बुधवार, 1 अप्रैल 2020

Ramayan Notes रामायण वार्त्तिक - १

माता कौसल्या का औषधि ज्ञान
इक्ष्वाकु हों या अन्य, क्षत्राणियाँ भिषग विद्या में पारङ्गत होती थीं। क्षत होने पर प्राथमिक चिकित्सा करने में कुशल, जड़ी बूटियों की ज्ञाता।
कौसल्या तो अथर्वण विदुषी थीं। जिस विशल्यकरणी औषधि का उल्लेख युद्ध में क्षत विक्षत राम लक्ष्मण को स्वस्थ करने हेतु हुआ है, उसे देवी कौसल्या ने वनगमन के पूर्व राम के हाथों में मन्त्र पढ़ते हुये रक्षासूत्र में पिरो कर बाँधा था -
इति पुत्रस्य शेषाश्च कृत्वा शिरसि भामिनी, गन्धांश्चापि समालभ्य राममायतलोचना 
ओषधीम् च अपि सिद्ध अर्थाम् विशल्यकरणीम् शुभाम्, चकार रक्षाम् कौसल्या मन्त्रैः अभिजजाप च

(वसागोलकों से पूछ कर देखें, उत्तर मिलेगा कि स्त्री को वेद का अधिकार नहीं है।)
कविहृदय लक्ष्मण
लक्ष्मण कविहृदय थे। उन्होंने अद्भुत ऋतुवर्णन किये हैं । 
[क्या आप को उनके इस गुण से किसी वसागोलक कथावाचक ने कभी परिचय कराया? कथावाचक आप को १४ वर्ष न सोने का गल्प सुनायेगा, लक्ष्मणरेखा बतायेगा, शबरी के जूठे बेरों पर मुँह बिचकाना बतायेगा और हास्यास्पद रूप में उग्रता भी। कथावाचकों ने समस्त इतिहास की निर्मम हत्या करुणा व प्रेम के आँसू बहाते हुये कर दी! यही सच है।]
'कवि' लक्ष्मण का हेमंत ऋतु वर्णन -
अयम् स कालः संप्राप्तः प्रियो यः ते प्रियंवद
 अलंकृत इव आभाति येन संवत्सरः शुभः
नीहार परुषो लोकः पृथिवी सस्य मालिनी
जलानि अनुपभोग्यानि सुभगो हव्यवाहनः
नव आग्रयण पूजाभिर्भ्यर्च्य पितृ देवताः
कृत आग्रयणकाः काले सन्तो विगत कल्मषाः
प्राज्यकामा जनपदाः संपन्नतर गो रसाः
विचरन्ति महीपाला यात्र अर्थम् विजिगीषवः
सेवमाने दृढम् सूर्ये दिशमन्तक सेविताम्
विहीन तिलका इव स्त्री न उत्तरा दिक् प्रकाशते
प्रकृत्या हिम कोश आढ्यो दूर सूर्याः च सांप्रतम्
यथार्थ नामा सुव्यक्तम् हिमवान् हिमवान् गिरिः
अत्यन्त सुख संचारा मध्याह्ने स्पर्शतः सुखाः
दिवसाः सुभग आदित्या: छ्हाया सलिल दुर्भगाः
मृदु सूर्याः सनीहाराः पटु शीताः समारुताः
शून्य अरण्या हिम ध्वस्ता दिवसा भान्ति सांप्रतम्
निवृत्त आकाश शयनाः पुष्यनीता हिम अरुणाः
शीता वृद्धतर आयामः त्रि यामा यान्ति सांप्रतम्
रवि संक्रान्त सौभाग्यः तुषार अरुण मण्डलः
निःश्वास अन्ध इव आदर्शाः चंद्रमा न प्रकाशते
ज्योत्स्ना तुषार मलिना पौर्णमास्याम् न राजते
सीता इव च आतप श्यामा लक्ष्यते न तु शोभते
प्रकृत्या शीतल स्पर्शो हिमविद्धाः च सांप्रतम्
प्रवाति पश्चिमो वायुः काले द्वि गुण शीतलः
बाष्पच्छ्हन्नानि अरण्यानि यव गोधूमवंति च
शोभन्ते अभ्युदिते सूर्ये नदद्भिः क्रौञ्च सारसैः
खर्जूर पुष्प आकृतिभिः शिरोभिः पूर्ण तण्डुलैः
शोभन्ते किंचिद् आलंबाः शालयः कनक प्रभाः
मयूखैः उपसर्पद्भिः हिम नीहार संवृतैः
दूरम् अभ्युदितः सूर्यः शशांक इव लक्ष्यते
अग्राह्य वीर्यः पूर्वाह्णे मध्याह्ने स्पर्शतः सुखः
संरक्तः किंचिद् आपाण्डुः आतपः शोभते क्षितौ
अवश्याय निपातेन किंचित् प्रक्लिन्न शाद्वला
वनानाम् शोभते भूमिर् निविष्ट तरुण आतपा
स्पृशन् तु सुविपुलम् शीतम् उदकम् द्विरदः सुखम्
अत्यन्त तृषितो वन्यः प्रतिसंहरते करम्
एते हि समुपासीना विहगा जलचारिणः
न अवगाहन्ति सलिलम् अप्रगल्भा इव आवहम्
अवश्याय तमो नद्धा नीहार तमसा आवृताः
प्रसुप्ता इव लक्ष्यन्ते विपुष्पा वन राजयः
बाष्प संचन्न सलिला रुत विज्ञेय सारसाः
हिमार्द्र वालुकैः तीरैः सरितो भान्ति सांप्रतम्
तुषार पतनात् चैव मृदुत्वात् भास्करस्य च
शैत्यात् अग अग्रस्थम् अपि प्रायेण रसवत् जलम्
जरा जर्जरितैः पत्रैः शीर्ण केसर कर्णिकैः
नाल शेषा हिम ध्वस्ता न भान्ति कमलाकराः

पञ्चवटी में जब भैया भाभी को स्नान कराने हेतु लक्ष्मण ले जाते हैं तो नदी किनारे यह वर्णन राम से करते हैं।
[विश्वामित्र का गाथा गायक गाथिन कुल हो, इक्ष्वाकुओं की घुमंतू कुशीलव गायन परम्परा हो, कुरुओं के सूत गायक हों या सहस्र वर्ष पीछे परमारों के यशगायक पँवरिये; क्षत्रियों का काव्य से प्रेम उतना ही प्रबल रहा जितना आन्विक्षिकी व ब्रह्मविद्या से। कालप्रवाह में सब समाप्त हो गया। कान्यकुब्जाधिपति महाराज जयचंद्र के यश को धूमिल करने वाला गल्पी चंद्रबरदाई चारण उस विकृत होती परम्परा का एक उदाहरण है।]
लक्ष्मण का भरत प्रेम  
लक्ष्मण कहते हैं, भैया! आप से दूर हैं भरत, राज करना था उन्हें किंतु आप ही के समान समस्त भोगों को त्याग नियताहारी तापस व्रत अपनाये हुये हैं।
आह, वे कोमल श्यामवदन कैसे हेमंत की शीत में सरयू के शीतल जल में रात रहते ही स्नान करते होंंगे, कैसे इस शीत में भुँइया सोते होंगे! ...
... हेमन्त का वर्णन करते करते कविहृदय लक्ष्मण का ध्यान दूर अपने तापस भ्राता भरत पर चला गया। शब्दप्रयोग देखेंं- शेते शीते महीतले! अंतर का दाह हृदय चीर कर शीत की ठिठुरन भरता चला जाता है!
अस्मिन् तु पुरुषव्याघ्र काले दुःख समन्वितः 
तपश्चरति धर्मात्मा त्वत् भक्त्या भरतः पुरे
त्यक्त्वा राज्यम् च मानम् च भोगांश्च विविधान् बहून्
तपस्वी नियताहारः शेते शीते महीतले
सोऽपि वेलाम् इमाम् नूनम् अभिषेक अर्थम् उद्यतः
वृतः प्रकृतिभिर् नित्यम् प्रयाति सरयूम् नदीम्
अत्यन्त सुख संवृद्धः सुकुमारो हिमार्दितः
कथम् तु अपर रात्रेषु सरयूम् अवगाहते
पद्मपत्रेक्षणः श्यामः श्रीमान् निरुदरो महान्
धर्मज्ञः सत्यवादी च ह्री निषेधो जितेन्द्रियः
प्रियाभिभाषी मधुरो दीर्घबाहुः अरिन्दमः
संत्यज्य विविधान् भोगान् आर्यम् सर्वात्मना आश्रितः
जितः स्वर्गः तव भ्रात्रा भरतेन महात्मना
वनस्थम् अपि तापस्ये यः त्वाम् अनुविधीयते

