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गुरुवार, 27 जनवरी 2011

लेंठड़े का गाली विमर्श - अंतिम भाग

भाग- 1, 2 और 3 से आगे...
गालियाँ सीख कर उनका धड़ल्ले से प्रयोग कर लेने वाले भी समझते हैं कि गालियाँ संवाद की मुख्य धारा नहीं है। अधिकांश बाल बच्चेदार हो जाने के बाद गाली बकना अंतरंग मित्रों की बैठक के लिये सुरक्षित कर देते हैं। यह दर्शाता है कि परिवार के बाहर भी एक अलग सा रागात्मक परिवेश है जो एक दूसरे से इतना खुला है कि निषिद्ध सम्वाद भी बेहिचक कर लेता है। गालियाँ वहाँ सहज ही आती हैं चली जाती हैं। यह ‘निजी’ परिवेश परिवार इतना महत्त्वपूर्ण भले न हो, कम महत्त्व नहीं रखता। इस परिवेश में निराशायें, दुख, क्षोभ साझा किये जाते हैं और आगे के लिये महत्त्वपूर्ण बातें तय की जाती हैं। इस परिवेश से गालियाँ निकाल कर देखिये – औपचारिकता हाबी होने लगेगी।
हिन्दी साहित्यिक समाज छिछ्ला आत्ममुग्ध समाज है। अध्ययन, उदारता और आत्ममंथन का घोर अभाव है। मजे की बात यह है कि इससे जुड़े सभी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं लेकिन वे स्वयं छिछ्ले तर्कों और जुमलों का प्रयोग दूसरों के लिये करते हैं। समृद्ध परम्परा वाली भाषा बोलियों के स्थान पर एक नई भाषा खड़ी बोली को संस्कारित कर विकसित की गयी और देखते ही देखते सौ वर्षों से भी कम समय में इस पूरे क्षेत्र की सभ्य, असभ्य, औपचारिक, अनौपचारिक सब भाव की भाषा बन गई। यह चमत्कार नहीं था। इसकी सफलता के पीछे एक अंगड़ाई लेते समाज की आशायें थीं और कर्मयोगियों का श्रम था। लेकिन बाद की साहित्यिक पीढ़ी समाज से कटती चली गई। उसके कथित क्रांतिकारी साहित्य के पन्ने ‘दीवारी क्रांति’ तक सीमित रह गये। जनवाद की बातें तो खूब हुईं लेकिन उन्हें सुनने वाले जन कब ‘बतकही’ को छोड़ गए, पता ही नहीं चला।
आज हिन्दी समाज में सिनेमा और टी वी की पैठ साहित्य से अधिक है। पढ़े लिखे तबके में इंटरनेट का प्रयोग तेजी से फैल रहा है। हिन्दी क्षेत्र के बुद्धिजीवी वर्ग का बहुसंख्य अंग्रेजी में और अंग्रेजी को पढ़ता है। वह गम्भीर विमर्श अंग्रेजी में करता है। उसे अपने लिये अलग से न गढ़ना है और न अपनी भाषा को सक्षम बनाने का उद्योग करना है। इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बाद भी नेट पर स्तरीय हिन्दी सामग्री का अकाल है। साहित्य और लक्षित पाठक में एक दूसरे से कटाव की स्थिति है। कोई आश्चर्य नहीं कि हिन्दी में ‘नया बेस्ट सेलर साहित्य’ नहीं के बराबर है। विश्वविद्यालयों में हिन्दी बची है तो उसका भी कमोबेश वही हाल है जो राज्य से आश्रय पाई ‘राजभाषा हिन्दी’ का है। अकादमिक गलियों में मेरिट के बजाय गोल और गोलबन्दी को आगे बढ़ाने का चलन है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि हिन्दी साहित्य से क्रांति नहीं हो सकती। दूसरी भाषाओं में भी साहित्यिक कृतियों के कारण क्रांति का कोई उदाहरण नहीं मिलता, हाँ वन्दे मातरम जैसे विरल उदाहरण अवश्य हैं जिन्हों ने क्रांति के जुनून को स्वर और सहारे दिये। यह साहित्य की शक्ति और सीमा दोनों है लेकिन हिन्दी की स्थिति में केवल सीमा ही सीमा है।
यहाँ साहित्य समाज को दिशा नहीं दे सकता लेकिन अपने समाज का दर्पण तो बन ही सकता है। जिस समाज में सड़क किनारे या हर उस जगह पर जो साफ, समतल और चिकनी हो, हगने का रिवाज हो, गालियों का चलन सीधे मनोवृत्ति से जुड़ता है। अब साहित्य अपने समाज की ही बात करेगा, दूसरे समाज की नहीं। दूसरे साहित्य में भी ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं। जिनके यहाँ जैसी गालियाँ हैं, साहित्य में वैसी आती हैं। हिन्दी में भदेस और लैंगिक गालियाँ आनी कुछ अधिक ही स्वाभाविक हैं, जो समाज का सच हैं।
यह युग उदारीकरण के साथ साथ ध्रुवीकरण का भी युग है। जाति, लिंग, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र आदि को लेकर नित नई गोलबन्दियाँ हो रही हैं। ऐसे में साहित्य की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। क्या हिन्दी साहित्यिक समाज संवाद, संवेदना, सहानुभूति और उदात्त मानवीयता को स्वर देने को तैयार है? स्थापित साहित्यिक समाज सुविधापरस्त, भ्रष्ट और पाखंडी है और तकनीकी के कारण आम पढ़े लिखे लोगों को अभिव्यक्ति के जो नए प्लेटफॉर्म मिले हैं, उन पर हो रहे सृजन को देखकर भयभीत है। अनर्गल प्रलाप, जुमलेबाजी और आरोप शुरू हो गये हैं। ये सभी उनके छिछ्लेपन के प्रमाण हैं। वे यह भी भूल गये हैं कि काल की गति रोकना सम्भव नहीं।
साहित्य में गालियों के उन सीमित प्रयोगों पर हो हल्ला मचाना जो कि कथ्य को स्वाभाविकता और सम्वेदना से पूरित करती हैं, एक साजिश है और कुछ नहीं। पाठक वर्ग में तमीज थी और हमेशा रहेगी। उसे फुटपाथिये मस्तराम की गाली और ‘काशी का अस्सी’ की गाली में फर्क करना बखूबी आता है। साहित्यकारों से श्रम और ईमानदारी अपेक्षित है न कि एक दूजे का पीठ खुजाने की गोलबन्दी और सतही जुमलेबाजी। गालियाँ साहित्य से समाज में नहीं जातीं, समाज से साहित्य में आती हैं। समाज इतना संस्कारित हो जाय कि गाली बकना ही छोड़ दे, एक बहुत व्यापक फलक वाला विषय है और उसमें साहित्य का योगदान तो है लेकिन इतना भी नहीं कि उसे शुचितावादी होकर कृत्रिमता का चोला पहनने की आवश्यकता पड़े। (समाप्त)
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धूप खिल चुकी थी। लेंठड़े ने प्रवचन समाप्त करते हुये अपनी यह बात दुहराई कि उसे मानव समाज का बहुत कुछ समझ में नहीं आता। जानना एक बात है और समझना दूजी बात।
मुझे पढ़ने के लिये एक ब्लॉग लिंक देकर वह वापस लाइब्रेरी में चला गया।

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

लेंठड़े का गाली विमर्श - 3


भाग- 1 और 2 से आगे... 

