रविवार, 25 मार्च 2018

भोजपुरी -12: रामनवमी : राम जी लिहलें अवतार रे चइतवा

फागुन रेचक है। वास्तविक मधुउत्सव तो चैत्र में होता है। नौ दिन नवदुर्गा अनुष्ठान, जन जन में रमते राम का नवजन्म नये संवत्सर में।
नवान्न दे पुनः प्रवृत्त होती धरा का स्वेद सिंचन, धूप में सँवरायी गोरी का पिया को आह्वान - गहना गढ़ा दो न, बखार तो सोने से भर ही गयी है!

चैत में शृंगार का परिपाक होता है। गेहूँ कटता है, रोटी की आस बँधती है, मधुमास भिन्न भिन्न अनुभूतियाँ ला रहा होता है एवं ऐसे में उस राम का जन्म होता है जो आगे चल कर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये किंतु उनके जन्मोत्सव में जो भिन्न भिन्न पृष्ठभूमियों के लोकगायकों एवं नर्तकों की हर्षाभिव्यक्ति होती है, उसमें उल्लास स्वर नागर शास्त्रीयता तथा अभिरुचि की मर्यादाओं को तोड़ता दिखता है। इसमें गाये जाने वाले चइता चइती की टेर अरे रामा, हो रामा होती है। 
चइता पुरुष गान है। सुनिये चइता विशाल गगन के स्वर में। 
(अंत तक सुनने पर ही समझ में आयेगा कि चैत क्यों फागुन से श्रेष्ठ!)  

पूरी प्रस्तावना के साथ गान होता है। प्रकृति भी आने वाले के स्वागत में है, रसाल फल गए हैं, महुवा मधुवा गए हैं, पवन कभी लहराता है तो कभी सिहराता है। 
घर में नया अन्न आ गया है, पूजन हो रहा है, मंगल गान है, क्रीड़ा है। मस्ती भरे वातावरण में राम जी जन्म लेते हैं! ढोल की ढमढम के साथ बधाई गीतों की धूम है।

सावन से न भादो दूबर, 
फागुन से ह चइत ऊपर 
गजबे महीना रंगदार रे चइतवा।

आम टिकोराइ जाला
महुवा कोचाइ जाला
रस से रसाइल रसदार रे चइतवा।

कबहू लहर लागे 
कबहू सिहर लागे 
किसिम किसिम बहेला बयार रे चइतवा।

गेंहू के कटाई होला
नवमी के पुजाई होला 
लेके आवे अजबे बहार रे चइतवा।

घरे घरे मंगल होला 
कुस्ती आ दंगल होला 
मस्ती से भरल मजदार रे चइतवा।

ढोल ढमढमाय लागे 
चइता गवाय लागे 
राम जी लिहलें अवतार रे चइतवा।

बाजे अजोधा में अनघ बधइया 
ए राम रामजी जनमलें 
दसरथ जी के अंगनइया।

बाजे चइत मास गावेला बधइया
ए राम रामजी जनमलें 
दसरथ जी के अंगनइया।


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शृंखला के अन्य गीत 

लोक : भोजपुरी - 10: चइता के तीन रंग
लोक: भोजपुरी- 9: पराती, घरनियों का सामगायन
लोक: भोजपुरी- 8: कस कसक मसक गई चोली(निराला) और सुतलऽ न सुत्ते दिहलऽ(लोक)
लोक : भोजपुरी - 7: बोले पिजड़ा में सुगनवा बड़ऽ लहरी (अंतिम भाग)
लोक : भोजपुरी - 6: रोइहें भरि भरि ऊ... बाबा हमरो...भाग-1
लोक : भोजपुरी - 5 : घुमंतू जोगी - जइसे धधकेले हो गोपीचन्द, लोहरा घरे लोहसाई
लोक : भोजपुरी - 4 : गउरा सिव बियाह
लोक : भोजपुरी -3: लोकसुर में सूर - सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।
लोक : भोजपुरी - 2 : कवने ठगवा - वसुन्धरा और कुमार गन्धर्व : एक गली स्मृति की
लोक:भोजपुरी-1: साहेब राउर भेदवा