कहते कहते माता कैकेयी के लिये लक्ष्मण कटु हो जाते हैं - कथम् नु सा अम्बा कैकेयी तादृशी क्रूरदर्शिनी! 
तब राम की प्रशांत वाणी फूट पड़ती है -
न ते अम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या कथञ्चन
ताम् एव इक्ष्वाकु नाथस्य भरतस्य कथाम् कुरु

[और मुझे कुरुक्षेत्र में अर्जुन मोह का प्रबोधन करते कृष्ण दिखने लगते हैं - कुत: त्वा कश्मलम्‌ इदम्‌ विषमे समुपस्थितम्‌ ! इतना मनोविज्ञान भरा पड़ा है किंतु कोई कथावाचक नहीं सुनायेगा, कदापि नहीं!]
अंगद अभियान
राजनीतिक दृष्टि से अंगद को भेजना उपयुक्त था - एक राजकुमार का सन्देश ले दूसरा राजकुमार तीसरे राजा के यहाँ औपचारिक रूप से भेजा गया। राम ने राजमर्यादा का पालन किया। साथ ही अङ्गद का दौत्य युद्धपूर्व मनोवैज्ञानिक आक्रमण भी था।
राम के सन्देश में रावण को सुनाया गया - वरदान बहुत हो गया, तुम्हें मार कर अब महर्षियों व राजर्षियों की गति दूँगा। मेरी पत्नी का हरण कर तुमने काल को आमन्त्रित किया है, उसे नहीं लौटाने पर मैं लङ्का को अराक्षस बना दूँगा और विभीषण भावी राजा होंगे।
संकेत था कि अभी भी जो टूट कर आना चाहते हैं, आ जायें। अपनी शक्ति व बल विश्वास दर्शा शत्रु में भय व्याप्त करना था, हुआ भी वही।
गृह्यताम् एष दुर्मेधा वध्यताम् - पकड़ो इस दुर्बुद्धि को एवं मार डालो, रावण ने अंगद हेतु यही निर्णय सुनाया।अंगद ने जानबूझकर पहले तो स्वयं को चार राक्षसों द्वारा पकड़वाया और तब उन्हें झटकते हुये कूद कर प्रासाद के शिखर पर चढ़ कर उसे ध्वस्त कर दिया। राजा का मानमर्दन तो था ही, एक वानर ने अकेले कर दिया, शक्ति प्रदर्शन भी था।
राघव द्वारा अपने शर की परीक्षा भी हो गई कि दुरात्मा रावण तो वालि का मित्र भी था, यदि अपने पिता के वध के कारण अंगद के मन में कोई चोर रह गया हो तो वहाँ भेजने का निर्णय सब प्रकट कर देता। क्रोधवश रावण ने कोई प्रयास ही नहीं किया, एक अन्य वानर हनुमान द्वारा पहले की गयी दुर्गति ध्यान में रही होगी।
अंगद लौट आये। विपुल वानर सैन्य से घिरी लंका के आतंकित निवासियों की चीख पुकार ने सिद्ध कर दिया कि राघव का अमोघ शर इस बार भी लक्ष्यसिद्ध हो लौटा।

कुम्भकर्ण उपदेश 
सुषुप्तस्त्वम् न जानीषे मम रामकृतम् भयम्, तुम सोये रहे और जाने ही नहीं कि राम ने मुझे भयाक्रांत कर रखा है!  रावण बोला -
एष दाशरथी रामः सुग्रीवसहितो बली
समुद्रम् लङ्घयित्वा तु कुलम् नः परिकृन्तति

यह बलवान दाशरथि राम सुग्रीव के साथ समुद्र लाँघ कर आ पहुँचा है और हमारे कुल के विनाश में लगा है।
सेतु मार्ग से आये वानरों की अगाध राशि द्वारा लङ्का के वन उपवन आच्छादित हो गये हैं - सेतुना सुखमागत्य वानरैकार्णवम् कृतम्। उन्होंने युद्ध में मुख्य मुख्य राक्षसों को मार डाला है - ये राक्षसा मुख्यतमा हतास्ते वानरैर्युधि। लंका में केवल बाल वृद्ध बचे हैं - लङ्काम् बालवृद्धावशेषिताम्। पूरा राजकोश रिक्त हो गया है - सर्वक्षपितकोशम् (आर्थिक चोट)...
... कितना आतङ्कित है न रावण!
[यही डर, यही भय आजकल के सिंगल सोर्स राक्षसों में भी होना चाहिये किंतु ....]
कुम्भकर्ण ने सुना और अट्टहास कर उठा - प्रजहास च। उसने ध्यान दिलाया कि पहले तुम्हारे कुकर्म के परिणाम की जो चेतावनियाँ दी गई थीं, वे आन पड़ीं। आगे कुम्भकर्ण ने राजनीति का जो उपदेश दिया है, अद्भुत है। कुछ श्लोक देखें -
अनभिज्ज़्नाय शास्त्रार्थान् पुरुषाः पशुबुद्धयः
प्रागल्भ्याद्वक्त्मिच्छिन्ति मन्त्रेष्वभ्यन्तरीकृताः
अशास्त्रविदुषाम् तेषाम् कार्यम् नाभिहितं वचः
अर्थशास्त्रानभिज्ञानाम् विपुलाम् श्रियमिच्छताम्
अहितम् च हिताकारम् धार्ष्ट्याज्जल्पन्ति ये नराः
अवश्यम् मन्त्रबाह्यास्ते कर्तव्याः कृत्यदूषकाः
विनाशयन्तो भर्तारम् सहिताः शत्रुभिर्बुधैः
विपरीतानि कृत्यानि कारयन्तीह मन्त्रिणः
तान् भर्ता मित्रसम्काशानमित्रान् मन्त्रनिर्णये
व्यवहारेण जानीयात्सचिवानुपसम्हितान्
चपलस्येह कृत्यानि सहसानुप्रधावतः
चिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजाः
यो हि शत्रुमवज्ञाय नात्मानमभिरक्षति
अवाप्नोति हि सोऽनर्थान् स्थानाच्च व्यवरोप्यते

[अन्योक्तियों के प्रयोग द्वारा कुम्भकर्ण ने रावण को बहुत गरियाया है - पशुबुद्धि आदि।]

राघवों की मूर्च्छा और हनुमान के सञ्जीवनी अभियान 
जब दोनों भाइयों सहित समस्त वानरसेना आहत मूर्च्छित पड़ी थी, तब जाम्बवान ने हनुमान को औषधियों का नाम बता कर लाने को भेजा। 
श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं तथापि व्यथितेन्द्रियः
पुनर्जातमिवात्मानं स मेने ऋक्षपुङ्गवः
...
ऋक्षवानरवीराणामनीकानि प्रहर्षय
विशल्यौ कुरु चाप्येतौ सादितौ रामलक्ष्मणौ
...
मृतसञ्जीवनीं चैव विशल्यकरणीम् अपि
सौवर्णकरणीं चैव सन्धानीं च महौषधीम्

लक्ष्मण भूमि पर पड़े थे, राघव राम ने विलाप करते हुये तीनों माताओं का नाम लिया कि मैं उन्हें क्या मुख दिखाऊँगा?
उपालम्भं न शक्ष्यामि सोढुं दत्तं सुमित्रया
किं नु वक्ष्यामि कौसल्यां मातरं किं नु कैकयीम्

...
सुषेण वानर सेना के यूथप थे, राक्षस लङ्का से अपहृत वैद्य नहीं।
एवमुक्तः स रामेण महात्मा हरियूथपः
लक्ष्मणाय ददौ नस्तः सुषेणः परमौषधम्