स्त्री पुरुष का आपसी आकर्षण, जिसकी चरम परिणति दैहिक समागम और संतति मे होती है, संसार का सबसे बड़ा सच है। नियमन की प्रक्रिया में समाज ने समागम को निकृष्ट कर्म बना दिया जिसका पार्श्व प्रभाव गालियाँ थी। विवाह स्त्री पुरुष सम्बन्ध को एक नैतिक और स्वीकार्य धरातल देता है लेकिन इसके बाद बहुसंख्य समाज सेक्स शिक्षा का कोई आयोजन नहीं करता। स्त्री को यह शिक्षा माँ और सहेलियों से मिलती है तो पुरुष को अंतरंग मित्रों से। सही गलत की बात नहीं, जो है सो है। विवाह के मांगलिक अवसर पर निकट सम्बन्धों का आलम्बन ले कर होने वाला गाली गायन नई पीढ़ी को परम्परा के माध्यम से स्त्री पुरुष सम्बन्धों के निकृष्ट न होने का सूक्ष्म संकेत होता है। नई पीढ़ी मैथुन क्रिया का आलम्बन ले घृणित गालियाँ रोज कहती सुनती रहती है। क्रिया आधारित जुगुप्सित गालियों के बजाय सम्बन्ध आधारित सरस गालियों का सबसे महत्त्वपूर्ण संस्कार अनुष्ठान में आवश्यक अंग बनना मस्तिष्क के भीतर की उस स्वाभाविक रागात्मकता को स्वास्थ्य प्रदान करता है जिसे दैनन्दिन निषेध रोग की तरह घोषित किये रहते हैं।
वैवाहिक अनुष्ठान में ‘माटिकोड़वा’ के अवसर पर केवल स्त्रियाँ होती हैं। बुआ या बहन मिट्टी खोद कर गड्ढा बनाती है जिसमें पानी भर कर सिक्के डाल दिये जाते हैं और उन्हें ढूढ़ने के कौतुक होते हैं। सिक्के रत्नगर्भा की क्षमता के प्रतीक होते हैं जिसका दोहन नया परिवार बसाने जाते दम्पति को करना होता है। इस अवसर पर बेहिचक और बिन्दास लैंगिक गालीगलौज होता है। मैथुन के प्रत्यक्ष सन्दर्भ वाली गालियाँ भी खूब चलती हैं। कृषि के पुरुषकेन्द्रित होते जाने और पैतृक भूमि सम्पत्ति से स्त्री को बेदखल कर दिये जाने के प्रति यह कहीं स्त्री का विरोध प्रदर्शन तो नहीं? ठीक वैसे ही जैसे आम पुरुष हताशा में गाली बक कर, नपुंसक ही सही, प्रतिरोध का संतोष कर लेता है और आगे के संघर्ष के लिये तैयार हो जाता है। यह क्रिया इतनी स्वाभाविक है कि पुरुष व्यक्तित्त्व का अंग सी हो गई है। घर में केन्द्रित स्त्री या कृषि कर्म में सहयोगी लेकिन उपेक्षिता स्त्री को अपने लिये सम्भवत: विरोध प्रदर्शन का यही अवसर मिला।
विवाह के बाद, जब कि एक नया परिवार बनता है, स्त्री धरती माँ की तरह ही बीज को गर्भ में सहेज सृजन करती है। स्त्री के लिये धरती से बेहतर अपनापन क्या हो सकता है? विवाहोपरांत स्त्री पैतृक भूमि अधिकार से वंचित होकर ससुराल की भू सम्पत्ति में भागीदार बनती है। कहीं गालीबाजी विरोध प्रदर्शन के साथ नई सम्भावना के लिये उल्लास प्रदर्शन तो नहीं? प्रश्न उठता है कि गाली ही क्यों? किसी और कथ्य में कठोरता से नियमित समागम क्रिया केन्द्रित गालियों जैसी तीव्रता कहाँ? वह भी पुरुष केन्द्रित समाज में जहाँ गाली बकना पौरुष का प्रतीक माना जाता हो और गाली देना स्त्री के लिये एक निहायत ही गलीज निकृष्ट कर्म।
ऐसी प्रथायें नगरीकरण के साथ साथ ‘सभ्यता’ के तकाजे को ध्यान में रखते हुए लुप्त हो रही हैं – अप्रासंगिक हो गई हैं। कुंठा और आक्रोश अभिव्यक्ति के तमाम साधन उपलब्ध हैं। हिंसक प्रमोद का अपना आनन्द है। स्त्री बराबरी के प्लेटफॉर्म पर उतनी ही बर्बर या क्रूर हो रही है जितना पुरुष। यहाँ के नियम और विधियाँ अलग हैं।
 निकट सम्बन्धों जैसे देवर भाभी में गालीबाजी मनोविनोद का साधन तो है ही, समाज द्वारा इसकी स्वीकृति एक तरह से सम्भावित विपत्ति से निपटने की परोक्ष व्यवस्था भी। यह मनोविनोद पारिवारिक दायरे के भीतर एक अलग सी रागात्मक निकटता गढ़ता है। देवर शब्द से ही दूसरा पति ध्वनित होता है। ऐसी तमाम घटनायें हैं जहाँ अकाल मृत्यु की स्थिति में समाज ने स्त्री को देवर से विवाह की अनुमति दे दी। कई मामलों में तो स्त्री संतानवती भी थी।
 कोई आवश्यक नहीं कि दैनन्दिन गाली बकने वाला स्त्री जाति के प्रति अनादर का भाव रखता हो। जैसा कि पहले कहा, यह क्रिया उसके संस्कारों और परिवेश से अनुकूलित मस्तिष्क में स्वचालित सी आती है और अप्रत्यक्ष रूप से अवसाद या क्रोध का निवारण कर उसे आगे के संघर्ष के लिये तैयार कर देती है। अपने परिवार के और दीगर स्त्रियों के प्रति वह आदर, अनादर या तटस्थता का वही भाव रखता है जो पुरुषों के लिये रखता है।
अब सवाल यह कि स्त्रियाँ गाली क्यों बकती हैं? पुरुष केन्द्रित समाज में अगर पुरुष को झटका देना है या उसके ऊपर ‘विजय’ प्राप्त करनी है तो उन्हीं अस्त्रों का प्रयोग क्यों नहीं जिनका प्रयोग वह स्त्री को पीड़ित करने के लिये करता है? बहुधा स्त्री के मुँह से लैंगिक गालियाँ निरर्थक लगती हैं लेकिन पुरुष के लिये स्त्री की यह ‘निर्लज्जता’ एक जोरदार झटका होती है, साथ ही समागम क्रिया में पुरुष वर्चस्व को चुनौती भी – फक यू! चोद तुम ही नहीं मैं भी सकती हूँ, तुम्हें आनन्द आता है तो मुझे भी आता है। ऐसी स्त्री प्रतिद्वन्द्वी को मानसिक रूप से हीन भाव ग्रसित कर देती है। लड़ाई में शत्रु का यही हाल होना चाहिये न। परिणाम देखो, अपनाया गया मार्ग नहीं।
गाँव गिराम में तो ऐसी स्त्रियाँ हमेशा से रही हैं, महानगरीय संस्कृति में उच्च शिक्षित प्रोफेशनल स्त्री तबके में भी इस प्रवृत्ति का अवतरण सबको चौंका रहा है।  इसमें चौंकने जैसी कोई बात नहीं है। स्त्री पुरुष से कन्धा मिला कर साथ चल रही है। उसे भी उन्हीं चुनौतियों और निराशाओं का सामना करना है जिनका सामना पुरुष करता रहा है। अपने लिये कुछ नया ढूँढने की उसे कहाँ फुरसत? गाली दे देना अच्छा है या घुटते हुये मनोरोगी होना? बहुतेरी के लिये तो यह स्वाभाविक बात है, ठीक पुरुषों की तरह वे इसके बारे में सोचती भी नहीं। हाँ, यह प्रवृत्ति बहुधा इतनी स्वस्थ मनोवृत्ति को नहीं दर्शाती। इसका उल्टा कुछ अधिक ही सच है। लेकिन ऐसा स्त्री पुरुष दोनों के लिये है। अभी संक्रमण काल है, आगे बदलाव होंगे। परिवेश का ‘लिंग्वा फ्रैंका’ ऐसी कामकाजी स्त्रियों का भी है। सामाजिक वर्गानुसार संस्कृत और प्राकृत सम्वाद विभेद साहित्य में चल सकता है, दैनिक जीवन में नहीं।   
 गालियों को लेकर सारी चिंतायें मध्य वर्ग की ही हैं। निम्न और उच्च वर्ग इनसे अधिक हलकान नहीं होते। मध्य वर्ग ने सारी अच्छाइयों का ठीका जो ले रखा है! प्रश्न यह है कि समाज या साहित्य में गालीबाजी क्या एक चिंतनीय विषय है? हिन्दी पट्टी के परिप्रेक्ष्य में गालियों का साहित्य में उतरना कहाँ तक उसके छिछलेपन से जुड़ता है? कहीं यह महज उसकी निराशाओं और यथार्थ को चित्रित करने की एक विधि तो नहीं? हम किसी साहित्य का क्या याद रखते हैं – गालियाँ या उनसे जुड़ी सम्वेदनशीलता? गालियों के बिना भी साहित्य रचा जा सकता है लेकिन क्या बस इसे न मानने के कारण कोई साहित्य या साहित्यकार छिछ्ला और त्याज्य हो जाता है? ...(अगला भाग) 
लेंठड़े की पुरानी बातें:

