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रविवार, 18 अप्रैल 2021

संवत्सर - आनन्द या राक्षस?

 

कभी ५ वर्ष का एक युग होता था, ६० महीनों का (वेदाङ्ग ज्यौतिष)। जब आप शताब्दियों की परास में कालचक्र का प्रेक्षण करना चाहते हैं तो बड़ी इकाई की भी आवश्यकता पड़ती है। जितनी बड़ी संख्या, त्रुटि की सम्भावना उतनी ही अल्प।
धरा के १२ माह १२ आदित्यों से जोड़ कर देखे जाते थे, सूर्य नमस्कार मन्त्रों का ध्यान करें। सूर्य के आभासी वार्षिक पथ को १२ आदित्यों में बाँट कर देखा जाता। यह पाया गया कि गुरु ग्रह लगभग एक वर्ष में एक आदित्य की दूरी पूरी करता है। अर्थात् १२ वर्षों में पूरा चक्र। अर्थात् यदि एक पृथ्वी वर्ष को महामास मानें तो महावर्ष हुआ १२ पृथ्वी वर्ष और ऐसे ५ महावर्षों का हुआ एक महायुग (कलि, द्वापर आदि को इसमें न लायें, यह भिन्न बीज वाला गणित है।) १२×५ = ६० वर्षों के संवत्सर चक्र का यही रहस्य है। सबको भिन्न भिन्न नाम दिये गये और एक चक्र पूरा होने पर पुन: उन्हीं नामों का दूसरा चक्र आरम्भ होता। लेखा जोखा व गणना हेतु बड़ी परास मिल गयी।
किन्तु प्रकृति व पूर्णाङ्क में बैर है। गुरु एक आदित्य से दूसरे के घर ~३६५.२५ दिनों में न जा कर ~३६१.०३ दिनों में ही पहुँच जाते हैं। आप जानते ही हैं कि चान्द्रवर्ष अर्थात चन्द्रकलाओं वाले २९.५ दिनों के १२ मासों का वर्ष मात्र ३५४ दिनों का होता है तथा लगभग प्रत्येक ८ वर्ष में ३ मलमास लगा कर उसे सौरवर्ष के निकट लाया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रत्येक १९वें वर्ष सौर दिनांक व चान्द्रमास तिथि सम्पाती हो जाते हैं।
अर्थात् जो हमारा सौर-चान्द्र समन्वित वर्ष है, उसे लम्बी परास में सौर वर्ष माना जा सकता है।
अब देखिये कि किसी वर्ष प्रतिपदा को आपका वर्ष और बार्हस्पत्य संवत्सर एक साथ आरम्भ हुये, परन्तु बार्हस्पत्य संवत्सर का अन्त वर्षान्त से ४.२३ दिन पहले ही हो गया। अगले वर्ष यह अन्तर हो जायेगा २×४.२३ दिन, उसके अगले वर्ष ३×४.२३ दिन... इसी प्रकार यह अन्तर बढ़ता जायेगा और लगभग ८५ या ८६ वर्षों पश्चात ऐसा होगा कि पीछे घटता नया संवत्सर नये वर्ष का स्पर्श ही नहीं कर पायेगा। ऐसा होने पर उसका लोप माना जाता है क्योकि नववर्ष लगने पर उससे आगे वाले संवत्सर का क्रम आ जाता है। चक्र ऐसे ही चलता रहता है।
इस वर्ष आनन्द नामधारी का लोप हो गया और राक्षस का क्रम आ गया।
एक अपर बात।
६० संवत्सरों को २०-२० कर ब्रह्मा, विष्णु व रुद्र की ३ 'बीसियों' में बाँटा गया है। प्लवङ्ग से ही रुद्र की बीसी चल रही है (विक्रम २०७१, 2014-15 CE) से। रुद्र की बीसी को सामान्यतया ज्योतिषी विनाशी ही बताते हैं किन्तु संहार से निर्माण भी जुड़ा है। केन्द्र में दशक पश्चात हुये सत्ता परिवर्तन को देखें। विष्णु की बीसी में तो वेटिकनी मौनी राज था। उससे तो अच्छा ही है।
दक्षिण भारत ने लगभग १२०० वर्ष पूर्व आर्यसिद्धान्त को अपनाया और बार्हस्पत्य संवत्सर चक्र से लोप प्रक्रिया का त्याग कर दिया। परिणामत: उनके संवत्सर नाम की संगति उत्तर के सूर्यसिद्धान्तीय पद्धति से नहीं बैठती।

यह भी है कि यदि वह आरम्भ बिन्दु जब बार्हस्पत्य संवत्सर एवं सौर-चांद्र वर्ष सम्पाती माने गये किसी पद्धति में भिन्न हुआ तो उसमें लोप हुआ संवत्सर आनन्द से भिन्न होगा।

पुनश्च:

१९ वर्षीय सम्पात की बात की न! १९×५ = ९५ वर्षों का एक अन्य युग वैदिक याज्ञिक परम्परा में प्रयुक्त होता था। श्येनवेदी अर्थात पंख पसारे गरुळ की आकृति वाली महावेदी जोकि संवत्सर चक्र की रेखागणितीय प्रारूप होती, उसमें ९५ की संख्या भी मह्त्वपूर्ण थी। अपने आप में बहुत रोचक है जिसका सैद्धान्तिक ज्यौतिष से कोई सम्बन्ध नहीं।

रविवार, 13 जनवरी 2019

Bhanu Saptami भानु सप्तमी के व्याज से गणित चर्चा

आज भानु सप्तमी है। जिस सप्तमी तिथि को रविवार पड़ता है, वह भानुसप्तमी कहलाती है। क्यों भला?
आप इतना जो जानते ही हैं कि अपने यहाँ दिन का आरम्भ सूर्योदय से माना गया है अर्थात प्रत्येक दिन सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक होता है। सरल प्रेक्षण से आरम्भ करते हैं। पूर्णिमा तो जानते ही होंगे जिस दिन चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में होते हैं। आप यह भी जानते हैं कि किसी भी बिंदु पर एक चक्र ३६० अंश का कोणीय घुमाव लिये होता है तथा किसी भी सीधी रेखा का अर्थ उसके किसी भी बिंदु पर १८० अंश होता है अर्थात बिंदु पर होने वाले पूरे कोणीय घुमाव का आधा। 

