उत्तर मध्य रेलवे ने पहली बार महिला पोर्टरों की भर्ती की है। 4800 अभ्यर्थियों के बीच हुई प्रतियोगिता में बिना किसी आरक्षण के अंचितपुर जिला फतेहपुर की निवासी ऊषा ने भी सफलता प्राप्त की। उन्हें बिल्ला नं 70 दिया जाएगा। उनके अतिरिक्त एक और महिला निर्मला ने भी सफलता प्राप्त की।
प्रतियोगिता में उन्हें पुरुषों की तरह ही 25 किलो वज़न को सिर पर रख 200 मीटर तक ले जाना था। उनके लिए समय सीमा थी 4 मिनट जब कि पुरुषों के लिए 3 मिनट। इसके अतिरिक्त इन दोनों ने मानसिक परीक्षण में भी सफलता प्राप्त की।
ग़रीब ऊषा ने यह कदम बच्चों की अच्छी शिक्षा दीक्षा के लिए उठाया है जब कि वह स्वयं आठवीं तक ही पढ़ी हैं।
_________________
चलते चलते :
नैनी क्षेत्र में इन्द्र देव को प्रसन्न करने के लिए सूखी धरती पर महिलाओं ने खुद जुत कर हल चलाए।
(समाचार और चित्र आभार: इंडियन एक्सप्रेस)
शुक्रवार, 25 जून 2010
शनिवार, 19 जून 2010
रोज रोज की
हमारे क्युबिकल्स के बीच एक मौन खिंचा है। कीबोर्ड की किटकिटाहटें, ग्राहकों से की गई बातें और इंटरकॉम की सौम्य कुनमुनाहटें रूटीन हैं, 'मौन' में शामिल हैं। कितनी बार लगा कि मैं चुप तुमसे कुछ कह जाता हूँ। कितनी बार अनुभव हुआ कि तुमने मुझे सुना है। कितनी बार लगा कि मॉनिटर को बेध तुम्हारी दृष्टि मेरा एक्स रे बिम्ब सोख रही है !पर नज़र मिलते ही वही चिर परिचित औपचारिक मुद्रा और रुक्षता हमें धारण कर कह उठते हैं," यू सी ! बड़ा प्रेसर है। मुझे तो यही कहना है तुम्हारी वज़ह से टार्गेट पूरे नहीं हुए।" हममें होड़ है - कौन इसे पहले कह जाता है। क्या इससे कुछ अन्तर पड़ता है?
उस आबनूसी किवाड़ के पीछे का मौन हमारी होड़ की रत्ती भर परवा नहीं करता। "यू बोथ आर यूजलेश ! इन फैक्ट यू आल आर यूजलेश!!" और हम बिना कुछ कहे यूँ ही बाहर आ जाते हैं। होड़ अपने हाड़ का इलाज़ कराने भाग जाती है - कल फिर आने के लिए। बाहर आते ही मुझे लगता है कि ऑफिस एअर कंडीशण्ड है और गरदन से चिपके तुम्हारे केश लहलहा उठने को पसीना झिटक रहे होते हैं। खुलता है थोड़ा सा, बारीक सा तुम्हारा मौन ! एक कंजूस मुस्कान । परफ्यूम स्वेद गन्ध से मिल कुछ अधिक तीखी हो जाती है और मैं सोच उठता हूँ कि ऑफिस ब्वाय रोज नहीं नहाता !
डोर क्लोजर की चीं चीं को गलियारे में ढकेल नींबू पानी के दो गिलास आते हैं और देखता हूँ कि तुम्हारी आँखों के नीचे काले घेरे बढ़ने लगे हैं। नींबू पानी पी कर बाथ रूम । बाहर आते ही काले घेरे ग़ायब। छि: ऐसे भी कोई फॉलो करता है ? ऑफिस ब्वाय की नज़र मेरी नज़र को पकड़ कुछ सन्देशा ले उसके होठों पर आती है और वह दाँत निपोर देता है - साब ! कॉफी पियेंगे ? मैडम आप ?
"नो" । उसकी खिसियाहट देख मैं मुस्कुरा देता हूँ - कंजूस !
ऊब को उछाल तुम घड़ी को देखती हो। नज़रें बीते घंटों और आने वाले घंटों की सीधी उल्टी गिनती दिमाग को सौंप सुस्ताने को सामने की कुर्सी पर चिपकती हैं। वहाँ एक आगंतुक आ बैठा है। अचानक तुम्हारा सारा वज़ूद लहलहा उठता है और मुझे वेनिशन ब्लाइण्ड के पार लटक आई लता पर बैठा गिरगिट दिख जाता है। एक बेहूदा सा सवाल,"नर कि मादा?" तुम्हारी शुद्ध, प्रोफेशनल अंग्रेजी अपने पूरे शबाब पर है और आगंतुक आतंकित होने के कगार पर है कि ओठलाली पुते होठों से निकलता है,"भाई साहब ! यह नहीं हो सकता। सॉरी।" कंजूस मुस्कान। धक्के से उबरने की कोशिश करता भी वह निहाल हो उठ जाता है। नहीं कहने के तरीके और ज़गहों पर जुबान से कुछ अधिक ही होते हैं।
चुप सा वह कुर्सी खींच मेरे पास खिसक आता है और अब अंग्रेजी बोलने की मेरी बारी है। मेरा मोबाइल बजता है। मैं जोर जोर से खोखली बातें शुरू कर देता हूँ जैसे सामने आदमी नहीं हवा का पुतला बैठा हो जो नज़र ही नहीं आ रहा लेकिन उसे मुझे अपने आप को दिखाना है, बताना है कि सामने कुर्सी खाली नहीं है।
"हाउ कैन यू कैल्कुलेट विदाउट अपडेटिंग सी ए जी आर?" सी ए जी आर तेज बोलता हूँ , रुकता हूँ - सामने वाले पर क्या प्रभाव पड़ा ? वह बंडल से निकल प्रिंटर में घुसते ए फोर पेपर जैसा कोरा है - दोनों तरफ । जी में आता है पीछे जा कर एक लात लगाऊँ - तुम्हें अभी तक पसीना क्यों नहीं आया, यू थिक स्किंड रास्कल !