शनिवार, 22 जनवरी 2011

लेंठड़े का गाली विमर्श - 2

पहले भाग से आगे...
लेंठड़े ने मुझे पार्क के किनारे पेंड़ के नीचे बुला लिया। पूछ बैठा – यह किसका पेंड़ है? मुझे प्रश्न से आश्चर्य हुआ। मंतव्य न समझते हुए भी मैंने बता दिया,“आम का।“
“कभी आम के पेंड़ पर चढ़े हो?”
मैं जोश में आ गया – जाने कितनी ही बार चढ़ा हूँ!
“बड़े चूतिये हो!”
सुबह सुबह किसी केंकड़े से ऐसा सुन कर मैं हैरान भौंचक्का रह गया! उसने अपने पंजे कड़कड़ाये और कहा – सिर्फ मनुष्य ही गालियाँ बकते हैं क्यों कि उनके पास भाषा है, यह एक अज्ञानी का तर्क है।...
चूतांकुरा स्वादकषायकंठ:... चूत माने आम का वृक्ष। इसका एक अर्थ गुदा या गुह्यांग भी होता है। दूसरे अर्थ की उपेक्षा कर अगर मैं ‘आम’ अर्थ का आश्रय ले, वह भी एक अप्रचलित भाषा से, किसी को यह गाली देने के बाद उसे बहलाने का प्रयास करूँ कि मैंने आम के पेंड़ पर चढ़ने वाले के लिये कहा तो मेरे कुतर्क और बलात-कुविद्या को वह मानेगा या मुझे मारने दौड़ेगा?... गायत्री मंत्र के प्रेरित अर्थ वाले ‘चोद’ और मैथुन की शारीरिक धकेल को व्यक्त करने वाले गाली की ‘चोद’ में अंतर है। कहने वाले की भावना देखी जाती है, शब्द नहीं। ‘साले’ में मित्रों का प्रेम भी है और किसी अजनबी के प्रति प्राथमिक गाली भी। असल में तुम मनुष्यों की बहुत सी बातें मुझे समझ में नहीं आतीं। मैं बात करते गोबर..नहीं हिन्दी पट्टी पर केन्द्रित रहूँगा। ठीक है न?
... मेरा मन ऐसा हो गया जैसे सुबह सुबह किसी ने जबरिया ब्लैक कॉफी पिला दी हो, वह भी बिना शक्कर की! उसने अपनी बकवास को आगे बढ़ाया...
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प्रहार शारीरिक और मानसिक दोनों होते हैं। जिस सम्बन्ध या वस्तु के प्रति जितना अधिक सम्मान और अपनत्त्व का भाव होता है, वह प्रहार के लिये उतनी ही उपयुक्त होती है। किसी को कष्ट पहुँचाना हो तो उसके लिये जो परम आदरणीय है, उसका परम अनादर कर दो – गालियों के पीछे यह मानसिकता काम करती है। आश्चर्य नहीं कि माँ की गाली सबसे तीखी और खराब मानी जाती है। अंतरंग मित्र जो बिना गालियों के एक दूजे से एक वाक्य भी नहीं बोल पाते, वे भी इससे परहेज करते हैं। बहुतेरे ऐसे हैं जो कोई भी गाली सह लेते हैं लेकिन माँ की गाली मिलते ही क्रोधोन्मत्त हो जाते हैं। न्यूनाधिक रूप में ऐसा पिता केन्द्रित गाली के साथ भी होता है। ऐसा क्यों है?
भावनायें अपनी जगह हैं लेकिन उसके पीछे वर्चस्व और प्रतिष्ठा की मानसिकता काम करती है। माँ की गाली देने वाला यह जताता है कि देखो इस नपुंसक को! इसके सबसे प्रिय व्यक्ति को मैंने गाली दे दी। उसे गाली दी जो इसे इस संसार में ले आई। यह पुरुष प्रधान समाज में सम्पत्ति और भावना के जटिल मिश्रण वाले सबसे प्रिय स्त्री सम्बन्ध पर प्रहार कर सामने वाले को मानसिक रूप से पीड़ित करने का उद्योग होता है। गाली देने वाला अपनी जान सामने वाले की प्रतिष्ठा को क्षतिग्रस्त कर रहा होता है। प्रतिष्ठा में जो महाप्राण ‘ठ’ है, उसमें बहुत ठसक है। इतनी ठसक है कि बहुत बार भाव को स्थानच्युत और ठरका देता है लेकिन समझते ही कितने हैं? आक्रामकता को दर्शाते और सराहते हुये प्रतिष्ठा का मूल स्थान ही खिसक जाता है। गाली देते हुए वह अपनी जननी को भी कहीं आक्षेपित कर रहा होता है, यह उसकी समझ में नहीं आता।
लेकिन उन गालियों का क्या जो लोकभाषाओं का अंग हो गई हैं? वास्तव में बहुधा इन गालियों में उन सभी पुरानी लुप्तप्राय भाषाओं के अंश सुरक्षित रह जाते हैं जिनसे लोकभाषा विकसित हुई – संस्कृत के चूत या चोद उदाहरण हैं।
यह उल्लेखनीय है कि संस्कृत ‘संस्कृत’ भाषा साहित्य में कहीं भी लैंगिक, यौनांगों या यौन सम्बन्ध आख्यानक गालियाँ नहीं हैं। व्यक्ति के बजाय उसके सम्बन्धियों पर प्रहार करती गालियाँ भी नहीं पायी जातीं। प्रताड़ित करने के लिये व्यक्ति केन्द्रित अपशब्द भर मिलते हैं जैसे पामर, नीच, कुलटा, दुष्ट, दुर्मति, लंपट आदि आदि। संस्कृत में लोकभाषा के लिये तिरस्कार का भी भाव मिलता है। उसे ‘ग्राम्या’ कह कर उपेक्षित किया गया है। परवर्ती नाटकों में ग्रामीण, अशिक्षित या निम्न वर्ग के सम्वादों के लिए प्राकृत या पाली का प्रयोग हुआ है और नागर या सुशिक्षित व्यक्ति सम्वादों के लिये संस्कृत का। प्रश्न यह है कि समाज की वास्तविक स्थिति से परहेज क्यों? इसके कई कारण हैं - समाज को संस्कारशील बनाये रखने के लिये एक मानक की आवश्यकता (नाटकों में हत्या, चुम्बन आदि मंच पर दिखाने पर निषेध); श्रेष्ठताबोध और नागर दम्भ; भाषा को पवित्र और अति विकसित देवसभ्यता से जोड़ा जाना आदि आदि। यह प्रवृत्ति संसार की अन्य प्राचीन भाषाओं में भी पायी जाती है।
हिन्दी के समूचे भक्ति साहित्य में भी लैंगिक या यौन सम्बन्धों वाली गालियाँ नहीं हैं, अपशब्द भले हों। रीतिकाल में भी कमोबेश ऐसा ही है। इन सबके पीछे शुचिता की यह अवधारणा कि साहित्य समाज को संस्कारित करने वाला होना चाहिये, काम करती रही लेकिन साहित्य में नागर, शिक्षित और अभिजात्य वर्ग का पाखंड भी प्रवेश कर गया। परिणामत: यौन सम्बन्धों, अवैध सम्बन्धों आदि के चमत्कारिक और जुगुप्सा की हद तक जा कर ग्राफिक वर्णन हुए। स्त्री पुरुष सम्बन्धों की उद्दाम रागात्मकता और रोगी मनोवृत्ति के बीच के अंतर को भुला दिया गया। साहित्य सरस्वती धनपशुओं की चेरी हो गई। ‘ग्राम्या’ की उपेक्षा की अगली परिणति हुई – आम जन जीवन की उपेक्षा, तब जब कि रचनाभाषा ‘ग्राम्या’ ही थी। साहित्य में संस्कार उड़ेनले वाले संत व्यक्तित्त्व तो रहे नहीं, साहित्य समाज को दिशा क्या देता, उसका दर्पण भी नहीं रहा और उससे कट गया।
एक बात अनुकूलन पर भी। स्त्री को लालित्य का प्रतीक माना गया। प्रकृति-पुरुष द्वय में कोमल भाव की वाहिका स्त्री रही। इसे शिशु पालन की नैसर्गिक मातृ/ममत्त्ववृत्ति का तार्किक विकास मानना चाहिये। साहित्य, संगीत, कलादि को स्त्री तत्त्व से जोड़ दिया गया। लोककथाओं में भले मिल जाय लेकिन इस ‘सभ्य’ समाज में विद्या की देवी ही मिलेगी, देवता नहीं। यह सब जनमानस में इतना पैठ गया कि अनुकूलित हो सोच, समझ, व्यवहार, बोली आदि का अंग हो गया और बहुतेरे इससे इतर सोच ही नहीं सकते। स्त्री केन्द्रित गालियाँ उस सोच का विस्तार हैं जो सुसंस्कृत व्यवहार को पुरुष प्रधान समाज में स्त्रैण और निष्प्रभावी मानती है और भद्दे, कटु, जुगुप्सित बोली व्यवहार को पुंसत्त्व (फलत: प्रभावी) का प्रतीक। विवादों की स्थिति में ऐसी गालियाँ प्रतिद्वन्द्वी के सामने चुनौती रखती हैं – है मर्दानगी तुममें? और सामने वाला अपने पौरुष को दर्शाने के लिये विरोधी की माँ बहन ...करने लगता है। ऐसा करते हुये वह अपने भीतर की कथित ‘स्त्रैणता’ से उबर रहा होता है। बहुधा विवाद इस ‘शक्ति प्रदर्शन’ के आगे नहीं जाते। उनका यूँ शमित हो जाना गालियों के विधेयात्मक पक्ष को उजागर करता है लेकिन सामाजिक सोच के ठहराव को भी दिखाता है और स्त्री तत्त्व के प्रति अनादर भाव को भी। सोच और व्यवहार में स्त्री-पुरुष तत्त्व का असंतुलन सीमित प्रभाव नहीं रखता बल्कि हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ता है। पौरुष की भ्रामक अवधारणा को महिमामंडित कर पुरुष प्रधान समाज की गति और प्रगति दोनों को पंगु बनाता है।
वर्तमान समय तेज परिवर्तन का समय है। गालियाँ के कई प्रकार हो गये हैं। गालियों के अलावा गाली देने वाले/वालियों पर भी ध्यान देना होगा। कई बाते हैं – गाली बकने वाले क्या इतना सोचते हैं? इसकी आवश्यकता भी है? गालियाँ की स्वीकार्यता और उनसे घृणा, जुगुप्सा किस स्तर की है? क्या गाली देने वाले के मन में वाकई स्त्री या स्त्रीजाति के प्रति अनादर का भाव ही होता है? क्या स्त्री वाकई अनादर का अनुभव कर याद रखती है या लैंगिक संकेतों पर मुँह बिचका कर उपेक्षित करते हुए भूल जाती है? स्त्री का गाली पर इतना सम्वेदनशील होना उचित है क्या, तब जब कि वह स्वयं बकती है? यह ‘सम्वेदनशीलता’ पुरुष प्रधान समाज में अपने पैर जमाती स्त्री के बराबरी के दावे से कितनी और कैसे जुड़ती है? गालियों के प्रयोग का विरोध करने वाले पुरुष स्त्रैण हैं? क्या गालियाँ इतनी आवश्यक हैं कि उनके बिना काम ही नहीं चल सकता? क्या यह समाज गालीबाज समाज है? ऐसा क्यों है कि परिवार बन्धन में बँधने के बाद बहुसंख्य जन गाली बकना अत्यल्प कर उसे अंतरंग मित्रों की बैठकी के लिये सुरक्षित कर देते हैं? गालियाँ रागात्मकता और मित्रवत प्रेम से क्यों जुड़ती हैं? कुछ निकट सम्बन्धों में गालियाँ स्वीकार्य क्यों हैं? वैवाहिक अनुष्ठानों में कुछ अवसर गालियों के कर्मकांड के लिये सुरक्षित क्यों हैं? धीरे धीरे वे लुप्त क्यों हो रहे हैं? गालियाँ सार्वकालिक और सार्वदेशिक क्यों हैं? सिनेमा, टीवी, इंटरनेट के जमाने में साहित्य में गालियों का प्रयोग समाज को कितना दूषित कर सकता है? गालियों को सहेजने की साहित्य की प्रवृत्ति समाज की स्थिति और सोच को कितना दर्शा रही है और उन्हें कितना बदल सकती है? इस युग में साहित्य समाज को दिशा देने और सामाजिक परिवर्तन करने में क्या वाकई सक्षम है?   (अगला भाग)
लेंठड़े की पुरानी बातें:

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

लेंठड़े का गाली विमर्श - 1

आज सुबह लेंठड़े से मुलाकात हुई। वातानुकूलित लाइब्रेरी से बाहर आ कर सर्दी में काँप रहा था। पंजे कड़कड़ा रहा था। वह जगदीश्वर चतुर्वेदी, मृणाल पाण्डेय, अरविन्द मिश्रादि के गाली विषयक लेख पढ़ कर  विमर्शी मुद्रा में था। दुखी भी था कि एक ओर वादी लोग 'भोजपुरी के पथभ्रष्टक दुअर्थी विशारद बलेसर 'के महिमा गायन में लगे हैं तो दूसरी  ओर गालियों से परहेज करने की सलाह दे रहे हैं। गुड़ खाओ और गुलगुल्ले से .... हाँ कुछ वैसा ही जैसे कृष्ण करें तो लीला हम करें तो व्यभिचार! 
लंठ केंकड़े के साथ विमर्श क्या होता, वह अपनी ही हाँकता चला गया। सोचा कि साझा कर दूँ। आप इसे पढ़ें तो अपने पूर्वग्रहों को ताख पर रख कर चुभलाते हुए पढ़ें ताकि रस परिपाक हो सके। पहले बताना ठीक होता है ताकि बाद में यह कह कर कि बताया नहीं, आप _रियाने न लगें। मैं अज्ञानी मन्दमति हूँ, बस उसकी बात कह रहा हूँ। मुझे वाकई इस विषय में कुछ नहीं पता। हाँ, गालियाँ दे लेता हूँ।  
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आम समझ में गाली का अर्थ यौनांगों और यौन सम्बन्धों से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी उस अभिव्यक्ति से लिया जाता है जो लक्षित व्यक्ति की प्रतिष्ठा, आत्मविश्वास या आत्मबल पर सीधा असभ्य सा प्रहार करती है। यह प्रहार लैंगिक, सामाजिक आदि पक्षों के अतिसम्वेदनशील मार्मिक बिन्दुओं पर होता है, परिणामत: शारीरिक प्रहार से भी भयानक हो जाता है।
पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के जननी स्वरूप का बहुत आदर है। स्त्री प्रधान समाज में भी होता लेकिन        शायद उतना नहीं होता। उस स्थिति में पुरुष के जनक स्वरूप का अधिक आदर होता। यहाँ ‘प्रधान’ से ‘शासित’ का भी अर्थ समझें। समाज का नारी अर्धांश कहीं पुरुष के स्वामित्त्व के दम्भ से जुड़ता है और घर परिवार के नारी सम्बन्ध जैसे माँ, पत्नी, बहन, बेटी आदि अकथित सम्पत्ति की श्रेणी में आ जाते हैं। किसी को यदि अपने प्रतिद्वन्द्वी को चोट पहुँचानी है तो उसकी एक विधि सम्पत्ति पर प्रहार है। अकथित सम्पत्ति का सबसे सम्वेदनशील पहलू उसका जननी होना है जो अति आदृत भी है। वह सम्पत्ति निर्जीव नहीं, सजीव है। उसके साथ तमाम भावनायें भी जुड़ी हैं। पशुओं की तरह उसका व्यापार नहीं होता (मैं अपवादों की बात नहीं कर रहा)। चोट पहुँचाने के लिये इससे उपयुक्त क्या ‘चीज’ हो सकती है? 
चूँकि स्त्री समान रूप से सोचने समझने की और भावनामयी शक्तियाँ रखती है इसलिये उसे भी इस प्रहार से अपार चोट पहुँचती है। इसके कारण प्रहार का प्रभाव कई गुना हो जाता है। गाली देने में किसी तरह के शारीरिक उद्योग की भी आवश्यकता नहीं लिहाजा तत्काल निकल आती है, बाद में भले उसके कारण हत्या तक हो जाय!
हजारो वर्षों से हो रहे अनुबन्धन या अनुकूलन के कारण स्त्रियाँ भी वह गालियाँ देती हैं जो स्वयं स्त्री जाति के लिये अनादरसूचक और हिंस्र होती हैं। इसे पुरुष सत्ता का प्रभाव भी कहा जा सकता है और नौ महीने सबकी दृष्टि में गर्भ भार ढोने को लेकर अवचेतन में बैठे हीन भाव का प्रभाव भी। यौन सम्बन्धों के नियमन की प्रक्रिया में उन सम्बन्धों को गोपनीय, गुह्य, अवांछनीय और पापमूलक संज्ञायें दे दी गईं। पुरुष तो शुक्राणु देकर निश्चिंत हो जाता है लेकिन स्त्री उस ‘पापक्रिया’ के भार को तीन चौथाई वर्ष तक झेलती है और बाद में प्रसव प्रक्रिया को भी जो उसके यौनांग और पूरे शरीर को क्षत भी करती है। स्त्री ‘पापक्रिया’ की प्रत्यक्ष वाहिका होने के कारण पुरुष प्रधान समाज में घृणा का केन्द्र हो जाती है। सृष्टि चलती रहे इसके लिये गर्भ ढोना गर्भाधान से अधिक महत्त्वपूर्ण है। जो सृजन स्त्री को मातृत्त्व की गरिमा और आदर से अलंकृत करता है, वही उसके लिये घोर अनादर का कारण भी बन जाता है। इस अनादर के पीछे पुरुष अवचेतन का यह हीन भाव भी है कि स्त्री का दाय उस सृष्टि को जारी रखने में उससे बहुत अधिक है जिसका वह स्वामी बना बैठा है। सम्पत्ति न हो तो स्वामी कैसा? हीन भाव हिंसा को जन्म देता है। विवादों और असहमतियों की स्थिति में गालियाँ छिपे हुए इस हिंस्र भाव की अभिव्यक्ति हो जाती हैं।
गालियों से और भी पहलू जुड़े हैं। (अगला भाग) 
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लेंठड़े की पुरानी बातें: 