पूर्णिमा के दिन साँझ को खुले में निकल लें तो आप देख पायेंगे कि जब पश्चिम में सूर्य का गोला अस्त हो रहा होता है तो उसके ठीक सामने पूरब में पूर्ण चंद्र का बड़ा सा गोला उदित हो रहा होता है। बड़ा ही मनोहारी दृश्य होता है। उस समय दोनों आप जहाँ खड़े हैं उस बिंदु के दोनो छोरों पर एक रेखा में अर्थात १८० अंश के कोण पर होते हैं। आगे चंद्र का प्रकाशित भाग प्रतिदिन घटने लगता है जिसे कला कहते हैं।
यदि आप प्रतिदिन देखते रहेंगे तो पायेंगे कि चंद्र का उदय सूर्यास्त के पश्चात प्रतिदिन बिलम्ब से होने लगा है तथा क्रमश: चंद्रोदय बिंदु पश्चिम की दिशा में खिसकने लगा है। यही कृष्ण पक्ष है, चंद्रमा घटते जाते हैं। एक दिन ऐसा आता है कि जब चंद्र दिखते ही नहीं अर्थात सूर्य के साथ ही हो जाते हैं। एक चक्र पूरा हो कर ३६० अंश का कोण भी पूरा हो जाता है तथा अदृश्य हो जाते हैं। यही स्थिति अमावस्या कहलाती है आरम्भ ० तथा अंत ३६० अंश सम्पाती। चूँकि इस दिन सूर्य एवं चंद्र 'साथ' होते हैं, अमावस्या को बहुत ही शाक्त साधनाओं के लिये उपयुक्त माना जाता है। 
सूर्योदय से सूर्योदय तक दिन का चंद्र से कुछ नहीं लेना देना, वह चलता रहता है। हम सूर्य एवं चंद्र की परस्पर कोणीय स्थिति का दैनिक परिवर्तन देख चुके हैं। ० से पुन: ३६० अंश तक घूम कर वहीं पहुँचने में चंद्र को लगभग २९.५ दिन लगते हैं अर्थात १८० अंश का अंतर होने में १४.७५ दिन जिसे लगभग कर सुविधा के लिये १५ दिन मान कर ३० दिन का पूरा मास (मास का मा चंद्रमा के मा से सम्बंधित है :) चंदा मामा ऐसे ही हुये।) तथा १५ दिन का एक पक्ष माना जाता है - शुक्ल पक्ष जब चंद्र अमावस्या से बढ़ते होते हैं, कृष्ण पक्ष जब पूर्णिमा से आगे घटते होते हैं।
तो ३६० अंश ३० दिन अर्थात १२ अंश प्रतिदिन का अंतर। सूर्य एवं चंद्र के बीच यही १२ अंश का अंतर होने में लगा समय एक तिथि कहलाता है अर्थात जब पक्ष की तिथि बताई जाये तो आप चंद्रमा एवं सूर्य के बीच का कोण जान लेंगे। उदाहरण के लिये आक शुक्ल पक्ष की सप्तमी है तो चंद्रमा एवं सूर्य के बीच १२x७ = ८४ अंश का कोण होगा। कृष्ण पक्ष की होती तो १८०+८४ अर्थात २६४ अंश का कोण होता।   
समस्या पूर्ण ३० दिन नहीं होने से आती है जिसके समायोजन की अपनी विधियाँ हैं, उसमें नहीं जायेंगे। केवल इतना जान लें कि विश्व की सबसे वैज्ञानिक भारतीय गणना पद्धति में इसे चतुराई से उदया तिथि के माध्यम से सुलझा लिया गया। तिथि वही मानी जाती है जिसमें सूर्योदय होता है अर्थात आवश्यक कोण का अंतर हो जाने के पश्चात के सूर्योदय का दिन उस तिथि का माना जायेगा। यदि सूर्योदय के पश्चात आवश्यक कोण अंतर आता है तो पुरानी तिथि ही मानी जायेगी। इस गणित एवं प्रकृति के संयोजन में कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि पुरानी तिथि में सूर्योदय हुआ तथा अगले सूर्योदय के पूर्व ही कोणीय स्थिति पूर्ण हो अगली तिथि हो गई अर्थात बीच वाली तिथि में सूर्योदय हुआ ही नहीं ! इसे क्षय तिथि कहा जाता है तथा उसकी गिनती होती ही नहीं! 
ऐसा भी होता है कि एक ही तिथि में दो सूर्योदय हो गये। इसे अधिक तिथि या तिथि विस्तार कहते हैं। इस प्रकार वह आधे दिन का अंतर अपने आप समायोजित होता रहता है। 
तो आप ने दिन जान लिया, तिथि जान लिया। 
अब आते हैं वार पर, रविवार, सोमवार, ... कुल सात वार। ये सात ही क्यों हैं? गणित के बारे में कहा जाता है कि प्रकृति से गणित है, गणित से प्रकृति है। कैसे? देखते हैं। पृथ्वी सूर्य का एक चक्र ३६५ से अधिक एवं ३६६ से अल्प दिनों में पूरी करती है। मास के ३० से भाग दे तो १२ की संख्या आती है। यही १२ मास हैं या द्वादश आदित्य भी। सूर्य नमस्कार में १२ नामों से मंत्र हैं न ! 
केवल चंद्र गति देखें तो १२ मास में केवल १२x२९.५ = ३५४ दिन ही हुये। ३५४ एवं ३६६ का औसत हुआ .... हाँ, ३६०। तो किसी बिंदु पर बनने वाले कोण का ३६० भागों में विभाजन इस कारण से है जिससे कि सुविधा रहे, एक तिथि १२ अंश, १२ महीने, ३६० अंश, वर्ष में ३६० दिन, आगे संयोजन आदि सब एक दूसरे से जुड़े हुये हैं जिनके मूल में प्रकृति का प्रेक्षण है तथा प्रकृति का गणित से बंधन भी। 
सात पर लौटते हैं। इसका रहस्य पृथ्वी अर्थात प्रेक्षक के सापेक्ष ग्रहों की गति से जुड़ा है। पुरातन समय में ज्ञात ग्रहों (ग्रह की आज की परिभाषा न लें) को उनकी गति के घटते क्रम में रखें तो यह स्थिति बनती है: 
शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चंद्र। दिनमान को इनसे जोड़ दिया गया। आप के पास दो पद्धतियाँ थीं- सौर एवं चंद्र अर्थात आदित्य एवं सोम। दिन नाम का आरम्भ आदित्यवार (अतवार, इतवार) या सोमवार से कर सकते हैं। चलिये अतवार से करते हैं। दिन के पहले होरा (Hour, कभी पूरा होने पर सूचित करने हेतु नगर चतुष्पथ पर घण्टा बजाया जाता था) को सबसे तीव्र गति वाले चंद्र से जोड़ दें, अगले घण्टे को अगले तीव्र बुध से, अगले को शुक्र से ... उसी प्रकार बढ़ते जायें तो पायेंगे कि दिन के २४ घण्टे पूरे होने पर अगले दिन का पहला होरा चंद्र पर आयेगा अर्थात पहले घण्टे के आधार पर उस दिन का नाम हुआ सोमवार, आगे ४८ घण्टे अर्थात दो दिन बीतने पर अगले दिन के पहले घण्टे का स्वामी हो जायेगा मंगल अर्थात वह दिन मंगलवार। इसी प्रकार चक्रीय क्रम में दिनों के नाम होते जायेंगे। 
यह सात की संख्या भी गणित एवं प्रकृति के परस्पर सम्बंध को दर्शाती है। सूर्य रश्मियों में सात रंग होते हैं। बारह एवं सात का योग उन्नीस होता है जो कि चंद्र गति के एक महत्त्वपूर्ण चक्र के वर्षों से जुड़ा है। प्रत्येक १९ वर्ष पर चंद्र तिथि एवं सौर दिनांक अपना साथ दुहराते चलते हैं। 
बारह में से सात घटायेंगे तो ५ होगा, पाँच तत्त्व। वत्सर भी पाँच नाम से। दो ऋतुओं को मिला कर एक कर छ: के स्थान पर पाँच ऋतुओं की बात वैदिक साहित्य में खूब मिलती है।
शतपथ ब्राह्मण में वर्षा एवं शरद को मिला कर पाँच ऋतुओं की बात की गयी है:
लोको॑वसन्त॑ऋतुर्य॑दूर्ध्व॑मस्मा॑ल्लोका॑दर्वाची॑नमन्त॑रिक्षात्त॑द्द्विती॑यम॑हस्त॑द्वस्याग्रीष्म॑ऋतु॑रन्त॑रिक्षमेवा॒स्य मध्यमम॑हरन्त॑रिक्षमस्य वर्षाशर॑दावृतू य॑दूर्ध्व॑म्न्त॑रिक्षादर्वाची॑नं दिवस्त॑च्चतुर्थम॑हस्त॑द्वस्य हेमन्त॑ऋतुर्द्यउ॑रेवा॒स्य पञ्चमम॑हर्द्यउ॑रस्य शि॑शिर ऋतुरि॑त्यधिदेवतम्।
शतपथ के पुरुषमेध का प्रारम्भ पाँव से होता है और पाँव है ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ बसंत! शतपथ का वर्षा और शरद को मिलाना उस ऋग्वैदिक कूट कथ्य से भी जुड़ता है जिसमें इन्द्र वृत्र को मार कर सूर्य और वर्षा दोनों को नया जीवन देते हैं। पुरुषमेध में यह देह का केन्द्रीय भाग अर्थात कटि है।
ऐसा क्यों? इसमें उस समय की स्मृति है जब वर्ष का आरम्भ वर्षा से था। शरद मिला देने पर शरद विषुव जोकि वसंत विषुव से छ: महीने के अंतर पर पड़ता है, वर्षा के साथ आ जाता है, नाक्षत्रिक एवं ऋत्विक प्रेक्षणों के सम्मिलन से सुविधा हो जाती है।
ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत एवं शिशिर को मिला दिया गया है: हेमन्‍तशिशिरयो: समासेन तावान्‍संवत्सर: संवत्सर: प्रजापति: प्रजापत्यायतनाभिरेवाभी राध्नोति य एवं वेद।
१९ में इस ५ का गुणा करेंगे तो आयेगा ९५। यह संख्या एक युगमान है जिसमें सौर चंद्र गतियों का सूक्ष्म समायोजन किया जाता था। 
१२ का पहाड़ा देखें तो अद्भुत संयोग मिलेंगे - १२ आदित्य; २४ गायत्री मंत्र अक्षर, ३६ तैंतिस देवता एवं त्रिदेव; ४८ सात गुना सात ४९ मरुतों से मात्र एक की न्यूनता; ६० बृहस्पति एवं शनि गति समन्‍वित संवत्सर नाम; ७२ ब्रह्मा के एक चक्र में चतुर्युगी संख्या ७१ एवं ७२ के बीच; ८४ योनिलक्ष; ९६ ९५ वर्ष के शोधन चक्र से आगे की संख्या; १०८ पर कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है।  अन्य अनेक उदाहरण हैं, जिन्हें रुचि हो वे अग्निचयन एवं श्रौत सत्रों की वेदी का गणित ब्राह्मण ग्रंथों से पढ़ें, शुल्व सूत्र देखें। कहने का अर्थ मात्र यह कि जिस प्रकार अंकगणित का उपयोग ज्योतिष में किया जाता था, वह आज कल की प्रचलित शिक्षा पद्धति से लुप्त है, प्रकृति से जुड़ाव कट गया है। 
तो चाहे आदित्य से आरम्भ करें या सोम से, सात की संख्या महत्त्वपूर्ण है। सूर्य की रश्मियों के सात वर्ण, सात 'ग्रह', सात वार आदि से सूर्य आधारित दिनमान पद्धति में सात की संख्या बहुत महत्त्वपूर्ण हो गयी तथा सप्तमी तिथि को सूर्य से जुड़ा मान लिया गया। 
अब सूर्य की संख्या वाली तिथि एवं उनके वार रविवार या आदित्यवार की संगम हो जाये तो पर्व या विशेष व्रत आदि का योग बनता है न? 
आज की भानुसप्तमी वही है। भा को भाने से, प्रभा से, विभा से समझें कि अद्भुत कांति के साथ मनोहारी प्रभाव। सूर्य में तो होती ही है किन्‍तु आज विशेष हो जाती है। मानव का देव पर निज भाव आरोपण। 

रविवार, 11 नवंबर 2018

किशोर नाक्षत्रिकी - 1

पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, साथ में अपने अक्ष पर घूमती भी है (परिभ्रमण) जैसे कि कोई लट्टू नाचते हुये किसी बिंदु का चक्कर भी लगा रहा हो।
उसके घूमने का अक्ष परिक्रमा के तल से प्राय: 23.5 अंश झुका हुआ है। सर्कस में झुकी हुई मोटरसाइकिल के साथ चालक का एक गोले में घूमना समझें, केवल यह मान कर कि चालक ऐसी सीट पर सवार है जो अपने अक्ष पर भी घूम रही है।


धरती का परिभ्रमण अक्ष उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं को निश्चित करता है तथा उसके लम्बवत जिन दो बिंदुओं के निकटवर्ती क्षेत्र में सूर्य क्रमश: उगता एवं अस्त होता दिखता है, वे क्रमश: पूरब एवं पश्चिम होते हैं। जब इण्टरनेट, जी पी एस आदि नहीं थे तथा हम प्रकृति से इतने कटे नहीं थे, तब लोग दिशाओं को बिना किसी यंत्र के ही बता सकते थे क्यों कि उनकी आंतरिक समझ सूर्य गतियों से अधिक जुड़ी थी, दिन में भी अंधेरा कर कृत्रिम प्रकाश से चलने वाले कार्यालय भी नहीं होते थे।

अक्ष के झुकाव के कारण सूर्य प्रतिदिन ठीक पूरब में उगता या पश्चिम में अस्त होता नहीं दिखाई देता, इस दो दिशाओं के सापेक्ष उस काल अवधि में दोलन करता दिखता है जिसे हम वर्ष कहते हैं। वर्ष क्या है?