"...आर यू सेन ? व्हाइ आर यू शाउटिंग?" दूसरी तरफ मोबाइल पर जी एम है। मेरी पेशानी पर चुहचुहाअट खुजली करने लगती है। तुम्हारी कनखियाँ मुस्कुरा रही हैं। आगंतुक मेरी उड़ गई रंगत को देख उठ खड़ा होता है। आज काम नहीं होगा। कत्तई नहीं। हरगिज नहीं।
मुझसे ऐसी चूक हुई कैसे ?
मैंने अपनी समझ तुम्हारे क्युबिकल में गिरवी रख छोड़ी है। तुमसे कभी कुछ उधार लिया था क्या? तुम्हारा इंटरकॉम कुनमुना उठता है। हड़बड़ा कर तुम उठती हो। आबनूसी किवाड़ में तुम्हारे धसने से बने खालीपन को चीरती एक आवाज़ मेरे सिर पर धौल जमा जाती है," तुम्हें सुनाई नहीं दिया ? निमंत्रण पत्र प्रेषित करूँ क्या?" डोर स्टॉपर लगा दिया क्या? हे हे हे , ही ही ही
जुगलबन्दी हँसी - फँसा कि फँसी ?
जुगलबन्दी हँसी - फँसा कि फँसी ?
निमंत्रण पत्र ??
प्रेषित???
मेरा इंटरकॉम बजा क्यों नहीं? आबनूसी रंग का औज़ार । तेजी से उठने के बहाने पटक देता हूँ। फर्श पर टुकड़े नाच रहे हैं - चिप, स्प्रिंग, की बोर्ड...। एक क्षण के लिए किसी एनीमेशन फिल्म के दृश्य आँखों में घुस आते हैं। उफ, ज़िन्दगी निर्जीव चीज़ों की !
प्रेषित???
मेरा इंटरकॉम बजा क्यों नहीं? आबनूसी रंग का औज़ार । तेजी से उठने के बहाने पटक देता हूँ। फर्श पर टुकड़े नाच रहे हैं - चिप, स्प्रिंग, की बोर्ड...। एक क्षण के लिए किसी एनीमेशन फिल्म के दृश्य आँखों में घुस आते हैं। उफ, ज़िन्दगी निर्जीव चीज़ों की !
" यू आर लेट डियर! रोज़ा ने मुझे सब समझा दिया है। यू नो , हमें कस्टमर्स से इंटीमेसी डेवलप करनी होगी। उनसे हिन्दी में बात किया करो। आइ थिंक यू हैव अंडरस्टुड ?"
"धड़ाम !" चैम्बर की किवाड़ में तो हाइड्रॉलिक क्लोजर लगा है। फिर यह आवाज़ ?
"रामसिंघ ! क्लोजर चेक करो। गेट इट रिपेयर्ड ऑर चेन्ज्ड ।"
" साब! वह तो ठीक है।" तुम फिर मुस्कुरा रही हो। शायद कुछ गुनगुना भी रही हो।
" तो ये क्युबिकल्स के बीच का काँच हटा कर बोर्ड लगवा दो। आर पार कुछ भी नहीं दिखना चाहिए।"
"जी। पेमेंट तो हो जाएगा न ?"