रविवार, 14 नवंबर 2010

लेंठड़े का मीडिया रूम में तमाशा

पुरानी कड़ियाँ 
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पिछले भाग से आगे ...
काल, स्थान और विचार की सीमाओं से मुक्त लेंठड़े को यह स्थिति मनोरंजक लगी। जिस उन्नत सभ्यता से वह आया था, उसकी एक छटा मनुष्यों को दिखाने का इतना अच्छा अवसर जाने कब मिले! उसे लग गया था कि इस सम्मोहक वातावरण में गड़बड़ है, बहुत गड़बड़। खिलन्दड़ तो वह था ही।
तीखे प्रकाश और कैमरों की निगरानी में रहते हुए भी उसने काल के एक और आयाम में प्रवेश किया। जाने कितनी काँच की दीवारों के पीछे से चुपचाप तमाशा देखती मीडियाकर्मी तक उसकी सम्मोहक दृष्टि पहुँची। स्तब्ध सी उस महिला ने जो देखा वह दूसरे किसी ने नहीं देखा। समय के आयाम इतने मायावी भी हो सकते हैं? सुनिए उसी की जुबानी...
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...रंग-बिरंगे स्टुडियो में रंग-बिरंगे चार्ट और ग्राफ सज गए। बत्तियां जगमगा उठीं, टेलीप्रॉम्पटर ऑन कर दिया और बढ़िया सूट-बूट में सजे एंकर ने भारी-भरकम शब्दों में लेंठड़े का परिचय कराया। पॉल द ऑक्टोपस का हिंदुस्तानी रूप – क्रैपी क्रैब। स्टूडियो में सवाल लोकतंत्र में किसी राजा की कुर्सी से जुड़ा हुआ था...
... भूत का एक और समय साथ साथ जिसका किसी को आभास तक नहीं। उसी स्थान का एक और आयाम जब कोई ग्लैमर नहीं, कोई चकाचौंध नहीं।लेंठड़ा ‘एक दिन पहले में’ पहुँचा है...
न्यूज़-रूम की चमकती रौशनी थोड़ी फीकी पड़ी है। आधे टीवी स्क्रीन बंद हैं, थोड़े बेमतलब के दौड़ते-भागते दृश्य दिखा रहे हैं। आधी रात के बाद यहां कोई नहीं होता, होते हैं तो वो जिन्हें नाइट ड्यूटी की सज़ा मिली होती है। या फिर वो, जो अपने-आप पर ये सज़ा थोप लिया करते हैं। सज़ायाफ्ता ऐसी ही एक शख्स कोने में नज़र आती है केंकड़े को। हाथ में कॉफी का मग, नींद और थकान से बोझिल पलकें सामने के कंप्यूटर स्क्रीन पर गड़ी हुईं। चेहरे पर पुराने पड़ चुके मेकअप की लकीरें, फीकी-सी लिपस्टिक, धुंधला पड़ा काजल...
"हे सुंदरी! कौन हो तुम और रात्रि के इस प्रहर यहां तुम्हारे होने का क्या अभिप्राय?"
"चकाचौंध में मैं कैसे नज़र आऊंगी केंकड़ा महाराज? यहां हर शय मेरी तलाश के लिए, मेरा पीछा करने के लिए ही बनाई गई थी। मुझे सजा-संवारकर दुनिया से रूबरू करने के मकसद से शीशे की ये इमारत, करोड़ों की मशीनें, आधुनिक तकनीक... सब यहां लाई गई। लेकिन यहां मुझे ऐसे पेश किया गया कि अब मैं खुद को आईने में नहीं पहचान पाती।"
लेंठड़ा पूछ पड़ा है,"मैं कुछ मदद कर सकता हूं?"
"मदद? हां, तुम्हें भी तो मुझे एक नया रूप देने के लिए बुलाया गया है। नहीं, घसीट लाया गया है। हैरान न हो। मैं वही ख़बर हूं, वही समाचार, जिसे सच्चे रूप में दिखाने का दावा मीडिया करता है।
...समझाती हूं। मैं कौन हूं? सम-आचार। ख़बर... मेरा असली रूप क्या है? सही सूचना... मुझे कहां तलाशना चाहिए? उन सूचनाओं में जिनका दर्शकों से, आम जनता से सरोकार है... मेरा असली वजूद, मेरी असली पहचान क्या होनी चाहिए? उस मज़बूत नींव के तौर पर जिसपर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आश्रित है... मेरा ध्येय क्या हो? सच को सामने लाना, जनता पर, लोकतंत्र पर, सरकार पर अपना प्रभाव छोड़ना... लेकिन मेरा असली रूप क्या हो गया है, देखा है?
...मेरी दास्तान इतनी सी नहीं है। मैं कभी किसी के कुत्ते के नाम के रूप में परोसी जाती हूं कभी किसी भूत-प्रेत, आत्मा-परमात्मा के साथ दर्शकों पर थोप दी जाती हूं। मेरा वजूद ये नहीं। जहां मैं हूं, जहां मुझे होना चाहिए, जहां से मुझे निकालकर सभ्य रूप में सभ्य समाज के समक्ष पेश किया जाना चाहिए, वहां मुझे कोई नहीं ढूंढता। मेरा इतना गलीज, इतना गिरा हुआ रूप पेश किया जाता है कि मुझे खुद से घिन आती है। और क्यों ना हो? मेरे इस रूप का किसी पर क्या असर पड़ना है? धार और गांभीर्य कायम रहता तो मैं भी लोकतंत्र में अपनी भूमिका निभा पाती। लेकिन इस छद्म रूप में खुद को किसी तरह जीवित रख सकती हूं बस।“...
लेंठड़े ने अपना रुमाल निकाला है। आँसू सुखाते हुए बोल पड़ा है,”...तुम्हारा क्षोभ जायज़ है। एक तरह से ज़रूरी भी। अपूर्णता का अहसास तुम्हें अपनी परिस्थितियों से जूझने को कोई बेहतर रास्ता निकालने की वजह देगा।“...
वर्तमान। पुस्तकालय से आती जाने कितनी हवाई धारायें लेंठड़े के शरीर में घुसने लगीं। शब्द, व्याकरण, जाने कितनी भाषाओं में ज्ञानियों की बातें, कितनी लिपियाँ! नागरी, मलयालम, अरबी, कन्नड़, रोमन ....उसके पन्जे जैसे रिसेप्टर हों। वह कैमरे पर लाइव था, यहां उसे कोई नहीं रोक सकता था। सच बोलने से, ख़तरों से खेलने से घबराया होता तो केंकड़ा लेंठड़ा ना बना होता। लेंठड़े ने बोलना शुरू किया, “यहां तो एक से एक महारथी हैं भविष्यवाणियां करनेवाले। शनि बाबा हैं, तीन देवियां हैं जो शीशे की एक गेंद सामने रख एक नई तरह की फंतासी दुनिया का सम्मोहन जाल रचती हैं। इनका जादू उतरे तो यहां मौजूद पत्रकार और बुद्धिजीवी विचारों के दोहन के नाम पर अपने निष्कर्ष और पूर्वाग्रह दर्शकों पर थोपते हैं।
...कभी इस चार्ट पर, कभी उस ग्राफ पर। चार्टों और ग्राफों का क्या है? वे तो ना बदलेंगे, नाम अवश्य बदल जाएंगे। सो कल एक चव्हान रहे होंगे, आज दूसरे हैं। कुर्सी के नीचे के खेल कहां बदलेंगे?”
केंकड़े की इस भूमिका ने स्टूडियो के बाहर-भीतर सबको बेचैन कर दिया। एंकर खिसियानी-सी हंसी हंस रहा था, संपादक जी शीशे के केबिन से बाहर निकलकर चीख रहे थे। “गेट दिस क्रैपी थिंग ऑफ कैमरा। व्हाट द हेल इज़ ही अपटू?” लेंठड़े को पकड़कर न्यूज़ रूम लाने वाला पत्रकार दौड़ता हुआ आया, “सर, रूक जाइए सर। चलने दीजिए सर चलने दीजिए। टीआरपी सर टीआरपी। टॉकिंग केंकड़ा टीआरपी लाएगा। देखिए तो कि आगे बोलता क्या है?”
टी आर पी सुनते ही लेंठड़े ने जो अट्टहास किया, वह मुझे नहीं भूलता। एकाएक ही उसकी सारी देह में जाने कितने मुँह निकल आए। हर मुँह से अलग अलग भाषाएँ। लेकिन बात एक ही।
“मनुष्य की याददाश्त इतनी कमज़ोर क्यों होती है? या यह सेलेक्टिव शॉर्टटर्म मेमोरी जानबूझकर स्वयं पर ओढ़ा हुआ आवरण होता है, ताकि खुद को अप्रिय परिस्थितियों से बचाया जा सके? प्रतिक्रिया ना करना, आराम से भूल जाना, शुतुरमुर्ग-सा सिर मिट्टी में छुपा लेना... ये क्या करते हैं मनुष्य?”
न्यूज़ रूम में अफरा तफरी मच गई – हिन्दी, मराठी, उर्दू, तमिल, कन्नड़, अंग्रेजी ... सारे चैनल यही प्रोग्राम दिखा रहे हैं। एक ही बात - बस भाषाएँ अलग अलग हैं। बन्द करो इसे!
...मुस्कुराते हुए लेंठड़े ने पंजे खटकाए और सब कुछ फ्रीज़ हो गया। न लाइट बन्द हो सकती थी,न कैमरा और न प्रसारण। सब कुछ स्वचालित!
...भाँड़ में गई तुम्हारी टी आर पी। जब सब चैनल एक ही प्रोग्राम दिखाएँगे तो टी आर पी वापस प्राइमर की किताबों में होगी। चुपचाप देखो मेरी लंठई और सोचो प्यारों!
न्यूज़-रूम की चमकती रौशनी थोड़ी फीकी पड़ गई। स्टूडियो और पीसीआर में सब सांसें रोके गिरनेवाली अगली गाज का इंतज़ार कर रहे थे। अजीब स्थिति थी। लेंठड़े का प्रोग्राम कोई रोकने की स्थिति में नहीं था लेकिन बाकी सब काम यथावत किए जा सकते थे। सभी लाइनों पर लगातार फोन आने लगे थे और फीडबैक के नाम पर एसएमएस। कोई लेंठड़े को गालियां दे रहा था तो कोई इसे मीडिया की नई तिकड़म बता रहा था।
... लेंठड़ा लाइव जारी रहा।
"... शीशे की ये इमारत, करोड़ों की मशीनें, आधुनिक तकनीक... इन सबके बीच ख़बर या समाचार कहां है? सम-आचार। सही सूचना... वे सूचनाएं कहां हैं जिनका दर्शकों से, आम जनता से सरोकार है... मीडिया का ध्येय क्या होना चाहिए? उस मज़बूत नींव के तौर पर जिसपर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आश्रित है... उसका ध्येय सच को सामने लाना है। जनता पर, लोकतंत्र पर, सरकार पर अपना प्रभाव छोड़ना है। लेकिन यहां तो अब ख़बर भी पेड होने लगी है – पेड न्यूज़।
कभी किसी के कुत्ते के नाम पर ख़बर परोसी जाती है, कभी किसी भूत-प्रेत, आत्मा-परमात्मा के साथ दर्शकों पर थोप दी जाती है। ख़बर का रूप नेताओं के आपसी समीकरण, उनकी निजी सनक तय करती है... पत्रकारों की कच्ची-पक्की समझ तय करती है।
लेकिन उम्मीद की कोई किरण तो होगी। मीडिया ख़बर को ऐसे घुटते हुए कितने दिनों तक देखेगा? आख़िर मीडिया का पूरा वजूद भी तो ख़बर के दम पर है।
मीडिया में वाकई ताकत है, सोए हुओं को जगाने की उम्मीद भी। कितनी ही बार मीडिया ने सरकारों की नींद उड़ाई है, उन्हें सचेत रखा है, उन्हें आईना दिखाया है। मीडिया एक व्यवसाय सही, लेकिन ख़बर अपने सच्चे रूप में असर डालती है। मीडिया भले ये दंभ पाल ले कि समाज के "मूवर्स एंड शेकर्स" की कमान उसके हाथ में है, भले इस भुलावे में रहे कि लोगों के विचारों पर उसका गहरा प्रभाव है, लेकिन ख़बर के बिना मीडिया का कोई वजूद नहीं। ख़बर की गहराई और सचाई में ही मीडिया की समृद्धि छुपी है। यह दुनिया बड़ी तेज़ी से बदल रही है और वक्त पर पहुंचनेवाली लगातार सूचनाओं का स्थान अपरिहार्य है। यहां राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक बदलाव से अनभिज्ञ रहना आत्मघाती साबित हो सकता है। मीडिया ही यह तय करने में मदद करती है कि सत्य क्या है, असत्य क्या... क्या हकीकत है और क्या महज़ कल्पना... क्या बेहद ज़रूरी है और क्या बेहद गैर-ज़रूरी। लोगों की मानसिकता बदलने के लिए मीडिया से बड़ी शक्ति नहीं हो सकती। देश की दशा दिखाते हुए नया दिशा-निर्धारण करने का दारोमदार मीडिया के हाथों है। यदि किसी बड़ी बेरहम ताकत की जीत होती है तो वह इसलिए कि उस ताकत को स्वीकार करने की एक मनोवृत्ति तैयार की गई है।“
"सत्तासीन लोगों को हमेशा से अहसास रहा है कि आम जनता को अपने नियंत्रण में रखना है तो ख़बर पर भी नियंत्रण रखना होगा। जिन हाथों में सबसे पहले समाचार और विचार पहुंचते हैं उनके पास एक राजनीतिक ताकत होती है - ताकत ये तय करने की कि क्या बताना है और क्या छिपाना है, समाचार के किन पहलुओं की घोषणा करनी है और किनकी नहीं, सही अवसर आने तक किन तथ्यों को दबाए रखना है और जो सूचना सामने लाई जानी है उसकी व्याख्या भी पहले से वही तय करते हैं। तुम्हारा तंत्र तो ‘लोकतंत्र’ कहलाता है न? खुद को लोकतंत्र के पैरोकार बताने का दावा करनेवाले नेता भी राजाओं से कम नहीं हैं। वे सूचनाओं पर ठीक उसी तरह का नियंत्रण चाहते हैं जैसा राजाओं का उनकी सेनाओं पर होता है। इसलिए कम-से-कम लोकतंत्र में तो किसी भी राजा को लोकतंत्र से, लोकतंत्र के स्तंभों से खिलवाड़ करने की इजाज़त न दी जाए।"
इतना कहकर लेंठड़ा अपने पंजे कड़कड़ाते हुए बाहर को चल पड़ा। न्यूज़ रूम में हाहाकार मच गया – उसे और बोलने दो। उसे वापस बुलाओ। लेंठड़े ने राह से ही आवाज़ दी – कथनी नहीं करनी महत्त्वपूर्ण हैं। तुम लोग समर्थ हो। मुझे बस तुम्हें झकझोरना था। मैट्रिक्स फिल्म तो तुम सबने देखी होगी – सँभल जाओ, वैसा वक़्त बहुत दूर नहीं है।
...मैंने लेंठड़े को उस सुन्दरी के पास फिर से देखा है। सुन्दरी ने अपना मुँह धुल दिया है।
रात ढल चुकी है। पुस्तकालय में सनातन प्रकाश पसरा हुआ है। एकांत टेबल पर लेंठड़ा पढ़ रहा है और सामने की दीवार पर सारी दुनिया से खबरें आ रही हैं, जा रही हैं। बैकग्राउंड में जाने कितने स्वर हैं ... I have a dream…we shall overcome… आ नो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वत:। पुस्तक का जो पृष्ठ अभी लेंठड़े के सामने है, उस पर थीसिस, एंटीथिसिस और सिंथेसिस लिखे दिख रहे हैं।
anu
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बुधवार, 3 नवंबर 2010