शनिवार, 24 मार्च 2018

सीबीडी एसबीयू मैट्रिक्स तंत्र वीरभोग्या वसुंधरा CBD SBU Matrix System



जिन्होंने मैट्रिक्ससिनेमा शृंखला देखी है तथा जिन्हें भारतीय चिंतन परम्परा का आरम्भिक ज्ञान है, वे समझ जाते हैं कि सधे हुये नवोन्मेष द्वारा उसी परम्परा को आधुनिक युगबोध के साथ आधुनिक दृश्य श्रव्य माध्यम द्वारा प्रस्तुत किया गया है। गाँव गाँव घूम घूम गाथायें सुनाने वाली आख्यानक परम्परा को जो प्रभाव पहले हुआ करता था, वही प्रभाव इस युग में सिनेमा का है। जो विचार योद्धा यह जानते हुये सिनेमा एवं टी वी धारावाहिकों का उपयोग करते हैं, वे सफल हैं, जमे हुये हैं, जो नहीं करते, उनकी पकड़ जन सामान्य तक नहीं है। इस तन्‍त्र में महत्व इसका अधिक है कि आप कितने जन के अंतर्मन तक पहुँच सकते हैं, दृश्य श्रव्य माध्यम पुराने समय के नाटकों की पूर्ति करता है।
मैं भी न, जो कहने चला था, उसे तज जाने क्या कहने लगा। हाँ, तो उस फिल्म में एक समांतर शासन तंत्र है जिसके बारे में जन सामान्य को पता नहीं है तथा उसके प्रतिरोध में कुछ समझदार भी हैं जिन्हें उस तंत्र तक पहुँचने, उससे जूझने इत्यादि के लिये विशेष प्रयास करने पड़ते हैं।
उस स्तर का साई फाई तो नहीं, किंतु हम सभी भी एक मैट्रिक्स में ही रह रहे हैं जिसका नाम लोकतंत्र है। नेताओं के अतिरिक्त सत्ता में ऊपर बैठे जो अधिकारी जन हैं, वे यह जानते हैं कि तंत्र कैसे चलता है। विवशताओं, स्वार्थ, सेवा नियमों इत्यादि के कारण वे न तो मुँह खोलते हैं, न ही तंत्र छोड़ पाते हैं। तंत्र पर आक्रमण की स्थिति में वे ढाल बन कर तन जाते हैं क्योंकि उनके हित उससे नाभिनालबद्ध होते हैं। समस्त संसार में यह खेल चल रहा है, संसार के सबसे योग्य कुशाग्र जन उनके वेतन पत्रक पर हैं जो मैट्रिक्स के कर्ता धर्ता हैं।