पर्वतों में नगाधिराज हिमालय की बड़ी प्रतिष्ठा रही। पौराणिक परम्परा में मेरु की रही। दक्षिण में आज भी संकल्प में मेरोः दक्षिणे पार्श्वे बोला जाता है। यह मेरु विराट भारत की भौगोलिक प्रसार व उसके केन्द्र का कूट है।
रामायण लोककाव्य भी रहा। घुमन्तू कुशीलव गायकों ने उस पर्वत को भी हिमालय बना दिया जहाँ से हनुमान औषधियाँ लाये थे।
सागर संतरण जैसे महान अभियान के कारण मारुति हनुमान के प्रति विशेष आदर व नायकप्रतिष्ठा का भाव बढ़ता चला गया जिसकी परिणति उनके दैवीय निरूपण में हुई। वाल्मीकीय रामायण में उनके द्वारा दो बार औषधियों हेतु पर्वत पर जाने की बात है। एक बार तब जब राम और लक्ष्मण, दोनों भाई मूर्च्छित होते हैं, दूसरी बार जब केवल लक्ष्मण।
आश्चर्य है कि दोनों बार वह औषधियों का अभिज्ञान नहीं कर पाते जबकि होना यह चाहिये कि एक समान औषधियों के होने पर दूसरी बार अभिज्ञान करने में उन्हें सक्षम हो जाना चाहिये। वास्तविकता यह है कि पहली बार जो उन्हें हिमालय पर गया बताया गया है, वह अतिशयोक्ति है। सागर संतरण में ही उन्हें बहुत समय लग गया था जबकि लंका से तो हिमालय बहुत दूर है तथा वहाँ तक पहुँच कर लौटने में जो समय लगता, वह दोनों भाइयों एवंं सैन्य हेतु घातक होता। जैसा कि महाभारत के रामोपाख्यान में एवं रामायण में ही दूसरी बार के समय संकेत है, वह कोई बहुत दूर नहीं गये थे। पहली बार की यात्रा को सागर संतरण के समान ही काव्य युक्तियों से दैवीय बना दिया गया है।
यही स्थिति लंकादहन की भी है। जब दोनों भाई मूर्च्छित थे, तब लंकादहन का एक प्रसंग मिलता है जोकि स्वाभाविक है कि सेना थी, परिस्थितियाँ वैसी थीं, विविध यूथप थे, लंकादहन सामान्य था। हनुमान द्वारा लंकादहन में भी अतिशयोक्तियाँ हैं। यहाँ तक कह दिया गया है कि विभीषण का प्रासाद छोड़ उन्होंंने अन्य सभी राक्षसों के घर जला दिये मानो उन घरों पर नामपट्टिकायें लगी थीं! रामायण विविध स्तरों में परिवर्द्धित हुआ तथा उनके इसी प्रकार अंत:प्रमाण मिलते जाते हैं। सुंदरकाण्ड में तो चालिस के लगभग श्लोकों को चमत्कारपूर्ण वर्णन को स्थान देने हेतु यथावत दुहरा दिया गया है!
औषधियों को लाने जाने हेतु हनुमान की छलांग कोई बहुत लम्बी नहीं है, न कालनेमि है, न भरत द्वारा हनुमान पर प्रहार। हनुमान उचक कर मात्र एक श्लोक में वहाँ पहुँच जाते हैं। उस शैल का नाम था - ओषधिपर्वत। ऐसा पर्वत जहाँ औषधियों का प्राचुर्य था।
सौम्य शीघ्रमितो गत्वा शैलमोषधिपर्वतम्
पूर्वन् हि कथितो योअसौ वीर जाम्बवता शुभः
दक्षिणे शिखरे तस्य जातामोषधिमानय
विशल्यकरणी नाम विशल्यकरणीन् शुभाम्
संजीवकरणीं वीर संधानीं च महौषधीम्
संजीवनार्थं वीरस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः
इत्येवमुक्तो हनुमान्गत्वा चौषधिपर्वतम्
चिन्तामभ्यगमच्छ्रीमानजानंस्ता महौषधीः



शब्दविशारद यूथपति डॉक्टर सुषेण द्वारा लक्ष्मण का चिकित्सकीय परीक्षण
(देहलक्षण व मनोविज्ञान, बंधु का self-suggestion द्वारा प्रबोधन) 
राममेवं ब्रुवाणं तु शोकव्याकुलितेन्द्रियम् 
आश्वासयन्नुवाचेदं सुषेणः परमं वचः
शोक से व्याकुलइंद्रिय हुये राम को आश्वस्त करते हुये सुषेण ने कहा -
त्यजेमां नरशार्दूल बुद्धिं वैक्लब्यकारिणीम्
शोकसंजननीं चिन्तां तुल्यां बाणैश्चमूमुखे

हे नरसिंह! बुद्धि पर क्लैब्यता लाने वाली इस चिंता का त्याग करें जो शोक की कारक है तथा युद्ध में बाण के समान ही घातक है।
[अब शब्द प्रयोगके साथ देखें]
नैव पञ्चत्वमापन्नो लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धनः
नह्यस्य विकृतं वक्त्रं न च श्यामत्वमागतम्

पञ्चत्वम्‌ उसे कहा जिसमें आप की देह के पाँच तत्त्व अपने मूल में लीन हो जायें - मृत्यु। लक्ष्मिवर्धन कहा कि लक्ष्मण तो जीवनशक्ति को बढ़ाने वाले हैं। [एक अन्य निरूपण सीता को लक्ष्मी का रूप मान कर हो सकता है। वन में रहते हुये लक्ष्मण ने सीता की सेवकाई की थी, वे नहीं रहते तो सीता हेतु वन बहुत दुष्कर होता]
लक्ष्मण की मृत्यु नहीं हुई है, उनका रूप विकृत नहीं हुआ है, न ही उसमें मृत्युजनित कालिमा है।
सुप्रभन् च प्रसन्नं च मुखमस्याभिलक्ष्यते 
पद्मरक्ततलौ हस्तौ सुप्रसन्ने च लोचने
[सब ने वह स्तोत्र तो सुना ही होगा - प्रसन्नवदना सौभाग्यं ... । लक्ष्मी का एक नाम है रम्य मुख वाली। पहले लक्ष्मिवर्धन कहा, अब प्रसन्नं च कहते हैं]उनके मुख पर कांति है, वह रम्य है। पञ्जे कमलदल के समान आरक्त हैं (उनका वर्ण मलिन नहीं हुआ) और आँखें भी सुप्रसन्न हैं।
नेदृशं दृश्यते रूपं गतासूनां विशां पते
विषादं मा कृथा वीर सप्राणोऽयमरिंदम
[गतासून शब्द का प्रयोग देखें कि भगवद्गीता में भी भगवान कहते हैं - गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति। मृत्यु हेतु यह शब्द प्रयुक्त । राम 'विशां पते' हैं। विश्‌ बहुत पुराना शब्द है, जब जनसाधारण को विश्‌ कहा जाता था। वैश्य इसी से है। आरम्भ में समस्त जन वैश्य, उनमें से रक्षा हेतु निकले राजन्य क्षत्रिय और जटिल होते समाज व राजकर्म को दिशा देने हेतु हुये ब्राह्मण। श्रुति इसी को संकेतरूप में कहती है, ऋग्वेद से वैश्य, यजुर्वेद से क्षत्रिय और सामवेद से ब्राह्मण। साम बहुत ही विकसित व सूक्ष्म दशा है, जब केवल वाणी से ही नियन्त्रण व दिशा का बोध कराया जा सके। अस्तु। तो विश्‌ कहते हैं प्रजा को, प्रजा कहते हैं संतान को, राम को कौसल्या-सु-प्रजा कहा गया है। राजा हेतु समस्त प्रजा संतान की भाँति होती है। विशाम्‌ पते प्रजा को संतान के समान समझने वाला प्रजा का पति अर्थात राजा। राम को इस सम्बोधन द्वारा सुषेण उनके कंधों पर महत दायित्व का बोध कराते हैं।]हे राजन्, मृतक का रूप ऐसा नहीं दिखता।
हे अरिंदम अर्थात शत्रुओं का दमन करने वाले (पुन: एक वैद्य का मनोवैज्ञानिक संकेत कि अभी तो शत्रु बचे हुये हैं, ऐसी दशा को प्राप्त होंगे तो उनका दमन कैसे करेंगे?) लक्ष्मण प्राणयुक्त हैं। आप विषाद न करें। विषाद वह अवस्था है जब आप का नियंत्रण समाप्त हो जाता है। यह सामान्य दु:ख नहीं है। इस शब्द का प्रयोग भी संकेतक है।
आख्याति तु प्रसुप्तस्य स्रस्तगात्रस्य भूतले
सोच्छ्वासं हृदयं वीर कम्पमानं मुहुर्मुहुः