लेंठड़ा द क्रैपी क्रैब : अनु-पम मीडिया रूम में...

पुरानी कड़ियाँ

  केंकड़ा : लंठ महाचर्चा,  · हवा, बड़ा और लेंठड़ा -1: लण्ठ महाचर्चा, · लेंठड़े का भोर का सपना : लण्ठ महाचर्चा, · लंठ महाचर्चा: अलविदा शब्द, साहित्य और ब्लॉगरी तुम ..., · दूसरा भाग: अलविदा शब्द, साहित्य और ब्लॉगरी तुम से ..., · तीसरा भाग पूर्वार्द्ध : अलविदा शब्द, साहित्य और ब्... ,· तीसरा भाग ,उत्तरार्द्ध: अलविदा शब्द, साहित्य और ब्...

...पुस्तकालय के बाहर मज़मा लगा कर वैज्ञानिक को अपना लेक्चर पिलाते पिलाते लेंठड़ा सो गया। जब जागा तो क्या हुआ? 

सुतक्कड़ लेंठड़ा बड़ी लंबी निद्रा से जागा। इसे शीतस्वापन ना सही, ग्रीष्मस्वापन समझ लीजिए। मानव के अंतिम अभीष्ट की खोजपूर्ण यात्रा तो एक तिलस्मी यात्रा निकली। लेकिन इस विचित्र केंकड़े का स्वभाव उसे अपने ही सामने निरीह बना देता है। खुली हवा का आस्वाद ले लिया, तो फिर बर्तन में क्यों जाए? शब्द और साहित्य, विज्ञान और गणित के पन्ने तो उलटे जा चुके थे। लेकिन अब भी मानव सभ्यता के कई ऐसे पन्ने थे जो उलटे जाने थे! यहीं, इसी पुस्तकालय से यात्रा दुबारा प्रारंभ करनी था। हो भी क्यों ना! सच नहीं कि यहीं मानव अपनी मेधा को निखारने-संवारने का काम करता है?