इतने के पश्चात आप यदि रहस्य रोमाञ्च पढ़ने वाले हैं तो एलुमिनाटी या उस तरह के अनेक सिद्धांत आप के मन में कुलबुलाने लगे होंगे। मैं उनकी बात नहीं कर रहा, वे हों या न हों, इससे मौलिक समस्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। मैट्रिक्स को आप चाहें तो माया भी कह लें। 
वीरभोग्या वसुंधरा का जो सिद्धांत है, वही वैश्विक तंत्र को चलाने का मूल है। कोई नेता पकड़ा जाता है या हार जाता है तो आप बहुत प्रसन्न होते हैं किंतु यह नहीं सोच पाते कि जो दिख रहा है, वह हिमखण्ड की नोक भर है। उस आकर्षक नोक के नीचे जाने कितने समीकरण होते हैं जो असम्भव को सम्भव कर रहे होते हैं। उपद्रव छँटने तक, धूल बैठने तक सब सकुशल सम्पन्न हो चुका होता है। जनता प्रसन्न होती है कि चलो दण्डित हुआ, कुकर्मों की सजा हुई जबकि अपनी सात पीढ़ियों तक का सुखी समृद्ध जीवन निश्चित कर चुके तत्व यह सोच कर प्रसन्न होते हैं कि अब इससेअधिक क्या मिलता? ऐसे ही छूट गये! तंत्र चलता रहता है।
वीर एवं उपयुक्त समय पर कर्म में लग जाने वाले ही प्रकृति के प्रिय होते हैं। एक उदाहरण देता हूँ – CBD नाम सुने हैं? Coal Bed Methane को कहते हैं, वह मेथेन जो कोयला स्रोतों में पाई जाती है। आज से तीसो वर्ष पहले से उससे आगे के एक काम में चीन लगा हुआ है – कोयले का भञ्जन कर मेथेन गैस बनाना तथा उसके संघनन इत्यादि से विविध रसायन एवं ईंधन के निर्माण की युक्ति का विकास। चीनी कोयले की गुणवत्ता भारतीय कोयले से अच्छी है। सब को पता है कि हमारे यहाँ विशाल कोयला भण्डार है तथा उसका प्रभावी उपयोग कौन कहे, कोई उस दिशा में सोच भी नहीं रहा।
ऐसा नहीं भी है। लगभग 15 वर्ष पहले भारत के ही एक स्वनामधन्य प्रसिद्ध कम्पनी की सम्बंधित इकाई के सर्वोच्च व्यक्ति से मिला था। उन्होंने बताया कि हमलोग भारतीय कोयले का चीन द्वारा कल्पित विधि से दोहन कैसे हो, इस हेतु तकनीक विकसित करने एवं शोध में लगे हैं। हमारी एक समर्पित इकाई SBU Strategic Business Unit इस काम के लिये पिछले पाँच वर्षों से लगी हुई है। मुझे आश्चर्य हुआ कि करोड़ो का व्यय एक ऐसी तकनीक के लिये जिसकी उपादेयता संदिग्ध है! उन्होंने कहा कि देखिये, आरम्भ में सब ऐसे ही लगता है। कभी केवल सोचा ही गया होगा कि धरती माँ (उन्होंने यही शब्द प्रयुक्त किये थे) के गर्भ से कच्चा तेल निकाल, प्रसंस्कृत कर उस ईंधन पर सम्पूर्ण विश्व को निर्भर कर दास बनाया जा सकता है!
मैं उनकी शब्दावली – दास बनाना पर चौंका तो उन्होंने बात आगे बढ़ाई – संसार ऐसे ही चलता है। जो आगे होते हैं, वे लूट लेते हैं, शेष उनके फेंके पर जीवन व्यतीत करते हैं। उन्होंने कहा कि, देखिये अभी सरकार के पास इससे सम्बंधित कोई विधिक या नियमन के प्रावधान नहीं हैं, तकनीकी तो दूर की बात है। जब बात आगे बढ़ेगी तथा सुगबुगाहट होगी तो शीर्ष पर बैठे आई ए एस को हमलोग ही यह सब उपलब्ध करायेंगे, नियमन एवं विधिक प्रावधान भी हमारे अधिवक्ता तय करेंगे। सब कुछ बहुत ही साफ सुथरे ढंग से होगा तथा समय आने पर हम ही हम होंगे, क्योंकि हमें पता होगा कि कब, कैसे, कितना करना है, किसे करना है। सरकार किसी की रहे, आई ए एस कोई भी रहे, तंत्र हमारा होगा, हम शीर्ष पर होंगे।
मुझे लगता है कि इस उदाहरण से आप को ढेर सारे बिंदु मिले होंगे। यह भी जानिये कि पेट्रोलियम पदार्थों से सम्बंधित एक बहुत बड़ी कम्पनी ईंधन के रूप में हाइड्रोजन के वैसे ही वैकल्पिक अनुप्रयोग के अनुसंधान पर वर्षों से करोड़ो डॉलर लगा चुकी है जैसे हम आज डीजल पेट्रोल का करते हैं।
ये सभी ऐसा कैसे कर पाते हैं? क्योंकि वे सक्षम हैं। वे सक्षम क्यों हैं? क्योंकि चक्रीय गति में उन्होंने सर्वदा पहल की। उनके साथ सभी घूम रहे हैं किंतु वे घूमती चकरी की वह डण्डी हैं जो यह बताती है कि जुये में कौन जीतेगा, कौन हारेगा? जुये के भी अपने ढेर सारे नियम होते हैं, होते हैं कि नहीं? सब कुछ विधिवत होता है किंतु होता तो जुआ ही है! जुआ भी एक प्रकार का मैट्रिक्स ही है। कभी जुआघर गये हैं या नहीं?
जुआ कहिये, मैट्रिक्स कहिये या चाहे जो नाम दीजिये, चलेगी उसी की जो न केवल पहल करेगा अपितु तन मन धन से नवोन्मेष के साथ लगा रहेगा। 

