बुधवार, 26 अगस्त 2009

इस मोड़ से जाते हैं...


67 साल के वृद्ध मनोहर नाथ रैना के चेहरे पर विस्थापन की प्रगाढ़ पीड़ा पसर जाती है। दो दशकों की स्मृतियाँ भागती सी वापस आती हैं। आँखें नम हो जाती हैं और स्वर भावना ज्वार में घुट सा जाता है। उफान को नियंत्रित करने के साथ ही वह खुलते हैं,”मेरी शरीर यहाँ है लेकिन मैंने अपनी आत्मा अपने कश्मीरी गाँव के चिनार के वृक्षों पर छोड़ रखी है।“
सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक श्री रैना कश्मीर लौटना चाहते हैं लेकिन उनके इस गृह राज्य में स्थिति अभी भी बहुत अनिश्चित और जोखिम भरी है। श्रीनगर से 19 किलोमीटर दूर गाँव कनिहामा में उनके खेत और हवेली है। लेकिन आज वह दिल्ली के उपनगरी इलाके द्वारका के मलिन से एक कमरे के फ्लैट में रहते हैं। रैना कहते हैं,“मैं अपनी मृत्यु से पहले एक बार अपने गाँव को देखना चाहता हूँ।“
रैना की तरह ही दूसरे शरणार्थी कश्मीरियों, जिन्हों ने भय के कारण अपनी धरती हड़बड़ी में छोड़ दी, की भी यही इच्छा है। 1980 के उत्तरार्ध में यह पलायन प्रारम्भ हुआ जब सीमा पार से प्रशिक्षित हो कर आए स्थानीय आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को अपना निशाना बनाया। बहुतेरे पंडित मारे गए। जो बच गए उन्हों ने पलायन किया। जम्मू की झोपड़पट्टियाँ और जर्जर ढाँचे ही उनके नए घर हो गए।
सुरक्षित होते हुए भी जम्मू में कोई आश नहीं थी। कुछ वर्षों के भीतर ही दूसरा बहिर्गमन करना पड़ा। बहुतों ने उत्तर भारत के दूसरे नगरों की ओर रुख किया। रैना ने भी यही किया। उनके दो बेटे अपने परिवारों के साथ दिल्ली आए और बलबीर नगर के शरणार्थी शिविर में पनाह लिए। चार साल पहले दिल्ली सरकार ने रैना को द्वारका में एक कमरे का फ्लैट अलॉट किया।
विस्थापित कश्मीरियों के एक संघटन कश्मीरी सभा के प्रमुख भारत भूषण बताते हैं,” हम पंडित बहुत पढ़े लिखे हैं। लेकिन हमारे पास काम नहीं है। बहुत पहले हमारे घर छीन लिए गए और अब बिना काम के हमारे युवा निराशा में हैं। यदि सरकार हमारी मदद करना चाहती है तो उसे आर्थिक रूप से पिछड़े हमारे युवाओं को काम देना चाहिए।“
आज के बेकार भूषण कभी घाटी में एक फलते फूलते व्यवसाय के मालिक हुआ करते थे। विस्थापन के प्रारम्भिक दिनों में दिल्ली की जिस कम्पनी में वह काम करते थे वह बन्द हो गई। एक लम्बे संघर्ष के बाद उन्हों ने दूसरी जगह काम पकड़ा। लेकिन मन्दी के प्रकोप के कारण छँटनी किए जाने वालों में वह पहले थे। कश्मीर लौटना उनकी तात्कालिक प्राथमिकता नहीं है। बेटे के स्कूल की फीस अब उनकी पहली चिन्ता है।
हर शरणार्थी कैम्प की यही रामकहानी है। उच्च शैक्षिक स्तर और कुशाग्र बुद्धि के कारण कभी कश्मीर की सरकारी नौकरियों में पंडितों की धाक थी लेकिन आज नहीं रही। पलायन के प्रारम्भ में वहाँ सरकारी नौकरियों में 15000 से अधिक पंडित थे। दो दशकों के बाद यह संख्या घट कर मात्र 3000 रह गई है। पंडितों के पुनर्वास हेतु काम करते संघटन पुनुन कश्मीर की मानें तो केवल 400 पंडितों के पास सरकारी नौकरियों के लिए प्रस्ताव हैं।