अक्ष पर पृथ्वी के इस झुकाव के कारण ऋतुयें होती हैं। ऋतु अर्थात एक निश्चित आवृत्ति से धरती के वातावरण में गरमी, ठण्ड, सूर्य के दिखने के घण्टों में घटबढ़। यदि झुकाव नहीं होता तो घटबढ़ नहीं होती, सूर्य सदैव एक बिंदु पर उगता दिखता, एक ही बिंदु पर अस्त होता अर्थात धरती के विविध क्षेत्र उसके गोले अपनी अपनी विशेष स्थिति के अनुसार सदा सदा एक ही मात्रा में ऊष्मा प्राप्त करते।

मनुष्य हेतु सबसे स्पष्ट निश्चित आवृत्ति से होने वाली प्राकृतिक घटना वर्षा है। मनुष्य ने देखा कि एक निश्चित आवृत्ति से कुछ महीने या दिन ऐसे आते हैं जब वह वर्षा अधिक होती है, निरंतर होती है जो कि कृषि अर्थात पेट पालन के लिये अन्न आदि उत्पन्न करने के उद्योग हेतु बहुत लाभकारी होती है। उस निश्चित आवृत्ति को वर्ष नाम दे दिया गया।

वास्तव में वर्ष पृर्थ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लिया गया वह समय है जिसे एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक की समय इकाई 'दिन' या 'दिनमान' में मापा जाता है। जो कि मनुष्य के अपने विभाजन से 36 मुहूर्त या 24 घण्टे होता है।

मनुष्य ने पाया कि वर्ष 365 से 366 दिन तक का होता है जिसे गणना में सुविधा के लिये उसने 360 का निकट मान कर विविध इकाइयाँ बनाईं।

उसने ऋतुओं अर्थात एक निश्चित कालखण्ड में देह पर, कृषि पर, पेड़ पौधों पर, जलवायु पर होने वाले समेकित प्रभावों को नाम दिये। मोटा मोटी जाड़ा, गरमी, वर्षा।

भारत में रहने वाले मनुष्य ने इन तीन का पौधों एवं त्वचा पर प्रभावों को देखते हुये दो दो में विभाजन और किया - वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शीत तथा छ: ऋतुयें हो गईं।

उसने पाया कि वसंत के समय जब कि चहुँओर पुष्प खिले होते हैं, त्वचा एवं मन पर नया नया सा प्रभाव होता है, एक दिन सूर्य ठीक पूरब में उगता है तथा ठीक पश्चिम में अस्त होता है। प्राय: आधा वर्ष बीत जाने पर ऐसा पुन: होता है। ये दो दिन विषुव कहे गये।

ऐसे ही एक समय ऐसा भी होता है जब सूर्य के उदय का बिंदु उत्तर की दिशा में झुकते झुकते एक समय के पश्चात पुन: लौटने लगता है, यही बात एक अन्य समय के साथ दक्षिणी झुकाव में भी होती है मानों सूर्य एक डोरी से बँधा लोलक हो जो दोलन कर रहा हो!

इस चार बिंदुओं ने उसकी नींव डाली जिसे हम आज कैलेण्डर कहते हैं। वसंत ऋतु वहाँ भी होती है जहाँ आज सम्पूर्ण विश्व में मान्य ग्रेगरी का कैलेण्डर विकसित हुआ। यह कैलेण्डर ऋतु सापेक्ष है तथा वसंत विषुव प्रत्येक वर्ष एक निश्चित दिनांक (~ 21 मार्च) को ही पड़ता है।

पृथ्वी की अन्य ऐसी भी गतियाँ हैं जिसकी आवृत्ति वर्ष से हजार लाख गुना है अर्थात बहुत धीमी है। उनके प्रभाव पर आगे बात करेंगे किन्‍तु अभी वर्ष पर ही केंद्रित रहते हैं।

वर्ष के साथ समस्या यह है कि वह न तो ठीक 365 दिन का होता है, न ही 366 दिन का। वह इन दो के बीच, लगभग 365 दिन एवं 5 घण्टों एवं उससे भी अल्प समयावधियों को मिला कर होता है जो एक पूर्ण घण्टे से कम होती हैं।

कैलेण्डर में तो केवल दिन होते हैं, घण्टे नहीं। अनेक वर्ष बीतने पर यह अतिरिक्त अवधि बढ़ते हुये गड़बड़ करने लगती है यथा चार वर्ष पश्चात लगभग एक पूरे दिन का अंतर तथा घण्टे से लघु अवधियों के कारण आगे के सैकड़ो हजारो वर्षों में जुड़ने वाले अंतर। इस कारण ही समायोजन किया जाता है - लौद या लीप वर्ष, प्रत्येक 4 वर्ष पर एक दिन जोड़ कर 366 दिन का वर्ष मानना। अन्य समायोजन भी घण्टे से लघु अवधियों हेतु होते हैं जिन्हें हम आगे देखेंगे।

ध्यान देने योग्य यह बात है कि ग्रेगरी के कैलेण्डर में समायोजन इस प्रकार सदैव चलता रहेगा। ऋतु आधारित इस वर्ष गणना में किसी ऋतु का आरम्भ प्राय: निश्चित दिनांक पर ही होगा (लौद समायोजन के कारण कुछ एक दिनों का ही अंतर हो सकता है)। यह स्थिति हजारो वर्षों तक ऐसे ही रहेगी क्यों कि समायोजन कर के एक निश्चित दिनांक को वसंत विषुव हेतु सुरक्षित रखा जाता रहेगा।

यह हुआ पूर्णत: ऋतु या पृथ्वी से दर्श सूर्य गति आधारित कैलेण्डर किंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती। आकाश में रात में चंद्रमा भी दिखता है, उसका क्या? क्या ऐसे वर्ष भी हो सकते हैं जो सूर्य के अतिरिक्त चंद्र गति पर भी आधारित हों या केवल चंद्र गति पर ही आधारित हों?

उत्तर हाँ है। इस हाँ में मानव की विराट मेधा एवं प्रेक्षण क्षमता के प्रमाण हैं जिन्हें हम अगले अंक में देखेंगे।

शनिवार, 14 जुलाई 2018

हथिया के पेटे जाड़ - नक्षत्र, सूर्य, चंद्र, पृथ्वी प्रेक्षण - लोकगिरा, वर्ष, ऋतु, माह

