरह घबराने से क्या होगा। कोई कोई रास्ता तो निकलेगा ही) इकठ्ठा बाकी नारी समाज भी सुर में सुर मिलाने लगा। विवाह के गीतों की जगह इस षडराग ने ले ली। लेकिन पँड़ोही बैठका से निकले। देर होती देख माँ ने पुरोहित को तुरंत आने के लिए सन्देशा भेजा।
(ठ)
मिठाई मिसिर। पुरोहित। कहते हैं कि एक ब्राह्मण गुरु, मंत्री, रसोइया और सेवक सबका काम कर सकता है। इस गरीब और वृद्ध बाभन की अपने यजमानों के यहाँ एकदम ऐसी तो नहीं लेकिन कमोबेश यही स्थिति थी। भीतर से सन्देशा मिला तो तुरंत पधारे। माँ ने चरण धूलि ली और फिर स्थिति बताई। उन वृद्ध आँखों में एक क्षण के लिए चिंता के आसार दिखे फिर लुप्त हो गए।
बाभन का आदेश गूँजासज्जी कार जइसे होत रहल हे वइसही चालू रहे। हम पँड़ोही के सँभारतानी (सभी काम जिस तरह से हो रहे थे, जारी रहें। मैं पँड़ोही को सँभालता हूँ) दरवाजे पर सीधे धिक्कारना शुरू किए,”कवन रजपूत हउअ। एतने में घबड़ा गइल। भुक्खल पियासल कन्यादान के सोचले के जगही तिरिया चलित्तर का देखावताड़। तोहसे नीक मलकिनिए बाड़ी। धुर। बहरा निकल। (कैसे राजपूत हो! इतने में ही घबरा गए। भूखे प्यासे कन्यादान की सोचने की जगह त्रिया चरित्र दिखा रहे हो। तुमसे अच्छी तो मालकिन ही हैं। धुत्त। बाहर निकलो)
पँड़ोही ने पुरोहित की धिक्कार सुनी तो चेतना ने करवट ली। चिन्ता ने फिर सिर उठाया।बाबा, कइसे बराति खियाइब? एतना बेवस्था कहाँ से होई?(बाबा कैसे बारात को खिलाऊँगा? इतनी व्यवस्था कैसे होगी?) पुरोहित बाबा कि इस दलील पर कि सूरसती गाँव भर की बेटी है और पूरा गाँव मिल बैठ कर सब कर देगा, पँड़ोही तेहा(बेकार का गर्व) में गए। बाहर निकल कर बोले,” पट्टिदारन के आगे भीख नाहिं मँगबे (पट्टिदारों के आगे भीख नहीं माँगूगा)
भीख ! पँड़ोही ने भीख का नाम लिया था !! ब्रह्मतेज भभक उठा। ढलते सूरज की ओर मुँह कर वृद्ध बाभन ने दाहिना हाथ उठाया, भोजपूरी की जगह संस्कृतनिष्ठ भाषा सी कुछ निकली,”हम मिठाई मिश्र, पुरखों और प्रवरों की सौगन्ध ले कहते हैं सरस्वती इस समय से इस अग्निमुख ब्राह्मण की दुहिता है। सूर्यदेव साक्षी रहो, अन्नपूर्णा इस निर्धन ब्राह्मण की रसोई में वास करेंगी। ब्राह्मण आज भिक्षाटन करेगा। उसे अग्नि की सौंह।जिसने भी देखा सुना, रोमाञ्चित हो उठा।
पँडोही उनके पैरों पर गिर पड़े। बाबा का (ये क्या)? मिसिर ने उपेक्षा भाव से कायर को निहारा। व्यवस्था दी कि दही चिउड़ा नहीं चलेगा केवल पूरी सब्जी चलेगी और बच रही दही साथ में दी जाएगी। सुक्खल बनिया के यहाँ नाश्ते की बुनिया(बूँदी), लड्डू और शरबत वास्ते बेसन, गुड़ और घी वगैरह भेजने का संदेशा पठा कर बोले बाउ कहाँ बाड़ें (बाउ कहाँ हैं)? बाउ ने सब देख सुन लिया था। चुपचाप गाड़ा (बैलगाड़ी) लाने मिसिर को साथ ले चल पड़े। रास्ते में मिसिर ने पूछा लकड़ी लौना के का होई(जलावन की क्या व्यवस्था होगी)? बाउ बोले ,”अगिया बैतालऔर पोखरे की ओर इशारा कर दिया। ब्राह्मण औरब्रह्मराक्षसएक दूसरे की ओर देख ठठा कर हँस पड़े।
आग की तरह इस घटनाक्रम की सूचना टोले दर टोले फैलती चली गई। नमक मिर्च लगा कर। मँगरू हजाम और उसके खानदान ने निभाई प्रमुख भूमिका मिसिर ने जब हाथ उठाया तो कैसे चौंध सी हुई सूरज देवता में.. .’ से लेकरबाउ के बैल तो आज पगला गए हैं, घोड़े क्या दौड़ेंगे उनके आगे..’ तक। जिसके यहाँ जो भी राशन था ले कर तैयार दरवाजे पर इंतजार करने लगा। जिनके पास बैलगाड़ियाँ थी, रसद सामान लाद बाभन को भिच्छा देने चल पड़े। तो ऐसा भिखमंगा आज तक हुआ था और ही ऐसी भिक्षा। भिक्षा ऐसी क्यों नहीं?