...सर्वज्ञानी होते हुए भी उसे उत्कंठा सी होने लगी इतने महीनों में जाने क्या-क्या हो गया होगा इस नश्वर धरती पर! जाने कहां से मिलेंगे गुज़रे ज़माने की ख़बर, आनेवाली तारीख़ का पता, आज का ताज़ा समाचार। समाचार! सबकी ख़बर लेनी होगी। केंकड़ा बस्ती का आख़िर क्या हाल है? उस प्रेम-पत्र का हश्र क्या हुआ, जाने अवतार पूर्ण हुआ या नहीं? ...  
...पुस्तकालय में गहरा सन्नाटा था। पुस्तकों के पन्ने पलटते तो किसी की उपस्थिति का आभास होता। लेकिन कोने में बैठा एक मनुष्य परेशान-सा दिखा। बार-बार अपने मोबाइल को बाहर निकालता, जैसे किसी अत्यंत आवश्यक संदेश की प्रतीक्षा में हो। टांग अड़ाने की आदत से लाचार लेंठड़ा आख़िर उस मनुष्य के पास जा ही धमका। "चिंतित हो भाई? मैं सहायता कर सकता हूं क्या?"
मनुष्य ने लेंठड़े को ऐसी हिकारत भरी निगाहों से देखा कि लेंठड़ा बिचारा अपने ही पंजों में सिमट गया। "सहायता? कहो तो मैं तुम्हारी कुछ मदद करूं। आख़िर हो किस खेत की मूली तुम?" लेंठड़ा सोचता रहा, गुज़रे महीनों में वाकई मानव सभ्यता बहुत बदल गई है शायद। कहां तो सत्य के दर्शन कराता वैज्ञानिक, कहां शब्दों के संसार सजाता साहित्यकार, कहां निराकार और अमूर्त की बात करनेवाला गणितज्ञ! ये कैसा अहंकारी मानव है रे!
"अच्छा, तो तुम्हीं वो केंकड़े हो जो यहां-वहां कोने में घुसकर ज्ञान बघार रहा है। तुम्हें ढूंढने ही तो भेजा गया है मुझे। पत्रकार हूं मैं लेंठड़ा बाबा, और आज के दिन आप हमारे चैनल पर विशिष्ट अतिथि होंगे।" अचानक पत्रकार की बोली में शहद कैसे घुल गया? 'तुम' से 'आप' पर उतरने में तनिक भी देर नहीं लगी!
लेंठड़ा घबराकर दो कदम पीछे हटा ही था कि पत्रकार ने सीधे उसपर हमला कर दिया, उसके पंजों की परवाह किए बगैर! एक हाथ में कसमसाता लेंठड़ा और दूसरे में मोबाइल फोन। "मिल गया बॉस वो ज्ञानी लेंठड़ा। हां, हां। ब्रेकिंग न्यूज़ चला दीजिए अभी के अभी। आज प्राइमटाइम में हम अपने चैनल पर इंट्रॉड्यूस करेंगे इसे। हां, प्रोमो भी चलवा दीजिएगा सर।"
बर्तन से निकलकर दुनिया देखने के लिए केंकड़ा निकल भागा था लेंठड़ा, पर आज उसे वापस बर्तन में डाल दिया गया। पूरी दुनिया को दिखाने के लिए। कैसी विडंबना है! शुक्र है कि बर्तन शीशे का था। चिकना सही, लेकिन लेंठड़े को वहां से बाहर की दुनिया तो दिखाई देती थी!
लेंठड़े को न्यूज़रूम पहुंचा दिया गया। राजनीति के खेल, खेल की राजनीति, पर्दे के पीछे का सच, सच पर डाला गया पर्दा... न्यूज़ रूम के ठीक बीचों-बीच कांच की मोटी तह के पीछे संपादक बैठा था। कांच के आर-पार सब दिखता था, मोटी चमड़ी के आर-पार शायद ही कुछ गुज़रता हो। इस कमरे में मौजूद हर बंदे की सांसों पर हर हफ्ते आनेवाली टीआरपी (टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट) का पहरा था। टीआरपी ऊपर, सांसों की जुंबिश में राहत। टीआरपी नीचे तो सांस चलना-ना चलना बराबर। किसी ने कहा कि यही टीआरपी चैनल पर विज्ञापन लेकर आती है, विज्ञापन माने महीने के आख़िर में चैनल के मुलाज़िमों की जेब में तनख़्वाह।
न्यूज़रूम में कोने-कोने से ख़बरें ही ख़बरें बीम हो रही थीं। कितने तो टीवी स्क्रीन थे। छप्पन के बाद गिनना छोड़ दिया था उसने। देश-विदेश के चैनलों से प्रेरणा ली जा रही थी - देसी चैनलों से ब्रेकिंग न्यूज़ की। विदेशी चैनलों से सेट डिज़ाईन, प्रोडक्शन, प्रोमो और कई बार तो पूरे के पूरे कॉन्सेप्ट की। वैसे टीआरपी के लिहाज़ से जो चैनल नंबर वन है, वही प्रेरणा-स्रोत है फिलहाल।
चैनल पर कोई बड़ी ख़बर चल रही थी। सुर्ख़ लाल रंग से लिखा हुआ ब्रेकिंग न्यूज़। अरे! ये तो ओसामा के मरने की ख़बर है। चैनल के पास पुख़्ता ख़बर है - "ओसामा मारा गया"। साढ़े तीन मिनट तक लेंठड़ा ये तीन शब्द स्क्रीन पर आते-जाते देखता रहा। अंतरराष्ट्रीय अहमियत वाली इस ख़बर के बारे में वो और जानना ही चाहता था कि अगला ग्राफिक्स आया - "ओसामा मारा गया। हाथी ओसामा मारा गया।" जब युधिष्ठिर ने कुरुक्षेत्र में जीतने के लिए झूठ का सहारा लिया तो टीआरपी के इस रणक्षेत्र में चैनलों ने झूठा-सा सच बोलकर क्या गुनाह कर डाला? टीआरपी की इस जंग में सब जायज़ है।
जंग के सिपाहसलार अपने-अपने मोर्चे पर तैनात दिखे। रिपोर्टर ख़बरें जुटाने में, लेकिन उससे ज्यादा तीस सेकेंड का एयरटाईम जुटाने में। ख़बर जितनी बड़ी एयरटाइम उतना बड़ा। फील्ड में जाकर रिपोर्टिंग करने से अच्छा है छत पर से खड़े होकर एयरटाइम हासिल करना। उसे न्यूज़रूम तक पहुंचाने वाला पत्रकार भी लेंठड़ा बाबा से रूबरू होने के अपने अनुभव पूरे देश से बांटने के लिए छत पर आउटसाइड ब्रॉडकास्टिंग के लिए तैनात था। 
लेंठड़ा के बारे में किसिम-किसिम की बातें न्यूज़रूम के आउटपुट डेस्क पर रची जा रही थीं। उपमा में माहिर आउटपुट एडिटर ने इन्फोर्मेशन सुपर लिखा - लालबुझक्कड़ लेंठड़ा हमारे स्टूडियो में। अतिशयोक्ति के दिग्गज एडिटर ने लिखा - "पाताल से ढूंढ लाए आपके लिए ख़ास, पॉल ऑक्टोपस का हिंदुस्तानी जवाब। केंकड़ा जो प्रवचन देता है, गणित, विज्ञान, साहित्य पढ़ाता है!" अनुप्रास एडिटर ने तो लेंठड़े को नया नाम दे डाला और लिखा - क्रैपी क्रैब के क्या कहने।
कोने में बैठी सुंदर कन्या को तो लेंठड़ा पहचानता था। इस बर्तन से निकलने में शायद वोही मदद करे! केंकड़ा बस्ती के पब्लिक टीवी पर इसके आते ही कितनी बार सीटी-ताली मारते केंकड़ों को झिड़का उसने। लेकिन यहां तो इनके और ही नखरे थे। आउटपुट एडिटर इनको कुछ लिख-लिखकर दे रहे थे और ये बांचने की तैयारी कर रही थीं। "प्रतिशोध? आई डोन्ट लाइक दैट वर्ड। "बदला" में बदलें इसको? इज़ी रहेगा। और ये टंगट्विस्टर क्या है? बरलहाल? बहरबाल? बहरहाल? ओह प्लीज़। लेट्स कीप इट सिंपल। हम यहां लिंग्विस्टिक्स एक्रैबैटिक्स के लिए नहीं आए हैं सर।" "अंग्रेज़ी बोले तो टंगट्विस्टर नहीं। हिंदी में सब कठिन?"
पीसीआर में एक प्रोड्यूसर लगातार फोन ...आउटपुट एडिटर से बात। "गेट दैट स्पेलिंग करेक्ट सर जी। पैरिस है, पेरिस नहीं।" ..."हिंदी में पेरिस ही लिखते हैं।" "नॉनसेन्स। पी-ए-आर-आई-एस। क्या हुआ - पैरिस? पेरिस के लिए अंग्रेज़ी पी-ई-आर-आई-एस होती ना?" आउटपुट एडिटर के भीतर का साहित्यकार - रूदन। झल्लाहट में फोन बंद!

लेंठड़ा का मन ज़ार-ज़ार रो उठा। कहाँ तो लेंठड़ा ज्ञानवर्द्धन के लिए यहाँ पहुंचा था, कहाँ और दिग्भ्रमित हो गया। ये कैसी विचित्र दुनिया है! कहाँ तो गणितज्ञ को प्रवचन दिया था, कहाँ यहाँ प्रहसन का पात्र बना बैठा! क्रैपी क्रैब के साथ स्पेशल बुलेटिन की तैयारी करते संपादक का तो कुछ और ही इरादा था। "क्रैपी क्रैब बिहार विधानसभा के नतीजों की भविष्यवाणी करेगा। आईपीएल, बीपीएल, आरपीएल, सबके नतीजे पहले से बताएगा। हमारी टीआरपी को सबसे ऊपर आने से कोई ऑक्टोपस नहीं रोक सकता अब।"
स्टूडियो तैयार था, एंकर भी। ब्रेकिंग न्यूज़ चल पड़ा था। क्रैपी क्रैब को लाइट और कैमरे के ठीक बीचों-बीच छोड़ दिया गया। शीशे के बर्तन से निकलने की नाकाम कोशिश करते-करते लेंठड़ा अपनी नियति के आगे हार मान चुका था। टॉप एंगल शॉट। लेंठड़े को स्टूडियो की टेबल पर डाल दिया गया है। पूरी मेज़ पर रंग-बिरंगे चार्ट और ग्राफ है। जिधर रेंग कर गया लेंठड़ा, उधर का समझो भारी पलड़ा। समझ में आई बात?


पुनश्च - यदि आपका अपना प्रिय लेंठड़ा कुछ दिनों तक ना लौटे तो उसे काम के बोझ का मारा समझ लीजिएगा। टीवी पर आकर क्रैपी क्रैब बन जाना, भविष्यवाणियां करना अब कोई बच्चों का खेल तो है नहीं...

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लेखिका: अनु सिंह चौधरी, ब्लॉग : मैं घुमंतू

anuसाहित्य की छात्रा रही, प्रशिक्षण पत्रकारिता का मिला। मुंबई में एक फिल्म प्रोडक्शन हाउस के साथ कैरियर शुरू किया, लेकिन वापस न्यूज़ चैनल पहुंच गई। घर-परिवार और चार साल के जुड़वां बच्चों को संभालने के अलावा कभी डॉक्युमेंट्री फिल्में बना लेती हूं, कभी स्क्रिप्ट लिख लेती हूं, कभी टीवी प्रोडक्शन पढ़ा लेती हूं। दोस्तों के साथ इस दुनिया में मिलने-बैठने का वक़्त ना मिले तो वेब दुनिया के ज़रिए दिल के तार जोड़ लेती हूं। फितरत से घूमन्तू हूं और सबसे बड़ी ख्वाहिश बच्चों के साथ अस्सी दिनों में दुनिया देखने की है। इसके अलावा कई छोटी-छोटी ख्वाहिशें हैं। लिखूंगी। उनपर भी लिखूंगी कभी।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

तीसरा भाग पूर्वार्द्ध : अलविदा शब्द, साहित्य और ब्लॉगरी तुम से भी..(लंठ महाचर्चा)

... लेंठड़े की बातों में एक अजीब सी लय थी। उसकी आवाज भी ऐसी थी जैसे तबले को साधते साधते बजवइया मुग्ध होकर धीमी धीमी लय में बजाने लगा हो। उसके स्वर के उतार और चढ़ाव में एक सम्मोहन था। पुस्तकालय में उपस्थित जन धीरे धीरे सम्मोहित से बाहर आने लगे। कुछ ही देर में सभी गुनगुनी धूप में उसे चारो तरफ से घेर कर बैठ गए - बेंच पर, लॉन में, सीढ़ियों पर, जमीन पर ... । लेंठड़ा अपनी ओर लोगों के इस आकर्षण से मुग्ध हो गया था। स्पष्टत: वह भी इस दुनिया के इतने विभिन्न तत्त्वों की उपस्थिति से सम्मोहित था।
इतना ज्ञान ! वह भूल गया कि क्या करने आया था और अभी कुछ देर पहले शब्दों और साहित्य की बातें करने की कोशिश सी कर रहा था।
गणितज्ञ उसे हैरानी से देख रहा था लेकिन लेंठड़े की दृष्टि एक वैज्ञानिक पर जमी थी जो साहित्य में भी रुचि रखता था। लेंठड़े को यह बड़ी अजीब बात लगी कि शब्द और साहित्य पर वैज्ञानिक से बात की जाय। उसे लगा कि इस अद्भुत सभ्यता की जड़ों और उसके सनातन प्रश्नों के बारे में वैज्ञानिक से बात की जाय। आखिर शब्द, साहित्य वगैरह के प्रश्न तो इस सभ्यता के अस्तित्त्व से ही जुड़े थे। क्या था निचोड़ इस सभ्यता के सनातन प्रश्नों का ?