सूर्य पृथ्वी का निकटमत तारा है जहाँ से प्रकाश को तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकण्ड की गति से पहुँचने में मात्र आठ मिनट लगते हैं अर्थात किसी भी समय हमारी आँखों से देखा जाने वाला सूर्य आठ मिनट पुराना होता है अर्थात यदि सूर्य पर कुछ घटित हो तो हमें आठ मिनट पश्चात दिखेगा। 
प्रॉक्जिमा सैंटौरी तारा हम से दूसरा निकटतम तारा है जो कि लगभग सवा चार प्रकाशवर्ष की दूरी पर है अर्थात वहाँ से चले प्रकाश को हम तक पहुुँचने में सवा चार वर्ष लगेंगे अर्थात उसे जब भी हम देखेंगे, सवा चार वर्ष पुराना ही देखेंगे। 
अब उन तारों, निहारिकाओं, मंदाकिनी इत्यादि की सोचें जो हमसे लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं, उनका वर्तमान तो हम जान ही नहीं सकते ! दिक्काल की सीमायें यही हैं।
...  
विराट ब्रह्माण्ड में यदि हम अपने क्षुद्र सौरमण्डल को देखें तो पृथ्वी अपने अक्ष पर जितने समय में एक चक्र पूरा करती है, उससे लगभग 365 गुना समय में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है। सूर्य भी अपने समस्त ग्रहों के साथ तीव्र गति से भागता जा रहा है किंतु हमें तो स्थिर प्रकाश पिण्ड ही लगता है जिसकी परिक्रमा हम कर रहे हैं। कारण है, तुलनात्मक रूप से हमारा अति लघु रूप। हमें दिन रात जो कि पृथ्वी के अक्षीय घूर्णन के कारण होते हैं, प्रति दिन पता चलते हैं, दिन की इकाई बनी ही उससे है किंतु उससे क्रमश: बढ़ने में समस्यायें होने लगती हैं। 
By LucasVB [Public domain], from Wikimedia Commons
ऋतुयें इस कारण होती हैं कि पृथ्वी का घूर्णन अक्ष लट्‍टू की भाँति झुका हुआ है जिसका शीर्ष एक वृत्त में घूमता  रहता है, आकाश के जिस क्षेत्र की सीध में किसी समय उसकी शिरोरेखा पड़ती है, उसे ध्रुव कहते हैं, धुरी की भाँति अटल जो कि वस्तुत: लगभग 21 से 26 हजार वर्षों के आवर्तकाल से परिवर्तित होता रहता है। उसकी दिशा ही उत्तर दिशा है - ऊपर, उदीचि, उत्तर। चूँकि यह एक धीमी गति है, इसका प्रेक्षण सभ्यताओं के विद्वान ज्योतिषी ही कर पाये, जनसामान्य के लिये तो ध्रुव धुरी बने स्थिर ही रहे।
इस गति के कारण ही सूर्य देव पूरब पश्चिम में क्रमश: उदित अस्त दिखते हुये भी उत्तर दक्षिण दिशाओं में झुकते, सीधे होते, पुन: झुकते एक आवर्ती गति करते प्रतीत होते हैं। झुकाव के अल्प एवं अधिक होने से विकिरण, ऊष्मा आदि की प्राप्ति में हुये एवं उनसे जुड़े अन्य परिवर्तनों के कारण विविध नाटकीय परिवर्तन धरा पर दिखते हैं, कभी फूल ही फूल, कभी सब पत्ते लुप्त, कभी वर्षा ही वर्षा तो कभी तपती धूप। ये परिवर्तन सहसा नहीं हो जाते, उनका पता हमें अपेक्षतया मंद गति से शनै: शनै: पड़ता है।
ये परिवर्तन एक लय में होते हैं - संस्कृत का ऋत, अंग्रेजी का rhythm. ऋतु अनुकूल आहार विहार से स्वास्थ्य ठीक रहता है, rhythm में विविध ध्वनियाँ सङ्गीत हो जाती हैं, जीवन सङ्गीत यही तो है ! आवर्ती लय।     
इन दो घूर्णन गतियों के साथ साथ पृथ्वी द्वारा सूर्य की वार्षिक परिक्रमा है ही। चूँकि ये सारी गतियाँ लयबद्ध हैं, इनमें कोई यादृच्छ या अनिश्चित या सहसा परिवर्तन नहीं हो सकते; सूर्य सापेक्ष सबसे बड़े परास वाली गति 365 दिनों के वर्ष विभाजन के सापेक्ष हम शेष दो को व्यवस्थित कर सकते हैं। यही तो है अभियांत्रिकी एवं प्रबंधन की एक प्रिय कार्यविधि - सकल से सूक्ष्म की दिशा में, from WHOLE to PART ! 
चंद्रमा को आप प्राकृतिक कैलेण्डर मान सकते हैं जो कि भीति पर टँगा होने के स्थान पर आकाश में टँगा कलाओं के माध्यम से तिथियाँ बताता रहता है। आज सामान्य जन भले चंद्र को देख तिथि न बता पायें, एक पीढ़ी पूर्व तक लोग देख कर बता देते थे - अन्हार या अँजोर, चौथी या पञ्चमी ! 
उसकी सोलह कलाओं में से आरम्भ एवं अंत को हटा दें तो चौदह चौदह दिन की दो अवधियाँ हुईं अट्ठाइस एवं वे दो मिला कर एक अवधि हुई तीस दिन की। मा, चंद्रमा से मास, moon से month. 365 को जब इन तीस दिनों में बाँटा गया तो बारह इकाइयाँ हो गयीं, बारह नामों वाले महीने। बचे खुचे दिनों का समायोजन विविध रीतियों से कर लिया गया। एक दूसरा गणित, अधिक सटीक 'पक्ष' वाला हुआ - जब चंद्र घट रहा हो तो अन्हार, बढ़ रहा हो तो अँजोर - क्रमश: कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष। माह में दो पक्ष हो गये मानोंं मास रूपी उड़ते पक्षी के दो पंंख हों ! 
दो महीने मिला कर हो गयी एक ऋतु जब कि परिवेश का समेकित सकल प्रभाव निश्चित प्रकार से पारिभाषित किया जा सकता है। बारह अद्धे छ: ऋतुयें हुईंं। 
...  
इनके अतिरिक्त जो भी गतियाँ हैं, उनके लिये हमें विशेष यंत्र, प्रेक्षण, विद्या इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। उन्हें हम इनके बिना नहीं जान सकते, अतिशय मेधावी जन अनुमान मात्र लगा सकते हैं। 
रात में आकाश देखें तो हमें भिन्न भिन्न तारामण्डल दिखाई देते हैं जो विविध आकृतियों में सहस्राब्दियों से यथावत मानव को दिखते रहे हैं। इस कारण ही अनेक कल्पनाओं एवं कहानियों का सृजन हो पाया किंतु उन ताराओं में भी सापेक्ष गतियाँ हैं जो कि अतिशय दूरी के कारण हमें कोरी आँखों से पता नहीं चल पातीं। लाखों वर्षों के पश्चात उनके आकार वही नहीं रहने जो आज दिखते हैं, सप्तर्षि पूँछ वाली पतंग की भाँति उड़ते नहीं दिखेंगे, आकार परिवर्तित हो जायेगा।  
कल्पना करें कि पृथ्वी की परिधि पर एक वृत्तीय पथ बना हुआ है जिस पर हम किसी वाहन में सवार अबाध गति से चल रहे हैं। पहला परिक्रमण पूरा होते ही हमें खिड़की से वही संरचनायें दिखने लगेगीं जो आरम्भ में दिखी थीं। बाह्य परिवेश हमारा स्थिर संदर्भ बिंदु हो जायेगा जिसके सापेक्ष हम गतिमान होंगे, कहेंगे यहाँ पहुँच गये, अब आगे वह वृक्ष आयेगा, सरोवर पीछे छूट गया आदि आदि। 
इसी प्रकार पृथ्वी की गति अंतरिक्ष में है। वे विविध तारामण्डल स्थायी स्थिर संरचनाओं की भाँति संदर्भ बिंदु हैं, स्थिर stationary station, स्‍थिर स्थानक हैं जिनके सापेक्ष गाड़ी की गति का लेखा जोखा रखा जाता है। अंतर इतना ही है यह गाड़ी विलम्ब नहीं करती, न कभी समय से पहले चल पाती है। लगभग स्थिर मान का वर्ष उसकी इस समयबद्धता के कारण ही है। गति में विविध सूक्ष्म अंतर हैं किंतु उनकी उपेक्षा की जा सकती है या उन्हें जटिल बृहद गणित में समोया जा सकता है। बृहस्पति का साठ वर्षीय चक्र, सप्तर्षि का 2700 वर्षीय आदि ऐसी ही व्यवस्थायें हैं। 
हमारी गति के कारण वर्ष भर सूर्य जिस पथ पर चलता दिखाई देता है, उस पर सम दूरी पर विविध तारों एवं तारामण्डलों के 27 स्थानक मान लिये गये जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। 27 ही क्यों? 
यहाँ पुन: चंद्रमा रूपी प्राकृतिक कालेन्‍द्र calendar काम आया। सूर्य के साथ समस्या यह है कि जब वह दिखता तो कोई अन्य तारे या नक्षत्र नहीं दिखते। चंद्रमा के साथ यह समस्या नहीं है। वह नक्षत्रों के साथ साथ रात में दिखता है, सबसे प्रभावी दिखता है। इसी कारण से उसे नक्षत्र रूपी स्त्रियों का स्वामी मान लिया गया। देखा यह गया कि वह किसी नक्षत्र की सीध में 27 से 28 दिनों के बीच की अवधि में बारम्बार आ जाता है, चंद्र के रूप में मानव को सूर्य गति के प्रेक्षण हेतु एक स्वतंत्र मापनी मिल गयी !  
ऋतु कोई हो, सूर्य पृथ्वी कुछ भी कर रहे हों, चंद्रमा अपनी यह 27 दिवसीय यात्रा निरपेक्ष भाव से करता रहता है। चूँकि पृथ्वी की परिक्रमा के साथ साथ वह सूर्य की भी परिक्रमा कर रहा है, वह निरपेक्ष होते हुये भी इनके सापेक्ष सत्यापन की युक्ति हो सकता है। 
वह आभासी पथ जिस पर सूर्य अपने समस्त ग्रहादि एवं उनके उपग्रहों के साथ गतिमान प्रतीत होता है, उसे क्रांतिवृत्त कहते हैं। क्रांतिवृत्त को 27 स्थानकों या नक्षत्रों में बाँट दिया गया - सूर्य जी जब इस स्थानक आये थे तो चंद्र जी अपनी फला कला में फला स्थानक पर थे ! घड़ी की व्यवस्था हो गयी। 
आकाश में चलते चलते सूर्य जब किसी नक्षत्र पर पहुँचता है अर्थात जिसकी सीध में दिखता है, उसे उस समय का सूर्य नक्षत्र कहते हैं या इस भाँति कहते हैं कि अभी सूर्य उस नक्षत्र पर है। ऐसा ही चंद्र के साथ है। इस कारण ही किसी दिन सूर्य नक्षत्र एवं चंद्र नक्षत्र, दो होते हैं। दोनों का एक साथ एक ही नक्षत्र पर होना बहुत सुलभ घटना नहीं है।  
365.25 दिनों की पृथ्वी की वार्षिक गति को 27 नक्षत्रों से भाग दें तो सूर्य एक नक्षत्र पर साढ़े तेरह दिनों से किञ्चित अधिक समय तक रहेगा। 
(कभी यह भी था कि मानव निर्मित ये विभाजन समान नहीं थे किंतु हमें तो अब  का देखना है।)
ग्रेगरी का अंग्रेजी कैलेण्डर शुद्ध सौर है अर्थात उसमें चंद्रमा की कलाओं, मास, दिन, तिथि आदि के संयोजन नहीं होते, न उस उद्देश्य से गणितीय संशोधन किये जाते हैं; इस कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित इस कैलेण्डर के दिनाङ्कों को सौर गति अर्थात उसके विविध नक्षत्रों में प्रवेश से जोड़ा जा सकता है। उदाहरणतया :                 
अगस्त मास में 18 को सूर्य मघा नक्षत्र में प्रवेश कर 30 तक रहते हैं,  31 को पूर्व फाल्गुनी में, 14 सितम्बर को उत्तर फाल्गुनी में एवं 28 सितम्बर को सूर्य रूपी गाड़ी हस्त स्थानक अर्थात नक्षत्र पर पहुँचती है। 
(दिन सूर्योदय से गिनते हैं अत: रात्रि में या सूर्योदय के पश्चात हुये परिवर्तनों के लिये +/- 1 दिन की परास रहेगी।) 
स्पष्ट है कि इसी प्रकार ऋतु आरम्भ एवं अंत के दिनाङ्क भी बताये जा सकते हैं जो वर्षो वर्ष एक ही रहेंगे। तमिळ कैलेण्डर भी पूर्णत: सौर है, भारतीय मानक शक संवत भी। इनमें भी ऋतुओं की आरम्भ तिथियाँ निश्चित एवं स्थिर होंगी। 
24 अगस्त को शरद ऋतु का आरम्भ हो जाता है, 26.50 उत्तरी अक्षांश के निकटवर्ती क्षेत्रों में इसी दिन के निकट अगस्त्य का उदय होता है अर्थात सूर्य की ओट में अपनी कांति खो चुके अगस्त्य उससे मुक्त हो पुन: भोर में दिखना आरम्भ करते हैं। (यहाँ समस्या यह है कि इस प्रकार के उदय अस्त अक्षांश आधारित होते हैं। क्यों ? कभी समझायेंगे।) 
अक्षांश आधारित स्थानीय प्रेक्षण भारत में बहुत हुये एवं कृषि आधारित समाज में उन्हें ऋतुओं से जोड़ कर एक मौखिक परम्परा के ढीले ढाले लोक-कैलेण्डर के रूप में बारहो महीनों, छहो ऋतुओं के लिये सँजो लिया गया। पीढ़ियों तक इस कला में निष्णात 'घाघ भड्ढरी' प्रकार के जन किसानों का मार्गदर्शन तो करते ही रहे, उन्हें शिक्षित कर एक स्वतंत्र सशक्त वैज्ञानिक परम्परा को भी सुरक्षित सम्वर्धित करते रहे। 
ऐसे प्रेक्षणों के साथ समस्या यह है कि ये सार्वदेशिक नहीं लागू किये जा सकते। कोल्लम का प्रेक्षण काशी में काम नहीं आयेगा। हाँ, यदि दोनों स्थानों के औपचारिक ज्योतिर्विद एक साथ बैठें तो अपने अपने क्षेत्रों के लोकज्ञान के संयोग से जाने कितने रहस्य उद्घाटित कर सकते हैं।  
उत्तर भारत में अगस्त्य दर्शन को वर्षा ऋतु का अन्त माना जाता है। वर्षा इससे आगे भी होती है किन्‍तु अवसान वाली। लगभग महीने भर पश्चात जब 28 सितम्बर को सूर्य हस्त नक्षत्र में होते हैं तब अंतिम वर्षा के झँकोरों के साथ ही जाड़े की भूमिका हो जाती है। 
लोक में कहते हैं - हथिया के पेटे जाड़। हस्त नक्षत्र हाथ के आकार में समाता चार तारकों का समूह है जो कि लोकगिरा में हस्त से हाथ, हाथ से हाथी हो गया है (हाथी या हस्ति को यह नाम इस कारण दिया गया है कि चौपाया होने पर भी उसकी सूँड़ ऐसे काम करती है जैसे मनुष्य का हाथ।)  
देखें तो बारह महीनों में छ: ऋतुओं हेतु प्रति ऋतु दो माह ही पड़ते हैं किंतु संधि काल का ध्यान लोक में रखा गया है। शरद है किंतु उसमें हो रही वर्षा को अगस्त्य तारे से जोड़ कर सँजो लिया गया। 
शरद है किन्‍तु उसमें हो रही अंतिम वर्षा के साथ हेमन्त (हिम का अंत अर्थात हिमपात अब ठहर जायेगा, पिघलेगा तो दाँत कड़कड़ाने वाले शिशिर का आगम होगा) अर्थात जाड़े की पूर्वऋतु से जोड़ कर स्मृतिबद्ध कर लिया गया। 
वस्तुत: शरद-हेमन्त-शिशिर की तिकड़ी ऐसी रही कि उनमें ऋतुओं का संक्रमण उतना स्पष्ट न होने के कारण पाँच ऋतुओं की भी संकल्पना करनी पड़ी। 
इसके अनेक उदाहरण वैदिक वाङ्मय में उपलब्ध हैं।
शतपथ ब्राह्मण में वर्षा एवं शरद को मिला कर पाँच ऋतुओं की बात की गयी है: 
लोको॑वसन्त॑ऋतुर्य॑दूर्ध्व॑मस्मा॑ल्लोका॑दर्वाची॑नमन्त॑रिक्षात्त॑द्द्विती॑यम॑हस्त॑द्वस्याग्रीष्म॑ऋतु॑रन्त॑रिक्षमेवा॒स्य मध्यमम॑हरन्त॑रिक्षमस्य वर्षाशर॑दावृतू य॑दूर्ध्व॑म्न्त॑रिक्षादर्वाची॑नं दिवस्त॑च्चतुर्थम॑हस्त॑द्वस्य हेमन्त॑ऋतुर्द्यउ॑रेवा॒स्य पञ्चमम॑हर्द्यउ॑रस्य शि॑शिर ऋतुरि॑त्यधिदेवतम्।
ऐसा क्यों? इसमें उस समय की स्मृति है जब वर्ष का आरम्भ वर्षा से था। शरद मिला देने पर शरद विषुव (23 सितम्बर) जो कि वसंत विषुव (21 मार्च) से छ: महीने के अंतर पर पड़ता है, वर्षा के साथ आ जाता है, नाक्षत्रिक एवं ऋत्विक प्रेक्षणों के सम्मिलन से सुविधा हो जाती है (विषुव अर्थात जब उत्तर दक्षिण में दोलन करता सूर्य माध्य स्थिति में दिखे, ठीक पूरब में उगे, ठीक पश्चिम में अस्त हो।)
ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत एवं शिशिर को मिला दिया गया है: 
हेमन्‍तशिशिरयो: समासेन तावान्‍संवत्सर: संवत्सर: प्रजापति: प्रजापत्यायतनाभिरेवाभी राध्नोति य एवं वेद। 
आजकल के आधे कार्त्तिक से आधे फाल्गुन तक के इस कालखण्‍ड में माघ महीना पड़ता है जो कभी संवत्सर का आरम्भ मास था, वही शीत अयनांत वाली उत्तरायण अवधि जिसे अब लोग संक्रांति के रूप में मनाते हैं।
... 
आगे लिखते रहेंगे। हमारी मान्यताओं में जाने कितनी सहस्राब्दियों के अवशेष छिपे हुये हैं। सावधान विश्लेषण करें तो ! 