"अबे! फोकट में काम करता है क्या ?" हिन्दी। इनफॉर्मल ? नहीं । रस्टिक हिन्दी।
ऑफिस ब्वाय को न बुला कर खुद फर्श पर बिखरे इंटरकॉम को डस्टबिन में डालता हूँ। मुझे काँच सरकता नज़र आता है। तुम्हारे चेहरे पर हवाइयाँ क्यों उड़ रही हैं ? आबनूसी किवाड़ बन्द है लेकिन भीतर से भेदती आँखें मैं महसूस कर रहा हूँ। भीतर कोई ज़ोर ज़ोर से मुस्कुरा रहा है।
शब्दचिह्न :
कहानी
शुक्रवार, 18 जून 2010
गुजरात में एक क्रांतिकारी कदम
गुजरात में इस वर्ष निगम के 6 वार्डों के चुनावों में ई-मतदान का देश में पहली बार प्रयोग होगा। GSWAN (गुजरात राज्य वाइड एरिया नेटवर्क) के द्वारा यह सम्पन्न की जाएगी। लोग घर बैठे अपने कम्प्यूटर और अंतर्जाल के उपयोग से अपना मत दे सकेंगे। आलसियों, बुद्धिजीवियों, एलीट वर्ग और तंत्र से खुन्नाए वे सभी लोग जो बहाने ढूँढ़ ढूँढ़ कर मत नहीं देने जाते, सम्भवत: अब सक्रिय होंगे और मत के अधिकार का प्रयोग करेंगे।
यह मतदान को अनिवार्य बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा। साथ ही मतदान की प्रक्रिया केवल एक दिन की जगह कई दिनों तक जारी रखने की सम्भावना अब बन सकती है।
इसके लिए निम्न प्रक्रिया होगी:
(1) पंजीयन कराना होगा। पंजियन के समय अपने कम्प्यूटर का आइ पी पता देना होगा।
(2) वोटर के मतदान के समय अपने क्षेत्र में रहना होगा। वह अन्यत्र से मत नहीं देना सकेगा।
(3) ई-मतदाता को दो पासवर्ड दिए जाएँगे। पहले पासवर्ड से वह डिजिटल बैलट पेपर प्राप्त करेगा।
(4) पहचान सुनिश्चित करने के लिए उसके मोबाइल पर काल आएगी।
(5) पहचान सुनिश्चित होने के बाद दूसरे पासवर्ड के प्रयोग द्वारा वह मतदान कर सकेगा।
एक बार इस प्रक्रिया का परीक्षण हो जाने के बाद निम्न सम्भावनाएँ बनती हैं:
(1) टेलीफोन द्वारा मतदान
(2) एटीम द्वारा मतदान
(3) बैंक खाते के उपयोग द्वारा मतदान
...
...
मेरे विचार से टेक सैवी युवा पीढ़ी भी अब मतदान में अधिकाधिक रूप से भाग लेगी। अनंत सम्भावनाएँ हैं। लोकतंत्र के नाम पर एक बहुत बड़े षड़यंत्र, जिसमें हमेशा अल्पमत वाले सत्ता के दलाल ही शासन करते हैं , के विखंडित होने की सम्भावना भी अब दिखने लगी है। मुझे प्रसन्नता है कि अच्छी सोच वाले लोग इस बार विचार को क्रिया रूप में लाने में सफल रहे हैं।
इस सम्बन्ध में मैंने उल्टी बानी नाम से एक लेखमाला लिखी थी जिसका उद्धरण यहाँ देना मुझे प्रासंगिक लग रहा है।
मेरी शुभकामनाएँ। आप लोग क्या कहते हैं? अपने विचार बताइए।
सोमवार, 14 जून 2010
इंडीब्लॉगर पर प्रतियोगिता में भाग लें और मुझे वोट दें
इंडी ब्लॉगर http://www.indiblogger.in/ पर आज कल
Jiyo Life Moments Blogger Contest
चल रहा है। सभी भाषाओं के लिए खुला है। आप अपने ब्लॉग की पोस्टों को वहाँ प्रतियोगिता के लिए रजिस्टर कर सकते हैं। लेख/कविता विषय से जुड़ा होना चाहिए।
अबकी यह प्रतियोगिता किसी हिन्दी ब्लॉग को ही जीतनी चाहिए आखिर शीर्षक में पहला शब्द ही हिन्दी से है : 'जियो'- भले रोमन में लिखा है।
हिन्दी के बिना अब लोगों का काम नहीं चलने वाला !
हिन्दी के बिना अब लोगों का काम नहीं चलने वाला !
माबदौलत ने 4 लेख/कविताएँ रजिस्टर की हैं। लेकिन राग यमन को सुनते हुए अब तक हिन्दी ब्लॉगों में टॉप पर है। सो इसे ही वोट देकर आगे बढ़ाइए या अपनी ब्लॉग पोस्टों को रजिस्टर कर स्वयम् प्रतियोगिता में कूद जाइए लेकिन मुझे वोट देना न भूलिएगा। एक बात और आप अपनी पोस्ट को वोट नहीं दे सकते :)
बाकी तीन लेख/कविताएँ हैं:
रात साढ़े तीन बजे
शुभा मुद्गल और आबिदा परवीन को सुनते हुए
और मेरी व्यक्तिगत पसन्द
टुकड़ा टुकड़ा दुपहर
बाकी तीन लेख/कविताएँ हैं:
रात साढ़े तीन बजे
शुभा मुद्गल और आबिदा परवीन को सुनते हुए
और मेरी व्यक्तिगत पसन्द
टुकड़ा टुकड़ा दुपहर
[ पोस्ट शीर्षक पर क्लिक करने से आप इंडीब्लॉगर के सम्बन्धित पृष्ठ पर पहुँच जाएँगे, जहाँ रजिस्टर करने के बाद आप अपना मत दे सकते हैं। मेरा निवेदन है कि चारो पर अपना मत दें।]
तो मैदान में आइए और हिन्दी की शक्ति दिखाइए।
ब्लॉगवाणी के पसन्दी नापसन्दी वीरों! औकात दिखाने का समय आ गया है। मत चूको चौहान !