एक क्षण को उसने अपने पंजे कड़कड़ाए और फिर उस वैज्ञानिक की ओर दृष्टि कर शुरू हो गया...
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महान चिन्तक, दार्शनिक अरस्तू का मानना था कि मानव मात्र का अन्तिम लक्ष्य/अभीष्ट सुख की प्राप्ति है। आखिर कौन नहीं चाहता सुख। पशु-पक्षी कपि-भालू, नर-वानर, ऋषि-मुनि सभी तो सुख चाहते हैं। हाँ, यह बात दीगर है कि पशु पक्षियों में सुख की वह अनुभूति नहीं होती जैसी कि प्रकृति की श्रेष्ठतम कृति मानव में होती है। पशुओं में सुखानुभूति महज एक जैवीय ``उद्दीपन प्रतिक्रिया´´ के ही दायरे में सीमित होती है। मानव ने अपने अद्वितीय और अद्भुत सांस्कृतिक विकास की यात्रा में कई तरह के ``सुखों´´ के अन्वेषण-अनुभूति के पड़ाव तय किये हैं-सांसारिक (भौतिक) सुख, आध्यात्मिक  (मानसिक) सुख और यहाँ तक कि ``परमानन्द (सच्चिदानन्द ) तक की  प्राप्ति´´ का सुख जिसके पश्चात् फिर किसी और सुख की चाह ही नहीं रह जाती। यही मोक्ष (निर्वाण) है। मोक्ष यानि एक उस ``परम सत्ता´´ में स्व-अस्तित्व का समाहित हो जाना-जो शाश्वत है, नित्य है, अजर है, अमर है, जिसके बखान में उपनिषदों की अकथ (फिर भी अधूरी) व्याख्यायें हैं और जिसके स्वरूप के निर्धारण का विचार मन्थन आज भी चल रहा है- चरैवेति, चरैवेति ... ... मान्यता है कि वही परमसत्ता ही परम सर्जक है, ब्रह्माण्ड-रचयिता है। उसी के अंश मात्र में स्थित मानव को पुन: उसी में लीन हो जाना है। ... ... तो फिर मानव अस्तित्व, उसके जीवन काल, धरती पर उसके प्रादुर्भाव-अवसान की आवश्यकता ही क्या है, जब मोक्ष ही परम अभीष्ट है, तो मानव जनमता ही क्यों है?विश्व भर के दार्शनिकों, आध्यात्मविदों ने इन प्रश्नों का समय-समय पर अपने-अपने ढंग से जवाब दिया है, जिसके फलस्वरुप, पुनर्जन्म, भूत-प्रेत, लोक-परलोक, मृत्योपरान्त जीवन जैसी अनेक रोचक अवधारणाओं का जन्म और विकास हुआ है। पर इस विषय में विज्ञान का नजरिया क्या है?


    सबसे पहले यह बात स्पष्ट कर देनी होगी कि विज्ञान के पास हर प्रश्न का जवाब नहीं है- उसकी अपनी एक विशिष्ट कार्य पद्धति है- विज्ञान की पद्धति यानि, जिज्ञासा ... ... प्रश्न... ... प्रेक्षण, संकल्पना, जाँच परख, सत्यापन और निष्कर्ष के सोपानों को पार कर जो उत्तर मिलता है, वहीं विज्ञान का उत्तर है-विज्ञान सम्मत उत्तर है। इसीलिए ``ईश्वर´´ का प्रश्न विज्ञान के समक्ष अनुत्तरित है-ईश्वर विज्ञान की कसौटी पर नहीं उतारे जा सकते। ऐसा कोई प्रयोग परीक्षण आज तक अवधारित नहीं हो सका जो ईश्वर की जाँच विज्ञान की पद्धति पर करे। अत: विज्ञान इस सम्बन्ध में चुप है- वह न तो यह कहता है कि ईश्वर है और न ही यह कि ईश्वर नहीं है। इन दोनों पक्षों की पुष्टि में प्रायोगिक प्रमाण नहीं है। यहाँ लाचार है बिचारा विज्ञान। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जाता है कि जो कुछ प्रमाण पूर्वक झुठलाया न जा सकता हो, उसे सप्रमाण साबित भी नहीं किया जा सकता । विज्ञान की पद्धति से ``ईश्वर´´ न झुठलाये जा सकते हैं और न ही साबित हो सकते हैं क्योंकि इसके लिए चाहिए प्रमाण (जो अभी तक नहीं जुट सका है)। फलत: ``लांग लिव गॉड´´ - जियें वे करोड़ों किंवा असंख्य वर्ष ... ... कम से कम विज्ञान से कोई चुनौती नहीं है उन्हें । हाँ, हम बात मानव के अन्तिम लक्ष्य की कर रहे थे... ... शायद विज्ञान के पास इस प्रश्न का भी उत्साहजनक सीधा सपाट उत्तर नहीं है... ... पर वह मानव की मौजूदा स्थिति, उसके भविष्य पर जरूर कुछ कह पाने की स्थिति में है।


    चार्ल्स  डार्विन ने बहुत ही प्रभावपूर्ण तरीके से यह स्पष्ट कर दिया था कि मानव किसी सृजन का परिणाम नहीं बल्कि एक लम्बी सतत विकास प्रक्रिया का उच्चतम उत्पादन है। यह विकास प्रक्रिया एक कोषी जीव से शुरू होकर अपने में समूची धरा के जीव जन्तुओं को समेटे हुए है। जीवनोद्भव और विकास का यह सिलसिला धरती पर लगभग एक अरब वर्ष पहले शुरू हुआ लगता है। करीब साठ करोड़ वर्ष पुराने सूक्ष्म जीव समूहों के जीवाश्म वैज्ञानिकों ने ढूढ़ निकाले हैं। विकास की प्रक्रिया एक बार जो शुरू हुई तो फिर थमी नहीं है, विविध जीवों के अवतरण के पश्चात् भी विकास की क्रिया विधि अभी भी सक्रिय है- यानि आज के आदमी, जानवर सभी विकास पथ पर ही अग्रसर हैं- बहुत धीमी गति से -शनै:शनै: । पर प्राणियों के इस ``जैवीय´´ विकास में एक बड़ी अनहोनी (!) मानव के साथ घटी है.. ... ... उसका एक और विकास अचानक ही शुरू हो गया- सांस्कृतिक विकास, जिसने कालान्तर में मानव की कई अलग थलग संस्कृति और सभ्यताओं को जन्म दे दिया। शायद यह मानव की जैवीय सत्ता से पृथक उसकी विशिष्ट बुद्धि से सृजित एक नये ढंग के विकास की प्रक्रिया है। आज मानव के इस वैविध्यपूर्ण अनूठे विकास की झलकियाँ, धरती के विभिन्न द्वीपों-महाद्वीपों में दृष्टव्य हैं- मानव का यही सांस्कृतिक विकास उसे अपने अन्य जैवीय सहचरों से एक अलग विशिष्ट पहचान देता है। निश्चित ही, मनुष्य उस परम सत्ता, (मैं उसे प्रकृति कहूँगा) की एक विशिष्टतम कृति है ... ... शायद इस कृति के अवतरण में प्रकृति का कोई हेतु छिपा है... ... कोई खास मकसद।


    अब यदि मानव अस्तित्व के इस विशेष हेतु/प्रयोजन का पता लग जाय तो उसके अन्तिम अभीष्ट का भी कुछ आकलन सम्भव हो सकता है। प्रख्यात विज्ञान कथाकार आइजक आजिमोव ने अपनी एक - चर्चित कहानी ``द लास्ट ऐन्सर´´ में बड़े ही मनोहारी तरीके से मानव अस्तित्व से जुड़े इन कई शाश्वत प्रश्नों के उत्तर पाने की कोशिश की है। कहानी का भौतिकीविद नायक मृत्योपरान्त ब्रह्माण्ड  नियामक (परम सत्ता) से यह जानना चाहता है कि उसकी उत्पत्ति का हेतु क्या था।
जवाब मिलता है-
``महज मेरी इच्छा,  केलि, क्रीड़ा-कौतुक और कुछ नहीं´´ इस बेतुके जवाब पर नायक क्रोधित हो उठता है और कहता है,
    ``मात्र मनोरंजन  के लिए मेरी उत्पत्ति की आपने, यानि मैं आजीवन केवल क्रीड़ा का पात्र बना रहा आपका´´ ... ...
    फिर एक उत्तर, ``वह तो तुम अभी भी हो, ... पहले साकार, अब निराकार रूप में´´
    ``यानि में आपका बन्धक हूँ, बन्धुआ प्राणी मात्र ... ... मैं इस बन्धन से मुक्ति चाहता हूँ´´  झुंझलाये नायक का प्रतिवाद था।
    ``हूँ, खूब ,बहुत खूब, ... ... सस्ते में ही निर्वाण चाहते हो--पड़े रहो इसी तरह... ... ´´

    संवाद अनवरत चलता है... ... यहाँ मृत्यु के उपरान्त भी नायक को छुटकारा नहीं है। यहाँ वह मोक्ष को प्राप्त नहीं होता क्योंकि वह उस असीम सत्ता का ही प्रतिकार करता है, विद्रोह कर देता है... ... उससे प्रतिवाद करता है। ठीक आधुनिक मानव की तरह, जिसने प्रकृति के प्रतिकार को ही अपनी जीवनचर्या/जीवन दर्शन बना लिया है।


    यहीं एक यह प्रश्न भी उठता है कि क्या ``प्रकृति पर विजय´´ का अभियान मानव का उसकी ``प्राकृतिक दासता´´ से मुक्ति का प्रयास है। क्या वह प्रकृति के बँधे बधाये वैकासिक क्रम से स्वतन्त्र हो अपना अलग विकास (सांस्कृतिक विकास) चाहता है, पर इस सूझ की प्रेरणा उसे मिली कहाँ से। कहीं उसकी यह विकास यात्रा भी प्रकृति से अनुप्राणित तो नहीं है। दूसरे शब्दों में क्या मानव का ``सांस्कृतिक विकास ``प्रकृति की ही कोई गुप्तगुंफित योजना तो नहीं है, तो क्या मानव का उत्कर्ष या अवसान उसके सांस्कृतिक विकास में ही निहित है। क्या मानव महा विनाश की ओर बढ़ रहा है। प्रकृति के इस या ऐसे किसी गुप्त प्रयोजन की भनक क्या उसे है?