कश्मीर से विस्थापित चार लाख पंडितों में से ढाई लाख जम्मू के शरणार्थी शिविरों और किराए के घरों में रहते हैं। एक लाख दिल्ली और उत्तर भारत के बाकी नगरों में रहते हैं। बहुतेरे अपनी भूमि पर लौटना चाहते हैं और पनुन कश्मीर के पास इसके लिए उपाय है। इस संघटन ने इसके लिए सरकार को एक विस्तृत योजना सौंपी है। इसके अनुसार कश्मीर के एक भाग को संघ शासित क्षेत्र घोषित कर वहाँ पंडितों को बसाया जा सकता है। पुनुन कश्मीर के उपाध्यक्ष उत्पल कौल बताते हैं कि कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की अधिकतर योजनाएँ सरकारी कार्यालयों में धूल खा रही हैं। सरकार हमेशा वादाखिलाफी करती है। यह हमारे घर और जमीन लौटाने की बात करते हुए भी आतंकवादियों को संरक्षण देती है।
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(विशेष रिपोर्ट : अनिल पाण्डेय, ‘संडे इंडियन मैगज़ीन’, मूल अंग्रेजी लेख)
आदित्य राज कौल के लेख से ब्लॉग लेखक द्वारा अनुवादित
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आभार: 'संडे इंडियन मैगज़ीन, अनिल पाण्डेय और आदित्य राज कौल'

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मंगलवार, 25 अगस्त 2009

मदार :वनस्पति,पौधा,लता,वृक्ष -3


पौधा है : मदार , वैज्ञानिक (Botanical) नाम: Calotropis gigantea,
अन्य नाम - अर्क(संस्कृत), आक, अकौआ
मदार आदमी की ऊँचाई से भी अधिक बढ़ने वाला झाड़ी प्रकार का पौधा है। इसकी पत्तियाँ स्निग्ध, मांसल सी और कोमल होती हैं। तोड़ने पर दूध सा स्राव निकलता है जिसे लोग विषैला बताते हैं।

मुख्यत: यह दो प्रकार का होता है। एक प्रकार में पुष्प एकदम श्वेत होते हैं। पत्तियाँ कुछ छोटी तो पौधा बृक्ष सा आकार लेता हुआ। दूसरे प्रकार में पत्तियाँ अपेक्षाकृत बड़ी, पौधा छोटा और पुष्प बैगनी रंगत लिए होते हैं।

इसके संस्कृत नाम 'अर्क' का एक अर्थ सूर्य भी होता है। प्रात: बेला में सूर्य की किरणों से नहाए इसके श्वेत पुष्पों को देखने से इस संज्ञा की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। अद्भुत कांति !

यह पौधा तमाम औषधीय गुण रखता है और नानियों, दादियों का प्रिय रहा है। इसके फल जब पक कर बीज प्रसारण के लिए चिटकते हैं तो उनसे रूई निकलती है। इस रूई से बने तकिये को लगा कर सोने से 'अधकपारी' शिरोपीड़ा में लाभ होता है। इस प्रयोग को सफल होते मैंने स्वयं देखा है।

बचपन में हम लोग इसके दूध को प्रतिदिन्द्वी की आँखों मे डाल उन्हें फोड़ देने की धमकियाँ दिया करते थे। नाना नानी ने हमेशा इस पौधे के निकट जाने से मना किया - सम्भवत: इसके दूध से आतंकित रहने के कारण। वाकई इतना त्वरित प्रभाव होता है, इसकी परीक्षा नहीं कर सके। आँखों से चांस कौन ले?

महादेव की पूजा में इसके पुष्पों का प्रयोग होता है। किसी और देवी देवता की पूजा में इसे प्रयुक्त होता मैंने नहीं देखा। भाँग और धतूरा की तरह ही औघड़दानी शिव ने इस सर्वहारा पौधे पर भी अपनी कृपा रखी है। शिव से सम्बद्ध और पौधों की तरह ही टोटका वग़ैरह में भी इसका प्रयोग होता है।

सम्भवत: आप ने ध्यान न दिया हो - गाँवों में कोला कोलवाई, बँसवारी और सरेह में पाया जाने वाला यह पौधा अब कम दिखने लगा है। यहाँ गोमती नगर में एल डी ए इस पर कुछ अधिक ही मेहरबान है जिसके कारण इसके पौधे बाकायदे रोपित किए गए हैं। मैंने बड़े अनूठे चित्र मोबाइल से खींचे थे लेकिन दुर्भाग्य से कुछ चित्र गायब हो गए। इसी कारण उपर के दो चित्रों के लिए वीकीपीडिया की शरण लेनी पड़ी। वीकीपीडिया को आभार।