[इतना कहने के पश्चात चिकित्सक स्पष्ट लक्षणों की बात करता है। आख्यातो शब्द पर ध्यान दें, आज भी उत्तरप्रदेश में सरकारी शब्दावली का अङ्ग है - जाँच कर अपनी आख्या प्रस्तुत करें। आख्यान होता है आँखों देखी कहना, साक्षी हो कर कहना। रामायण और महाभारत आख्यान कहे गये, किसी अन्य शास्त्र को यह पद नहीं दिया है, इस कारण ही ये इतिहास हैं - इति ह आस - ऐसा ही हुआ!]
भूमि पर पड़े प्रसुप्त वीर लक्ष्मण की हृदय की मुहुर्मुह अर्थात रह रह होने वाली धुकधुक और स+उत्‌+श्वास = सोच्छवास, आती जाती साँसें अपनी आख्या प्रस्तुत कर रही हैं [कि लक्ष्मण अभी भी लक्ष्मीवर्द्धन हैं, जीवित हैं।]
सुषेण ने मृत्यु शब्द का प्रयोग तक नहीं किया।
[विचार करें कि यहाँ तो शुभ कहना था कि आहत को कुछ नहीं हुआ, तब देश, काल व परिस्थिति को देखते हुये शब्दों पर इतना ध्यान है, अशुभ समाचार सुनाते समय चिकित्सक डॉक्टर किस प्रकार की मानसिक दशा में होते होंगे! डॉक्टरों का सम्मान न करें, न हो पाये तो कटु न बोलें, अपमान न करें।
थूकने व मारने पीटने का निषेध नहीं कर रहा क्योंकि वैसा तो मुसलमान करते हैं, मनुष्य सोच भी नहीं सकते!]
केवल अनुवाद में बात बहुत ही सपाट हो जाती न? मूल शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। संस्कृत का प्राथमिक ज्ञान प्रत्येक सनातनी हेतु आवश्यक है। सीखें।
यज्ञ परम्परा और जाली उत्तरकाण्ड 
रामायण का अंतिम युद्धकाण्ड श्रीराम द्वारा अनेक पौण्डरीक, वाजपेय, अश्वमेध एवं अन्य यज्ञों के किये जाने की सूचना देता है जिनमें अश्वमेधों की संख्या सौ है। युद्धकाण्ड में राजसूय करने का नाम से उल्लेख नहीं मिलता।
ध्यातव्य है कि आधुनिक काल में भी ये यज्ञ विविध श्रोत्रियों एवं यजमानों द्वारा सम्पन्न किये जाते रहे हैं। राजसूय कोई नहीं करता।
राजसूय का लिखित प्रमाण युधिष्ठिर से लेकर कन्नौजाधिपति जयचंद्र तक मिलता है। अश्वमेध आदि के भी प्रमाण बिखरे पड़े हैं।
जाली उत्तरकाण्ड में श्रीराम राजसूय करने का प्रस्ताव करते हैं जिसका भरत द्वारा निषेध किया जाता है। वह कारण बताते हैं - राजन्य हानि, पृथिव्यां राजवंशानां विनाशो अर्थात धरती से राजाओं का नाश हो जायेगा।
यह उस पौराणिक अंधविश्वास की प्रतिध्वनि है जिसके अनुसार युधिष्ठिर द्वारा राजसूय किये जाने के कारण ही महाभारत का महाविनाश हुआ।
पुराणों में ही कलियुग में राजसूय सहित अश्वमेधादि का भी निषेध मिलता है जो कि स्पष्टत: अर्वाचीन है। इसके कारण जनमेजय एवं वैशम्पायन के विवाद से जुड़ते हैं जिसमें याज्ञवल्क्य द्वारा शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी) आधारित समांतर यज्ञ परम्परा का आरम्भ व जनमेजय द्वारा उसका समर्थन भी कारक रहे। उत्तर भारत में आज भले वाजसनेयी अधिक मिलेंगे किंतु कभी उन्हें तिरस्कार से देखा जाता था। वाजसनेयियों का उत्कर्ष भार्गवों के अपकर्ष से जुड़ा है। अस्तु।
राजसूय अपेक्षतया नया यज्ञ प्रतीत होता है जो अश्वमेध के विकल्प में किया गया होगा। ध्यातव्य है कि इसमें क्षत्रिय का स्थान ब्राह्मण से ऊँचा होता है।
राजसूय का भरत द्वारा विशेष निषेध यह दर्शाता है कि उत्तरकाण्ड कालांतर में जोड़ा गया। कब जोड़ा गया?
यह प्रश्न शोध की माँग करता है किंतु अनुमानत: इसे उत्तर भारत में वर्द्धनों की शक्ति क्षीण होने के उपरांत जोड़ा गया माना जा सकता है जिसकी पुष्टि उत्तरकाण्ड की भाषा और शब्द भी करते हैं। जयचंद द्वारा शताब्दियों पश्चात राजसूय आयोजन उनकी शक्ति, प्रभाव और समृद्धि को दर्शाता है, साथ ही भाँड़ चंद्रबरदाई द्वारा प्रतिक्रिया में खल चित्रण भी वैसा ही है जैसा श्रीराम के चरित्र को कलंकित करने के लिये उत्तरकाण्ड का प्रणयन।
उत्तरकांडी अश्वमेध आयोजन भी उसके क्षेपक होने की पुष्टि करता है। जहाँ युद्धकाण्ड सौ अश्वमेधों का उल्लेख करता है, वहीं उत्तरक्षेपक में एक अश्वमेध में ही सब काण्ड हो जाते हैं।
अश्वमेध का अश्व श्वेतवर्णी होना चाहिये जिसके मस्तक पर कृष्णकेश चित्ति हो किंतु उत्तरक्षेपक का अश्व पूरे काले रंग का है। यह तथ्य भी किसी अन्य धारा द्वारा इसे जोड़े जाने की ओर संकेत करता है।
[दक्षिण भारत में ऐसे विद्वान मिल जायेंगे जो ब्राह्मणों पर मांसभक्षण निषेध का एक रोचक कारण बताते हैं। उनके अनुसार यज्ञ में मंत्रपूत (प्रोक्षण क्रिया) पशु की बलि का मांस ब्राह्मण ग्रहण करते थे, अन्य नहीं। कलियुग में उन यज्ञों का निषेध होने के कारण उनके द्वारा मांसभक्षण को सामान्य नियम से निषिद्ध कर दिया गया, यज्ञ होंगे ही नहीं तो मांस मिलेगा कैसे? इसकी कड़ी भी वैशम्पायन द्वारा जनमेजय को शापित किये जाने से जुड़ती है। एक बात और ध्यान देने की है, उत्तर भारत में कृष्ण यजुर्वेदियों को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता। यजुर्वेद की पुरातन मूल धारा कृष्ण थी जिसमें मंत्र भाग व ब्राह्मण भाग मिश्रित थे।]

रविवार, 1 मार्च 2020

satyakam jabal क्या सत्यकाम की माता जबाला कुलटा, वेश्या या बहुगामिनी थीं?


सत्यकाम जाबाल की कथा की व्यथा यह है कि उसे जिसने जैसे चाहा विकृत किया। कुछ उदाहरण :

 (1) मृदु नारीवादियों द्वारा - माता जबाला वेश्या या बहुगामिनी होते हुये भी शिक्षा के प्रति कितनी समर्पित थी!  (2) उग्र स्त्रीवादियों द्वारा - स्त्री का शोषण होता था तथा उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं था।
(3) नवहिंदूवादियों द्वारा - कुलटा/वेश्या/शूद्रा होते हुये भी ऋषि ने उसके पुत्र को उसका नाम दे कर शिक्षा दी। कितना उदार था हमारा समाज!
. .
इनके अनेक क्रमचय सञ्जय भी उपलब्ध हैं। प्रतीत होता है कि या तो मूल को लोगों ने पढ़ा ही नहीं या उसे छिछले अनुवादों से समझा।

वास्तविकता क्या है? 

जबाला को मूल में न तो कुलटा कहा गया है, न वेश्या, न बहुगामिनी। पहले इन शब्दों के अर्थ समझें।
  • कुलटा बना है - कुल+टा अर्थात कुल की गर्भ मर्यादा से बाहर जा कर अगम्य गमन करने वाली।
  • गम शब्द का एक अर्थ सम्भोग से भी जुड़ता है। अगम्या अर्थात जिनसे मैथुन सम्बन्ध निषिद्ध हैं - माता, भगिनी, गुरुपत्नी, राजा की पत्नी, पुत्री, सगोत्री, सपिण्डा, पराई भार्या। यह स्त्रील्लिङ्ग हेतु भी लागू।
  • बहुगामिनी वह है जो बहुतों के साथ गमन अर्थात मैथुन में रत होती है।
  • वेश्या शब्द वेश से बना है - जो विविध वेश बना कर देह बेचती है।