रविवार, 15 अप्रैल 2018

वर्षा+शरद, हेमन्‍त+शिशिर

By Meinolf Wewel [CC BY 3.0 (https://creativecommons.org/licenses/by/3.0)], from Wikimedia Commons
जमदग्नि एवं ऋग्वैदिक ऋचा 'य॒ज्ञाय॑ज्ञा वो अ॒ग्नये॑ गि॒रागि॑रा च॒ दक्ष॑से । प्रप्र॑ व॒यम॒मृतं॑ जा॒तवे॑दसं प्रि॒यं मि॒त्रं न शं॑सिषम् ॥' पर विचरते आगे बढ़ा तो उसी सूक्त में मुझसे एक खोई हुई कड़ी मिल गयी। शिशिर के पश्चात बसंत ऋतु आती है। शिशिर में पत्ते झड़ने आरम्भ होते हैं तो बसंत तक वृक्ष वसन वस्त्र हीन हो पुन: नये धारण करने लगते हैं, संक्रमण काल होता है नवरसा का। उस सूक्त की आठवीं ऋचा रोचक है: विश्वा॑सां गृ॒हप॑तिर्वि॒शाम॑सि॒ त्वम॑ग्ने॒ मानु॑षीणाम् । श॒तं पू॒र्भिर्य॑विष्ठ पा॒ह्यंह॑सः समे॒द्धारं॑ श॒तं हिमा॑: स्तो॒तृभ्यो॒ ये च॒ दद॑ति ॥ शत शरद जीने के आशीर्वाद तो आप ने बहुत देखे होंगे। वर्षा के पश्चात शरद ऋतु आती है। वर्षा नवजीवन हेतु सृष्टि को समर्थ बनाती है किंतु उसके साथ बहुत कुछ अवांछित भी रहता है। उसका अंत देख एक और सुखदायी शरद देखने की कामना में उस आशीर्वाद का मूल है। किंतु इस ऋचा में शतं हिमा की बात की गयी है। विद्वानों ने इसे शत हेमंत बताया है। हेमंत, हिम का अंत जिसके आगे कड़ाके की ठण्ड वाला शिशिर होता है। हेमंत ऋतु वर्ष की सबसे 'स्वास्थ्यकर' ऋतु है। स्वभाव से ही क्षयी शरीर इस ऋतु में पुष्ट हो विस्तारी देह बनती है। जठराग्नि प्रदीप्त होती है त्वमग्ने मानुषीणां को शतं हिमा से मिला कर देखें तो इस आशीर्वाद में स्वस्थ जीवन बिताते हुये एक और पुष्टिकारक ऋतु तक जी लेने की कामना छिपी हुई है। नवप्रवालोद्रमसस्यरम्यः प्रफुल्लोध्रः परिपक्वशालिः। विलीनपद्म प्रपतत्तुषारोः हेमंतकालः समुपागता-यम्‌॥ (कालिदास, ऋतुसंहार) ब्राह्मण ग्रंथों को देखें तो रोचक तथ्य दिखते हैं। शतपथ में वर्षा एवं शरद को मिला कर पाँच ऋतुओं की बात की गयी है:
लोको॑वसन्त॑ऋतुर्य॑दूर्ध्व॑मस्मा॑ल्लोका॑दर्वाची॑नमन्त॑रिक्षात्त॑द्द्विती॑यम॑हस्त॑द्वस्याग्रीष्म॑ऋतु॑रन्त॑रिक्षमेवा॒स्य मध्यमम॑हरन्त॑रिक्षमस्य वर्षाशर॑दावृतू य॑दूर्ध्व॑म्न्त॑रिक्षादर्वाची॑नं दिवस्त॑च्चतुर्थम॑हस्त॑द्वस्य हेमन्त॑ऋतुर्द्यउ॑रेवा॒स्य पञ्चमम॑हर्द्यउ॑रस्य शि॑शिर ऋतुरि॑त्यधिदेवतम्।
शतपथ के पुरुषमेध का प्रारम्भ पाँव से होता है और पाँव है ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ बसंत! शतपथ का वर्षा और शरद को मिलाना उस ऋग्वैदिक कूट कथ्य से भी जुड़ता है जिसमें इन्द्र वृत्र को मार कर सूर्य और वर्षा दोनों को नया जीवन देते हैं। पुरुषमेध में यह देह का केन्द्रीय भाग अर्थात कटि है। ऐसा क्यों? इसमें उस समय की स्मृति है जब वर्ष का आरम्भ वर्षा से था। शरद मिला देने पर शरद विषुव जोकि वसंत विषुव से छ: महीने के अंतर पर पड़ता है, वर्षा के साथ आ जाता है, नाक्षत्रिक एवं ऋत्विक प्रेक्षणों के सम्मिलन से सुविधा हो जाती है।
ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत एवं शिशिर को मिला दिया गया है: हेमन्‍तशिशिरयो: समासेन तावान्‍संवत्सर: संवत्सर: प्रजापति: प्रजापत्यायतनाभिरेवाभी राध्नोति य एवं वेद। आजकल के आधे कार्त्तिक से आधे फाल्गुन तक के इस कालखण्‍ड में माघ महीना पड़ता है जो कभी संवत्सर का आरम्भ मास था, वही शीत अयनांत वाली उत्तरायण अवधि जिसे अब लोग संक्रांति के रूप में मनाते हैं। पुन: ऐतरेय ब्राह्मण वाला अंश पढ़ें तो! ... शेष पुन: कभी। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारी मान्यताओं में जाने कितनी सहस्राब्दियों के अवशेष छिपे हुये हैं। डूबने की आवश्यकता है।

मंगलवार, 20 मार्च 2018

Spring Equinox and Festivals कल के वसंत विषुव के व्याज से पर्व चर्चा

Spring Equinox and Festivals
आप ने कुछ लोगों को सुना होगा कि विक्रम संवत तो वैशाख में लगता है, यह तो शक संवत है! वास्तव में वे सौर कैलेण्डर एवं सौर-चंद्र पञ्चाङ्ग की बातें कर रहे होते हैं, किञ्चित भ्रम में भी रहते हैं। 

पहले चार बिंदुओं को जानिये। धरा से सूर्य को देखें तो सूर्य उत्तर-दक्षिण-उत्तर वर्ष भर दोलन करते प्रतीत होते हैं। इस गति के कारण ही जाड़ा, गरमी, बरसात ऋतुयें होती हैं जिन्हें दो दो में बाँटने पर छ: हो जाती हैं।

कल प्रात:काल 21 मार्च को महाविषुव या वसंत विषुव का सूर्योदय होगा। इस दिन पृथ्वी के बीचोबीच की कल्पित रेखा विषुवत वृत्त वाला तल सूर्य के गोले के बीचोबीच से जाता है, सूर्योदय ठीक पूरब में, सूर्यास्त ठीक पश्चिम में। सम ऋतु – वसंत। निकट का पर्व – वासंती नवरात्र। शस्य देखें तो गेहूँ, रबी। रामनवमी के नौ रोटी। 