नए घर में आया तो आसपास इसके दूसरे प्रकार की बहुतायत दिखी। अपनी पूरी देहाती गरिमा के साथ यह पौधा यहाँ बहुतायत में उपलब्ध है। यहाँ पादप और जंतु जगत की अन्योन्याश्रयिता का एक उदाहरण मैंने पाया है। एक बहुत ही रंग बिरंगी टिड्डे की जाति आहार के लिए पूरी तरह से इसकी कोमल पत्तियों पर निर्भर है। ये टिड्डे इन पत्तियों पर ही रहते हैं, उन्हें खाते हैं, वहीं सम्भोग करते हैं . .। किसी और पौधे पर मैंने उन्हें नहीं पाया। नीचे कुछ चित्र दे रहा हूँ।
क्या आप इस टिड्डे की जाति बता सकते हैं?

शनिवार, 22 अगस्त 2009

बित्तन बाबा : लंठ महाचर्चा

(7) समय: जब हमरे बापू हमरी वर्तमान उमर के आधे पादान पर थे। परम्परा : श्रौत
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बित्तन भरे पूरे परिवार वाले यजमानी बाबा थे। बित्ता कहते हैं पूरी तरह से ज़बरदस्ती टाइप से फैलाए गए पंजे में अंगूठे की नोक से कानी उँगली की नोक तक की दूरी को। बिचारे ठिगने कद के थे। बाप को सामान्य शरीर की ऊँचाई की तुलना में यही नाम उपयुक्त लगा सो रख दिया।
इलाके में उनके परिवार की बहुत धाक थी। सात टोले में बस उनके घर की औरतें सात रूपये वाली पंजी (एक प्रकार की साड़ी) पहनती थीं वो भी साया के साथ। घर में माँ, एक अदद पत्नी और तीन लाल। पूरा अमन चैन। सास कोशिला तो बहू सीता। बाल गोपाल तो बस छुटके कन्हैया जैसे। दुवारे धौरी गैया, भूरी भैंस, दो जोड़ी पँछाही बैल, पाँच बखरियाँ और भोले भण्डारी का छोटा सा मन्दिर। नीम के पेंड़ तले सुबह शाम पंचइति बैठती और बाबा साइत से लेकर घर आंगन मेड़ सेड़ सबका फासला करते और उनका फैसला ‘इति’ होता था आगे कुच्छ नहीं, इसीलिए पंच-इति।
सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन अचानक बित्तन बाबा की माँ भीख माँगनें लगीं। बित्तन की हालत का आप अन्दाजा लगा सकते हैं। पहले तो उन्हों ने इसे टोटका बताया। चूँकि उन्हें पूरा यकीन था कि एक महीने में बात कंट्रोल में आ जाएगी इसलिए लोगों को बिना पूछे यही टाइम बताते रहे। लोगों ने भरोसा किया और इस मोहलत में सपत्नीक उन्हों ने माँ को खूब समझाया। नात रिश्तेदार सभी समझा समझा हार गए। साष्टांग दण्डवत और रोहा रोहट सब हुआ। माँ में समझ समझ इतना सुधार हुआ कि पहले ठीक ठाक कपड़े पहन नीम के पेंड़ तले भीख माँगती थीं, अब फटे पुराने कपड़े पहन गली गली टोला टोली घूम घूम भीख मांगनें लगीं। मतलब पूरे प्रोफेशनल तरीके से।
अब बित्तन की मुसीबत शुरू हुई। पहले तो नीम तले पंचइति कम होते होते खत्म हुई और उसके बाद लोगों ने मजे लेने शुरू किए। इज्जत का पलीदा तो हो ही चुका था। सब कुछ जानते हुए भी लोग पूछते, “ का हो बित्तन, सुनाइल हे कि तोहार माई भीख माँगेली (बित्तन, सुना है कि तुम्हारी माँ भीख माँगती है)?”। बित्तन गरजते, बरसते और इस गरज बरस से लोग उत्साह में आ कर भिन्न भिन्न प्रकार की कजरी उन्हें सुनाने लगते।
दूसरा महीना पूरते पूरते पूरे गाँव के हास्य के बिषै हो गए बित्तन। घर से निकलना मुहाल हो गया। माँ तो माँ ठहरी क्या करते? संस्कारी बेचारे न मार सकते थे और न जहर दे सकते थे ! माँ जोर शोर से भीख माँगती और हफ्ते की हाट में बेंच भी आती। लोग भी इतने हरामी कि चाहे गाँठ में एको अधन्नी न हो, उधार ले उनसे खरीदते और जोर जोर से बतियाते, “हई त मतवा से लेहनी हँ, सस्ते मिलि गइल हे (ये तो मतवा से खरीदा है, सस्ता मिल गया है)”।