अपने देश में ही देखें तो कुछ प्रांत, विशेषकर हिंदी प्रांत, अन्यों से पीछे हैं। क्यों हैं? क्योंकि उनके निवासियों में यह कमी भीहै। कुछ लोग हीकहना अधिक उपयुक्त पायेंगे तो कुछ भी की उपेक्षा कर लाल पीला होना तथा तर्क वितर्क करना किंतु क्या है कि तर्कों से संसार नहीं भीचलता है, मैट्रिक्स तो अतर्क्य है ही! गहराई से सोचिये, सम्भवत: कोई किरण दिख जाये।       

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

On constipation constitution NOTA चड्ढी and अकबरी लोटा मसीही घण्टा

On constipation constitution NOTA चड्ढी and अकबरी लोटा मसीही घण्टा


कोष्ठबद्धता को अंग्रेजी में constipation कहते हैं। मानव मन अद्भुत होता है। कभी कभी कुछ लय ऐसे मिला लेता है कि जब भी आप कोई शब्द कहते सुनते हैं तो तुरंत लय वाला शब्द ध्यान में आता है। constitution ऐसा ही शब्द है जिसके साथ तुरंत ही constipation का ध्यान आता है। देश भी कोष्ठबद्धता से ग्रसित होते हैं। विकार जब उच्चस्थ मस्तिष्क तक पहुँच जाता है तो कुछ भी ठीक नहीं रह जाता। कोष्ठबद्धता लम्बे समय तक चले तो व्यक्ति उसका अभ्यस्त हो जाता है। कभी दुर्दैव से उदर स्वच्छ हो जाये तो ऐसे व्यक्ति को सारा संसार सूना लगने लगता है, सब कुछ उड़ता हुआ, प्लवित होता हुआ। घबरा कर वह पुन: कोष्ठबद्धता हेतु मन्नतें मानने लगता है। देश में constitution बहुत दिन से है। ब्रिटिशों को भगा हम सबने उनकी भगई अपना ली जिसने नवसामंत वर्ग को सजने सँवरने के पूरे अवसर सुविधायें प्रदान कीं। भगई विकेंद्रित हो विकसित होते हुये पहले रूपा की चड्ढी हुई, तदुपरांत फ्रेंची होती हुई ज़ीरो साइज जॉकी हो गई, दर्म्याना, एक कीनो पहनें सभी जन, जनाना, बचकाना। उसमें सबके उसकी साँस घुटती है किंतु चाहिये जॉकी की वही वाली ही, राजा को constipation है, कहे तो कौन कहे - हॉट कूल जो होती है। भ्रम की जॉकी स्थिति के समांतर ही भ्रष्टाचरण का विकेंद्रीकरण हुआ तो जॉकी एवं उसका constipation गाँवों में भी पहुँच गया। पिछवाड़े के अर्द्धवृत्तों को चौथाई उघारे जुवा बोतल पानी ले बाइक से निपटने जाने लगे। बाइक का खर्चा शौचालय निर्माण निधि के खाते में - स्वच्छ भारत बिकास। कोष्ठबद्धता का ही प्रभाव होता है कि चुनावों के दिन नगरीय जनता का आधा भाग पिकनिक मनाने सरेह में निकल्लेता है, उसे बोतल की आवश्यकता रहती है किंतु पीने वाली की, धोने वाली की नहीं।