यहाँ से क्रमश: उत्तर की ओर झुकते सूर्य के कारण दिन के घण्टे बढ़ते जाते हैं, ताप भी बढ़ता जाता है। 21/22 जून को अधिकतम उत्तरी झुकाव होता है, भीषण उमस, वर्षा ऋतु का उद्घाटन। ग्रीष्म अयनांत, चलना रोक कर लौटना। 

वहाँ से पुन: दक्षिण की ओर माध्य स्थान की ओर लौटते सूर्य 22/23 सितम्बर को पुन: विषुव वाली माध्य स्थिति प्राप्त करते हैं। सम ऋतु – शरद। निकट का पर्व – शारदीय नवरात्र। कृषि उपज देखें तो धान, खरीफ शस्य। 
वहाँ से दक्षिण की ओर झुकते जाते हैं, दिन छोटे होने लगते हैं, शिशिर आ जाता है, पूस जाड़ तन थर थर काँपा। 21/22 दिसम्बर को अधिकतम दक्षिणी झुकाव होता है। शीत अयनान्त। 
यहाँ से उत्तरायण होते सूर्य पुन: 21 मार्च की स्थिति तक आते हैं। ऋतु चक्र चलता रहता है। 3 – 3 महीनों के अंतर से चार बिंदु। 
इतना समझ लेने पर अब जानिये कि अंतर्राष्ट्रीय कैलेण्डर सौर है अर्थात चंद्र गति से इसका कोई सम्बंध नहीं। विक्रम संवत सौर-चंद्र है अर्थात दोनों को मिला कर, समायोजित करते चलता है किंतु तिथियों एवं मास के लिये चंद्र गति पर ही निर्भर होता है, पूर्णिमा के दिन चंद्र नक्षत्र से मास का नाम होता है।
इस कारण आप पायेंगे कि अंतर्राष्ट्रीय कैलेण्डर के अनुसार अधिकतर पर्वों का दिनांक निश्चित नहीं होता किंतु चंद्र मास, पक्ष एवं तिथि निश्चित होते हैं। 
वस्तुत: चंद्र तिथि मास के अनुसार हम मूलत: सौर गति से उत्पन्न ऋतु आधारित पर्व ही मनाते हैं। पर्व को पोर, सरकण्डे की गाँठ से समझिये, एक निश्चित बिंदु। 
अब ऊपर लिखा पढ़िये तो! दो महत्त्वपूर्ण सौर बिंदुओं विषुव के निकट सम ऋतु में दोनों नवरात्र पड़ते हैं। 
ऐसा नहीं है कि पूर्णत: सौर पर्व उत्तर में नहीं मनाये जाते। संक्रांतियाँ वही तो हैं! एक समय ऐसा था शीत अयनांत एवं वसंत विषुव के बिंदु परवर्ती काल में अपनाये गयी राशि पद्धति की क्रमश: मकर एवं मेष से सम्पाती थे। सापेक्ष सूर्य की लगभग 26000 वर्ष की एक अन्य गति के कारण यह सम्पात खिसकता रहा एवं अब 23/24 दिनों का अंतर आ गया है। जो जन पहले अयनांत एवं विषुव मनाया करते थे, अब सौर संक्रांति मनाते हैं जिसकी तिथि, मास स्थिर नहीं होते, सौर कैलेण्डर का दिनाङ्क स्थिर होता है – 14/15 जनवरी (मकर संक्रांति) एवं 13/14 अप्रैल। 
14 अप्रैल को उत्तर में वैशाखी होती है – मेष संक्रांति, कतिपय पूरबी भागों में नया संवत्सर आरम्भ होता है तो दक्षिण में तमिळ नववर्ष –पूर्णत: सौर। वैशाखी नाम से स्पष्ट है कि पर्व का नाम चंद्र मास पर ही है। उस मास पूर्णिमा को चंद्र विशाखा नक्षत्र पर होता है। 

ऐसे समझिये कि सूर्य तो वर्ष भर एक समान गोला ही दिखता है, जबकि चंद्रमा कलायें दर्शाता है, वह भी दो पक्षों में। इस कारण चंद्रमा ने आकाश में उस कैलेण्डर की भाँति दिन बताने का काम किया जो भीत पर टँगा कैलेण्डर आज कल करता है। 


14 अप्रैल को ही भोजपुरी क्षेत्र में हर वर्ष पड़ता है – सतुआन (सतुवान, सतुवानि) पर्व, पूर्णत: सौर। सतुवा अर्थात रबी के उबले, सुखाये, भुने, पिसे विविध अन्न। आप के यहाँ कौन सा पर्व पड़ता है?


.... 

कल सूर्योदय अवश्य देखें तथा उनकी स्थिति किसी दूरवर्ती स्थायी वस्तु, संरचना इत्यादि के सापेक्ष मन में बिठा लें। वह आप को वर्ष भर वास्तविक पूरब की दिशा बताती रहेगी। उसके सापेक्ष वर्ष भर सूरज की उत्तरी दक्षिणी यात्रा का पञ्चाङ्ग तथा कैलेण्डर देखते हुये प्रेक्षण कर सकते हैं।



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अन्य रोचक लेख:
  1. नक्षत्र पहचानें - युगादि अवसर चैत्र चन्द्र सङ्ग Nakshatra Moon Chaitra Yugadi

रविवार, 11 मार्च 2018

नक्षत्र पहचानें - युगादि अवसर चैत्र चन्द्र सङ्ग Nakshatra Moon Chaitra Yugadi

Nakshatra Moon Chaitra Yugadi
नक्षत्र पहचानें प्रथम भाग , द्वितीय भाग
... 
(इस लेख में हम बहुत ही सरलीकृत ढाँचे में चैत्र महीने की रात के माध्यम से कुछ मूलभूत तथ्य समझने के प्रयास करेंगे।)
चंद्रमा हम पृथ्वीवासियों के सबसे निकट का पिण्ड है, आकर्षक भी है, घटता बढ़ता कलायें (Moon Phases) जो दिखाता है! 
सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक का समय एक दिन कहलाता है जिसे आजकल 24 घण्टों में बाँटा गया है। प्राचीन भारत में इसे 30 मुहूर्तों में बाँटा गया था अर्थात 1 मुहूर्त = 24x60/30 = 48 मिनट।
देखा गया कि रात के आकाश में चंद्रमा एक निश्चित स्थान पर पुन: लौटने में 27 से 28 दिन का समय लगाता है। निश्चित स्थान को उन तारों के माध्यम से जाना गया जो अपेक्षतया स्थिर प्रतीत होते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि चन्‍द्रमा पृथ्वी का एक चक्कर इस अवधि में पूरी करता है (लगभग 27 दिन 9⅔ मुहूर्त)। प्रेक्षण की सुविधा के लिये रात का जो अर्द्धगोलीय आकाश सिर के ऊपर दिखता है, उस पर चंद्रमा के दिन प्रतिदिन के आभासी पथ के 27 भाग कर लिये गये तथा उन्हें नाम दिया गया नक्षत्र।
नक्षत्र नाम का उत्स है न: क्षरति अर्थात जिसका क्षरण न हो, जो बना रहे क्योंकि उसके ऐसे स्थिर पृष्ठभूमि के सापेक्ष ही गति का अध्ययन किया जा सकता है। उन स्थिर खण्डों को चमकते तारा या तारकसमूहों के नाम दे दिये गये यथा कृत्तिका खण्ड में सर्वदा कृत्तिका तारा समूह दिखाई देगा। जब चंद्र उस खण्ड में पहुँचेगा तो कहेंगे कि चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र पर है। प्रतीकात्मक रूप में इसे ही कहा गया कि चंद्रमा की 27 पत्नियाँ हैं जिनमें से प्रत्येक के यहाँ वह क्रम से एक एक रात रहता है।
चंद्रमा का संक्षिप्त नाम मा है, चंदा मा मा से समझें। मा के सापेक्ष, सहित जो अवधि थी वह मास कहलाई – महीना, 27.3 दिनों की अवधि। चूँकि यह स्थिर नक्षत्रों के सापेक्ष थी अत: नाक्षत्र मास कही जाती है।
सापेक्षता देखें तो सूर्य भी सम्मिलित हो जाते हैं। जहाँ चंद्र पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है, वहीं पृथ्वी चंद्र को साथ लिये सूर्य की परिक्रमा कर रही है। सूर्य के प्रकाश से ही चंद्रमा प्रकाशित होता है। इन दो गतियों के कारण ही चंद्रमा की कलायें, घट बढ़ दिखती है।
कला नाम को कल अर्थात लघु भाग से समझें। कल कल बहती नदी हो या कलाओं के साथ चंद्रमा, मानों लघु भागों को मिला कर ही उनका प्रवाह, गति या रूप बनता है।
यदि आप पूर्णिमा के दिन की साँझ देखें तो बहुत ही मनोहारी दृश्य दिखता है। पश्चिम में सूर्य लाल हुये डूब रहे होते हैं तो उनके विपरीत पूरब में पूर्ण चंद्र उग रहे होते हैं। यदि हम पूर्ण वृत्त को 360 अंश में बाँटें तो कहेंगे कि दृश्य आकाशीय अर्द्धवृत्त के व्यास के दो विपरीत बिंदुओं पर स्थित सूर्य एवं चंद्र 180 अंश की दूरी पर होते हैं।
इसका विपरीत तब होगा जब चंद्रमा गति करते करते सूर्य के साथ जा पहुँचेगा अर्थात जब दोनों एक साथ होंगे, एक ही बिंदु पर। आमने सामने होने पर चंद्र सूर्य के प्रकाश से पूरा चमकता है एवं साथ होने पर विराट सूर्य के प्रभा वलय में छिपा रहता है, नहीं दिखता जिसे कहते हैं अ-मा, मा नहीं, चंद्रमा नहीं, अमावस्या।