अहिरटोली के मुन्नर और मनसुख को मिसिर की यह नौटंकी और भीखमँगई कत्तई पसन्द नहीं आई। अरे भाई, गाँव की बेटी की बात है लोगों को ऐसे ही आगे आना चाहिए। आएँ तो जबरी ले लो। पहली बार उन्हें बाउ से भी असहमति हो गई। दोनों ने अपना गाड़ा हाँक दिया।
अब जनता जनार्दन चाहे मिसिर को भीख दे या मुनरा कीसभ्य सी जबरदस्तीपर दे, अन्नपूर्णा की क्या मजाल कि बाभन की रसोई में पइसें (प्रवेश करें)?
(ड)
यह कथा मैंने अपनी यथार्थवादिनी कर्मठ माँ से सुनी है, जिसे उन्हों ने अपनी चचिया सास (चचेरी सास) के मुँह से सुना था। आज भी कभी अस्फुट से प्रसंग छिड़ जाने पर सुनाने का उनका उत्साह देखते ही बनता है।
आज के हिसाब से देखता हूँ तो उन आठ टोलों के समूहघरौठा, अहिरटोली, कैरटोली, टिपरी, माँझी,सनेरा, बिसुनपुर और महतौरा की कुल जनसंख्या भी उस समय हजार के आस पास ही रही होगी। बाउमंडली के क्षोभ,अनूठी कर्मठता और पराक्रम के कारण बारात की संख्या से तुलना करने पर समझ में आने लगते हैं।

एक निहायत ही निर्धन और अकिञ्चन सा वर्तमान पूर्वी उत्तर प्रदेश का इलाका कैसे उस जमींदार के ऐश्वर्य के विरुद्ध हिमालय सी निष्ठा और निश्चय से खड़ा हो गया था! बहुत दिनों के बाद जब यूरोप के छोटे से गाँव गॉल और महान सम्राट सीजर की झड़पों के किस्से कॉमिक्स में पढ़े तो लगा कि ऐसा संसार के हर कोने में होता रहा है। बस बाउ मंडली के पास मिथकीय शक्तियाँ नहीं थी। प्रेत, बैताल वगैरह तो बस किस्से ही थे। था तो केवल अनपढ़, गँवार और उज्जड समाज का आपदा प्रबन्धन!!
()
उन टोलों के नारी समाज का उस संझा रैन (संध्या रात) का उद्योग मुन्नर, मनसुख, मिसिर, बाउ, बिरछा गोल आदि के लंठोद्योग के उपर भारी पड़ता है। कैसे? वह जमाना घर घर जाँते (घरेलू चक्की) का जमाना था। लड़कियाँ और औरतें रोज भोरहरे उठ कर जौ, गोहूँ (गेहूँ), केराय (मटर) वगैरह पीसतीं और उसके बाद ही चूल्हा जलता। मिसिर के तार्किक फरमान ने चिउड़ा से तो निजात दिला दिया लेकिन आटा? किसी भी घर की डेहरी( अनाज, रसद रखने का पीली मिट्टी से बना बड़ा सिलिण्डरनुमा पात्र) में बहुत होता तो दो तीन दिन का आटा। देवें क्या और रखें क्या?