इन सब असम्बद्ध अगड़म बगड़म के बीच कुछ को लगने लगा कि constipation वास्तव में रोग होता है, गर्वित होने का कोई उपादान नहीं, तो राजाओं ने उन्हें लॉलीपॉप पकड़ा दिया, लो चूसो, इससे सब कुछ साफ रहता है - मुँह से लेकर अधोविवर तक! उस लॉलीपॉप का नाम था - NOTA - भयङ्कर फुल्ल फॉर्म - None Of The Above, Of एवं The तक के पहले अक्षर उसके नाम में बड़के थे कि ल्यो, इसे चूसो एवं उन बड़कों के ऊपर मुँह ऊपर कर थूक दो, ले NOTA. हम सभी तुम्हारी जागरूकता से घबरा गये हैं। इसे चूसते हुये तुम्हें वास्तव में लगेगा कि हम सब तुम लोगों से बहुत अधिक भयभीत हो रहे हैं, हमारी पुंगी बजने ही वाली है।

उन जगे हुओं को बहुत प्रसन्नता हुई, हमको भी हुई पर बुरा हो गुरुत्वाकर्षण बल का कि ऊपर की ओर मुँह कर उछाली हुई हर थूक अपने मुँह पर ही गिरती है, हमें उसका विज्ञान शीघ्र समझ में आ गया। जॉकी नीचे तो सरक ही रही थी, उस पर सोचने की आवश्यकता हमें न लगी। किंतु नागर जन की एक प्रजाति को लॉलीपॉप डबौत अच्छा विकल्प लगा। जिसने कभी अंगुली में नीला क्या, पीला रंग तक न लगने लगाने दिया था, वह भी NOTA रँगाने लगा। नये प्रकार का हॉट कूलत्व - हमने तो सिर ऊपर कर आकाश में थूक दिया, हाउ कूल! nobody deserves मानो इनसे योग्य जन गढ़ने का साँचा ही टूट गया! आज एक जन ऐसे ही मिल गये पिलेटफारम पर। हमने कहा कि जानते हैं NOTA अर्थात नोटा की तुक किससे मिलती है? वे भकुवाये से देखने लगे तो मैंने कहा - ले लोटा ! ले घण्टा !!
constipation साफ होने की प्रतीक्षा करते रहो, घण्टा बजाते रहो, NOTA दबाते रहो। राजा लोग इस बार कोई नया चुसना थमाने वाले हैं तब तक माजते धोते एवं बजाते रहो!
DIIOT कहीं के!

मंगलवार, 20 मार्च 2018

Spring Equinox and Festivals कल के वसंत विषुव के व्याज से पर्व चर्चा

Spring Equinox and Festivals
आप ने कुछ लोगों को सुना होगा कि विक्रम संवत तो वैशाख में लगता है, यह तो शक संवत है! वास्तव में वे सौर कैलेण्डर एवं सौर-चंद्र पञ्चाङ्ग की बातें कर रहे होते हैं, किञ्चित भ्रम में भी रहते हैं। 

पहले चार बिंदुओं को जानिये। धरा से सूर्य को देखें तो सूर्य उत्तर-दक्षिण-उत्तर वर्ष भर दोलन करते प्रतीत होते हैं। इस गति के कारण ही जाड़ा, गरमी, बरसात ऋतुयें होती हैं जिन्हें दो दो में बाँटने पर छ: हो जाती हैं।

कल प्रात:काल 21 मार्च को महाविषुव या वसंत विषुव का सूर्योदय होगा। इस दिन पृथ्वी के बीचोबीच की कल्पित रेखा विषुवत वृत्त वाला तल सूर्य के गोले के बीचोबीच से जाता है, सूर्योदय ठीक पूरब में, सूर्यास्त ठीक पश्चिम में। सम ऋतु – वसंत। निकट का पर्व – वासंती नवरात्र। शस्य देखें तो गेहूँ, रबी। रामनवमी के नौ रोटी। 

यहाँ से क्रमश: उत्तर की ओर झुकते सूर्य के कारण दिन के घण्टे बढ़ते जाते हैं, ताप भी बढ़ता जाता है। 21/22 जून को अधिकतम उत्तरी झुकाव होता है, भीषण उमस, वर्षा ऋतु का उद्घाटन। ग्रीष्म अयनांत, चलना रोक कर लौटना। 