प्रविष्टि की अंतिम तिथि है 8 जुलाई और प्रतियोगिता 10 जुलाई तक चलेगी।
शब्दचिह्न :
इण्डीब्लॉगर
शुक्रवार, 11 जून 2010
लंठ महाचर्चा : बाउ और नेबुआ के झाँखी - 1
समय:ब्रिटिश काल परम्परा: श्रौत
(अ)
कुआर का अँजोर । पितरपख बीत चुका था। भितऊ बैठके में चौकी बिछी थी। पँचलकड़ियों से बनी चौकी पर ऐसे मौकों पर ही निकाले जाने वाले तोषक, मसनद, बनारस की धराऊ चादर और उनके उपर विराजमान थे शास्त्र, तंत्र, मंत्र सर्वज्ञाता खदेरन पंडित। पत्रा और एक लाल बस्ते में रखे भोजपत्र के टुकड़े खुले थे। पंडित तल्लीन थे। उनकी चुप्पी माहौल में फैले तनाव को और गम्भीर बना रही थी।
कोई खास उमस न थी लेकिन सग्गर बाबू धीरे धीरे उनके उपर बेना झल रहे थे जिसमें आदर प्रदर्शन का भाव अधिक था। उनके बाप ,रामसनेही, पंडित जी के सामने नीची और छोटी चौकी पर बैठे जनेऊ से कभी पीठ खुजाते तो कभी सग्गर बाबू को इशारा करते।
जुग्गुल की तैनाती नीम के नीचे थी। कोई ऐसा वैसा छूत छात वाला मनई न आ जाय! घर के भीतर सग्गर की महतारी आड़ किए लतमरुआ पर बैठी थीं। हाथ में लकड़ी लिए लँगड़ी पिल्ली को डराए हुए थीं जो बार बार खिरकी के रस्ते दुआर की ओर जाने की कोशिश में थी।
खदेरन पंडित बड़े जोगियाह थे। सिले कपड़े नहीं पहनते थे और ऐसे मौकों पर अस्पृश्य की ओर दृष्टि पड़ जाने पर तुरंत काम बन्द कर स्नान करने चल देते थे। रमल, लाल किताब, रोमक और जाने कितने टोटके उनके बाएँ हाथ के खेल थे और सनकें मशहूर थीं।
कोई खास उमस न थी लेकिन सग्गर बाबू धीरे धीरे उनके उपर बेना झल रहे थे जिसमें आदर प्रदर्शन का भाव अधिक था। उनके बाप ,रामसनेही, पंडित जी के सामने नीची और छोटी चौकी पर बैठे जनेऊ से कभी पीठ खुजाते तो कभी सग्गर बाबू को इशारा करते।
जुग्गुल की तैनाती नीम के नीचे थी। कोई ऐसा वैसा छूत छात वाला मनई न आ जाय! घर के भीतर सग्गर की महतारी आड़ किए लतमरुआ पर बैठी थीं। हाथ में लकड़ी लिए लँगड़ी पिल्ली को डराए हुए थीं जो बार बार खिरकी के रस्ते दुआर की ओर जाने की कोशिश में थी।
खदेरन पंडित बड़े जोगियाह थे। सिले कपड़े नहीं पहनते थे और ऐसे मौकों पर अस्पृश्य की ओर दृष्टि पड़ जाने पर तुरंत काम बन्द कर स्नान करने चल देते थे। रमल, लाल किताब, रोमक और जाने कितने टोटके उनके बाएँ हाथ के खेल थे और सनकें मशहूर थीं।
उनके आने का कारण एक दिन पहले की घटना थी । जंत्री सिंघ बरदेखाई के लिए सुबह सुबह निकले ही थे कि सग्गर सामने पड़ गए।
"धुर बहानचो ! कौनो सुभ कार करे निकल त ई निस्संतानी जरूर समने परि जाला।" "धुत्त बहनचो! कोई शुभ काम करने निकलो तो यह नि:संतानी जरूर सामने पड़ जाता है।"
"धुर बहानचो ! कौनो सुभ कार करे निकल त ई निस्संतानी जरूर समने परि जाला।" "धुत्त बहनचो! कोई शुभ काम करने निकलो तो यह नि:संतानी जरूर सामने पड़ जाता है।"
जंत्री सिंघ ने जाना टाल दिया और घर के भीतर से जवान सोनमतिया की महतारी सग्गर को कोसने लगी। अठारह बरस से निस्संतानी सग्गर के लिए यह सब सुनना आम हो चला था लेकिन सोनमतिया पट्टीदारी की ही सही उनकी प्यारी भतीजी थी।
उसका विवाह खोजा जा रहा था और उन्हें खबर ही नही !
उनके सामने पड़ जाने से निकलना तक टाल दिया जा रहा है !!
दोहरे धक्के ने कुछ अधिक ही हिला दिया। खटवासि ले पड़ गए तो दिन भर कुछ नहीं खाए। संझा के बेरा आँख लग गई जो महतारी की फजिहत से खुली,
"ए बेरा सुत्तता। लछमी का अइहें। जाने कौन बाँझ कुलछनी घर में आइल कि एकर सगरी बुद्धी हरि लेहलसि। नाती नतकुर नाही होइहें। निरबंसे होई।" "इस समय सो रहा है। धन सम्पदा क्या आएगी? जाने कौन कुलक्षणा घर में आई कि इसकी सारी बुद्धि ही हर ली। नाती पोते नहीं होंगे, वंश डूब जाएगा।"
उसका विवाह खोजा जा रहा था और उन्हें खबर ही नही !
उनके सामने पड़ जाने से निकलना तक टाल दिया जा रहा है !!