सामवेदी उपनिषद छांदोग्य में उन्हें ऐसा कुछ नहीं कहा गया है। वह परिचारिणी हैं - अनेक घरों में परिचर्या करने वाली। परिचारिका शब्द तो आज भी प्रचलित है। क्या विमान परिचारिकाओं को वेश्या कहेंगे जो सभी यात्रियों की सेवा में रहती हैं? क्या अपनी कामवाली को वेश्या दुराचारिणी कहेंगे जो अनेक घरों में काम करती है? कोशों में भी कहीं भी परिचारिणी का अर्थ यह नहीं है कि वह स्वामी के साथ यौन सम्बंध में रत रहती हो और पुरातन वाङ्मय ऐसी बातें छिपाता नहीं, स्पष्ट लिख देता है। 
उपनिषद में न कोई शंका है और न ही आश्रम वासियों द्वारा कोई आशंका कि गौतम निकाल देंगे। गढ़ी हुई कथायें कभी कभी विचित्र संप्रेषण करने लगती हैं।
जबाला स्थविर आयु में है, रजोनिवृत्ति के समीप पुत्र प्राप्त हुआ, स्त्री को संतान यौवन में ही प्राप्त होती है। मैं तुम्हारा गोत्र नहीं जानती, तुम्हें यौवन में बहुतों की परिचर्या करते हुये तुम्हें पाया - इस वाक्य का अर्थ यह लगाया गया है कि वह मुक्त यौन सम्बंध रखने वाली थी। यह अर्थ आज के मानस को ठीक लगता है तथा इसके समर्थन में ऋषियों व राजन्यों की विविध अप्सराओं आदि के साथ यौन सम्बंधों की पुराण गाथायें सुना दी जाती हैं। नेपथ्य में कोई बहुत शास्त्रीय समर्पण की भावना नहीं काम कर रही होती, उन्मुक्त यौन सम्बंधों को प्रचलित करने तथा विवाह व परिवार संस्था को ध्वस्त करने में लगे लोगों की विकृतियाँ ही काम पर लगी होती हैं। विस्तार से वामपंथियों व उग्र नारीवादियों का ऐसे विषयों पर लेखन देखेंगे तो समझ में आयेगा कि प्रकटत: जो बहुत लुभावना व उदात्त दिख रहा है, वह वास्तविकता में क्या है!

तो एक दूसरी सम्भावना क्या हो सकती है?  

यह घटना तब की है जब विवाह व परिवार संस्थायें स्थापित हो चुकी थीं। स्त्री व पुरुषों में विवाहविच्छेद पुराने के अवशेष के रूप में सामान्य रहे हो सकते हैं। आज भी गाँवों में कुछ शूद्र व अंत्यज वर्गों में विवाहविच्छेद जातिपञ्चायत की देखरेख में  सरल है। किसी अन्य से नेह लग गया तो उसे छोड़ अन्य को अपना लेना बहुत जटिल नहीं है। किंतु यह मान लेना कि एक स्त्री को अपनी संतान के पिता का अभिज्ञान ही नहीं रहेगा, उसका परिचय ही नहीं ज्ञात रहेगा, बहुत दूर की कौड़ी है। स्त्री सब जानती है तथा संतान का सच उसकी स्मृति में मरणसेज तक रहता है। 
 'यौवने त्वामलभे' स्त्री यौवन में ही संतान को जन्म देती है, बूढ़ी होने पर नहीं। यौवने कहने का तात्पर्य यही है कि जबाला अपनी वर्तमान आयु को आरेखित कर रही हैं कि बहुत दिन हो गये तुम्हारे जन्म को, गोत्र की विस्मृति है। साथ ही यह भी कि पुत्र, तुम्हारी आयु भी उपनयन की दृष्टि से अधिक हो गयी है। देखना यह है कि यह इतनी विकसित अवस्था का समाज है जिसमें परिचारिणी का पुत्र भी जानता है कि विद्याध्ययन हेतु उसे गुरु के पास जाना होगा तथा वहाँ की आवश्यकतायें क्या क्या हैं?
उस समाज में ऐसी परिचारिणी भी है जो शिक्षा के महत्त्व को समझते हुये, सीमाओं को जानते हुये भी आश्वस्त है कि माता का नाम भी प्रयोग में लाया जा सकता है क्योंकि जाने कितने ऋषि हैं जो माताओं के नाम से जाने गये हैं, यथा ममता के पुत्र दीर्घतमा मामतेय, इतरा के पुत्र ऐतरेय आदि। उल्लेखनीय है कि माता के नाम पर पुत्र को जानने की भारतीय परम्परा बहुत पुराने समय से रही और जारी रही।
उस समाज में गौतम जैसा गुरु भी है जो इस मर्यादा का आदर करता है तथा स्थूल नियम बंधनों से ऊपर उठ कर सोचता है।
अब आते हैं गोत्र पर।
वह सेविका है, सेवा करने वाली शूद्रा है- परिचारिणी। गोत्र की अवधारणा कुल से पहले स्थान विशेष की मानव बस्ती की रही। यह घटना बहुत बहुत पुरानी है जब गोत्र की आज की रूढ़ अवधारणा आकार ले रही थी। गोत्र परिवर्तन के जाने कितने उदाहरण उपलब्ध हैं। ऋग्वेद में वह है न, जिसमें एक ही कुल में अनेक व्यवसायों वाली बात है।
ना॒ना॒नं वा उ॑ नो॒ धियो॒ वि व्र॒तानि॒ जना॑नाम् । तक्षा॑ रि॒ष्टं रु॒तं भि॒षग्ब्र॒ह्मा सु॒न्वन्त॑मिच्छ॒तीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
जर॑तीभि॒रोष॑धीभिः प॒र्णेभि॑: शकु॒नाना॑म् । का॒र्मा॒रो अश्म॑भि॒र्द्युभि॒र्हिर॑ण्यवन्तमिच्छ॒तीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
का॒रुर॒हं त॒तो भि॒षगु॑पलप्र॒क्षिणी॑ न॒ना । नाना॑धियो वसू॒यवोऽनु॒ गा इ॑व तस्थि॒मेन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
अश्वो॒ वोळ्हा॑ सु॒खं रथं॑ हस॒नामु॑पम॒न्त्रिण॑: । शेपो॒ रोम॑ण्वन्तौ भे॒दौ वारिन्म॒ण्डूक॑ इच्छ॒तीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
जबाला घर परिवर्तन कर काम करने वाली कामवाली थी - बह्वं चरन्ति परिचारिणी। अनेक ग्रामों में, अनेक कुलों में सेवा करने वाली। शूद्रा का आज के अर्थ में गोत्र नहीं, किन्तु उस समय यदि एक ही गाँव की सेवा में रहती तो उसे गोत्र बता सकती थी। वैसा था नहीं और स्मृति साथ नहीं दे रही कि उस समय कहाँ काम कर रही थी, जब पुत्र गर्भ में आया। दुविधा से मुक्त व स्पष्ट हो अपने नाम को ही गोत्र बताने को कहती है - नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि... जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति।  गौतम इस सत्य पर मुग्ध होते हैं - सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा ! कि ऐसा कह कर अपना शूद्र वर्ण और गोत्र अनिश्चितता दोनों सच सच कह दिया। वे कहते हैं कि ऐसा ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य नहीं कर सकता- नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति.. समिधा लाओ, तुम्हारा उपनयन करना है - इति तमुपनीय। 

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

आत्महन्ता हिन्दी जन, उर्दू और 'वे तो ऐसे ही होते हैं'