वहाँ से पुन: दक्षिण की ओर माध्य स्थान की ओर लौटते सूर्य 22/23 सितम्बर को पुन: विषुव वाली माध्य स्थिति प्राप्त करते हैं। सम ऋतु – शरद। निकट का पर्व – शारदीय नवरात्र। कृषि उपज देखें तो धान, खरीफ शस्य। 
वहाँ से दक्षिण की ओर झुकते जाते हैं, दिन छोटे होने लगते हैं, शिशिर आ जाता है, पूस जाड़ तन थर थर काँपा। 21/22 दिसम्बर को अधिकतम दक्षिणी झुकाव होता है। शीत अयनान्त। 
यहाँ से उत्तरायण होते सूर्य पुन: 21 मार्च की स्थिति तक आते हैं। ऋतु चक्र चलता रहता है। 3 – 3 महीनों के अंतर से चार बिंदु। 
इतना समझ लेने पर अब जानिये कि अंतर्राष्ट्रीय कैलेण्डर सौर है अर्थात चंद्र गति से इसका कोई सम्बंध नहीं। विक्रम संवत सौर-चंद्र है अर्थात दोनों को मिला कर, समायोजित करते चलता है किंतु तिथियों एवं मास के लिये चंद्र गति पर ही निर्भर होता है, पूर्णिमा के दिन चंद्र नक्षत्र से मास का नाम होता है।
इस कारण आप पायेंगे कि अंतर्राष्ट्रीय कैलेण्डर के अनुसार अधिकतर पर्वों का दिनांक निश्चित नहीं होता किंतु चंद्र मास, पक्ष एवं तिथि निश्चित होते हैं। 
वस्तुत: चंद्र तिथि मास के अनुसार हम मूलत: सौर गति से उत्पन्न ऋतु आधारित पर्व ही मनाते हैं। पर्व को पोर, सरकण्डे की गाँठ से समझिये, एक निश्चित बिंदु। 
अब ऊपर लिखा पढ़िये तो! दो महत्त्वपूर्ण सौर बिंदुओं विषुव के निकट सम ऋतु में दोनों नवरात्र पड़ते हैं। 
ऐसा नहीं है कि पूर्णत: सौर पर्व उत्तर में नहीं मनाये जाते। संक्रांतियाँ वही तो हैं! एक समय ऐसा था शीत अयनांत एवं वसंत विषुव के बिंदु परवर्ती काल में अपनाये गयी राशि पद्धति की क्रमश: मकर एवं मेष से सम्पाती थे। सापेक्ष सूर्य की लगभग 26000 वर्ष की एक अन्य गति के कारण यह सम्पात खिसकता रहा एवं अब 23/24 दिनों का अंतर आ गया है। जो जन पहले अयनांत एवं विषुव मनाया करते थे, अब सौर संक्रांति मनाते हैं जिसकी तिथि, मास स्थिर नहीं होते, सौर कैलेण्डर का दिनाङ्क स्थिर होता है – 14/15 जनवरी (मकर संक्रांति) एवं 13/14 अप्रैल। 
14 अप्रैल को उत्तर में वैशाखी होती है – मेष संक्रांति, कतिपय पूरबी भागों में नया संवत्सर आरम्भ होता है तो दक्षिण में तमिळ नववर्ष –पूर्णत: सौर। वैशाखी नाम से स्पष्ट है कि पर्व का नाम चंद्र मास पर ही है। उस मास पूर्णिमा को चंद्र विशाखा नक्षत्र पर होता है। 

ऐसे समझिये कि सूर्य तो वर्ष भर एक समान गोला ही दिखता है, जबकि चंद्रमा कलायें दर्शाता है, वह भी दो पक्षों में। इस कारण चंद्रमा ने आकाश में उस कैलेण्डर की भाँति दिन बताने का काम किया जो भीत पर टँगा कैलेण्डर आज कल करता है। 


14 अप्रैल को ही भोजपुरी क्षेत्र में हर वर्ष पड़ता है – सतुआन (सतुवान, सतुवानि) पर्व, पूर्णत: सौर। सतुवा अर्थात रबी के उबले, सुखाये, भुने, पिसे विविध अन्न। आप के यहाँ कौन सा पर्व पड़ता है?