दोहरे धक्के ने कुछ अधिक ही हिला दिया। खटवासि ले पड़ गए तो दिन भर कुछ नहीं खाए। संझा के बेरा आँख लग गई जो महतारी की फजिहत से खुली,
"ए बेरा सुत्तता। लछमी का अइहें। जाने कौन बाँझ कुलछनी घर में आइल कि एकर सगरी बुद्धी हरि लेहलसि। नाती नतकुर नाही होइहें। निरबंसे होई।" "इस समय सो रहा है। धन सम्पदा क्या आएगी? जाने कौन कुलक्षणा घर में आई कि इसकी सारी बुद्धि ही हर ली। नाती पोते नहीं होंगे, वंश डूब जाएगा।"
प्राणप्यारी सोझवा पत्नी के लिए ऐसी भाखा सुन सग्गर तमतमा उठे। पहाड़ की तरह उन्हों ने पिछले पन्द्रह वर्षों से दूसरे विवाह के दबावों को झेला था - बिना टसके मसके। लेकिन आज जाने क्या हुआ था, अमर्ष ?... संझा के बेरा फूट फूट कर रो पड़े थे। बाप ने सुना और वज्र निर्णय लिया।
(आ)
महामहोपाध्याय चण्डीदत्त शुक्ल। गाँव की भाखा में महोधिया चंडी पंडित। गोरख पीठ, काशी और उज्जैन से शिक्षा दीक्षा। भृगु संहिता, रावण संहिता, ज्योतिष और साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान। मलेच्छ भाषा पर भी अधिकार लेकिन वाणी दोष की आशंका के कारण बोलने से बचते थे। महोधिया उपाधि उनकी शोहरत और अंग्रेज बहादुर को भूमि शोधन कर मदद करने से मिली थी। घोड़े पर चलते थे और यजमानों के यहाँ उनके लिए छ्त्र, चँवर अनिवार्य थे।
ऐसे चंडीदत्त के खानदान के थे भ्रष्ट विद्या आचार्य श्मशान साधक खदेरन पंडित। शव साधना, लाल किताब और ऐसे ही जाने कितनी गुप्त विद्याओं के अध्ययन साधन ने उन्हें गाँव का पतित बना दिया था। एक दिन तो हद ही हो गई जब तेलिया मसान की हड्डी लिए घूमते अघोरी को उन्हों ने भोजन करा दिया।
उग्रधर्मा वयोवृद्ध महोधिया ने निर्णय लिया और बाकी घरानों के साथ खदेरन का खान पान बन्द हो गया। जजमानी टूट गई जिसमें सग्गर का खानदान भी था।
लेकिन खदेरन तो खदेरन थे। बचपन से ही आक्रोश को अग्नि की तरह धारण किए थे। अपने को सच्चा अग्निहोत्री बताते वह अपनी साधना में लगे रहे - एकमात्र उनका ही घर था जिसमें अग्निशाला कभी ठंडी नहीं पड़ी थी। उनकी दृष्टि में चंडी चाचा भ्रष्ट और मलेच्छतुल्य थे और वह खुद खेतिहर अग्निहोत्री ब्राह्मण। जिस ब्राह्मण के घर अग्निहोत्र न हो वह कैसा ब्राह्मण ?
ऐसे चंडीदत्त के खानदान के थे भ्रष्ट विद्या आचार्य श्मशान साधक खदेरन पंडित। शव साधना, लाल किताब और ऐसे ही जाने कितनी गुप्त विद्याओं के अध्ययन साधन ने उन्हें गाँव का पतित बना दिया था। एक दिन तो हद ही हो गई जब तेलिया मसान की हड्डी लिए घूमते अघोरी को उन्हों ने भोजन करा दिया।
उग्रधर्मा वयोवृद्ध महोधिया ने निर्णय लिया और बाकी घरानों के साथ खदेरन का खान पान बन्द हो गया। जजमानी टूट गई जिसमें सग्गर का खानदान भी था।
लेकिन खदेरन तो खदेरन थे। बचपन से ही आक्रोश को अग्नि की तरह धारण किए थे। अपने को सच्चा अग्निहोत्री बताते वह अपनी साधना में लगे रहे - एकमात्र उनका ही घर था जिसमें अग्निशाला कभी ठंडी नहीं पड़ी थी। उनकी दृष्टि में चंडी चाचा भ्रष्ट और मलेच्छतुल्य थे और वह खुद खेतिहर अग्निहोत्री ब्राह्मण। जिस ब्राह्मण के घर अग्निहोत्र न हो वह कैसा ब्राह्मण ?
ऐसे पंडित का खदेरन नाम कैसे पड़ा ?