कल एक लेख दिखा था जिसमें मानव की भाषा के उसके व्यवहार पर प्रभाव की चर्चा थी। प्रत्येक हिन्दी जन को यह बात स्वयं से पूछनी चाहिये की उसकी वाणी को किस भाषा के निकटतम रखा जा सकता है और उस भाषा के इतिहास व गढ़न क्या हैं?
स्वयं को अति बुद्धिमान मानने वाले उन गोबरपुरीषों व धूर्तों से मैं संवादित नहीं जो इस आपातकाल में ब्रज से ले कर भोजपुरी तक को हिन्दी के सम्मुख उसे शत्रु बताते हुये खड़ा करने में लगे हैं।
आश्चर्य होता है न कि जिस उर्दू ने आप को केंचुआ बना डाला, उसी का उपयोग मोहम्मडन हिंसक जिहाद प्रसार हेतु करते हैं! जिस नाजुकी नफासत में आप मरे जाते हैं, आप की आधी जनसंख्या नरपशुओं से सटती जाती है, उसका क्लीव प्रभाव उन पर दिखता ही नहीं!!
आप ऐसे समझें कि उर्दू शब्दावली बर्बर आक्रान्ताओं द्वारा घुसेड़ी गई, थोपी गई शब्दावली है जो उनके लिये सहज है किन्तु आप के मानस पर पूरा विनाशक प्रभाव लिये उतरती है। विनाश केवल रक्तञ्जित हों, आवश्यक नहीं। एक विनाश विषकन्या द्वारा होता है, एक मत्कोटकों वाला, नाना मार्ग हैं, लक्ष्य एक है - काफिरों का समूल नाश!
वे सांस्कृतिक संसार पर अनेक शस्त्रास्त्रों के साथ चढ़ाई किये हुये हैं और पीड़ित जन 'वे तो ऐसे ही होते हैं' की आत्मघाती समझ व स्वीकार लिये स्टॉकहोम सिण्ड्रोम में जी रहे हैं।
मोहम्मडन मत छल व छद्म की अच्छी समझ रखता है। क्रूरान किताब, हदीस व सीरा क्रमश: मोहम्मद की वाणी, उसके बारे में अन्य विश्वसनीय बातें व उसका जीवनवृत्त; ये तीन उसके आधार हैं। इनका शब्दश: पालन व अनुकृति आसमानी आदेश हैं। किताब में मक्का व मदीना सम्बन्धित वाणी में सीधा अन्तर मिलेगा। जहाँ वह बली नहीं था, 'अच्छी' बातें किया, जहाँ वह बली था, वहाँ बिना आवरण के सीधी बात किया। उसी के अनुकरण में जहाँ दारुल इस्लाम है, वहाँ हिन्दुओं व अन्य काफिरों के साथ पाकिस्तान है, जहाँ दारुल हरब है, वहाँ #शाहीन_बाग व संविधान हैं। वे बहुत स्पष्ट हैं, जहाँ कोई भ्रम आता है, वहाँ हदीस व सीरा से मार्ग निकाल लेते हैं।
जो भी अच्छी बातें दिखती हैं वे या तो छल हैं या दारुल इस्लाम, इस्लामी हुकूमत वाली भूमि हेतु हैं। उदाहरण के लिये देखें, मोहम्मद ने सड़क रोक कर नमाज पढ़ने का निषेध किया। इस्लामी सऊदी में इसका पूरा पालन होगा किन्तु भारत जैसे बुतपरस्त देश में इसका उल्टा अर्थात सड़क घेर कर नमाज जिहाद हेतु किया जायेगा। क्रूरान में जो भी है, वह दुधारी तलवार है। महत्वपूर्ण यह है कि बात कही गयी, पक्ष विपक्ष दोनों परिस्थिति अनुसार मान्य हैं।
मृदु अस्त्र के रूप में जिसका उपयोग किया जाता है, वह शत्रु के अनुसार होता है। पश्चिमी जगत हेतु इस्लामोफोबिया की बात होगी, आप के लिये कथित गंगा जमुनी तहजीब और इस्लाम की ढेर सारी 'देनें'। भाषा, व्यञ्जन, शिल्प, वस्त्राभरण, नगर आदि सब को वे इस्लाम की 'देन' बता कर सहानुभूति अर्जित करते ही हैं, साथ में इस्लामी अनाचार व अत्याचारी लूट पर आवरण भी डाल देते हैं। उर्दू को ऐसे समझें। उर्दू आप की काहिली, कायरता, मेधाजड़ता, अपौरुष आदि सब सुनिश्चित करती है। पीढ़ियों से समायोजन करते करते आप की रीढ़ स्थायी रूप से झुक गयी है जिसे आप सतोगुण और प्रार्थना मुद्रा समझते हैं।
समायोजित करते करते कब आप शत्रुबोध से हीन हो शत्रु की प्रशंसा व दासता में लग जाते हैं, पता नहीं चलता। कब उसका बचाव करने लग जाते हैं, पता ही नहीं चलता!
'वे तो ऐसे ही होते हैं, हम भी वैसे क्यों बनें?' इस मानसिकता के साथ आप जीवन के मूलमन्त्रों की उपेक्षा कर बचाव में लग जाते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसे में अपना लघु दोष भी पहाड़ लगता है या लघु प्रतिरोध भी उत्पात लगने लगता है। बहुत भारी अन्तर देखें, वे छल छद्म के साथ, बिना नैतिकबोध के लगे हुये हैं, नख काट कर भी गाजी बनने में और आप अपने पीड़ित व हत सदस्यों की मृत्यु पर भी सहानुभूति नहीं ले पाते। क्यों? क्यों कि आप के ट्रांसमिटर व रिसीवर, दोनों बिगड़ चुके हैं। सहानुभूति सह अनुभूति है, उन्हें तो होने से रही और आप के यहाँ जिन्हें चाहिये और जिन्हें देना है; दोनों हैं तो वही न, सदाशयता रूपी क्लीवता के मारे सुविधाजीवी! आप का जो बुद्धिजीवी वर्ग है, वह या तो स्वार्थी है धर्मचेतना से शून्य या संकीर्ण जातिवादी। अध्ययन है नहीं, पुरखों का नाम बजाना है, चाहे जैसे हो! इस चक्कर में उसकी सारी बुद्धि उल्टी चलती है।
जब खलीफा उस्मान ने क्रूरान के समस्त उपलब्ध संस्करण जला कर केवल अपने संस्करण को एक और एकमात्र बताया तथा सुनिश्चित किया तो उसने दो लब्धियाँ सुनिश्चित कीं। एक, किसी भी प्रकार के द्वैध या वैकल्पिक किताब की सम्भावना नष्ट कर दी। दूसरा और महत्वपूर्ण रहा। क्रूरान का जो रूप कालानुक्रम में था, उसे सूरा की लम्बाई के क्रम में कर उसने क्रूरान के इतिहास से असम्पृक्त कर दिया। अब सन्दर्भ व प्रसंग केवल मौलाना ही बता सकते थे और परिस्थितियों के अनुसार उसकी बातों का उपयोग किया जा सकता था, बिना किसी शंका के। मतान्तरण से लड़ने वाले आर्यसमाज ने इसे समझा। जब आर्यसमाजी यह कहता है कि वेदों में इतिहास नहीं है तो वह वास्तव में लोहे से लोहा काटने की बात कर रहा होता है।
इतनी बड़ी पृष्ठभूमि में उर्दू को समझने की आवश्यकता है। शेरो शायरी, गजल, रण्ड तहजीब नफासत आदि का त्याग कर अपने जीवनमूल्य और अपनी भाषा को अपनाना है। उर्दू को इस उद्देश्य से सीखा जाना चाहिये कि शत्रु की चालें समझनी हैं। परन्तु जो 'जमात' अपनी संस्कृत पर हँसती रही हो, उसमें दोष ढूँढ़ती हो, वह तो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी भी प्रयोग करने से रही, उर्दू का ज्ञान अर्जित कर उसका अस्त्र रूप में प्रयोग तो बहुत ऊँची बात है! 