झलकारी देवी ने पहला काम किया लगन के घर में मंगल अनुष्ठानों और गीतों के लिए केवल पाँच बूढ़ी औरतें छोड़ बाकी सबको उनके घर पठा दिया, सबके जाँते चलते रहने चाहिए। वह आजघरघुमनीकी भूमिका में थीं! बाउ और मिसिर के साथ गाड़े से घर घर घूमती कहीं हाथ बँटाती, किसी को झिड़कती, किसी को दुलराती तो किसी को थोड़ा ठाँव(विश्राम) लेने को कहती। उस संझा रैन जाँते तब तक चलते रहे जब तक अंतिम बाराती ने भोजन नहीं कर लिया।अन्नपूर्णा साक्षात भाग दौड़ में जो लगीं थीं !
बाउ, मुन्नर और मनसुख के बैलों को तो जैसे आज भूख प्यास ही लगे! कृषक परिवार के ये सदस्य जैसे सब समझ रहे थे।
मुन्नर और मनसुख की जबरदस्ती बाउ और मिसिर केभावनादोहनप्रयास से अधिक सफल रही - इस मामले में कि तो किसी भी पेंड़ पर कटहल बँचा और किसी भी कोला(घर से लगी सब्जी वाटिका) में केला या कोई सब्जी। घर के आलू, प्याज, हल्दी, मसाले, मिर्च की तो औकात ही क्या? तेलिनिया(तेल पेरने वाली) घिघियाती गरियाती ही रह गई, सारा सरसो तेल मिसिर के भण्डारा में पहुँच गया।
सुखला (सुक्खल बनिया) आदेशित सामग्री ले गुरु महाराज की आज्ञा पालन करने स्वयं गया थादो हलवाई साथ में।
गोरखनाथ पीठ से संस्कृत की पढ़ाई करते अपने बेटे को पहली बार पौरोहित्त्य कर्म का जिम्मा सौंपा था, आज मिसिर वह पंचमेल मसालेदार तरकारी(सब्जी) बनाने वाले थे कि ससुर जमींदार की पीढियाँ याद रखें!
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इन सबसे पलखत(अवसर) पा कर मैनवा ने सोचा कि जरा बारात की टोह ली जाय सो खलिहान पर चक्कर काटने लगा। जमींदार की लाई बारात जम चुकी थी।

बारात वाले द्वारपूजा के लिए सज रहे थे क्यों कि गोधूलि बेला में इसका रिवाज था। रखवाले चक्कर लगा रहे थे। उनको मैनवा पर चोर होने का शक हो गया। यथा राजा तथा प्रजा। पकड़ कर दो तीन हाथ दे दिए। मैनवा रोता चिल्लाता पँड़ोही के घर की ओर भाग चला। नाहर सिंह ने सुना तो बहुत बिगड़े लेकिन अब तो जो होना था वह हो चुका था। द्वारपूजा अभी हुई ही नहीं थी और बाजा बज गया।
ठसक में थे सो सन्देशा जैसा कुछ भेजना भी सम्मान के खिलाफ था। बस प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगे।
पँड़ोही ने सुना तो जिद पकड़ लिए। विवाह नहीं होगा। बारात वापस जाए। ये कैसे जंगली कि जिस घर में बारात ले कर आए उसके सेवक को ही पीटने लगे! बाउ और मिसिरभिक्षाटनमें लगे थे कि यह समाचार सुनाई पड़ा। सब कुछ छोड़ तुरंत घर पहुँचे तो पँड़ोही छाती पीट रहे थे। बाउ ने जोर से डाँटा,”चुप रह काका। दुपहरिए से नाटक नाधि के देहले बाड़। बराति कइसे वापस जाई। पूरा गाँव के नाव बदनाम हो जाई। औरी बेटी बहिन नइखे बिअहे के का?( काका चुप रहो। दुपहर से ही नाटक कर रहे हो। बारात कैसे वापस जा सकती है? पूरा गाँव बदनाम हो जाएगा। क्या किसी और बेटी बहन की शादी नहीं करनी है)?
मिसिर बोले,”बेटी अब हमार हे। तू खाली कन्यादान करबअ लिए अब चुप्पे रह (बेटी तो अब हमारी है। आप को केवल कन्यादान करना है। इसलिए अब चुप ही रहें।)
बाउ ने मैनवा को उलाहना भरी नजर से देखा। बोले ,” भाग सबके मिलेला। तोके खराब लागल होखे हम माफी माँगतानी (ये भाग्य सब को नहीं मिलता। तुम्हें खराब लगा हो तो मैं माफी माँग रहा हूँ) अजीब सा तर्क और बाउ की माफी सुन मैनवा जैसे पानी पानी हो गया। दरहम बरहम, मान मनौवल सब हो गया।
प्रतिक्रिया के लिए नाहर सिंह प्रतीक्षा ही करते रह गए। ...जारी