(इ)
" कुलटा ! निकल घर में से। हमरे बीज से चरि चरि गो भवानी होइहें?""कुलटा ! घर में से बाहर निकलो। मेरे वीर्य से चार चार लड़कियाँ होंगी?" रात का समय। चतुर्भुज पंडित अपनी घरैतिन को घसीटते घर में से निकाल रहे थे। माँ बाप की रोज रोज की चख चख की अभ्यस्त हो चली चार भवानियाँ सहमी सी दुबकी हुई थीं और मतवा पति से निहोरा कर रही थी,
"राति के बेरा कहाँ जाईं? बिहाने अपने लइकनिन के ले के पोखरा में कूदि जाइब। रउरे मुकुत हो जाइब लेकिन ए बेरा छोड़ि देईं।" "रात के समय कहाँ जाऊँ? सबेरे अपनी बेटियों के साथ पोखरे में कूद जाऊँगी। आप मुक्त हो जाएँगे लेकिन इस समय रहने दीजिए।" घर से बाहर अकेली स्त्री का रात बिताना! लोकापवाद की आशंका ने मतवा को निरीह बना दिया था। पति के पैर पकड़ धाड़े मार रो रही थीं लेकिन चतुर्भुज के मन में वही चोर था जिसका मतवा को डर था। घसीटते हुए घर से बाहर ला एक लात जमाया और चाँचर बन्द कर दिया। चारो भवानियाँ चीख चीख रोने लगीं लेकिन पंडित टोले के किसी घर से कोई बाहर नहीं निकला।
रात कुछ अधिक ही काली हो चली थी। रोती बिलखती मतवा बबुआने पहुँच गई, सीधे भिक्खन के महतारी के पास।
गाँव भर की काकी भुनभुनाई,
" कठमरद चतुर्भुजवा। अरे ! औलाद औलाद होले। हमार बोक्का बा तब्बो मालिक कब्बो कुच्छू नाहीं कहलें।""कठमर्द चतुर्भुज। अरे! औलाद औलाद होती है। मेरी औलाद तो मन्दबुद्धि है लेकिन मेरे स्वामी ने तो कभी कुछ नहीं कहा !"
"ए भिखना ! लुकारा धराउ।" "भिक्खन! मशाल जलाओ!" काकी ने अपने मन्दबुद्धि जवान बेटे को जगाते हुए आदेश दिया।
पोरसा भर लम्बा पहाड़ सा शरीर लिए भिखना मातृ आदेश के पालन हेतु तत्पर हुआ। पति को माजरा बता-समझा कर भिखना और मतवा के साथ काकी चतुर्भुज की अक्ल दुरुस्त करने चल दी।
" ए पंडित ! इ कौनो कायदा हे ? मेहरारू के राति के घर से निकाल देहल ह।" "ऐ पंडित ! ये कोई तरीका है ? अपनी स्त्री को रात में घर से बाहर निकाल दिए ?"
" काकी हो, तू बिच्चे में न पर sss" "काकी! तुम बीच में न पड़ो" "
"काकी परिहें बिच्चे में पंडित ! पयलग्गी करिहें लेकिन बइयो झरिहें। भिखना के देखतल कि नाहीं ? अब्बे इशारा करब। बम्मड़ मनई, तोहार पहँटा लगावत देरि नाइ लागी।" "काकी तो बीच में पड़ेगी पंडित! प्रणाम करेगी लेकिन तुम्हारी अक्ल भी दुरुस्त करेगी। भिक्खन को देख रहे हो न ? अभी इशारा करूँगी। मन्दबुद्धि जवान है, तुम्हारी ऐसी तैसी करते देर नहीं लगेगी।"
चतुर्भुज ने साँड़ सरीखे भिक्खन को लुकारा लिए देखा तो पुत्र की कामना बिला गई। काकी का यह पुत्र काकी को भले नरक से न तार पाए लेकिन चतुर्भुज जैसों को एक इशारे पर नरक में झोंक सकता था।
धमकी काम कर गई। मतवा को गृहप्रवेश मिला और चतुर्भुज को भविष्य में फिर कभी ऐसा न करने की चेतावनी।
लेकिन मतवा का दु:ख और बढ़ गया। पुत्र प्राप्ति हेतु घर और घरैतिन में तारतम्य न होने का कारण बताते हुए महामहोपाध्याय चण्डीदत्त शुक्ल ने व्यवस्था दी,
"चतुर्भुज की स्त्री घर से, ग्राम सीमा से बाहर रहेगी। उत्तरायण सूर्य के रहते हुए पति पत्नी शास्त्रोक्त ऋतुकाल सम्बन्धी मर्यादाओं का पालन करते हुए समागम करेंगे। यदि वर्षांत में भी गर्भ नहीं ठहरा तो चतुर्भुज दूसरे विवाह के लिए स्वतंत्र होंगे।"
चण्डी के मन में चोर था। चतुर्भुज का दूसरा विवाह वह अपने रिश्ते में कराना चाहते थे। उन्हें डर था कि चार चार पुत्रियों को जन्म देने वाली स्त्री पुत्र को भी जन्म दे सकती है। यदि पति पत्नी में अलगाव डाल दिया जाय तो बात बन सकती थी। उन्हों ने तदनुकूल व्यवस्था दी। मतवा गाँव के बाहर 'खदेरा गई'।
नियति के आगे किसी का बस नहीं चलता भले वह महामहोपाध्याय ही क्यों न हो!
काकी ने यह सुना तो मन ही मन चंडी को खूब कोसा। उस रात बिन बुलाए काकी चतुर्भुज के यहाँ गई। भिक्खन दुआरे चतुर्भुज को बिठाए रहा। भीतर काकी मतवा को भूले पाठ याद कराती रही। सोहागिन नारी का कर्तव्य है कि अपना आकर्षण बनाए रखे।
उस साल सूर्य के उत्तरायण रहते, बस तीन महीने तक भिक्खन रात का सूरज बन चतुर्भुज के दरवाजे आता रहा। मन्दमति की नींद कच्ची थी। मारे डर के चतुर्भुज चुपचाप गाँव के बाहर अपनी निष्कासित पत्नी की झोपड़ी में जाते रहे और रात बिता सुबह घर वापस आते रहे।
इस तरह की अनूठी रखवाली शायद पहले कभी नहीं हुई थी। ..