एक दिन गाँव के एक पँघियाए (पाँघि कहते हैं किशोर के चेहरे पर नई नई उगती मूँछ की रेख को) लौण्डे मुनेसर ने बित्तन पर तरस खा हल बताया। बित्तन अब कहने लगे “मतवा खुदे माँगेली खुदे खाली”( माँ माँगती है और खुद खाती है)। मतलब ये कि हमें उससे कोई मतलब नहीं। कुछ दिनों तक तरकीब तो काम आई लेकिन अभी बित्तन चैन की साँस लेने ही वाले थे कि नई मुसीबत खड़ी हो गई। बित्तन जिधर निकलते बच्चे और लौण्डे पीछे पीछे गोल बना गाने लगते “बित्तन के माई माँगें भीख, बित्तन कहें बड़ी बेठीक”। बित्तन कुछ दिनों तक तो लोगों को जवाब देने की परम्परा निबाहते रहे और बच्चों को इग्नोर करते रहे लेकिन एक दिन गुस्सा चढ़ा तो एक को मार बैठे। फिर क्या था, गाँव के चिढ़ना मशहूर हो गए। जिधर जाएँ बाल टोली पीछे पीछे , “ बित्तन के माई....”।
और एक दिन ! गोधूलि बेला से कुछ पहले सभी लोगों को घर वापस आया जान बित्तन टोले के एकमात्र कुएँ में कूद पड़े। जोर जोर से चिल्लाने लगे । पूरा गाँव इकठ्ठा हो गया। लोग पूछते,” काहें कूआँ में कूदि गइल हो? (कुएँ में क्यों कूद गए?)”, बित्तन पूछते, “ सब केहू आ गईल कि नाहिँ (सभी लोग आ गए कि नहीं?)”। केवल प्रश्न ही प्रश्न, उत्तर की चिन्ता किसी को नहीं ! एक बार फिर मुनेसरा सामने आया, “ हँ बाबा सब केहू आ गईल बा ( हाँ बाबा, सभी लोग इकठ्ठे हो गए हैं)”। बित्तन ने तब समाधान सी बोली निकाली, “अरे पहिले हमके निकालअ सो (पहले मुझे निकालो तो सही)”।
लोगों ने बित्तन बाबा को मिल जुल कर निकाला। बित्तन कुएँ की जगत पर ऊँचे खड़े हो गए । “सुनअ ए पंचे, साँझि के दीया बाती के बेरा बा। हम सौंह खा के कहतानि कि हमार माई भीख माँगेली आ खुदे खाली। हम्म्न के वोसे कौनो मतलब नाहीं। तोहरा सब से आ लइकन से हाथ जोड़ि के कहतानि, बिहने से हमसे ई बात फेर से न पुछिह जा, न चिढ़हइ जा (सभी लोग सुनें, शाम की दिया बत्ती की बेला है। मैं कसम खा कर कहता हूँ कि मेरी माँ भीख माँगती है और खुद ही खाती है। बाकी परिवार से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। आप सभी लोगों से और बच्चों से हाथ जोड़ कर निवेदन है कि कल से इस बारे में मुझसे न पूछा जाय और न ही चिढ़ाया जाय)”।
भीड़ में से किसी ने कुछ नहीं कहा और लोग धीरे धीरे अपने अपने घरों को चल दिए। बाल टोली भी चुपचाप खिसक ली।
फिर किसी ने बित्तन से इस बावत नहीं पूछा । बच्चों ने भी चिढ़ाना छोड़ दिया। मतवा वैसे ही भीख माँगती रहीं। लेकिन नीम के पेंड़ के नीचे पंचइति दुबारा नहीं बैठी।
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लंठ महानिष्कर्ष: जीवन में कई बार ऐसा कुछ घटित हो जाता है जिसका कोई तुक या तर्क नहीं होता। उसे जैसे का तैसा स्वीकारने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं होता। लेकिन इस विकल्पहीनता की स्थिति को भी संतुलन देना होता है और उसके लिए अप्रत्याशित कदम भी उठाने पड़ते हैं।
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मंगलवार, 18 अगस्त 2009