इन दो विपरीत बिंदुओं तक पहुँचने में चंद्रमा को लगभग 15 दिन लगते हैं अर्थात पुन: पूर्णिमा तक पहुँचने में लगभग 30 दिन लगने चाहिये जोकि वस्तुत: 29 दिन 16 मुहूर्त का होता है। पूर्णिमा से अमा एवं पुन: अमा से पूर्णिमा तक की अवधियाँ दो पक्ष कहलाती हैं – कृष्ण पक्ष क्योंकि इसमें चन्‍द्र पूर्ण से शून्य तक घटता जाता है एवं शुक्ल पक्ष क्योंकि उसमें चन्‍द्र शून्य से बढ़ता हुआ पुन: पूर्ण अवस्था को प्राप्त कर लेता है। चूँकि इस मास में सूर्य एवं पृथ्वी दोनों के सापेक्ष चंद्र की गति है अत: यह संयुत मास कहलाता है। इसे सामान्यत: चंद्र मास भी कहते हैं। चंद्र मासों के नाम पूर्णिमा के दिन उसकी नक्षत्र स्थिति से रखे गये हैं यथा जिस मास में पूर्णिमा का चंद्र कृत्तिका पर होता वह कार्त्तिक, जिसमें मघा पर होगा वह माघ इत्यादि।
प्रश्न यह है कि नाक्षत्र मास एवं संयुत मास की अवधियों में अंतर क्यों है? ऐसा इस कारण है कि धरती भी तो सूर्य की परिक्रमा करती आगे बढ़ रही होती है! इस कारण सूर्य निर्भर समान कला या समान कोणीय स्थिति तक पहुँचने के लिये चंद्रमा को अतिरिक्त चलना पड़ता है, यह अवधि लगभग 2 दिन 7 मुहूर्त होती है जिससे चंद्रकला प्रेक्षण आधारित संयुत मास 29 दिन 16 मुहूर्त का होता है जिसे गणना सुविधा के लिये 30 दिन का मान लिया गया।
दिन को भी 30 भागों में बाँट कर 48 मिनट की इकाई ‘मुहूर्त’ अपनाने के पीछे भी यही कारण है।
संयुत मास का प्रत्येक भाग तिथि कहलाया। पूर्णिमा, अमावस्या एवं दोनों पक्षों के चौदह चौदह दिन प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया आदि मिला कर कुल तीस तिथियाँ होती हैं। शून्य से 180 एवं पुन: लौट कर वहीं आने में 360 अंश हो जाते हैं अर्थात एक तिथि वह हुई जिसमें 360/30 = 12 अंश का कोणीय अंतर पूरा कर लिया जाता है। स्पष्ट है कि यह वर्गीकरण सूर्योदय सूर्यास्त से कोई सम्बंध नहीं रखता। परिपथ वैभिन्न्य, सरलीकरण एवं गति वैविध्य को मिला कर प्रभाव यह होता है कि किसी तिथि की अवधि निश्चित न हो एक परास में होती है, ऐसा भी होता है कि तिथि का क्षय हो जाता है या तिथि बढ़ भी जाती है क्योंकि दिन को सूर्योदय से आरम्भ मानने पर ऐसा हो सकता है कि सूर्योदय के पूर्व 12 अंश की यात्रा आरम्भ हो एवं अगले सूर्योदय से पहले ही पूरी हो जाय; यह भी कि सूर्योदय के पश्चात हो एवं अगले सूर्योदय से आगे तक चलती रहे। 360 अंश में ही 27.3 दिन भी होने हैं तथा 29.5 भी।
यदि यात्रा को प्रेक्षण से समझना चाहें तो इस चैत्र मास पूर्णिमा के दिन से प्रतिदिन चंद्रोदय का समय देखते जायें। आप पायेंगे कि प्रतिदिन चंद्र प्राची (पूरब) में बिलम्ब से उग रहा है। यह अंतराल आरम्भ में  4/3 मुहूर्त से होता हुआ एकादशी तक 1 मुहूर्त तक क्रमश: बढ़ेगा। अगले दिन सूर्योदय के पश्चात भी चंद्र दिखता रहेगा। चंद्रोदय से अस्त तक का समय घटता रहेगा। कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी/चतुर्दशी तक चंद्र दिखने के पश्चात अमावस्या के दिन दिखेगा ही नहीं!
आप ने देखा होगा कि सूर्य उत्तर या दक्षिण की ओर झुके हुये उगता है। इन दो झुकावों के अंतिम बिंदुओं के बीच वर्ष भर सूर्य दोलन करता सा लगता है। वे दो बिंदु अयनांत कहलाते हैं। अयन अर्थात गति, अंत अर्थात उनसे आगे झुकाव नहीं बढ़ना। ऐसे में वर्ष में दो बिंदु ऐसे आते हैं जब झुकाव शून्य हो जाता है तथा सूर्य ठीक पूरब में उगते हैं। ये दो बिंदु विषुव कहलाते हैं। सूर्य की दक्षिणी चरम झुकाव से उत्तर की गति उत्तरायण कहलाती है तो उत्तरी चरम झुकाव से दक्षिण की गति दक्षिणायन।
मार्च में जो विषुव 20/21 को पड़ता है वह वसंत विषुव कहलाता है। इसे महाविषुव भी कहते हैं। इस बिंदु के निकट ही वर्ष का आरम्भ बिंदु पड़ता है, युगादि, नववर्ष। वसंत की मधु सम ऋतु होने के कारण ही इसे यह सम्मान प्राप्त हुआ। मार्च में ऋतु अच्छी होने के कारण आकाशीय प्रेक्षण में भी सुभीता रहता है।
इस वर्ष तीन ग्रह – गुरु, मंगल एवं शनि को चंद्र के साथ आकाश में प्रात:काल 5 बजे उठ कर देखा जा सकता है। शनि का सूर्य परिक्रमा काल 29.46 वर्ष, गुरु का 11.86 वर्ष एवं मंगल का 1.88 वर्ष होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि:
शनि एक नक्षत्र पर 29.46x365.25/27 = 399 दिन, गुरु 11.86x365.25/27 = 160 दिन एवं मंगल 1.88x365.25/27 = 25 दिन रहते हैं। इतनी लम्बी अवधि के कारण इस मास प्रेक्षण हेतु इन्हें भी नक्षत्रों की भाँति स्थिर ही माना जा सकता है।
प्रात:काल पाँच से सवा पाँच बजे की चंद्रमा की इनके सापेक्ष स्थितियाँ इस चित्र में दर्शायी गयी हैं। पूरब में देखिये तो प्रतिदिन। चंद्रमा की इन स्थितियों को मिला कर जो रेखा बनती है वही क्रान्‍तिवृत्त है जिस पर दिन में सूर्य चलता हुआ प्रतीत होता है। साथ में आप विविध नक्षत्रों विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, धनिष्ठा, श्रावण, अभिजित एवं विविध तारासमूहों हंस, गरुड़, धनु, ऐरावत (वृश्चिक) को भी देख सकते हैं।
इस बार 18 मार्च को वर्ष प्रतिपदा है, युगादि, चैत्र शुक्ल 1, नववर्ष, नवरात्र आरम्भ।
इस दिन से चन्द्र कहाँ दिखेगा?
जैसा कि पहले बताया है, ध्यान रखें कि अब चंद्र को बढ़ना है। ऊपर के चित्र से स्पष्ट है कि एक निश्चित समय पर चंद्र प्रतिदिन क्षितिज के निकट चलता चला जा रहा है। अमावस्या के दिन सूर्य चंद्र दोनों साथ होंगे, साथ साथ उगेंगे तथा अस्त होंगे। स्पष्ट है कि चंद्र सूर्य के साथ होने के कारण कभी नहीं दिखेगा। पूर्णिमा के दिन उलट स्थिति होती है, सूर्य से ठीक उलट 180 अंश का अंतर होने के कारण चंद्र रात भर दिखता है। इन दो सीमाओं की तुलना करें तो पायेंगे कि चंद्र तब ही दिखेगा जब सूर्य अस्त रहे तथा चंद्र क्षितिज के ऊपर। साथ ही कला भी ऐसी होनी चाहिये कि प्रकाशित भाग दृश्यमान हो। प्रतिपदा को ऐसा नहीं हो पाता।
दूज का चाँद मुहावरा है सुंदरता के लिये तथा दिखने में कठिनाई के लिये भी। चंद्र प्रेक्षण उसी तिथि से हो सकता है।
अब किञ्चित गणित। सरल ही है।
चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा पश्चिम से पूरब दिशा में करता है जिसमें समय लगता है 27.3 दिन जबकि पृथ्वी भी उसी दिशा में अपनी धुरी पर घूम रही है जिसमें समय लगता है मात्र 1 दिन अर्थात पृथ्वी की यह गति चंद्र की परिक्रमण गति की तुलना में बहुत अधिक है। इस कारण चंद्र भी सदा अन्य पिण्डों की भाँति ही पूरब में उगता एवं पश्चिम में अस्त होता है।
360 अंश को 30मुहूर्तx48 या 24घण्टेx60 से भाग दें तो पायेंगे कि धरती एक अंश 4 मिनट में घूम जाती है। चंद्रमा परिक्रमा पथ पर एक दिन में 13.2 अंश (360/27.3) आगे बढ़ चुका होता है। इस बढ़े हुये अंश को पूरा करने के लिये धरती को 13.2x4 मिनट अर्थात लगभग 53 मिनट लगते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि चंद्रोदय प्रतिदिन पिछले दिन से 53 मिनट पश्चात होगा, ऐसा ही अस्त के साथ भी स्वत: हो जायेगा। जब पूरी परिक्रमा कर लेगा तो 27.3x53 ~ 1440 मिनट अर्थात 24 घण्टे का चक्र पूरा कर पुन: अपने वास्तविक उदय समय को पा लेगा, चक्र चलता रहेगा।
इसी तथ्य का उपयोग चंद्र दर्शन में कर सकते हैं। अमावस्या के पश्चात प्रतिपदा को चंद्र का उदय सूर्य के उदय से 53 मिनट पश्चात होगा। द्वितीया को 106 मिनट पश्चात। चूँकि सूर्य पहले से ही आकाश में चमक रहा होगा, अन्य आकाशीय पिण्‍डों की भाँति ही चंद्र भी नहीं दिखेगा। ऐसा प्रतिदिन होगा।
तो क्या करें?
स्पष्ट है कि हमें अस्त के समय देखना होगा। तब क्या होगा? सूर्य से 106 मिनट पश्चात चंद्र का अस्त होगा अर्थात सूर्य प्रकाश के अभाव में रात में अन्य पिण्डों की भाँति ही चंद्र भी दिखेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि लगभग सात सवा सात बजे साँझ को पश्चिमी आकाश में आँखें गड़ाये रहें तो चन्द्र का निरीक्षण कर पायेंगे।
शुक्ल पक्ष में पश्चिमी आकाश में चंद्र प्रेक्षण में हमारा सहयोगी होगा परम तेजस्वी शुक्र, साँझ का ‘तारा’, हालाँकि यह ग्रह है किंतु नाम रूढ़ हो गया है। क्षितिज के पास इस 'तारे' के निकट ही बुध ग्रह होगा तथा इन दोनों से किञ्चित ऊपर आँख गड़ा कर देखने पर आकाश स्वच्छ हो तो दूज का चाँद दिख जायेगा।
षष्ठी को चन्‍द्रदेव अपनी प्रिय पत्नी रोहिणी के साथ होंगे तथा उससे आगे क्रमश: पूरब दक्षिण की ओर बढ़ते जायेंगे।
चैत्र के इस पश्चिमी आकाश में आप को एक साथ नक्षत्र मण्डल की अंतिम रेवती के साथ अश्विनी से आरम्भ कर आर्द्रा तक के नक्षत्र दिखेंगे। रुद्र तथा स्रोतस्विनी होंगे ही।
पूर्णिमा आते आते चन्द्र पुन: पूरब में होगा, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र पर। आठ बजे के आसपास उस समय साथ में दिखेंगे – मघा, पूर्वा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति एवं उत्तर में सप्तर्षि भी।
पूर्णिमा से आगे वैशाख महीने में प्रेक्षण पुन: वैसे ही पूरब दिशा में करते रह सकते हैं जैसे इस लेख के आरम्भ में किया था।
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चलते चलते :
आप चंद्र देख कर बता सकते हैं कि शुक्ल पक्ष का है या कृष्ण पक्ष का। चंद्र वृत्त की परिधि का अंश सर्वदा सूर्य की ओर रहता है जबकि घटता बढ़ता अंश उससे विपरीत। यदि वह पश्चिम दिशा में है तो हुआ शुक्ल पक्ष, यदि पूरब दिशा में है तो हुआ कृष्ण पक्ष।
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बुधवार, 23 नवंबर 2016