मतवा गर्भवती हुईं और...
... पुत्र ने जन्म लिया। चंडी के चेहरे पर कालिमा पोतते आह्लादित चतुर्भुज काकी के यहाँ पधारे और अद्भुत बात हुई।
नामकरण बिना किसी आडम्बर कर्मकांड के हो गया।
काकी ने खदेड़ी गई स्त्री के बेटे का नाम रखा "खदेरन"।
उन्हें नहीं पता था कि यह नाम माता के अपमान और पीड़ा की अग्नि को हमेशा हमेशा के लिए पुत्र के मनोमस्तिष्क में स्थापित कर देगा। बड़े होने पर भी खदेरन ने नाम नहीं बदला। यज्ञोपवीत के तुरंत बाद ही खदेरन ने अग्नि की स्थापना की थी। बचपन में न मंत्र आते थे और न कर्मकाण्ड लेकिन अग्नि हमेशा जीवित रही -उनके मन में भी और शाला में भी।
(ई)
अठ्ठारह वर्ष। पुत्र कामना कामना ही रही।
बन्ध्या धरती - खरपतवार तक न हो! सग्गर सिंघ के यहाँ कन्या तक का जन्म न हुआ।
पहले वयोवृद्ध चंडी शुक्ल कर्मकाण्ड कराते रहे फिर उनके बेटे भतीजे लेकिन विधाता की लेखनी पुन: स्याही में न डूबी। दबी जुबान से घरैतिन ने कई बार खदेरन पंडित का नाम लिया पर स्वामी की वर्जन दृष्टि के आगे बात बढ़ नहीं सकी।
लेकिन आज ?
... पुत्र की आँखों में आँसू और वंश न चलने के भय ने पिता को परम आदरणीय चण्डी पंडित की व्यवस्था का उल्लंघन करने को बाध्य कर दिया।
गाँव में सर्व बहिष्कृत और गाँव के बाहर सर्व पूजित खदेरन पंडित को बुलावा भेजने का वज्र निर्णय रामसनेही सिंघ ने लिया। जाति से बाहर किए जाने का खतरा कोई मायने नहीं रखता था तब जब कि वयस्क और परम स्नेही पुत्र को रोना पड़े।
(उ)
सूरज देव बाँस भर आकाश में चढ़ आए थे। खदेरन पंडित ने दृष्टि उठाई तो सब कुछ ठहर गया - सग्गर का बेना, रामसनेही का जनेऊ से खुजलाना, महतारी की लकड़ी, जुग्गुल की चहलकदमी, यहाँ तक कि लँगड़ी पिल्ली भी खिरकी में पटा गई।
हवा ठहर गई जैसे किसी चक्रवात की प्रतीक्षा हो !
खदेरन पंडित ने रुक्ष स्वर में आदेश सुनाया,
" सनातन धर्म के शास्त्रों में मुझे कोई समाधान नहीं दिखता। यजमान ! लोकविद्या, गुह्य विद्या और वामविद्या के समन्वय से राह मिलेगी। पोते का दर्शन आप को होगा ..."
खदेरन ने रुक कर वातावरण के तनाव में उमड़ते घुमड़ते स्वीकार को महसूस किया और पुन: जारी हुए,
" किसी भी रविवार के दिन सूर्य उगने के पहले पूरब दिशा की ओर सागर सिंह प्रस्थान करें। किसी से कुछ न कहें और न किसी की पुकार का उत्तर दें। गाँव की सीमा से बाहर आने पर पहली किरण का दर्शन होने के तुरंत बाद जिस किसी पहले पौधे को देख मन में स्वीकार भाव आए उसे अपने घर आने के लिए निमंत्रित करें, उसे सुरक्षित करें और वापस आ जाँय। अगले रविवार को उसे लाकर पति पत्नी दोनों घर के बाहर रास्ते के किनारे रोपित करें। तत्पश्चात दिन में ही समागम करें।
ईश्वर कृपा से पुत्र की प्राप्ति होगी लेकिन ..."
"... उस पुत्र से आगे की वंशावली उस पौधे के स्वभाव अनुरूप होगी। वंश तब तक चलेगा जब तक वृक्ष रहेगा। वृक्ष की हानि वंश का नाश कर देगी।
ईश्वर पर भरोसा रखें, सब शुभ होगा। मुझे दिख रहा है, यह वंश इतना बड़ा होगा कि रोज मनही भर नमक लगेगा।" कहते हुए खदेरन ने आसन छोड़ दिया।
चरण छूने को उद्यत हाथों को बरजते और दक्षिणा को घर भेजवा देने का इशारा करते लगभग भागते हुए रुखसत हुए।
नियति भी कैसे कैसे खेल खेलती है!
सग्गर सिंघ को अगले रविवार को गाँव से बाहर गोंयड़े के खेत की मेड़ पर जो पौधा पहली किरण के साथ मिला और स्वीकार्य भी लगा, वह था - 'नींबू'
रामसनेही सिंघ ने सिर पीट लिया - नीबू। काँटेदार झाड़ियाँ, फल अफरात लेकिन बला की खटास ! और नींबू के पेंड़ का जीवन ही कितना ?
मन में खदेरन पंडित की रुक्ष वाणी गूँज उठी, "... उस पुत्र से आगे की वंशावली उस पौधे के स्वभाव अनुरूप होगी। वंश तब तक चलेगा जब तक वृक्ष रहेगा। वृक्ष की हानि वंश का नाश कर देगी।" (अगला भाग)
हवा ठहर गई जैसे किसी चक्रवात की प्रतीक्षा हो !