रविवार, 19 जनवरी 2020

Hindu genocide Kashmir exodus 19 Jan जश्न-ए-शाहीन



तीस वर्ष पूर्व माघ कृष्ण सप्तमी/अष्टमी को जिहाद करते हुये मुसलमानों ने कश्मीर से काफिरों को पलायन करने पर विवश किया। ग्रेगरी कैलेण्डर के अनुसार आज स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी असफलता की बरखी है। 18/19 जनवरी की रात को जो हुआ, वह यह दर्शाने हेतु पर्याप्त होना चाहिये कि सामरिक और सम्वेदनशील स्थानों पर शेष देश में भी बनी और बन रही मस्जिदों का जिहाद हेतु उपयोग भविष्य में भी हो सकता है।  लाखों अपने ही देश में शरणार्थी हुये और पंथनिरपेक्ष का ढोंग करता हुआ भारतीय तंत्र कुछ नहीं कर सका। आत्मघातियों द्वारा आत्मघात हेतु बनाये गये तंत्र से वैसी अपेक्षा भी क्यों रखनी?  
कश्मीर को सामान्य राज्य बनाने की दिशा में उन्मूलित धारा 370 की ढकी पीड़ा लिये इस्लामी उम्मा आज राजधानी दिल्ली के शाहीन बाग में औरतों व बच्चों को आगे कर नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध  की आड़ में बैठी है जो इस्लाम द्वारा पीड़ित इस्लामी पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने हेतु है। स्पष्ट है कि वे अल्पसंख्यक हिंदू आदि ही हैं जो दीन को नहीं मानते, जो इस्लाम द्वारा काफिर व दिम्मी की श्रेणी में रखे गये हैं। जिहाद का एक रूप यह भी है। सारा क्षेत्र त्रस्त है, न्यायपालिका से ले कर प्रशासन तक उसके आगे विवश है। जब देश की राजधानी में ऐसा है तो तत्कालीन कश्मीर में जो स्थिति रही होगी, उसकी कल्पना की जा सकती है।
शाहीन शब्द संस्कृत श्येन का समानार्थी है। पुरातन पर्सिया व अब के इस्लामिक ईरान सहित अनेक मध्यपूर्व के इस्लामी देशों में शाहीन बाजबाजी falconry में प्रयुक्त पक्षी  Barbary falcon है जिसका उपयोग आखेट हेतु किया जाता है। यह पक्षी इस्लामी मध्यपूर्व में ही प्रमुखत: पाया जाता है और उनके द्वारा काफिरों के किये जाने वाले आखेट कर्म से सटीक सङ्गति रखता है।
जश्न भी मूलत: पारसी शब्द है जिसका मूल अवेस्ता के यस्न में है जो वैदिक यजन शब्द की भाँति प्रयुक्त होता था। यस्न एक जलार्पण आधारित कर्मकाण्ड था जिसे अवेस्तन लोग बुरी शक्तियों के प्रतिकार हेतु व उन्हें दूर रखने हेतु करते थे। इस्लाम में आ कर यह शब्द बुरे काफिरों पर विजय के पश्चात हर्षोत्सव से जुड़ गया। आक्रांता इस्लाम के साथ साथ फारसी भाषा उसकी मुखौटा और प्रशासनिक भाषा बन कर पसरी, भारत में आ कर जश्न का अर्थ सामान्य हर्षोत्सव हो गया। पराजित जातियाँ विजेताओं के शब्दों का ऐसा अनुकूलन करती हैं। ऐसे अनेक शब्द आज भारतीय भाषाओं में प्रचलित हैं, यथा ईमानदारी जो अपना मूल जुगुप्सित व हिंसक अर्थ छिपा चुके हैं। मरुस्थली मजहब से जुड़ी जमात ऐसे शब्दों का दुधारी तलवार की भाँति प्रयोग करती है। ऐसा ही एक प्रयोग है, आज शाहीन बाग के जिहादी जमावड़े के moral boost हेतु वहाँ का आयोजन – जश्न-ए-शाहीन
इसके अनेक निहितार्थ हैं, पहला तो मुखौटा है कि उस अधिनियम के विरोध में जुड़े आंदोलन के समर्थन में हम कर रहे हैं जो कथित रूप से मुसलमानों की नागरिकता छीनने की एक युक्ति है। नागरिकता देना कैसे छीनना हो गया, यह सामान्य समझ के बाहर है किंतु जिहादी अपने दुष्प्रचार तकिय: को अच्छे से जानते हैं। वस्तुत: इस्लाम द्वारा पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देना बर्बर जिहादी इस्लाम के मुख पर तमाचा तो है ही, यह उनके अत्याचार को आधिकारिक रूप से स्थापित करता है। बिलबिलाहट उसी की है।
दूसरा पक्ष यह है कि इस लम्बे खिंचे जिहादी अनाचार की सफलता का उत्सव मनाना है कि देख लो काफिरों! इस्लाम के आगे तुम्हारी सरकार कितनी विवश है! जो हमारे मार्ग में आयेगा, वह चाहे ऐसे, चाहे वैसे झेलेगा ही और अंतत: नष्ट कर दिया जायेगा।
तीसरा पक्ष यह कि कश्मीर में जिहाद के विजय की बरखी मनानी है, स्मरण रखो काफिरों, हमने कश्मीर में जो किया था, एक रात की ही बात रही और काफिरियत फना हो गई‍! इंसाल्लाह अंतिम विजय हमारी ही होगी।
चौथा पक्ष यह है कि यह एक ऐसी कार्यशाला होगी जिसमें जिहाद को कैसे सभ्यता के आवरण में प्रस्तुत करते हुये सफल हुआ जाय, इसका मानसिक प्रशिक्षण होगा।
वे हमारे तंत्र, हमारे विधान, हमारे पौरुष, हमारे औदार्य, हमारी सदाशयता; सब पर थूक रहे हैं, निर्लज्ज नंगा नाच कर रहे हैं, चुनौती दे रहे हैं कि कर सको तो कर लो, हम देखेंगे! यह गीतोत्सव नहीं, काफिरों के ऊपर जिहाद का उत्सव है, जिसे आकर्षक आवरण दिया गया है। आश्चर्य नहीं कि इसे समझने वाले अत्यल्प हैं। आक्रांता भाषायें मूल से काट कर मेधा कुंद भी करती हैं। अरबी-फारसी शायरी से संक्रमित मानस आक्रांताओं के प्रति भी सहानुभूति रखते हैं। उन्हें कथित मीठी जुबान की छुरी दिखती ही नहीं, आक्रांता कविता शत्रुबोध समाप्त कर देती है। आक्रांता भाषा का ही प्रभाव है कि आज भी प्रताड़ित पलायित हिंदू कश्मीरियत की बात करते हैं जो कि जिहाद के एक उदार दिखते मुखौटे के अतिरिक्त कुछ नहीं!  
इसके पीछे एक कारण यह भी है कि उदारता के गर्भ में द्रोह जन्म लेता है, जो संरक्षण में फलता फूलता हुआ आत्महंता राक्षस बन जाता है, ऐसा राक्षस जो कुल और समाज का भी नाश कर देता है। जश्न-ए-शाहीन के पोस्टर पर दिये नामों में चार मुसलमानों के नाम महत्त्वपूर्ण नहीं, उनका तो घोषित उद्देश्य ही यही है कि काफिरों का नाश हो, चिंताजनक वह नाम है जो सबसे ऊपर है – अंकुर तिवारी। एक नाम जो उनके लिये कवच है, मुखौटा है, उपयोगी आत्महंता मूर्ख काफिर है जो उनके जिहाद को उजागर करने वालों के मुँह पर सेकुलरिज्म, ह्यूमेनिज्म आदि की थूकें मारेगा - थू है तुम्हारी संकीर्ण मानसिकता पर। ये तो जानवर को भी जिबह करते हुये कितने प्यार से सल्ला फेरते हैं‍! ये हमारे शत्रु? कदापि नहीं!