    किन्तु भला प्रकृति मानव का सम्पूर्ण विनाश क्यों चाहेगी। वह तो जीवन के सतत संवहन की पक्षधर रही है। संतति प्रवाह ही तो उसका एक प्रमुख ध्येय है।


    प्रथम दृष्टि में तो यह सच सा लगता है कि सुख शान्ति के खेल में बेचैन मानव की सुख शान्ति ही उससे दिन ब दिन छिनती जा रही है-उसके सांस्कृतिक विकास, उसकी सभ्यता ने उसे कई महारोगों का अभिशाप भी तो दे डाला है। आज वह, चिन्ताग्रस्त है, तनाव  ग्रस्त है- ``सुख´´ उसके लिए मरीचिका है। यानि प्रकृति से अलग हटना, स्वयं मानव के लिए आत्मघाती हो सकता है। शायद इसीलिए दार्शनिक रूसों ने ``प्रकृति की ओर लौटो´´ का नारा बुलन्द किया था। गोस्वामी जी की यह बहु -उद्धृत उक्ति कि ``सबसे भले वे मूढ़ जिन्हें न व्यापहि जगत गति... ... ´´ भी शायद मानव को जैवीय, प्रकृति सम्मत तरीके से जीवन यापन की व्यंजनात्मक सीख देती है।


    आज का मानव सांस्कृतिक विकास के बावजूद भी अपने पाशविक अतीत से मुक्त नहीं है- उसकी पशु-विरासत उसके आचार-व्यवहार में क्षण-क्षण दर्शित होती रहती है। उसकी अति आक्रामकता, कामुकता उसकी पाशविक पृष्ठभूमि की ही चीख-चीख कर ऐलान करती है। विश्वभर में बढ़ती हिंसा और अपराधों पर एक दृष्टिपात तो कीजिए। गुफा मानव तो क्रोध में महज पत्थर के आयुधों का ही संधान करता था ... .पर आज का ``सांस्कृतिक मानव´´ तो परमाणु बम तक चल देता है। गुफा मानव अपने शिकारी दल के साथ पकड़े शिकार को साम्यवादी तरीके से मिल बाँट कर खाता था ... ... पर आज के ``धन कुबेर´´ सारी सम्पदा हड़पने को आमादा हैं... ... ... क्या मानव का यही अभीष्ट है, तो फिर सांस्कृतिक विकास का क्या अर्थ रह जाता है।  जारी ......

रविवार, 4 अक्टूबर 2009

लेंठड़े का भोर का सपना : लंठ महाचर्चा

 (9) काल: हाल फिलहाल और गई रात की भोर           परम्परा: खुराफाती अवचेतन मन की


रात लेंठड़े को क्षीर सागर में सोए विष्णु के दर्शन हुए।
दिव्य शय्या पर सोए बड़े मगन थे। निठ्ठले मरद का पैर दबाने को अभ्यस्त लक्ष्मी अपना काम कर रही थीं कि अचानक प्रभु ने अपनी आँखें खोलीं,
"देवी ! आज मैं एक नास्तिक को दर्शन दे रहा हूँ।"
"नाथ ! आप की लीला अबूझ है। तपवान लोग मरे जा रहे हैं और आप नास्तिक को कृतार्थ कर रहे हैं।"
"देवी ! शब्द का सही प्रयोग करें। वह कभी अर्थ के लिए कृत नहीं हुआ। मुझे मानता नहीं। इसीलिए उसे चुना । भक्तों को दर्शन दे अपनी गरिमा का ह्रास मैं क्यों होने दूँ?"
"आप प्रयोजन बताएँ प्रभु !"
"भारत भू ,जहाँ हमेशा अवतार लेने का हमने ठीका ले रखा है, की एक भाषा है - हिन्दी। आज कल पूरे ब्रह्मांड में आभासी संसार की धूम मची हुई है। धरती भी अछूती नहीं है। उसी में लेखन की एक विधा के रूप में  'ब्लॉग' का विकास हुआ है। . . ."
". . . प्रभु ! विकास की अवधारणा मानव अवधारणा है। आप के मुख से शोभा नहीं देती।"
"अवतार भी विकास के ही विभिन्न सोपान हैं, ऐसा मैंने नास्तिकों के मुँह से सुना है। आप बात काटे नहीं देवी। .... हाँ तो ब्लॉग में हिन्दी लेखन भी होता है। उस त्वरित आभासी संसार की गति नारद गति से भी तीव्र है। भाँति भाँति के मानव लेख रच रहे हैं - कुछ मूढ़ तो कुछ अबूझ तो कुछ सूझे सूझ। कुछ कठमग़ज। ..."
"यह कठमग़ज क्या होता है प्रभु ?"
" ...मूढ़ता, मन्दबुद्धि और अविनय के संयोग को कहते हैं।...
  इन लिक्खाड़ों में कुछ घोर साम्प्रदायिक और मानव जीवन के शत्रु भी हैं। तुम्हें तो पता ही है देवी कि हमारा कल्कि अवतार होने में अभी बहुत समय बाकी है लेकिन इन लोगों में उसे हजारों वर्ष पहले ही हुआ बताने की होड़ सी मची है। घोर अनर्थ हो रहा है। कुछ में यह होड़ मची है कि किस तरह  नारी तत्त्व को नर तत्त्व से श्रेष्ठ सिद्ध किया जाय।"
"नाथ ! नारी और नर तत्त्व अलग कहाँ हैं? दोनों के संयोग और सम्मिलन से ही तो मानव बनता है। विभिन्न दिखते हुए भी दोनों गतिज संतुलन वाले आवर्त में घूमते रहते हैं। इनमें विरोध या नीच-ऊँच की कल्पना करना मूढ़ता है।"
" तो मैं किसकी बात कर रहा हूँ? आँ ? ..
देवी ! नारी और नर तत्त्व गूढ़ प्रकरण हैं और इसके आचार्य महादेव हैं। मुझसे इस बारे में अधिक बात न करें। मुझे तो ऐसे ही और कितने ही मुद्दों से चिंता सी हो रही है।"
"क्यों भगवन ?"
"देवी ! भारत भू आज कल हिन्दी के नाम से जाना जाता है। अत: इससे जुड़े किसी भी अनर्थ का बहुत भयावह प्रभाव होगा। मैं अवतार लूँगा।"
" प्रभु ! समय से इतने पूर्व आप का यह कर्म ब्रह्मा के हृदयाघात का कारण बन जाएगा। क्या कल्कि ...  ? "
" सशंकित न हों देवी। कुछ मन्दमति तो अपने एक गुरु से इतने प्रभावित हैं कि दूत को ही अवतार बता रहे हैं। मैं इतनी इतनी सी बात पर अवतार लेने लगूँगा तो आप तो क्षीरसागर में सर्वदा एकान्त में ही रहेंगी। तुम्हारी और शक्ति की पूजा के इस काल में मैं पत्रावतार ले रहा हूँ। प्रेम पत्रावतार।"...
"यह क्या कौतुक प्रभु?"
"प्रेम कौतुक नहीं होता देवी ! कृष्णावतार में मैं यह दिखा चुका हूँ। तीन लोक से न्यारी नगरी काशी के विश्वविद्यालय में एक  प्रेम प्रसंग चल रहा है। मैं प्रेमी के हृदय में प्रेमपत्र का लेख बन भाव अवतार लूँगा।"
"वही प्रेमी-युगल क्यों प्रभु ?"
"उनका प्रेम दैहिक और मानसिक दोनों पक्षों से परिपक्व हो चुका है। इस युग में ऐसे उदाहरण कम दिखते हैं।"
...
इस संवाद के चलते हुए ही लेंठड़े को सपने में एक रूठी युवती दिखी जिसने कागज के एक टुकड़े को कूड़ेदान में फेंका। आसमान से एक कबाड़ी वाला झाल बजाता आया और उसे उठा ले गया। कबाड़ी वाला झाल क्यों बजा रहा था ?
फिर एक मूँगफली वाले का ठेला दिखा। एक चौड़ा आदमी उससे मोल तोल कर रहा था जब कि ठेले वाला कबाड़ी सी दलीलें दे रहा था।
उसे हिन्दी के कवि निराला वहीं मूँगफली खरीदते दिखे। पैसे की जगह उन्हों ने चंद पंक्तियाँ सुनाईं जिन्हें ठेले वाले ने बटखरा ले हाथ जोड़ कर श्रद्धा पूर्वक सुना:
"..शत घूर्णावर्त तरंग भंग उठते पहाड़
जल राशि राशि पर चढ़ता खाता पछाड़
तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष
दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष .."
. . अचानक एक अंग्रेजी नस्ल की कुतिया जोर जोर से भोंकने लगी। शेषनाग सहम कर सागर में घुस गए। विष्णु और लक्ष्मी तो कभी के अंतर्ध्यान हो चुके थे। .. .
....
लेंठड़े की नींद खुल गई। सुबह के पाँच बज रहे थे। उसे सपने में कोई तारतम्य नहीं नज़र आया। सपने भी अजीब होते हैं ! वह सोचने लगा कि भोर का सपना क्यों और कैसे सच हो सकता है? ...
बहुत अतार्किक सा समुच्च्य था - विष्णु-लक्ष्मी-क्षीरसागर, अवतार पर वार्तालाप, प्रेम पत्र, युवती, कबाड़ी, मूँगफली का ठेला, चौड़ा आदमी, निराला, 'राम की शक्ति पूजा' कविता, अंग्रेजी नस्ल की कुतिया, शेषनाग .. दिमाग भन्ना गया। वह बेचैन टहलने लगा कि इन्द्रदेव का आगमन हो गया, भाग कर उसने आभासी दुनिया में प्रवेश किया कि यह पोस्ट दिखी . .
पढ़ने के बाद उसने विष्णु को नमन किया और तार से तार जोड़ने लगा।
उस मन्दमति में इतनी सामर्थ्य कहाँ ? सब विष्णु की लीला है। तो प्रस्तुत हैं तार से तार के जोड़ - तार तार। लेंठड़े ने अपने मन के गुहा खोह की अबूझ धारणाएँ भी इसमें जोड़ दी हैं सो आप को थोड़ा अधिक दिमाग लगाना पड़ेगा :
" देह को तुमने पवित्र कुरान बना लिया है  ! जबकि मन का एक क्षणिक समर्पण भी देह की अनंत आहुतियों के आगे गौण है ! तुमने खुद स्वीकार किया है कि क्षण भर के लिए तुम विचलित होती हो ,मनुष्य होती हो और फिर अगले ही पल दानवता के आगे घुटने टेक देती हो !
" तुम देह को पवित्र काबा और कुरान बनाए रखो -मुल्लों   की कमी नहीं है इस देश में  ! उन्ही का हक़ ज्यादा है इन पवित्रतम चीजों पर -और वे इनके लिए मरने मारने के लिए भी उतारू  रहते हैं ! मुझे तो त्याग के  आनंद का पूर्व अनुभव भी है -बहुत असहज नहीं  रह गया है त्याग मेरे लिए ! पर चिंता तुम्हारी है -तुम्हे अकेला छोड़ देने की सोच से ही आत्मा कांप उठती है !"
" पाषाण होना  मनुष्यता का पर्याय मान  लिया गया  -पुरुषार्थ मान    लिया गया है ! कहीं खुद  राम का दिया कोई स्पष्टीकरण नहीं मिलता और नहीं यह अपेक्षा की गयी कि जाना जाय कि सीता के  परित्याग पर उन पर क्या बीती होगी -उनकी मनोदशा क्या थी ? तब टीवी के रिपोर्टर नहीं होते होंगें  शायद ..... .!" और इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गयी ! कौन कहता है दुनिया पुरुषों की ,पुरुषों के लिए और पुरुषों द्वारा   ही बनायी गयी है ! राम के मन  का झंझावत सीता ने भी नहीं समझा हो शायद ! . . . जारी क्यों कि प्रेमपत्र अभी अधूरा है, अवतार पूर्ण नहीं हुआ।