खदेरन पंडित ने रुक्ष स्वर में आदेश सुनाया,
" सनातन धर्म के शास्त्रों में मुझे कोई समाधान नहीं दिखता। यजमान ! लोकविद्या, गुह्य विद्या और वामविद्या के समन्वय से राह मिलेगी। पोते का दर्शन आप को होगा ..."
खदेरन ने रुक कर वातावरण के तनाव में उमड़ते घुमड़ते स्वीकार को महसूस किया और पुन: जारी हुए,
" किसी भी रविवार के दिन सूर्य उगने के पहले पूरब दिशा की ओर सागर सिंह प्रस्थान करें। किसी से कुछ न कहें और न किसी की पुकार का उत्तर दें। गाँव की सीमा से बाहर आने पर पहली किरण का दर्शन होने के तुरंत बाद जिस किसी पहले पौधे को देख मन में स्वीकार भाव आए उसे अपने घर आने के लिए निमंत्रित करें, उसे सुरक्षित करें और वापस आ जाँय। अगले रविवार को उसे लाकर पति पत्नी दोनों घर के बाहर रास्ते के किनारे रोपित करें। तत्पश्चात दिन में ही समागम करें।
ईश्वर कृपा से पुत्र की प्राप्ति होगी लेकिन ..."
"... उस पुत्र से आगे की वंशावली उस पौधे के स्वभाव अनुरूप होगी। वंश तब तक चलेगा जब तक वृक्ष रहेगा। वृक्ष की हानि वंश का नाश कर देगी।
ईश्वर पर भरोसा रखें, सब शुभ होगा। मुझे दिख रहा है, यह वंश इतना बड़ा होगा कि रोज मनही भर नमक लगेगा।" कहते हुए खदेरन ने आसन छोड़ दिया।
चरण छूने को उद्यत हाथों को बरजते और दक्षिणा को घर भेजवा देने का इशारा करते लगभग भागते हुए रुखसत हुए।
नियति भी कैसे कैसे खेल खेलती है!
सग्गर सिंघ को अगले रविवार को गाँव से बाहर गोंयड़े के खेत की मेड़ पर जो पौधा पहली किरण के साथ मिला और स्वीकार्य भी लगा, वह था - 'नींबू'
रामसनेही सिंघ ने सिर पीट लिया - नीबू। काँटेदार झाड़ियाँ, फल अफरात लेकिन बला की खटास ! और नींबू के पेंड़ का जीवन ही कितना ?
मन में खदेरन पंडित की रुक्ष वाणी गूँज उठी, "... उस पुत्र से आगे की वंशावली उस पौधे के स्वभाव अनुरूप होगी। वंश तब तक चलेगा जब तक वृक्ष रहेगा। वृक्ष की हानि वंश का नाश कर देगी।" (अगला भाग)
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शब्द सम्पदा:
(1) कुआर का अँजोर - आश्विन (क्वार) मास का शुक्ल पक्ष (2) पितरपख - पितृपक्ष (3) भितऊ - मिट्टी की दीवार वाला घर (4) पँचलकड़ियाँ - औषधीय गुणों वाली 5 लकड़ियाँ (5) बेना - बाँस का या नारियल की पत्ती से बना हाथ का पंखा (6) मनई - व्यक्ति (7) लतमरुआ - खपरैल के घरों में प्रयुक्त मुख्य द्वार की भारी चौखट का निचला भाग (8) पिल्ली - कुतिया (9) खिरकी - दो घरों के बीच का सँकरा रास्ता/खाली स्थान (10) दुआर - देहाती घरों में आगे छोड़ा गया बड़ा खाली स्थान जिसे बैठने और अन्न प्रसंस्करण के लिए भी उपयोग में लाया जाता है। (11) जोगियाह - फालतू के नेम टेम मानने वाला (12) खटवासि - चरम दु:ख के क्षणों में खाट पर पड़े रहना (13) सोझवा - सीधी साधी (14) भाखा - भाषा, बोली (15) संझा के बेरा - शाम का समय (16) मलेच्छ भाषा - अंग्रेजी (17) तेलिया मसान की हड्डी - गुह्य साधना का एक अंग। तेली जाति के लिए सुरक्षित श्मशान से अधजले शव से खींच लिया गया हड्डी का टुकड़ा (18) भवानी - पुराने जमाने में बेटी के लिए प्रयुक्त (19) मतवा - ब्राह्मणी, आदर स्वरूप प्रयुक्त, इतर जातियों के लिए किसी भी आयु की विवाहिता ब्राह्मणी माता समान (20) बबुआने - गाँव की राजपूत बस्ती के लिए इतर जातियों द्वारा प्रयुक्त (21) पोरसा भर – हाथ को ऊपर की ओर सीधा फैलाने से हुई ऊँचाई (22) बिला - खो जाना, भूल जाना (23) खदेरा गई - खदेड़ दी गई, निष्कासित किए जाने के अर्थ में प्रयुक्त (24) सोहागिन - सुहागिन (25) मनही भर - एक चौथाई सेर, सेर तौल की पुरानी माप थी जो आज के एक किलोग्राम से कुछ कम होती थी। (26) नेबुआ - नींबू
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