नाक्षत्रिक नटराज

पूर्णिमान्त आधारित नामकरण में महीने का अंत पूर्णिमा से होता है, उत्तर के अधिकांश भाग में यह प्रचलित है। गई पूर्णिमा को जब कि चंद्र कृत्तिका नक्षत्र पर पहुंचे, कार्तिक मास समाप्त हो गया और मार्गशीर्ष (अगहन) प्रारम्भ हो गया जो कि अगली पूर्णिमा तक रहेगा। उस दिन चन्द्र मृगशिरा (Orion) नक्षत्र पर होंगे। इसी से महीना मार्गशीर्ष कहलाता है।

 इसके एक और नाम अगहन का सम्बन्ध उस समय से है जब महाविषुव (Spring equinox) के दिन सूर्य मृगशिरा नक्षत्र पर होते और नया साल प्रारम्भ होता अर्थात मृगशिरा साल का अगुवा था।

दक्षिण में अमान्त का चलन है अर्थात अमावस्या के दिन महीना समाप्त होता है और शुक्ल पक्ष एक से प्रारम्भ। पूर्णिमा महीने के बीच में पड़ती है। अत: यहां कार्तिक अभी भी चल रहा है जो अगली अमावस्या को समाप्त हो जाएगा। 

किसी समय परंपरा में मृगशिरा नक्षत्र प्रजापति का रूप था जिसका मस्तक लुब्धक नक्षत्र (Sirius) रूपी रुद्र ने काट दिया था। उस नाक्षत्रिक रूपक का संबंध महाविषुव की खिसकन से था।

दक्षिण भारत में मृगशिरा, आर्द्रा और रोहिणी नक्षत्रों के साथ और नीचे का क्षेत्र ले 'विराट नटराज' का रूपक मिलता है। रोहिणी (aldebaran) और अग्नि हुतभुज (Alpha स्टार) एवं [Hyades] का क्षेत्र वैदिक यज्ञीय अग्नि से संबन्धित था। उसका नटराज का प्रज्वलित खप्पर हो जाना! कल आकाश को घूरते मेरे रोंगटे खड़े हो गये। 

तो आज रात आप नटराज का दर्शन करेंगे न? दक्षिण पूर्वी आकाश साढ़े दस के पश्चात?

सोमवार, 20 जून 2016

नक्षत्र परिचय - 2 (ग्रीष्म अयनांत के आस पास)

पहले भाग में हम बता चुके हैं कि लगभग फरवरी से लेकर जुलाई तक का समय नक्षत्र पर्यवेक्षण के लिये उपयुक्त होता है क्यों कि आकाश में बादल नहीं होते, ऋतु भी उपयुक्त होती है, धुन्ध और शीत अनुपस्थित होते हैं। वास्तव में जुलाई का महीना फरवरी की तरह लगभग ही उपयुक्त होता है, कारण यह कि जून के अन्तिम सप्ताह से ही वर्षा ऋतु साँकल बजाने लगती है।

अब तक हम इन नक्षत्रों को कुछ प्रमुख तारकसमूहों के साथ पहचान चुके हैं:     
स्वाति
चित्रा
हस्त
उत्तराफाल्गुनी
मघा
पूर्वाफाल्गुनी
अभिजित
 अब आगे बढ़ते हैं। 
जून ग्रीष्म अयनांत का महीना है। 20/21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य अपने उत्तरी झुकाव के चरम पर होते हैं और सबसे बड़ा दिन होता है। इस वर्ष संयोग अच्छा है। 20 जून को पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र पर होंगे अर्थात जेठ महीने(पूर्णिमांत) का अंत हो जायेगा। 21 जून को ग्रीष्म अयनांत के दिन आषाढ़ का महीना प्रारम्भ होगा। जेठ के महीने में सूर्य की तपन अधिकतम होती है। गाँव गिराम में कहते हैं मिरगा दहकता! मिरगा क्यों? क्यों कि इस समय सूर्य मृगशिरा नक्षत्र में होते हैं।
21 जून को ही सूर्य मृगशिरा से आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करेंगे और ईंख की खेती करने वाले किसान ‘अदरा की गुड़ाई’ की तैयारी प्रारम्भ कर देंगे। इस नक्षत्र का नाम संकेतक है कि वातावरण में वर्षा की प्रस्तावना में आर्द्रता अर्थात नमी बढ़ जाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि रामायण काल में कुछ क्षेत्रों में नया वर्ष वृष्टि प्रारम्भ से लगता था और इसीलिये संवत्सर ‘वर्ष’ कहलाता था। वे बताते हैं कि महाविषुव के स्थान पर नववर्ष का प्रारम्भ वर्षा के संकेतक ग्रीष्म अयनांत के दिन अर्थात 21 जून से माना जाता था।
21 जून के दिन उठिये, चार बजे भोर में।  पूरब और उत्तरपूर्व दिशाओं के बीच खड़े हो जाइये। उत्तरपूर्व में सबसे अधिक चमकते दिखेंगे ब्रह्महृदय (Capella), ब्रह्मबेला नाम ध्यान में आया?

मध्य दिशा में मन्द लपलप करता सा मन्द तारकपुंज दिखेगा। यही है देहाती ‘झुलनिया’ या ‘कचपचिया’ या वैदिक कृत्तिका नक्षत्र (pleiades) । जहाँ इसकी टिमटिम और द्युति के कारण सामान्य जन ने नाक में पहना जाने वाला गहना समझा वहीं वैदिक ऋषियों ने अग्नि की लपलप जिह्वा से साम्य पाया – अग्निर्न: पातु कृत्तिका।
 इसके कोरी आँख से दिखने वाले छ: तारों के काटने वाले पुराने शस्त्र कटार से आकृति साम्य के कारण कृत्तिका कहा गया। यही षडानन कार्तिकेय को दूध पिलाने वाली  मातायें हैं जिनकी महिमा अपरम्पार है। 
एक ब्राह्मण ग्रंथ में संवत्सर प्रारम्भ के समय इनके प्राची में अटल रहने के उल्लेख ने ही भारतीय परम्परा के इसाई कालनिर्धारण की धज्जियाँ उड़ा दीं। तैत्तिरीय संहिता का नक्षत्रमंडल इन्हीं ने प्रारम्भ होता है, आज कल की तरह अश्विनी से नहीं। इनके बारे में विस्तार से यहाँ भी बताया गया है।
इनके बाद सबसे आसान पहचान है अश्विनी या अश्वायुज के दो तारों (Sharatan) की जो कि लगभग पूरब में 30 से 40 अंश के बीच दिखेंगे। कुछ लोग नीचे वाले तारे की अपेक्षा ऊपर के मन्द समांतर तारे को युग्म का भाग बताते हैं। वैदिक जन इनकी प्रशंसा में बहुत छन्द रचे हैं। ये भूलों को मार्ग दिखाने वाले हैं और देवताओं के वैद्य भी – यौ देवानां भिषजौ हव्यवाहौ, विश्वस्य दूतवमृतस्य गोपौ।
अश्विनियों से ऊपर प्राची में ही मीन राशि के दो तारे दिखते हैं जिनका स्थान नक्षत्र मण्डल की अंतिम रेवती का है। कृत्तिका और अश्विनियों के बीच दिखती हैं भरणी (Torcularis)। यदि आप साढ़े चार बजे तक रुक गये और भूदृश्य स्पष्ट हो तो क्षितिज के पास दिख जायेंगे बुध ग्रह और रोहिणी(Aldebaran) नक्षत्र - साथ साथ। महाभारत काल में महाविषुव मृगशिरा नक्षत्र से खिसक कर रोहिणी नक्षत्र पर आ चुका था। रोहिणी के बारे में कुछ और इस लिंक पर।

रात पौने दस बजे के आसपास दक्षिण से दक्षिण-पूर्वी आकाश में चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, अनुराधा के साथ मूल नक्षत्र। साथ में वृक और वृत्र तारामण्डल। पूरब में गरुड़ (Aquila, Altair)।
 पहले दक्षिण में देखिये, वृक और वृत्र तारासमूह अपने आकार और तारों की बहुलता से स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं।
 नीचे क्षितिज के पास दो बहुत तेज चमकते ताराओं से ऊपर जाइये, चित्रा (Spica) मिलेंगी। पूरब की ओर बढ़िये। दक्षिण-पूर्व से थोड़ा पहले ही वृश्चिक या रामायण में वर्णित ‘ऐरावत की सूँड़’(Scorpio) स्पष्ट दिखती है। इसी में अनुराधा और ज्येष्ठा हैं। बिच्छू का डंक ही मूल नक्षत्र है। चित्रा और मूल को मिलाने वाली रेखा पर तुला राशि में हैं विशाखा (Brachium)। 
ठीक पूरब दिशा में हैं गरुड़ जी जिन्हें एक तेज चमकते तारे के परिवेश में देखा जा सकता है। पूर्ण चन्द्र के प्रकाश के कारण थोड़ी कठिनाई हो सकती है। मई उत्तरार्द्ध से जून पूर्वार्द्ध तक रात साढ़े ग्यारह बजे से नौ बजे के बीच कृष्ण पक्ष में इन्हें आसानी से देखा जा सकता है।

( क्रमश: )