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कल सूर्योदय अवश्य देखें तथा उनकी स्थिति किसी दूरवर्ती स्थायी वस्तु, संरचना इत्यादि के सापेक्ष मन में बिठा लें। वह आप को वर्ष भर वास्तविक पूरब की दिशा बताती रहेगी। उसके सापेक्ष वर्ष भर सूरज की उत्तरी दक्षिणी यात्रा का पञ्चाङ्ग तथा कैलेण्डर देखते हुये प्रेक्षण कर सकते हैं।



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अन्य रोचक लेख:
  1. नक्षत्र पहचानें - युगादि अवसर चैत्र चन्द्र सङ्ग Nakshatra Moon Chaitra Yugadi

बुधवार, 14 मार्च 2018

महाभारत शांतिपर्व - 1 Mahabharat Shanti Parv - 1

महाभारत शांतिपर्व
Mahabharat Shanti Parv
युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो गया। श्रीकृष्ण ने वह रात अर्जुन के महल में व्यतीत की। प्रात:काल युधिष्ठिर मिलने गये तो उन्हें ध्यान में निश्चल दृढ़निश्चय पाया - काठ एवं शिला की भाँति: 
स्थाणुकुड्यशिलाभूतो निरीहश्चासि माधव
9मानो निर्वात में कोई दीपशिखा हो!
यथा दीपो निवातस्थो निरिङ्गो ज्वलतेऽच्युत
तथासि भगवन्देव निश्चलो दृढनिश्चयः
पूछने पर भगवान ने उत्तर दिया कि शर शय्या पर इस समय भीष्म मेरा ध्यान कर रहे हैं, अत: मेरा मन उनमें लगा हुआ है: 
शरतल्पगतो भीष्मः शाम्यन्निव हुताशनः
मां ध्याति पुरुषव्याघ्रस्ततो मे तद्गतं मनः

वे मेरी शरण में हैं अत: मेरा मन उनमें है। वे गङ्गा पुत्र वसिष्ठ ऋषि के शिष्य हैं - वसिष्ठशिष्यं तं। वे समस्त अ‍ङ्गों सहित चारो वेदों को धारण करते हैं - साङ्गांश्च चतुरो वेदांस्तमस्मि मनसा गतः। 
वे जामदग्नेय राम के प्रिय शिष्य -रामस्य दयितं शिष्यं जामदग्न्यस्य - त्रिकालदर्शी हैं। 
उन धर्मविद का मैं मन ही मन चिन्‍तन कर रहा था - वेत्ति धर्मभृतां श्रेष्ठस्ततो मे तद्गतं मनः। उनके अवसान से धरा उसी प्रकार सूनी हो जायेगी जैसे चंद्रमा से हीन अमा की रात होती है - भविष्यति मही पार्थ नष्टचन्द्रेव शर्वरी। 
आप चल कर उनसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से सम्बंधित विद्याओं; 
होता, उद्गाता, अध्वर्यु एवं उद्गाता से सम्बंधित यज्ञ कर्मों
एवं 
चार वर्णों के धर्म के बारे में ज्ञान प्राप्त कीजिये। 
कौरवों के धुरन्‍धर भीष्म के अस्त से ज्ञान शास्त्रादि अल्प रह जायेंगे, नष्ट हो जायेंगे। इस कारण ही मैं आप को उनके पास जा कर प्रेरक ज्ञान प्राप्त करने को कह रहा हूँ। 
चातुर्वेद्यं चातुर्होत्रं चातुराश्रम्यमेव च
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मं च पृच्छैनं पृथिवीपते
तस्मिन्नस्तमिते भीष्मे कौरवाणां धुरंधरे
ज्ञानान्यल्पीभविष्यन्ति तस्मात्त्वां चोदयाम्यहम्

युधिष्ठिर ने कहा कि मैं चाहता हूँ आप, स्वयं भगवान, मुझे उनके पास ले चलें ताकि आसन्नमृत्यु पितामह एक बार आप का दर्शन भी कर सकें। 
श्रीकृष्ण ने सात्यकि से व्यवस्था करने को कहा। सात्यकि ने सारथी दारुक द्वारा रथ सज्जित करवा दिया। 
(क्र्मश:)