बाउ मण्डली और बारात एक हजार - प्रसंगांत

पिछ्ले भाग से जारी . . .
दिन की घनी छाई अन्हरिया जैसे खत्म हो गई हो - बजनिओं के मेठ नोखे ने चैती छेड़ी। फिर कहरवा, फगुआ और कजरी की धुनों ने खलिहान पर बारहमासी बयार बहा दिया। समधी भात खाने चले थे।
दुल्हन के घर की ओर समधी के साथ प्रस्थान करते नोखे ने सोहर धुन शुरू की। अष्टभुजा नहा धो वस्त्र बदल कर साथ हो लिए।
कृषक बाला के आँगन में खेलते नन्हें नन्हें छौनों की सम्भावना से नाहरसिंह गुलगुल हो गए। गाछे कटहर ओठे तेल - भीतर की सारी कटुता और अभिमान भूल मन ही मन नोखे की धुन पर सोहर गाने लगे।
”कहवाँ से आवेला पियरिया ललना ss पियरी पियरिया लागा झालर हो s।
कहवाँ से आवेला सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss
नैहर से आवेला पियरिया ललना ss पियरी पियरिया मोती झालर हो s
ललना ससुरा से आवेला सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss।
कहवाँ धरबे पियरी पियरिया लागा झालर हो ललना ss
कहवाँ धरबे सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो s।
पेटिया में धरबे पियरिया ललना पियरी पियरिया लागा झालर हो ss।
कोहबर धरबे सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss।
फाटि चुटि जैहें पियरिया ललनाss पियरी पियरिया लागा झालर होs।
जुगे जुगे बाढ़ो सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो s, ललना ss।“
धुन सुनते मिसिर जैसे बाउ को सोहर का भाष्य सुना रहे थे – “देख ss , सोहर में नइहर के पियरी के फटहा बना देहल बा लेकिन ससुरा के सेनुर त सोहाग ह । वोके जुग जुग बढ़ावल बा। गुलरि के फूल परि गइल बा का? अरे, सोहाग हे।(1)“
बाउ,” हूँ ss। सारे ए बेरा बजाई कबो सोचलो नाहीं रहलीं हे। नीक लागता।(2)“ मिसिर गमछा सँभालते और बाउ को पीछे छोड़ते विवाह के घर की ओर झड़क चले।
झलकारी ने बाजा की आवाज सुनी तो भाग दौड़ शुरू करा दीं। खलिहान काण्ड की खबर उन्हें लग चुकी थी। लेकिन बनमानुख बेटे पर भरोसा था. .
“समधी आवतने। जल्दी कर सो।(3)” उनकी जल्दी को कोसती बालाएँ काम में लग गईं।
(व)
झिनिया चावल का महर महर सुगन्धित भात, घी से बघारी अरहर की दाल, दहिबाड़ा, रिंकवच, सजाव दही, बरी कढ़ी, अँचार, चटनी, करैली, पाकल कोंहड़ा, केला और परवल की सब्जियाँ – यह थे मिसिर के बारह व्यञ्जन।
सब्जियों का चयन मिसिर की पाककला के ज्ञान का परिचायक था – करैली (तीत), पाकल कोंहड़ा (मीठ), केला (कसैला) और परवल (सुन्न) जैसे जीवन के चार रसों के परिचायक थे। समधी को सूक्ष्म सन्देश , हमारी बेटी तुम्हारे परिवार में सभी रस भर देगी, इस भात की शपथ उसकी बेकदरी न करना।
नाहरसिंह ने मंडप की गाँठ खोली और हिला कर स्थिर कर दिया। सम्बन्ध पक्का हो गया। सगोतियों के साथ खाने बैठे तो बगल में अष्टभुजा बाबा भी आकर बैठ गए। ब्राह्मण राजपूत के साथ पंक्ति में! सभी संकोच में आ गए। बाबा बहके,” रजा बाभन अगिनमुख होलें। अरे, हमार तोहार गोत्र त एके ह। साथे नाहिं बइठब त गारी कइसे सुनSब?(4)”। मिसिर ने सहमति में सिर हिलाया। आँखों में शरारत नाच रही थी। उधर परोसना शुरू किए और इधर भीतर से अंचरा से मुँह ढाँप झलकारी देवी ने आलाप लिया:
“कंचन मड़वा बिसकरमा बनवलें भात रचली अनपुरना हे
बइठीं समधी दशरथ जी पिढ़इया जनि करिं मन काठ हे........
स्वर्ण मंडप विश्वकर्मा से बनवाया है। अन्नपूर्णा से भोजन रचाया, हे राजा दशरथ भोजन करने के लिए पीढ़े पर बैंठें लेकिन काठ के आसन पर बैठ मन को काठ न करें।“ ओरहन को समझ और खलिहान की घटना याद कर नाहरसिंह लजा कर रह गए।
बेटी की माँ। आँखों से गंगा जमुना बह रही लेकिन रीत तो निभानी है। सुरसतिया की माई ने बोल उठाए:
“ओरियन ओरियन बइठे बरियतिया
मुहवाँ झुरइले ए बेटी नयना बहे लोरिया
केकरा के सौंपी ए समधी अपनी पुतरिया
हँसेलें समधी दशरथ जी
हमरा के सौंपि ए समधिन अपनी पुतरिया
रहिया खियइबे समधिन पाकल पनवा
घरवा पिअइबे सुरहिया गाइ के दुधवा
रउरा पुतरिया ए समधिन हमरे घर के लछमिनिया
हमरा के सौंपि ए समधिन अपनी पुतरिया।
युगों युगों से चले आ रहे उलाहने के स्वर। राजा दशरथ तुमने तो बहुत वादे किए थे। राह चलती पतोहू पान खाएगी इसका तक खयाल रखा था, लेकिन निकाल दिया न चौदह साल के लिए ! मेरी बेटी सीता को याद कर रो रही है समधी। कैसे तुम्हें सौंप दूँ अमानत? तुम भी तो उसी दगाबाज दशरथ की श्रेणी के हो।“
बाउ का गला भर आया। नाहर मन्डली चुपचाप मिसिर का बनाया स्वादिष्ट भोजन भकोस रही थी।
मिसिर ने भारीपन महसूसा तो लकार लगाई,” अरे, गरियो शुरू होखे।(5)“
झलकारी देवी ने उत्तर सा दिया।
“जेवन बइठेलें समधी राजा दशरथ बोलेलें सकुचि लजाइ जी
भितरा से समधिन हमरा के देखीं हम रउरा मेहमान जी
अँगना से बोलेलें राजा जनक जी अदला के बदला न लजाइँ जी।
दशरथ - अरे समधिन हम तुम्हारे मेहमान हैं। थोड़ा हमरी ओर भी नजरिया हो। आँगन से जनक जी उत्तर दिए ,लजाना मत । अदला बदली होगी।“
राजा दशरथ उर्फ नाहर सिंह और राजा जनक उर्फ पँड़ोही सिंह घरैतिनों की अदला बदली करेंगे ! बाउ को इस सम्भावना से ही गुदगुदी हो चली – अच्छे भइल बियाह नाँइ कइनी(6)। उसी रौ में मिसिर को इशारा किए । दही परोसते मिसिर ने अचानक तउला पटका और कछाड़ बाँध दुसह गारी गायन कढ़ा दिए। बेटे हरिहर ने बाप का यह रूप देखा तो हतप्रभ सा लजाते हुए दुआरे भाग गया।
” सब सखियाँ मिलि जेवना परोसें हो
समधी बिगड़ल बैला हाय सीताराम से बनी।
अरे समधी तो बिगड़ा बैल है, उसे सुन्दरी सखियाँ मिल व्यञ्जन क्यों परोस रही हैं? “
वृद्ध गरिमामय मिसिर का यह रूप ! न तो नाहर ने सोचा था और न अष्टभुजा ने। बिचारे खिसियाए से मजे लेने लगे। मिसिर तो झगड़ालू फूआ की भूमिका पूरी करने पर आमादा थे। एक के बाद एक गालियाँ निकलती चली गईं:
” समधी के बहिना के तीनि गो भतरवा
भरवा, कोंहरा, सोनरा हाय सीताराम से बनी।
समधी ने अपनी बहन ऐसे दरिद्र घर ब्याही है कि उसका भरण पोषण करने के लिए तीन तीन भतार लगे हैं – वो भी कौन? भर, कुम्हार और सोनार। अब तो सीताराम ही बिगड़ी बना पाएँगे“
कटाक्ष गजब का था ! उपर से एक पुरुष को यह सब गाता कभी देखा ही नहीं था। नरसिंघवा मगन हो गया।
मिसिर बउरा गए थे। हाथ चमकाते अगली फुलझड़ी छोड़ी,
”समधी के भगिना दबले बा जोबना
सुतल रहली खरिहाने, रचना राम से बनी।