रविवार, 12 जनवरी 2020

बाबा नागार्जुन द्वारा कन्या से यौन दुष्‍कर्म के ब्याज से


तोड़ दूँगा मैं तुम्हारा आज यह अभिमान!
तुम हँसो, कह दो कि अब उत्संग वर्जित है-
छोड़ दूँ कैसे भला मैं जो अभीप्सित है?
कोषवत, सिमटी रहे यह चाहती नारी-
खोल देने, लूटने का पुरुष अधिकारी!
ओस चाहे, वह रहे, रवि-ताप ही चुक जाय,
फूल चाहे, लख उसे झंझा स्तिमित रुक जाय!
कूल की सिकता कहे बढ़ती लहर थम जाय,
पुरुष स्त्री की तर्जनी से पिघल कर नम जाय!
शक्ति का सहवास खो कर पुरुष मिट्टी है-
पूछता है पुरुष पर, वह शक्ति किस की है?
शक्ति के बिन व्यर्थ मेरा दृप्त जीवन-यान
क्यों न उस को बाँधने में तब लगूँ तन-प्राण?
बद्ध है मम कामना में क्षणिक तेरा हास,
मेघ-उर में ही बुझेगा दामिनी का लास!
दूर रहने की हृदय में ठानती क्या हो!
तुम पुरुष की वासना को जानती क्या हो!
मत हँसो, नारी, मुझे अपना वशीकृत जान-
तोड़ दूँगा मैं तुम्हारा आज यह अभिमान!
‍‍‍....
(अज्ञेय, लाहौर, 17 सितम्बर, 1936)
****
साहित्यकार साहित्यकार होते हैं, उन्हें वैसे ही समझें, पूजें नहीं। नागार्जुन 'बाबा' पर एक भूतपूर्व कन्या गुनगुन थानवी ने आरोप लगाया है कि नागार्जुन ने उसके साथ कुकर्म किया था, जब वह सात वर्ष की थी; तब जब कि वह उसके माता पिता की शरण में जी रहा था। उसका घर में आतंक बहुत था तथा उसी आतंक के चलते वह सब कुछ कर सका। हंसवाहन एक अन्य साहित्यकार का आतंक महिलाओं व भूतपूर्व सहित उसके वर्तमान की युवतियों पर कैसा था, छिपा नहीं। एक अन्य के अपनी बहन से ही अवैध सम्बंध थे ... बड़ी लम्बी सूची है, जिस पर कबीता कहाँई ग्रस्त समाज वाले लोग विश्वास नहीं करेंगे। साहित्यकार अनूठी प्रतिभा तो रखते ही हैं, शब्दों के साथ जिस कलाकारी का परिचय देते हैं, वही जीवन के यौन अपराध सहित अन्य कार्यक्रमों में भी उपयोग में लाते होंगे, भोला हीनू समाज मानने से रहा। अस्तु। 
मुझे नागार्जुन पर लगाया गया आरोप सच लगता है। आप न मानने को स्वतंत्र हैं और मैं प्रमाण न देने को। बहुत कुछ परिस्थितियों के अनुगत होता है जिसका लेखा जोखा कोई नहीं रख सकता और न रखना चाहिये। पुरुष हेतु स्त्री प्रलोभन है, यह मैं पुरुष होने के कारण अच्छे से जानता हूँ। स्त्री हेतु पुरुष भी होगा - यौन दुष्कर्म करने वालों पुरुषों के प्रति सहानुभूति की माँग रखने वाली राधाकृष्णन हो या यह पूछने वाली कि मेरा प्रेमी मेरे यौन साथी से भिन्न है, कोई समस्या तो नहीं? स्पष्ट कर देती हैं कि स्त्री के मन में भी पुरुष के प्रति उद्दाम आकर्षण होता होगा, अभिव्यक्ति व प्रकृति भिन्न रहेंगे ही जिन्हें कृत्रिम व पाखण्डी 'समानता' के मारे जन नहीं समझ सकते। बालपन से ही विकृत शिक्षा पद्धति द्वारा नैसर्गिक समझ कुचली जाती रहती है, कैसे समझेंगे? 
सभ्यता का आधार यौन अनुशासन है। संस्कृति की नींव यौन अनुशासन है। कम्युनिज्म इन दोनों का शत्रु है क्योंकि वह इन्हें एक दुर्ग व उस दुर्ग की जीवन रेखा की भाँति व्याख्यायित करता है जिसे तोड़े बिना 'आजादी' सम्भव नहीं। वह आजादी जो केवल शातिर निठ्ठले धूर्त जन को विविध भोगों की अबाध आपूर्ति सुनिश्चित करती है, जिसकी मरीचिका में चौंधा खाये भोले मनुष्य भटकते हुये अपने को उन्हें 'देते' रहते हैं, पूँजीवाद के अतिरिक्त मूल्य का दर्पण बिम्ब। समस्त स्थापित जीवनमूल्यों का समूल संहार किये बिना वह आजादी सम्भव नहीं जिसके लिये अराजकता का प्रसार पहली आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों से ले कर विविध भारततोड़क आंदोलनों में जिस 'आजादी' का कोलाहल है, वह न तो सहसा है और न ही वैसा है जैसा बताया जा रहा है। जवनिका के पीछे चल रहे बहुत बड़े अभियान का वह 'रैपर' है, सामग्री छिपी हुई है, समय समय पर अपना रूप व प्रभाव दिखाती रहेगी। 
आप को आश्चर्य होगा कि राधाकृष्णन हो या थानवी, उसी फेमिनाती-कम्युनिस्ट-इस्लाम युति की 'उपयोगी मूर्खायें' हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिये, भ्रमित बुद्धि के साथ जब व्यक्ति पाश में पड़ जाता है तो जीने के लिये, अपना औचित्य बनाये रखने के लिये, रोटी, दारू व कण्डोम की आपूर्ति के लिये ऐसी सचाइयों को उद्घाटित करता रहता है। यह भी सहसा नहीं होता कि किसी दिन अंतरात्मा जाग गई और भभक उठी। सब कुछ सुविचारित व सुनियोजित होता है जिसे हम जान नहीं पाते, जिसमें उसी साहित्यिक प्रतिभा का प्रयोग होता है जो अज्ञेय की ऊपर उद्धृत कविता में दिखती है, नाम भले किसी आकर्षक आंदोलन का दे दिया जाता है, सुंदर रैपर, सुंदर पैकिंग। 
थानवी ने फेसबुक पर लम्बा लेख लिखा है। उसने जामिया के आतंकी जिहादी को पुलिस से बचाती उस जिहादन का चित्र आदर्श ध्वज के रूप में लगा रखा है जिसकी सारी क्रांतिकारिता केरल के जिहादियों के आगे जाती रही तथा उसने मञ्च से क्षमा माँगी। वह पुलिस वाला सामान्य हिंदू मनई होगा जिसे बचपन से सिखाया गया होगा कि नारी पर हाथ नहीं उठाते, जो विभागीय आचरण संहिता से बँधा होगा कि स्त्री पर स्त्री बल ही हाथ उठा सकता है अन्यथा वह थी ही कितने डण्डों की! पुलिस के मृदु व सभ्य आचरण के अनेक कारण होंगे किंतु यह सच है कि जिहादी ने जिहादन का एक कवच के रूप में उपयोग किया तथा जिहादन ने पुलिस वाले के संस्कार व अनुशासन का पूरा लाभ उठाया। वह भारततोड़क वामजिहादी आंदोलन की 'पोस्टर गर्ल' बन गई! 
थानवी ने 'कागज नहीं दिखायेंगे' वाला नारा भी प्रमुखता से प्रदर्शित कर रखा है। आप के साहित्यकार भी ऐसा करते रहे हैं। देखने वाले दृष्टि विकसित करें, समझने वाली बुद्धि। एक दिन में नहीं हो पायेगा, सतत लगे रहना पड़ेगा। 
यौन अनुशासन की मानसिक रेखा को कैसे चरणबद्ध ढंग से धूमिल या नष्ट किया गया है, इसका उदाहरण राधाकृष्णन की वह लम्बी ट्विटर लेखमाला है जिसमें यौन आक्रमण के होते समय शारीरिक स्नेहक स्राव को लेकर प्रश्न उठाया गया है कि क्या मैं उस समय आनंद का अनुभव कर रही थी? आगे उसने उसी आक्रांता के साथ सहमति से अनेक बार यौन सम्बंध बनाने की बात लिखी है तथा और भी बहुत कुछ है। कहाँ तो यौन उच्छृङ्खलता के बारे में सोचना भी 'पाप' था और कहाँ बात यहाँ तक आ गई कि यौन दुष्कर्मियों को खल नहीं बताना चाहिये। जो इतनी देखभाल करता है, मित्र है, उसने एकाध बार बलात्कार कर ही लिया तो बुरा हो गया? इसे लक्ष्य ऊँचा करना कहते हैं, चतुर कर्म। यौन शुचिता की जो बातें थीं कि विवाह पूर्व सामान्य संयम रखें, शारीरिक सम्बंध न बनायें; यह उससे बहुत आगे की बात हो गई जिसमें यौन सम्बंध my life my choice का सहज सत्य है, विवाह जैसी साँसघोंटू घटना हेतु प्रतीक्षा क्यों की जाय? स्वयं को सुख से वञ्चित क्यों किया जाय? यह तो सहज है, आओ कामरेड, इसमें आने वाली मानसिक व दैहिक समस्याओं पर विचार करते हैं, किसी ने बलात्कार कर दिया तो कर दिया! यह तो मार्ग पर चलते समय दुर्घटना वाली बात हो गई, भूलो और उस पर आगे बढ़ो, कितना अच्छा मार्ग है, है न? सूक्ष्म विमर्श इस पर करो कि उस समय योनि से स्नेहक स्राव क्यों हुआ? 
हम देख सकते हैं कि आजाद विकृतियों में जीते युवाओं ने कितना वैविध्य भरा व यथार्थ से कटा हुआ संसार विकसित कर लिया है, परिवेश के सामान्य संसार से असम्पृक्त एक दुर्गबद्ध संसार जिसकी प्राथमिकताओं का देश, समाज, परम्परा आदि से कुछ नहीं लेना देना और ऐसे युवा हमारे देश के तथाकथित गुणवत्ता वाले उच्च शैक्षिक संस्थानों की सचाई हैं। इनसे हम आस लगाये बैठे हैं तो हम सा मूर्ख कौन? 
विकृत यौनाचार से सभ्यतायें नष्ट हुई हैं, संस्कृतियाँ विकृत हो मानवमात्र हेतु अशिव हो गई हैं। स्त्री हों या पुरुष, सामान्य यौन शुचिता बनाये रखने पर ध्यान दें, सीमायें न लाँघें। सहस्राब्दियों की सञ्चित समझ ने उनका निर्माण किया है। 
एक बात सामान्य पुरुषों से। उस स्त्री का विशेष सम्मान करें जो जननीस्वरूपा है, जो उससे जुड़े गुणों को धारण करती हुई अपनी विशिष्टता बनाये रखती हुई समाज को थामे रखती है किंतु जिन्हें मातृत्व से ही बैर है और जो निरपेक्ष 'समानता' की प्रवक्ता हैं, स्वयं को व्यक्ति के रूप में देखे जाने को कहती हैं, स्त्री रूप में नहीं; उनसे 'स्त्री को विशेष सम्मान' वाली शिक्षा को किनारे रख ही संवादित हों। समानता सुनिश्चित करें - स्त्री पुरुष एक समान। दूरी रखें तो अधिक ठीक क्योंकि वे सामाजिक विशेषाधिकार का बहुत धूर्तता के साथ प्रयोग करने में निष्णात होती हैं। चित्त भी मेरी, पट भी उनका आदर्श वाक्य होता है तथा ऐसे समय पुरुष महामूर्ख ही सिद्ध होते हैं। स्त्री का पतन पुरुष के पतन की तुलना में बहुत घातक होता है, अनेक कारण हैं। मनन करेंगे तो स्पष्ट होता जायेगा कि उसके मूल में उसका माता होने का गुण ही है। विशेष जब बिगड़ता है तो विशेष ही होता है!