समधी की बहन यौवन भार से दबी इतनी बौरा गई है कि खलिहान में सोती पाई गई है। ऐसी रचना भी विधाता ने इसके घर ही रचाया ।“ राजा दशरथ तुम्हारी कोई बहन भी थी क्या?
मार मुधइ के, बाबा त मउगा बानें(7) - बुढ़ऊ के इस अन्दाज पर नारियाँ भी मुँह दबाए भीतर भाग चलीं। बाउ ने हाथ पकड़ चेताया तो मिसिर चुपाए। अष्टभुजा की गारी सुनने की पिपाशा तृप्त हो चुकी थी। डकार लेते उठ गए।
विदाई के रूप में बाउ ने नाहरसिंह के हाथ में अपनी भुअरी भैंस का पगहा पकड़ा दिया। नरसिंघवा नाम जेहन से गायब हो चुका था। नाहर से इनकार करते न बना। हाथ जोड़ कर बाउ बोले,” कहल सुनल माफ कइ दीं। रउरे बहिन के खयाल राखब । गाँव के दुलारी रहलि हे . . .”(8)। आगे मारे भावुकता के कुछ बोल न पाए।
(श)
लोचना फिर बोलने लगा था। लेकिन नाहरसिंह के पास उसकी सफाई सुनने वाला मन ही नहीं रहा . . आने वाले छोटे छोटे छौनों की किलकारी को मन के आँगन में बसा रहे थे। . . .बरस भितरे पहले की आस थी। नाती ! .. हाथी गए हाथीशाला की ओर। घोड़े दौड़े घुड़साल। बारात विदा हो गई।
(ष)
परछावन और खोंइछा की रस्म पूरी हुई । उस समय आम तौर पर पाया जाने वाला अनासक्त वातावरण गायब था।
बुढिया काली माई के स्थान पर गमगीन भींड़। गाँव जवार से उखड़ती बेल दु:ख के सहारे लिपट विलाप कर रही थी ! बिदाई के समय का रूदन, सुरसतिया ने किसी को नहीं छोड़ा। रुला दिया सबको। रूदन ने कारुणिक लय ले ली थी:
अरे ए हमार बहिना ....अरे ए हमार भइया...
काका, केकरा खातिर टिकोरवा तू तूरब . .
काकी तोहार बरवा के झारी
के तोहार ढेंका चलाई...(9) हो अ ह ह हँ....
रोते हुए पँडोही ने बेटी को दुल्हे के साथ पिनिस में बिठाया। कहाँरों ने पिनिस उठाया कि अचानक दहाड़ मारती भइया भइया करती सुरसतिया कूद कर बाउ से लिपट पड़ी। औरतों ने सँभाल कर वापस चढ़ाया। फूट फूट कर रोते बाउ ने मुँह में गमछा ठूँसा और पोखरे की ओर भाग चले।
” निबिया के पेंड़ जनि कटिह हो बाबा चिरइया खोतवना झोंझ हे ss,
भइया के जनि कुछ बोलिह हो बाबा, भइया बड़ी बरजोर हे ss“
नीम के पेंड़ पर रहने वाली चिड़िया, उसके घोंसले और भइया के जिद्दी स्वभाव के बारे में बाबा को चेताती बेटी विदा हो गई। लगे हाथ दुआरे की नीम को न काटने का अनुरोध भी करती गई। सावन में आने पर झूला जो झूलना था ! हर घर का एक सदस्य कम हो गया। घरघुमनी जो चली गई थी।. . .
(ह)
सोहर मंत्र पढ़ते मानव प्रेत ने कट चुके ‘पोखरा पर के बाबा’ की जगह आँसुओं से सींच एक शीशम रोप दिया। मन्नत सी माँगी, बाबा गाँव की सब बेटी बहिनों को सुखी रखना !
पोखरे का तिलस्म टूट गया। जलप्रेत खत्म हो गए। अब बेटियाँ वहाँ पिंड़िया दहवाने जाती हैं। (प्रसंगांत)
अगला अंक – बित्तन बाबा
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लण्ठ महानिष्कर्ष: संकट से निपटने में सफलता त्वरित गति से सही दिशा में उठाए गए सही कदम पर निर्भर करती है। 'सही' का निर्धारण व्यक्ति के भीतर विद्यमान सनातन लण्ठई की मात्रा और उसकी बेवकूफी के अनुपात से होता है।
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अनुवाद:
(1) देखो, सोहर में नैहर की पियरी को फटा हुआ बताया गया है। लेकिन ससुराल का सिन्दूर तो सुहाग है सो उसे युगों युगों तक बढ़ता बताया गया है। जैसे सिन्होरा में गूलर का फूल पड़ गया हो – कभी खत्म नहीं होने की नियति लिए।
(2) साला इस समय बजाएगा सोचा ही नहीं था। अच्छा लग रहा है।
(3) समधी आ रहे हैं। तुम लोग जल्दी करो।
(4) राजा, ब्राह्मण अग्निमुख होते हैं। हमारा तुम्हारा गोत्र तो एक है। साथ नहीं बैठूँगा तो भोजन करते गाली गायन का आनन्द कैसे उठाऊँगा।
(5) अरे, कोई गाली भी शुरू करो।
(6) अच्छा हुआ जो मैंने विवाह नहीं किया।
(7) मुँह पकड़ कर मारो (औरतों का निजी गालीनुमा तकियाकलाम)। बाबा तो मउगा हैं।
(8) कहा सुना माफ करिए। आप बहन का खयाल रखिएगा। सारे गाँव की दुलारी है।
(9) काका किसके लिए तुम अमिया तोड़ोगे? काकी कौन तुम्हारे केश सँवारेगा और कौन तुम्हारा ढेंका (अनाज से छिलका निकालने और साफ करने का एक देहाती घरेलू यंत्र ) चलाएगा?
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शब्द सम्पदा:
मेठ – नायक; झड़क चलना – तेजी से चलना; झिनिया चावल – महीन चावल जिसे हमारी ओर काला नमक के नाम से जाना जाता है – धान काला होता है। वैसा सुगन्ध, स्वाद और रूप बासमती में क्या मिलेगा?; चैती – चैत के महीने में गाया जाने वाला ग्राम गीत;
गुलगुल – परमानन्द की स्थिति; गाछे कटहर ओठे तेल – एक भोजपुरी कहावत, पेंड़ में तो कटहल अभी लगा ही है। फल खाने के लिए अभी से होठों पर तेल लगाए बैठे हो ?; पियरिया – शुभ पीला वस्त्र; सिन्होरवा – सिन्दूर रखने का लकड़ी का बना पात्र; भात – पका हुआ चावल; रिंकवच - गहरी हरी अरबी के पत्ते को बेसन लपेट बनाई गई पकौड़ी; सजाव दही – उपले की आँच पर जला कर गाढ़े किए दूध से जमाई गई दही; पाकल कोंहड़ा – पका हुआ मीठा कद्दू; मीठ – मीठा; तीत – कड़वा; सुन्न – उदासीन स्वाद वाला; अँचरा – आँचल; ओरहन – उलाहना; तउला – दही जमाने का बड़ा मिट्टी का पात्र; कछाड़ – धोती को उपर उठा कस कर बाँधना; परछावन – दुल्हे की लोढ़ा (सिलबट्टा का बट्टा)से विदाई के समय की जाने वाली परीक्षा जिसमें नारियों द्वारा मंगल कामना और विदाई की जाती है; खोंइछा – दुल्हन की ओढ़नी में बाँधा जाने वाला मंगल अक्षत और धन; पिनिस – एक प्रकार की बड़ी पालकी जिसमें लम्बी यात्रा को काटने के सारे सुख साधन होते थे। सोलह कहाँर उठाते थे; पिंड़िया दहवाने – गोवर्धन पूजा के गोबर से बनी पिण्डिओं से लड़कियाँ महीने भर पूजा करती हैं। मन्नते माँगती हैं। बाद में जल में प्रवाहित कर देती हैं।


शनिवार, 15 अगस्त 2009

मेरी पचासवीं पोस्ट

चार महीने की सक्रियता के बाद आज किसी की बासठवीं वर्षगाँठ पर यह पचासवीं पोस्ट लिख रहा हूँ।

मुझे कोई ब्लॉग मिला है जिसके बारे में मैं यह कह सकता हूँ कि यदि मेरे ग्रेजुएशन के दिनों में ब्लॉगरी हो रही होती तो मैं ऐसा ही कुछ लिखता ।

वही उग्रता। वही निर्भीक पैनापन और लड़ने भिड़ने (?) को उद्यत वही जज्बा । हर बात को डिसेक्ट कर तार तार कर देने की आदत जो कभी कभी अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार लेने जैसी थी।

अधिक नहीं कहूँगा। न जाने इस युवा ने 27 जनवरी 2009 के बाद लिखना क्यों बन्द कर दिया?